Bhaj Man Ram Charan Sukh Dai

भज मन राम-चरण सुखदाई
जिहि चरनन ते निकसी सुर-सरि, शंकर-जटा समाई
जटा शंकरी नाम पर्यो है, त्रिभुवन तारन आई
जिन चरनन की चरन-पादुका, भरत रह्यो लवलाई
सोई चरन केवट धोइ लीन्हे, तब हरि नाव चढ़ाई
सोई चरन संतन जन सेवत, सदा रहत सुखदाई
सोई चरन गौतम ऋषि-नारी, परसि परम पद पाई
दंडक वन प्रभु पावन कीन्हो, ऋषि मन त्रास मिटाई
सोई प्रभु त्रिलोक के स्वामी, कनक मृगा सँग धाई
कपि सुग्रीव बन्धु भय व्याकुल, तब जय छत्र फिराई
रिपु को अनुज विभीषण निसिचर, परसत लंका पाई
शिव सनकादिक अरु ब्रह्मादिक, शेष सहस मुख गाई
‘तुलसिदास’ मारुत-सुत की प्रभु, निज मुख करत बड़ाई

Advitiy Madhuri Jodi

युगल माधुर्य
अद्वितीय माधुरी जोड़ी, हमारे श्याम श्यामा की
रसीली रसभरी अखियाँ, हमारे श्याम श्यामा की
चितवनि कटीली बाँकी सुघड़ सूरत मधुर बतियाँ
लटकनें कान में सुन्दर, हमारे श्याम श्यामा की
मुकुट और चन्द्रिका माथे, अधर पर पान की लाली
अहो! कैसी भली छबि है, हमारे श्याम श्यामा की
प्रेम में वे पगे विहरें, श्री वृन्दावन की कुंजो में
बसे मन मे यही शोभा, अनूठी श्याम श्यामा की

Utrai Le Lo Kewat Ji

केवट का प्रेम (राजस्थानी)
उतराई ले लो केवटजी, थाँरी नाव की
चरण पकड़ यूँ केवट बोल्यो, सुणो राम रघुराई
थाँरी म्हारी जात न न्यारी, ल्यूँ कइयाँ उतराई
धोबी सूँ धोबी ना लेवे, कपड़ो लेत धुलाई
नाई सूँ नाई ना लेवे, बालाँ की कतराई
थे केवट हो भवसागर का, म्हारे नदी तलाई
जब मैं आऊँ घाट आपरे, दीज्यों पार लगाई
राम लखन सीता के मन में, केवट प्रीति समाई
वर दीन्हो भगती को प्रभुजी, आगे लई विदाई 

Krishna Priya Jamuna Maharani

श्री यमुना स्तवन
कृष्ण-प्रिया जमुना महारानी
श्यामा वर्ण अवस्था षोडश सुन्दर रूप न जाय बखानी
नयन प्रफुल्लित अम्बुज के से, नुपूर की झंकार सुहानी
नीली साड़ी शोभित करधनी मोतियन माल कण्ठ मनभानी
स्वर्ण रत्न निर्मित दो कुण्डल, दिव्य दीप्ति जिसकी नहीं सानी
आभूषण केयूर आदि की,असीमित शोभा सुखद सुहानी
देवी का सौन्दर्य मनोहर, धरे हृदय में ऋषि, मुनि ज्ञानी
सूर्य-नन्दिनी यमुना मैया, भक्ति कृष्ण की दो वरदानी

Rang Chayo Barsane Main

होली
रंग छायो बरसाने में
नंदलाल खेलन को आयो होरी को हुरदंग मचायो
नाचै सब दे दे कर ताल, रंग छायो बरसाने में
घर द्वारे पे घेर के गोरिन ऊपर रंग बरसायो
सब मगन भई ब्रजबाल, रंग छायो बरसाने में
छैली मीठी बात बनावे, गोपिन को मन ये ललचाये
श्याम ने सबको किचड निहाल, रंग छायो बरसनो में
सखियाँ बज विविध बजावैं, प्यारे को मिल नाच नचावैं
गगन में छायो लाल गुलाल, रंग छायो बरसाने में
सब के मन आनंद समाये,कोई पार न इसको पाये
यमुन जल भयो आज है लाल, रंग छायो बरसाने में 

