Main Krishna Nam Ki Chudiyan Pahanu

भरतार श्याम
मैं कृष्ण नाम की चुड़ियाँ पहनूँ, आँख में कजरा डार
गले में मोतियन माला पहनूँ, उनके हित श्रंगार
ऐसे जन को नहीं वरूँ मैं, जो कि जिये दिन चार
मेरे तो भरतार श्याम हैं, उन सँग करूँ विहार
करूँ निछावर जीवन सारा, वे ही प्राणाधार
स्वत्व मिटे, कुछ रहे न मेरा, माया मोह निवार

Van Main Ruchir Vihar Kiyo

वन विहार
वन में रुचिर विहार कियो
शारदीय पूनम वृन्दावन, अद्भुत रूप लियो
धरी अधर पे मुरली मोहन स्वर लहरी गुंजाई
ब्रज बालाएँ झटपट दौड़ी, सुधबुध भी बिसराई
छलिया कृष्ण कहे सखियों को, अनुचित निशि में आना
लोक लाज मर्यादा हेतु, योग्य पुनः घर जाना
अनुनय विनय करें यों बोली, ‘तुम सर्वस्व हमारे’
‘पति-पुत्र घर सब कुछ त्यागा, आई शरण तुम्हारे’
कहा श्याम ने ‘ऋणी तुम्हारा, मुझको जो अपनाया’
भ्रमण किया उनके संग वन में, मन का मोद बढ़ाया
शीतल मन्द समीर बह रहा, लता पुष्प विकसाये
करें श्याम आलिंगन उनको, मृदुल हास्य बिखराये
हुआ गर्व सम्मानित होकर, लगा श्याम हैं वश में
अन्तर्धान हुवे बनवारी, लिये राधिका सँग में
करने लगी विलाप गोपियाँ, भटक रही वन-वन में
‘हाय! श्यामसुन्दर ने हमको, त्याग दिया कानन में’
उधर मदनमोहन करते थे, प्रणय-केलि राधा से
मान हो गया कहा ‘प्राणधन, क्लांत हुई चलने से’
बोले मोहन-‘चढ़ जाओ, कंधे पर प्राण-पियारी’
लगी बैठने ज्यों ही तब तो, लुप्त हुवे बनवारी
हुआ न सहन वियोग श्याम का, जिनसे प्रेम अगाधा
करते खोज गोपियाँ आई, देखा मूर्छित राधा
विजन झले फिर धैर्य बँधाया, हुई चेतना तब तो
करने लगी विलाप पुकारें, ‘मिलो प्राणपति अब तो’
रह न सके दुख दूर किया, प्रकटे नयनों के तारे
करुणासिक्त वचन में बोली, ‘कहाँ छिपे थे प्यारे’
नवल कृष्ण की वन-क्रीड़ा जो, श्रवण करे श्रद्धा से
करे प्रचार धरा पे उनको मुक्ति मिले पापों से

Shri Mahalakshmi Jag Janani Ka

श्रीमहालक्ष्मी स्तवन
श्री महालक्ष्मी जगजननी का, हम श्रद्धापूर्वक करें ध्यान
जिनका है वर्ण स्वर्ण जैसा, उनकी महिमा का करें गान
सद्भाव, अतिथि की सेवा हो, सत्कर्म जहाँ नित होता हो
देवार्चन-प्रेम भाव मन का, आवास वहीं हो माता का
माँ को अति प्रिय है शील सत्य, सत्संग कीर्तन जहाँ नित्य
जहाँ प्राणि-मात्र प्रति प्रेम भाव, वहाँ धन का नहीं होगा अभाव
जहाँ भोग, क्रूरता और क्लेश, दारिद्य वहाँ करता प्रवेश
व्यवहार कपट अरु वचन झूठ, महालक्ष्मी जाती वहाँ रूठ
सबके प्रति करुणा हो मन में, आस्तिकता श्रद्धा हो प्रभु में
करुणामयी मैया कृपा करो, कालुष्य हृदय का आप हरो

