Kali Nam Kam Taru Ram Ko

राम स्मरण
कलि नाम कामतरु राम को
दलनिहार दारिद दुकाल दुख, दोष घोर धन धाम को
नाम लेत दाहिनों होत मन वाम विधाता वाम को
कहत मुनीस महेस महातम, उलटे सूधे नाम को
भलो लोक – परलोक तासु जाके बल ललित – ललाम को
‘तुलसी’ जग जानियत नामते, सोच न कूच मुकाम को

Ram Kam Ripu Chap Chadhayo

धनुष भंग
राम कामरिपु चाप चढ़ायो
मुनिहि पुलक, आनंद नगर, नभ सुरनि निसान बजायो
जेहि पिनाक बिनु नाक किये, नृप सबहि विषाद बढ़ायो
सोई प्रभु कर परसत टूटयो, मनु शिवशंभु पढ़ायो
पहिराई जय माल जानकी, जुबतिन्ह मंगल गायो
‘तुलसी’ सुमन बरसि सुर हरषे, सुजसु तिहूँ पुर छायो

Are Man Jap Le Prabhu Ka Nam

नाम स्मरण
अरे मन जप ले प्रभु का नाम
पाँच तत्व का बना पींजरा, मढ़ा उसी पर चाम
आज नहीं कल छूट जायगा, भज ले करुणाधाम
द्रुपद-सुता ने उन्हें पुकारा, वसन रूप भये श्याम
श्रद्धा-भाव रहे मन में नित, जपो प्रभु का नाम
अजामील ने पुत्र-भाव से, नारायण का लिया नाम
सुलभ हो गई सद्गति उसको, पहुँचा उन के धाम
आर्तजनों के वे हितकारी, भज मन आठों याम
सब सुकृत का सार यही, भज राधा-कृष्ण ललाम  

Kapiraj Shri Hanuman Ka

श्री हनुमान
कपिराज श्री हनुमान का है वर्ण सम सिन्दूर के
ललाट पर केशर तिलक, हाथों में वज्र ध्वजा गही
अनुराग भारी झलकता, दो नयन से महावीर के
गल-माल तुलसी की ललित, मुस्कान मुख पे खिल रही
वे ध्यान में डूबे हुए, रघुकुल-तिलक श्री राम के
पुलकायमान शरीर है, अद्भुत छटा है छा रही
वे पर-ब्रह्म स्वरूप हैं, सेवक बड़े श्री राम के
महादेव के जो पुत्र हैं, संकट मेरे हर ले वही  

Guru Charno Me Shish Nava Ke Raghuvar

धनुष-भंग (राजस्थानी)
गुरुचरणों में सीस नवा के, रघुवर धनुष उठायोजी
बाण चढ़ावत कोई न देख्यो, झटपट तोड़ गिरायोजी
तीन लोक अरु भवन चतुर्दश, सबद सुणत थर्रायोजी
धरणी डगमग डोलन लागी, शेष नाग चकरायोजी
शूरवीर सब धुजण लाग्या, सबको गरब मिटायो जी 

Jab Gaye Shyam Mathura Udho

विरह व्यथा
जब गये श्याम मथुरा ऊधो, तब से गोकुल को भूल गये
यो कहते नन्द यशोदा के, आँखों से आँसू छलक गये
वह सुघड़ वेष कटि पीताम्बर, मुख कमल नित्य ही स्मरण करे
संग ग्वाल सखा, वंशी वादन, वृन्दावन में लाला विचरे
इस तरह नित्य मैया बाबा, सुत स्नेह लहर में थे बहते
स्तन से दूध प्रवाहित हो, इस विरह कहानी को कहते
भोली-भाली ब्रज बालायें भी, फूट फूट कर थीं रोतीं
विस्मृत न हुए वो निर्मोंही, उन्मत्त दशा इनकी होती
देकर अधारमृत प्यारे ने संतुष्ट किया था उन सबको
चित चुरा लिया उस कपटी ने, वे भूल नहीं सकती उसको
उन्मुक्त हँसी वह आलिंगन, रस महारास की क्रीड़ा में
रजनी भी शरद् पूर्णिमा की, जब रमण किया उनके संग में
वे पुनर्मिलन की आशा में, प्राणों को धारण करती थीं
हों लीन विरह की लीला में, इस भाँति बिलखती रहती थीं

Jo Bit Gaya So Bit Gaya

हरि भजन
जो बीत गया सो बीत गया, पल भर भी वापस नहीं आये
बहुमूल्य समय धन से बढ़कर, आदर उसका हम कर पाये
यह समय काल है वास्तव में, सबकी जो प्रतिपल उम्र हरे
जो करे समय का सदुपयोग तो, मानो उस पर विजय करे
घर बार धनार्जन कार्यों से अवकाश निकाले नित्य आप
श्रद्धापूर्वक हरि भजन करें, मिट जाये सब संताप ताप

Devi Doshon Ka Daman Kare

देवी चरित्र
देवी दोषों का दमन करे
करती कृपा सदा भक्तों पर, उनके कष्ट हरे
नष्ट करें दुष्टो को माता, कर त्रिशूल धरे
मूल प्रकृति से सृष्टि का सृजन, ये भी आप करे
चन्द्रवदनी माँ दिव्याभूषण, वस्त्र धरे रति लाजे
वे ही तो हिमाचल की पुत्री जो, शिव वामांग विराजै
महिषासुर निशुम्भ शुम्भ का भी, तो ध्वंस किया हे माता
रण सिंहिनी तुम्हीं हो देवी, पार न कोई पाता 

Pashu Hinsa Ka Ho Gaya Ant

भगवान बुद्ध
पशु-हिंसा का हो गया अन्त, भगवान बुद्ध अवतरित हुए
लख यज्ञ कर्म में पशु-वध को, अन्याय घोर प्रभु द्रवित हुए
वे कृपा सिन्धु करुणानिधि थे, वैराग्यवान् जो बुद्ध हुए
राजा शुद्धोधन की रानी, मायादेवी से जन्म लिया
सोचा पशु का वध क्रूर कर्म, जड़ता को तत्पर दूर किया
पशु-हिंसा द्वारा यज्ञों से, हो पूर्ण कामना तुच्छ भाव
अज्ञान-दोष से मुक्त किया, पशु-वध था केवल हीन भाव
वे तपोलीन महायोगी थे, पद्मासन में ध्यानस्थ रहें
पशुओं को जीवन दान दिया, हिंसा में व्यर्थ ही रक्त बहे  

Prabhu Se Jo Sachcha Prem Kare

हरि-भक्ति
प्रभु से जो सच्चा प्रेम करे, भव-सागर को तर जाते हैं
हरिकथा कीर्तन भक्ति करे, अर्पण कर दे सर्वस्व उन्हें
हम एक-निष्ठ उनके प्रति हों, प्रभु परम मित्र हो जाते हैं
लाक्षागृह हो या चीर-हरण, या युद्ध महाभारत का हो
पाण्डव ने उनसे प्रेम किया, वे उनका काम बनाते है
हो सख्य-भाव उनसे अपना, करुणा-निधि उसे निभायेंगे
सुख-दुख की बात कहें उनसे, वे ही विपदा को हरते हैं