Jivan Ke Din Char Re Man Karo Punya Ke Kam

नाशवान संसार
जीवन के दिन चार रे, मन करो पुण्य के काम
पानी का सा बुदबुदा, जो धरा आदमी नाम
कौल किया था, भजन करूँगा, आन बसाया धाम
हाथी छूटा ठाम से रे, लश्कर करी पुकार
दसों द्वार तो बन्द है, निकल गया असवार
जैसा पानी ओस का, वैसा बस संसार
झिलमिल झिलमिल हो रहा, जात न लागे बार
मक्खी बैठी शहद पे, लिये पंख लपटाय
कहे ‘कबीर’ सुनो भाई साधो, लालच बुरी बलाय

Mukhada Kya Dekhe Darpan Main

दया-धर्म
मुखड़ा क्या देखे दर्पण में, तेरे दया धरम नहीं मन में
कागज की एक नाव बनाई, छोड़ी गंगा-जल में
धर्मी कर्मी पार उतर गये, पापी डूबे जल में
आम की डारी कोयल राजी, मछली राजी जल में
साधु रहे जंगल में राजी, गृहस्थ राजी धन में
ऐंठी धोती पाग लपेटी, तेल चुआ जुलफन में
गली-गली की सखी रिझाई, दाग लगाया तन में
पाथर की इक नाव बनाई, उतरा चाहे छिन में
कहत ‘कबीर’ सुनो भाई साधो, चढ़े वो कैसे रन में

Jiwan Ko Vyartha Ganwaya Hai

चेतावनी
जीवन को व्यर्थ गँवाया है
मिथ्या माया जाल जगत में, फिर भी क्यों भरमाया है
मारी चोंच तो रुई उड़ गई, मन में तूँ पछताया है
यह मन बसी मूर्खता कैसी, मोह जाल मन भाया है
कहे ‘कबीर’ सुनो भाई साधो, मनुज जन्म जो पाया है

Main Kase Kahun Koi Mane Nahi

पाप कर्म
मैं कासे कहूँ कोई माने नहीं
बिन हरि नाम जनम है विरथा, शास्त्र पुराण कही
पशु को मार यज्ञ में होमे, निज स्वारथ सब ही
इक दिन आय अचानक तुमसे, ले बदला ये ही
पाप कर्म कर सुख को चाहे, ये कैसे निबहीं
कहे ‘कबीर’ कहूँ मैं जो कछु, मानो ठीक वही

Jiv Bas Ram Nam Japna

हरिनाम स्मरण
जीव बस राम नाम जपना, जरा भी मत करना फिकरी
भाग लिखी सो हुई रहेगी, भली बुरी सगरी
ताप करके हिरणाकुश राजा, वर पायो जबरी
लौह लकड़ से मार्यो नाहीं, मर्यौ मौत नख री
तीन लोक ककी माता सीता, रावण जाय हरी
जब लक्षमण ने करी चढ़ाई, लंका गई बिखरी
आठों पहर राम को रटना, ना करना जिकरी
कहत ‘ कबीर’ सुनो भाई साधो, रहना बिन फिकरी

Moko Kahan Dhundhe Re Bande

आत्मज्ञान
मोको कहाँ ढूँढे रे बन्दे, मैं तो तेरे पास में
ना मंदिर में ना मस्जिद में, ना पर्वत के वास में
ना जप ताप में, ना ही योग में, ना मैं व्रत उपवास में
कर्म काण्ड में मैं नहीं रहता, ना ही मैं सन्यास में
खोज होय साँची मिल जाऊँ, इक पल की ही तलाश में
कहे ‘कबीर’ सुनो भाई साधो, मैं तो हूँ विश्वास में

Dar Lage Aur Hansi Aave

कलियुग की रीति
डर लागे और हाँसी आवे, गजब जमाना आया रे
धन दौलत से भरा खजाना, वैश्या नाच नचाया रे
मुट्ठी अन्न जो साधू माँगे, देने में सकुचाया रे
कथा होय तहँ श्रोता जावे, वक्ता मूढ़ पचाया रे
भाँग, तमाखू, सुलफा, गाँजा, खूब शराब उड़ाया रे
उलटी चलन चले दुनियाँ में, ताते जी घबराया रे
कहे ‘कबीर’ सुनो भाई साधो, फिर पाछे पछताया रे

Rahna Nahi Des Birana Hai

नश्वर संसार
रहना नहीं देस बिराना है
यह संसार कागद की पुड़िया, बूँद पड़े घुल जाना है
यह संसार काँट की बाड़ी, उलझ उलझ मरि जाना है
यह संसार झाड़ और झाँखर, आग लगे बरि जाना है
कहत ‘कबीर’ सुनो भाई साधो, सतगुरु नाम ठिकाना है

Tan Ki Dhan Ki Kon Badhai

अन्त काल
तन की धन की कौन बड़ाई, देखत नैनों में माटी मिलाई
अपने खातिर महल बनाया, आपहि जाकर जंगल सोया
हाड़ जले जैसे लकरि की मोली, बाल जले जैसे घास की पोली
कहत ‘ कबीर’ सुनो मेरे गुनिया, आप मरे पिछे डूबी रे दुनिया

Ram Nam Ke Bina Jagat Main

राम आसरा
राम नाम के बिना जगत में, कोई नहीं भाई
महल बनाओ बाग लगाओ, वेष हो जैसे छैला
इस पिजड़े से प्राण निकल गये, रह गया चाम अकेला
तीन मस तक तिरिया रोवे, छठे मास तक भाई
जनम जनम तो माता रोवे, कर गयो आस पराई
पाँच पचास बराती आये, ले चल ले चल होई
कहत ‘कबीर’ सुनो भाई साधो, यह गति तेरी होई