Bethi Sagun Manavati Mata

माँ की आतुरता
बैठी सगुन मनावति माता
कब ऐहैं मेरे बाल कुसल घर, कहहु, काग ! फुरि बाता
दूध-भात की दौनी दैहौं, सोने चोंच मढ़ैहौं
जब सिय-सहित विलोकि नयन भरि, राम-लषन उर लैहौं
अवधि समीप जानि जननी जिय अति आतुर अकुलानी
गनक बोलाइ, पाँय परि पूछति, प्रेम मगन मृदु बानी
तेहि अवसर कोउभरत निकट तें, समाचार लै आयो
प्रभु-आगमन सुनत ‘तुलसी’ मनु, मीन मरत जल पायो

Adbhut Shri Vrindavan Dham

वृन्दावन
धामअद्भुत श्री वृन्दावन धाम
यमुनाजी की धारा बहती, केलि राधिका श्याम
मुरली की ध्वनि मधुर गूँजती और नाचते मोर
इकटक निरख रहे पशु पक्षी, नटवर नन्द-किशोर
बंशी स्वर, मयूर नृत्य में, स्पर्धा रुचिकारी
पाँख मोर की निकल पड़ी, तो मोहन सिर पर धारी
राधारानी के मयूर की, भेंट मिली कान्हा को
इसीलिये सहर्ष श्याम ने, स्वीकारी है इसको

Itna To Karna Swami Jab Pran Tan Se Nikale

विनती
इतना तो करना स्वामी, जब प्राण तन से निकले
गोविन्द नाम लेकर, फिर प्राण तन से निकले
श्री यमुनाजी का तट हो, स्थान वंशी-वट हो
मेरा साँवरा निकट हो, जब प्राण तन से निकलें
श्री वृन्दावन का थल हो, मेरे मुख में तुलसी दल हो
विष्णु-चरण का जल हो, जब प्राण तन से निकलें
मेरा साँवरा निकट हो, मुरली का स्वर भरा हो
तिरछा चरण धरा हो, जब प्राण तन से निकलें
सिर सोहना मुकुट हो, मुखड़े पै काली लट हो
यही ध्यान मेरे घट हो, जब प्राण तन से निकलें
पट-पीत कटि बँधा हो, होठों पे भी हँसी हो
छवि मन में यह बसी हो, जब प्राण तन से निकलें
जब कण्ठ प्राण आवें, कोई रोग ना सतावें
यम त्रास ना दिखावे, जब प्राण तन से निकलें
मेरा प्राण निकले सुख से, तेरा नाम निकले मुख से
बच जाऊँ घोर दुःख से, जब प्राण तन से निकलें
आना अवश्य आना, राधे को साथ लाना
इतनी कृपा तो करना, जब प्राण तन से निकलें

Krishna Katha Nit Hi Sune

सदुपदेश
कृष्ण-कथा नित ही सुनें, श्रद्धा प्रेम बढ़ाय
जो भी वस्तु परोक्ष हो, सुनें ध्यान में आय
नेत्र-कोण की लालिमा, मन्द मन्द मुस्कान
वस्त्राभूषण प्रीतिमा, मोहन का हो ध्यान
श्रीहरि के माहात्म्य का, करे नित्य ही गान
सुदृढ़ प्रेम उन से करें, माधुरी का रस-पान
श्रवण, कीर्तन, भजन हो, स्वाभाविक हरि-ध्यान
विषयों में रुचि हो नहीं, यही भक्ति का मान
हरि स्मरण, नित भजन की, पड़ जाये जो बान
पातक जो छोटे बड़े, भस्म करें भगवान
मन-मन्दिर में आ बसे, राधाकृष्ण स्वरूप
अभिव्यक्ति संभव नहीं, परम भक्ति का रूप
अक्षय-वट के पात्र में, सोये बाल-मुकुंद
सुधामयी मुसकान है, पाणि चरण अरविन्द
करते सृष्टि विश्व की, हों न किन्तु अनुरक्त
प्राणि-मात्र में चेतना, होती हरि की व्यक्त

