Tan Ki Dhan Ki Kon Badhai

अन्त काल
तन की धन की कौन बड़ाई, देखत नैनों में माटी मिलाई
अपने खातिर महल बनाया, आपहि जाकर जंगल सोया
हाड़ जले जैसे लकरि की मोली, बाल जले जैसे घास की पोली
कहत ‘ कबीर’ सुनो मेरे गुनिया, आप मरे पिछे डूबी रे दुनिया

Ram Nam Ke Bina Jagat Main

राम आसरा
राम नाम के बिना जगत में, कोई नहीं भाई
महल बनाओ बाग लगाओ, वेष हो जैसे छैला
इस पिजड़े से प्राण निकल गये, रह गया चाम अकेला
तीन मस तक तिरिया रोवे, छठे मास तक भाई
जनम जनम तो माता रोवे, कर गयो आस पराई
पाँच पचास बराती आये, ले चल ले चल होई
कहत ‘कबीर’ सुनो भाई साधो, यह गति तेरी होई

Tune Hira So Janam Gawayo

भजन महिमा
तूँने हीरा सो जनम गँवायो, भजन बिना बावरे
ना संता के शरणे आयो, ना तूँ हरि गुण गायो
पचि पचि मर्यो बैल की नाईं, सोय रह्यो उठ खायो
यो संसार हात बनियों की, सब जग सौदे आयो
चतुर तो माल चौगुना कीना, मूरख मूल गवाँयो
यो संसार माया को लोभी, ममता महल चितायो
कहत ‘ कबीर’ सुनो भाई साधो, हाथ कछू नहीं आयो

Ram Bhaja So Hi Jag Main Jita

भजन महिमा
राम भजा सोहि जग में जीता
हाथ सुमिरनी, बगल कतरनी, पढ़े भागवत गीता
हृदय शुद्ध कीन्हों नहीं तेने, बातों में दिन बीता
ज्ञान देव की पूजा कीन्ही, हरि सो किया न प्रीता
धन यौवन तो यूँ ही जायगा, अंत समय में रीता
कहे ‘कबीर’ काल यों मारे, जैसे हरिण को चीता

Din Yu Hi Bite Jate Hain Sumiran Kar Le Tu Ram Nam

नाम स्मरण
दिन यूँ ही बीते जाते हैं, सुमिरन करले तूँ राम नाम
लख चौरासी योनी भटका, तब मानुष के तन को पाया
जिन स्वारथ में जीवन खोया, वे अंत समय पछताते हैं
अपना जिसको तूँने समझा, वह झूठे जग की है माया
क्यों हरि का नाम बीसार दिया, सब जीते जी के नाते हैं
विषयों की इच्छा मिटी नहीं, ये नाशवान सुन्दर काया
गिनती के साँस मिले तुझको, जाने पे फिर नहीं आते हैं
सच्चे मन से सुमिरन कर ले, अब तक मूरख मन भरमाया
साधु-संगत करले ‘कबीर’, तो निश्चित ही तर जाते हैं

Sajanwa Nainan Mere Tumhari Aur

हरि दर्शन
सजनवा नैनन मेरे तुमरी ओर
विरह कमण्डल हाथ लिये हैं, वैरागी दो नैन
दरस लालसा लाभ मिले तो, छके रहे दिन रैन
विरह भुजंगम डस गया तन को, मन्तर माने न सीख
फिर-फिर माँगत ‘कबीर’ है, तुम दरशन की भीख

Deh Dhara Koi Subhi Na Dekha

दुःखी दुनिया
देह धरा कोई सुखी न देखा, जो देखा सो दुखिया रे
घाट घाट पे सब जग दुखिया, क्या गेही वैरागी रे
साँच कहूँ तो कोई न माने, झूट कह्यो नहिं जाई रे
आसा तृष्णा सब घट व्यापे, कोई न इनसे सूना रे
कहत ‘कबीर’ सभी जग दुखिया, साधु सुखी मन जीता रे

Ham To Ek Hi Kar Ke Mana

आत्म ज्ञान
हम तो एक ही कर के माना
दोऊ कहै ताके दुविधा है, जिन हरि नाम न जाना
एक ही पवन एक ही पानी, आतम सब में समाना
एक माटी के लाख घड़े है, एक ही तत्व बखाना
माया देख के व्यर्थ भुलाना, काहे करे अभिमाना
कहे ‘कबीर’ सुनो भाई साधो, हम हरि हाथ बिकाना