Jiwan Main Sadgun Apnayen

सदाचरण
जीवन में सद्गुण अपनाएँ
जिसके जीवन में सदाचार, वह आगे बढ़ता ही जाए
सेवा सत्कार बड़ों का हो, आशीष स्वतः उनसे पाएँ
जो व्यक्ति हमारी मदद करे, हों कृतज्ञ भूल यह नहीं जाए
जो भी दुगुर्ण में लिप्त रहे, वह बीज बुराई का बोता
सज्जन संतों का संग करे, जीवन में दुःखी नहीं होता 

Trashna Hi Dukh Ka Karan Hai

तृष्णा
तृष्णा ही दुःख का कारण है
इच्छाओं का परित्याग करे, संतोष भाव आ जाता है
धन इतना ही आवश्यक है जिससे कुटंब का पालन हो
यदि साधु सन्त अतिथि आये, उनका भी स्वागत सेवा हो
जो सुलभ हमें सुख स्वास्थ्य कीर्ति, प्रारब्ध भोग इसको कहते
जो झूठ कपट से धन जोड़ा, फलस्वरूप अन्ततः दुख सहते
उसकी रक्षा की चिन्ता हो, कुछ भी तो साथ नहीं जाता
सत्कर्म किया हो जीवन में, सद्भाव काम में तब आता 

Nirbal Ke Pran Pukar Rahe Jagdish Hare

जगदीश स्तवन
निर्बल के प्राण पुकार रहे, जगदीश हरे जगदीश हरे
साँसों के स्वर झंकार रहे, जगदीश हरे जगदीश हरे
आकाश हिमालय सागर में, पृथ्वी पाताल चराचर में
ये शब्द मधुर गुंजार रहे, जगदीश हरे जगदीश हरे
जब दयादृष्टि हो जाती है, जलती खेती हरियाती है
इस आस पे जन उच्चार रहे, जगदीश हरे जगदीश हरे
तुम हो करुणा के धाम सदा, शरणागत राधेश्याम सदा
बस मन में यह विश्वास रहे, जगदीश हरे जगदीश हरे

Prabhu Ko Prasanna Ham Kar Paye

श्रीमद्भागवत
प्रभु को प्रसन्न हम कर पाये
चैतन्य महाप्रभु की वाणी, श्री कृष्ण भक्ति मिल जाये
कोई प्रेम भक्ति के बिना उन्हें, जो अन्य मार्ग को अपनाये
सखि या गोपी भाव रहे, संभव है दर्शन मिल जाये
हम दीन निराश्रय बन करके, प्रभु प्रेमी-जन का संग करें
भगवद्भक्तों की पद-रज को, अपने माथे पर स्वतः धरें
यशुमति-नंदन श्री कृष्णचन्द्र, आराध्य परम एक मात्र यही
दुनिया के बंधन तोड़ सभी, हम वरण करें बस उनको ही
उत्कृष्ट ग्रन्थ श्रीमद्भागवत, सब शास्त्रों का है यही सार
हम पढ़ें, नित्य संकीर्तन हो, प्रभु भक्ति का उत्तम प्रकार

Biraj Main Holi Khelat Nandlal

होली
बिरज में होरी खेलत नँदलाल
ढोलक झाँझ मँजीरा बाजत, सब सखियाँ मिल होरी गावत,
नाचत दे दे ताल
भर भरके पिचकारी मारत, भीजत है ब्रज के नर नारी,
मुग्ध भई ब्रज-बाल
धरती लाल, लाल भयो अम्बर, लाल राधिका, लालहि नटवर,
उड़त अबीर गुलाल
होरी खेलत है कुँवर कन्हाई, जमुना तट पर धूम मचाई,
क्रीड़ा करत गुपाल