Ghanshyam Mujhe Apna Leo

शरणागति
घनश्याम मुझे अपना लेओ, मैं शरण तुम्हारे आन पड़ी
मैंने मात, पिता घर बार तजे, तो लोग कहें मैं तो बिगड़ी
अब छोड़ सभी दुनियादारी, मैं आस लगा तेरे द्वार खड़ी
यौवन के दिन सब बीत गये, नहिं चैन मुझे अब एक घड़ी
हे प्राणेश्वर, हे मुरलीधर, मुझको है तुमसे आस बड़ी
वह नयन मनोहारी चितवन, मेरे उर के बीच में आन अड़ी

Jiwan Ko Yagya Banaye Ham

यज्ञ
जीवन को यज्ञ बनायें हम
निष्काम भाव से ईश्वर को, जब कर्म समर्पित हो जाते
तो अहं वासना जल जाते, मुक्ति का दान वही देते
हम हवन कुण्ड में समिधा से अग्नि को प्रज्वलित करते
आहुति दे घृत वस्तु की, वेदों में यज्ञ इसे कहते
जब प्राण बचाने परेवा का, राजा शिवि जो अपने तन का
सब मांस भेंट ही कर देते, यह भूत यज्ञ अद्भुत उनका
कई दिन से भूखे रंतिदेव, परिवार सहित जब अतिथि को
सारा भोजन अर्पित करते, भूखा रखकर वे अपने को
दधीचि महर्षि ने निज तन की, दे दी थी अस्थियाँ देवों को
सेवा पथ का यह श्रेष्ठ रूप, गीता में यज्ञ कहे इसको
परहित में जो शुभ कर्म करे अकर्म वही कहलाते हैं
परमार्थ का जो भी कर्म करें, यज्ञ स्वरूप हो जाते हैं

Tu Ga Le Prabhu Ke Geet

हरि भजन
तूँ गा ले प्रभु के गीत
दुनिया एक मुसाफिर खाना, जाना एक दिन छोड़ के
मात-पिता बंधु सुत पत्नी, सब से नाता तोड़ के
एक दिन ये सुन्दर घर तेरा मिट्टी में मिल जाएगा
तुझे अचानक ले जाने को, काल एक दिन आएगा
अब तो होश सँभालो प्यारे, व्यर्थ ही समय गँवाओ ना
हीरे जैसा नर तनु पाया, कोड़ी मोल लुटाओ ना

Narayan Ka Nit Nam Japo

कीर्तन महिमा
नारायण का नित नाम जपो, हृदय से मंगलकारी
श्री राम कृष्ण हरि नारायण एक ही स्वरूप संकट हारी
है रामबाण औषधि है सब रोगों का जो शमन करें
प्रभु कीर्तन हो तन्मय हो कर सब चिंताओं को दूर करें
कलि-काल में साधन बड़ा यही हम जपे प्रभु का नाम नित्य
परिवार सहित संकीर्तन हो, वे करुणा सागर शांतिधाम 

Prabhu Ki Satta Hai Kahan Nahi

सर्व शक्तिमान्
प्रभु की सत्ता है कहाँ नहीं
घट घट वासी, जड़ चेतन में, वे सर्व रूप हैं सत्य सही
प्रतिक्षण संसार बदलता है, फिर भी उसमें जो रम जाये
जो नित्य प्राप्त परमात्म तत्व, उसका अनुभव नहीं हो पाये
स्थित तो प्रभु हैं कहाँ नहीं, पर आवृत बुद्धि हमारी है
मन, बुद्धि, इन्द्रियों से अतीत, लीला सब उनकी न्यारी है

Badi Maa Kaise Jiun Bin Ram

भरत का प्रेम
बड़ी माँ! जीऊँ कैसे बिन राम
सिया, राम, लछमन तो वन में, पिता गये सुरधाम
कुटिल बुद्धि माँ कैकेयी की, बसिये न ऐसे ग्राम
भोर भये हम भी वन जैहें, अवध नहीं कछु काम
अद्भुत प्रेम भरत का, प्रस्थित गये मिलन को राम