Pani Main Min Piyasi Re

आत्म ज्ञान
पानी में मीन पियासी रे, मोहे सुन-सुन आवे हाँसी रे
जल थल सागर पूर रहा है, भटकत फिरे उदासी रे
आतम ज्ञान बिना नर भटके, कोऊ मथुरा, कोई कासी रे
गंगा और गोदावरी न्हाये, ज्ञान बिना सब नासी रे
कहत ‘कबीर’ सुनो भाई साधो, सहज मिले अविनासी रे

He Antaryami Prabho

हितोपदेश
हे अंतर्यामी प्रभो, आत्मा के आधार
तो तुम छोड़ो हाथ तो, कौन उतारे पार
आछे दिन पाछे गये, हरि से किया न हेत
अब पछताये होत क्या, चिड़िया चुग गई खेत
ऊँचे कुल क्या जनमिया, करनी ऊँच न होई
सुवरन कलस सुरा भरा, साधू निन्दे सोई
ऐसी बानी बोलिये, मन का आपा खोय
औरन को सीतल करै, आपहुँ सीतल होय
कबिरा आप ठगाइये, और न ठगिये कोय
आप ठग्या सुख ऊपजै, और ठग्या दुख होय
काशी काँठे घर करे, पीजै निरमल नीर
मुक्ति नहीं हरिनाम बिनु, यों कहे दास कबीर
गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागौं पाँय
बलिहारी गुरु आपकी, गोविन्द दियो बताय
चलती चाकी देख के, दिया कबीरा रोय
दो पाटन के बीच में, साबुत बचा न कोय
चाह मिटी चिन्ता गई, मनुआ बेपरवाह
जिनको कछू न चाहिये, सो शाहन को शाह
जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान
मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान
जिहि घर साधु न पूजते, हरि की सेवा नाहिं
ते घर मरघट सारिखे, भूत बसे तिन माँहि
तन को जोगी सब करै, मन को बिरला कोइ
सिद्धि सहज ही पाइए, जो मन जोगी होइ
दोष पराये देख कर, राजी मन में होय
अपने दोष जो देखते, बुद्धिमान नर सोय
निंदक नियरे राखिये, आँगन कुटी छबाय
बिन साबुन पानी बिना, निर्मल करे सुभाय
पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय
मन के मते न चालिये, मन के मते अनेक
जो मन पर असवार हो, सो नर कोई एक
माँगन मरन समान है, मत माँगो कोई भीख
माँगन ते मरना भला, सतगुरु की यह सीख
माया मरी न मन मरा, मर मर गये शरीर
आशा तृष्णा ना मरी, कह गये दास ‘कबीर’
जिहि घर साधु न पूजते, हरि की सेवा नाहिं
ते घर मरघट सारिखे, भूत बसे तिन माँहि
माला फेरत जुग गया, गया न मन का फेर
कर का मन का छाड़ि के, मन का मन का फेर
मूँड मुड़ाये हरि मिले, सब कोई लेय मुँड़ाय
बार-बार के मूँड़ते, भेड़ न वैकुण्ठ जाय
मैं अपराधी जनम का, नख सिख भरा विकार
हे दाता दुख-भंजना, मेरी करो सम्हार
रात गँवाई सोय कर, दिवस गँवायो खाय
मानुष जनम अमोल था, कौड़ी बदले जाय
लघुता से प्रभुता मिले, प्रभुता से प्रभु दूरि
चींटी ले सक्कर चली, हाथी के सिर धुरि
लाली मेरे लाल की, जित देखूँ तित लाल
लाली देखन मैं गई, मैं भी हो गई लाल
साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप
जाके हिरदै साँच है, ताके हिरदे आप
साईं इतना दीजिये, जामे कुटुम समाय
मैं भी भूखा ना रहूँ, साधु न भूखा जाय
सात समंद की मसि करौं, लेखिन सब बनराइ
धरती सब कागद करौं, हरि गुण लिख्या न जाइ
साधू ऐसा चाहिये, जैसा सूप सुभाय
सार सार को गहि रहै, थोथा देहि उड़ाय