Om Jay Lakshmi Ramana

सत्यनारायण आरती
ॐ जय लक्ष्मीरमणा, प्रभु जय लक्ष्मीरमणा
सत्यनारायण स्वामी, जन-पातक हरणा —-ॐ जय…..
रत्नजटित सिंहासन, अद्भुत छबि राजे —-प्रभु अद्भुत ….
नारद करत निराजन, घंटा धवनि बाजै —-ॐ जय ….
प्रकट भये कलि कारण, द्विज को दरस दियो —-प्रभु द्विज …
बूढ़े ब्राह्मण बनकर, कंचन-महल कियो —-ॐ जय…..
दुर्बल भील व दीन, जिन पर कृपा करी —-प्रभु जिन ….
चन्द्रचूड़ एक राजा, जिनकी विपति हरी —-ॐ जय…..
वैश्य मनोरथ पायो, श्रद्धा तज दीन्ही —-प्रभु श्रद्धा …..
सो फल भोग्यो प्रभुजी, फिर स्तुति कीन्ही —-ॐ जय…..
भाव-भक्ति के कारण, छिन-छिन रूप धर्यो —-प्रभु छिन….
श्रद्धा धारण किन्ही, तिनको काज सर्यो —- —-ॐ जय ….
ग्वाल-बाल सँग राजा, वन में भक्ति करी —-प्रभु वन ….
मनवांछित फल दीन्हो, विपदा आप हरी —-ॐ जय ….
चढ़त प्रसाद सवायो, कदली फल, मेवा —-प्रभु कदली ….
धूप-दीप-तुलसी से, राजी सत देवा —-ॐ जय ….
सत्यदेव की आरति, जो कोई जन गावे —-प्रभु जो ….
सुख सम्पति यश आये, मनवांछित पाये —-ॐ जय ….

Aaj Grah Nand Mahar Ke Badhai

जन्मोत्सव
आज गृह नंद महर के बधाई
प्रात समय मोहन मुख निरखत, कोटि चंद छवि छाई
मिलि ब्रज नागरी मंगल गावति, नंद भवन में आई
देति असीस, जियो जसुदा-सुत, कोटिन बरस कन्हाई
अति आनन्द बढ्यौ गोकुल में, उपमा कही न जाई
‘सूरदास’ छवि नंद की घरनी, देखत नैन सिराई

Chalat Lal Penjani Ke Chai

बालकृष्ण लीला
चलत लाल पैंजनि के चाइ
पुनि-पुनि होत नयौ-नयौ आनँद, पुनि पुनि निरखत पाँइ
छोटौ बदन छोटि यै झिंगुली, कटि किंकिनी बनाइ
राजत जंत्र हार केहरि नख, पहुँची रतन जराइ
भाल तिलक अरु स्याम डिठौना, जननी लेत बलाइ
तनक लाल नवनीत लिए कर, ‘सूरदास’ बलि जाइ

Dekho Ri Nand Nandan Aawat

श्री चरण
देखौ री नँदनंदन आवत
वृन्दावन तैं धेनु-वृंद बिच, बेनु अधर धर गावत
तन घनश्याम कमल-दल-लोचन, अंग-अंग छबि पावत
कारी-गोरी, धौरी-धूमरि, लै लै नाम बुलावत
बाल गोपाल संग सब सोभित, मिलि कर-पत्र बजावत
‘सूरदास’ मुख निरखत ही मुख, गोपी-प्रेम बढ़ावत

Braj Me Hari Hori Machai

होली
ब्रज में होरी मचाई
इत ते आई कुँवरि राधिका, उतते कुँवर कन्हाई
गोपिन लाज त्यागि रंग खेलत, शोभा बरनि न जाई, नंद-घर बजत बधाई
बाजत ताल मृदंग बाँसुरी, बीना डफ शहनाई
उड़त अबीर, गुलाल, कुंकुमा, रह्यो चहुँ दिसि छाई, मानो मघवा झड़ी लगाई
भरि-भरि रंग कनक पिचकारी, सन्मुख सबै चलाई
छिरकत रंग अंग सब भीजै, झुक झुक चाचर गाई, अति उमंग उर छाई
राधा सेन दई सखियन को, झुंड झुंड घिर आई
लपट लपट गई श्याम सुंदर सौं, हाथ पकर ले जाई, लालजी को नाच नचाई
उत्सुक सबहीं खेलन आई, मरजादा बिसराई
‘सूरदास’ प्रभु छैल छबीले, गोपिन अधिक रिझाई, प्रीति न रही समाई

Ye Din Rusibe Ke Nahi

दर्शन की प्यास
ये दिन रूसिबै के नाहीं
कारी घटा पवन झकझोरै, लता तरुन लपटाहीं
दादुर, मोर, चकोर, मधुप, पिक, बोलत अमृत बानी
‘सूरदास’ प्रभु तुमरे दरस बिन, बैरिन रितु नियरानी

Shyam Bina Unaye Ye Badara

विरह व्यथा
स्याम बिना उनये ये बदरा
आज श्याम सपने में देखे, भरि आए नैन ढुरक गयो कजरा
चंचल चपल अतिही चित-चोरा, निसि जागत मैका भयो पगोरा
‘सूरदास’ प्रभु कबहि मिलोगे, तजि गये गोकुल मिटि गयो झगरा