Aao Manmohan Ji Jou Thari Baat

प्रतीक्षा
आओ मनमोहनाजी, जोऊँ थारी बाट
खान-पान मोहि नेक न भावै, नयनन लगे कपाट
तुम देख्या बिन कल न पड़त है हिय में बहुत उचाट
मीराँ कहे मैं भई रावरी, छाँड़ो नहीं निराट

Jogiya Chaai Rahyo Pardes

विरह व्यथा
जोगिया, छाइ रह्यो परदेस
जब का बिछड़्या फेर न मिलिया, बहुरि न दियो सँदेस
या तन ऊपर भसम रमाऊँ, खार करूँ सिर केस
भगवाँ भेष धरूँ तुम कारण, ढूँढत फिर फिर देस
‘मीराँ’ के प्रभु गिरिधर नागर, जीवन व्यर्थ विशेष

Nahi Bhave Tharo Desadlo Ji Rangrudo

मेवाड़ से विरक्ति
नहीं भावैं थाँरो देसड़लो जी रँगरूड़ो
थाँरा देस में राणा साधु नहीं छै, लोग बसैं सब कूड़ो
गहणा गाँठी भुजबंद त्याग्या, त्याग्यो कर रो चूड़ो
काजल टीकी हम सब त्याग्या, त्याग्यो बाँधन जूड़ो
‘मीराँ’ के प्रभु गिरिधर नागर, वर पायो छै रूड़ो

Baje Baje Re Shyam Teri Pejaniyan

श्याम की पैंजनियाँ
बाजे-बाजे रे स्याम तेरी पैजनियाँ
माता यशोदा चलन सिखावत, उँगली पकड़ कर दो जनियाँ
राजत अनुपम लाल झगुला, पीट बरन सुन्दर तनिया
‘मीराँ’ के प्रभु गिरिधर नागर, तीन लोक के तुम धनिया

Main Giridhar Ke Ghar Jau

प्रगाढ़ प्रीति
मैं गिरिधर के घर जाऊँ
गिरिधर म्हाँरो साँचो प्रीतम, देखत रूप लुभाऊँ
रैन पड़ै तब ही उठ जाऊँ, भोर भये उठि आऊँ
रैन दिना वाके सँग खेलूँ, ज्यूँ त्यूँ ताहि रिझाऊँ
जो पहिरावै सोई पहिरूँ, जो दे सोई खाऊँ
मेरी उनकी प्रीति पुरानी, उन बिन पल न रहाऊँ
जहाँ बैठावे तितही बैठूँ, बेचे तो बिक जाऊँ
‘मीराँ’ के प्रभु गिरिधर नागर, बार बार बलि जाऊँ

Vinati Suno Shyam Meri

विरह व्यथा
विनती सुनो श्याम मेरी, मैं तो हो गई थारी चेरी
दरसन कारण भई बावरी, विरह व्यथा तन घेरी
तेरे कारण जोगण हूँगी, करूँ नगर बिच फेरी
अंग गले मृगछाला ओढूँ, यो तन भसम करूँगी
‘मीराँ’ के प्रभु गिरिधर नागर, वन-वन बीच फिरूँगी

Aali Mhane Lage Vrindawan Niko

वृन्दावन
आली! म्हाँने लागे वृन्दावन नीको
घर घर तुलसी ठाकुर पूजा, दरसण गोविन्दजी को
निरमल नीर बहे जमना को, भोजन दूध दही को
रतन सिंघासण आप बिराजे, मुगट धरै तुलसी को
कुंजन कुंजन फिरै राधिका, सबद सुणै मुरली को
‘मीराँ’ के प्रभु गिरिधर नागर, भजन बिना नर फीको

Jogi Mat Ja Mat Ja Mat Ja

विरह व्यथा
जोगी मत जा, मत जा, मत जा, पाँव पड़ू मैं तोरे
प्रेम भगति को पंथ है न्यारो, हमकूँ गैल बता जा
अगर चंदन की चिता बनाऊँ, अपने हाथ जला जा
जल-जल भई भस्म की ढेरी, अपने अंग लगा जा
‘मीराँ’ कहे प्रभु गिरिधर नागर, जोत में जोत मिला जा

Nato Nam Ko Mosu Tanak Na Todyo Jay

गाढ़ी प्रीति
नातो नाम को मोसूँ, तनक न तोड्यो जाय
पानाँ ज्यूँ पीली पड़ी रे, लोग कहै पिंड रोग
छाने लँघन मैं कियो रे, श्याम मिलण के जोग
बाबुल वैद बुलाइया रे, पकड़ दिखाई म्हाँरी बाँह
मूरख वैद मरम नहि जाणे, दरद कलेजे माँह
जाओ वैद घर आपणे रे, म्हाँरो नाम न लेय
‘मीराँ’ तो है जरी विरह की, काहे कूँ औषध देय
माँस तो तन को छीजिया रे, शक्ति जरा भी नाहिं
आँगुलियाँ की मूँदड़ी म्हारे, आवण लागी बाँहि

Baadar Dekh Dari Shyam

बादल देख डरी
बादर देख डरी हो श्याम! मैं तो बादर देख डरी
काली-पीली घटा उमड़ी, बरस्यो एक घरी
जित जाऊँ तित पानी ही पानी, भई सब भोम हरी
जाको पिव परदेस बसत है, भीजै बार खरी
‘मीराँ’ के प्रभु गिरिधर नागर,कीज्यो प्रीत खरी