Jagahu Brajraj Lal Mor Mukut Ware

प्रभाती
जागहु ब्रजराज लाल मोर मुकुट वारे
पक्षी गण करहि शोर, अरुण वरुण भानु भोर
नवल कमल फूल, रहे भौंरा गुंजारे
भक्तन के सुने बैन, जागे करुणा अयन
पूजि के मन कामधेनु, पृथ्वी पगु धारे
करके फिर स्नान ध्यान, पूजन पूरण विधान
बिप्रन को दियो दान, नंद के दुलारे
करके भोजन गुपाल गैयन सँग भये ग्वाल
बंशीवट तीर गये, भानुजा किनारे
मुरलीधर लकुटि हाथ, विहरत गोपिन के साथ
नटवर को वेष कियो, यशुमति के प्यारे
आई में शरण नाथ, बिनवति धरि चरण माथ
‘रूपकुँवरि’ दरस हेतु द्वार पे तिहारे

Jin Ke Sarvas Jugal Kishor

युगल श्री राधाकृष्ण
जिनके सर्वस जुगलकिशोर
तिहिं समान अस को बड़भागी, गनि सब के सिरमौर
नित्य विहार निरंतर जाको, करत पान निसि भोर
‘श्री हरिप्रिया’ निहारत छिन-छिन, चितय नयन की कोर 

Tum Bin Pyare Kahun Sukh Nahi

स्वार्थी संसार
तुम बिन प्यारे कहुँ सुख नाहीं
भटक्यो बहुत स्वाद-रस लम्पट, ठौर ठौर जग माहीं
जित देखौं तित स्वारथ ही की निरस पुरानी बातें
अतिहि मलिन व्यवहार देखिकै, घृणा आत है तातें
जानत भले तुम्हारे बिनु सब, व्यर्थ ही बीतत सांसे
‘हरिचन्द्र’ नहीं टूटत है ये, कठिन मोह की फाँसे

Pitu Matu Sahayak Swami Sakha

प्रार्थना
पितु मातु सहायक स्वामी सखा, तुमही एक नाथ हमारे हो
जिनके कछु और अधार नहीं, तिनके तुम ही रखवारे हो
प्रतिपाल करो सगरे जग को, अतिशय करुणा उर धारे हो
भूले हैं हम तुम को, तुम तो, हमरी सुधि नाहिं बिसारे हो
शुभ, शान्ति-निकेतन, प्रेमनिधे, मन-मंदिर के उजियारे हो
उपकारन को कछु अंत नहीं, छिन ही छिन जो विस्तारे हो
महाराज महा महिमा तुम्हरी, सबसे बिरले बुधिवारे हो
इस जीवन के तुम जीवन हो, इन प्राणन के तुम प्यारे हो
तुम से प्रभु पाय ‘प्रताप’ हरि, केहि के अब और सहारे हो

Baithe Hari Radha Sang

मुरली मोहिनी
बैठे हरि राधासंग, कुंजभवन अपने रंग
मुरली ले अधर धरी, सारंग मुख गाई
मनमोहन अति सुजान, परम चतुर गुन-निधान
जान बूझ एक तान, चूक के बजाई
प्यारी जब गह्यो बीन, सकल कला गुन प्रवीन
अति नवीन रूप सहित, तान वही सुनाई
‘वल्लभ’ गिरिधरनलाल, रीझ कियो अंकमाल
कहन लगे नन्दलाल, सुन्दर सुखदाई 

Bhaj Man Shri Radhe Gopal

श्रीराधाकृष्ण स्तुति
भज मन श्री राधे गोपाल
स्निग्ध कपोल, अधर-बिंबाफल लोचन परम विशाल
शुक-नासा, भौं दूज-चन्द्र-सम, अति सुंदर है भाल
मुकुट चंद्रिका शीश लसत है, घूँघर वाले बाल
रत्न जटित, कुंडल, कर-कंगन, गल मोतियन की माल
पग नूपुर-मणि-खचित बजत जब, चलत हंस गति चाल
गौर श्याम तनु वसन अमोलक, चंचल नयन विशाल
मृदु मुसकान मनोहर चितवन, गावत गीत रसाल
जिनका ध्यान किये सुख उपजे, दूर होत जंजाल
‘नारायण’ वा छबि को निरखत, पुनि पुनि होत निहाल

Bhajahun Re Man Shri Nand Nandan

नवधा भक्ति
भजहुँ रे मन श्री नँद-नन्दन, अभय चरण अरविन्द रे
दुर्लभ मानव-जनम सत्संग, तरना है भव-सिंधु रे
शीत, ग्रीष्म, पावस ऋतु, सुख-दुख, ये दिन आवत जात रे
कृपण जीवन भजन के बिन चपल सुख की आस रे
ये धन, यौवन, पुत्र, परिजन, इनसे मोह परितोष रे
कमल-नयन भज, जीवन कलिमल, करहुँ हरि से प्रीति रे
श्रवण, कीर्तन, स्मरण, वंदन, पाद-सेवन दास्य रे
सख्य, पूजन, आत्मनिवेदन, ‘गोविंददास’ अभिलाष रे

Bhai Duj Bal Mohan Dou

भाई दूज
भाई दूज बल मोहन दोऊ, बहन सुभद्रा के घर आये
विविध भाँति श्रृंगार कियो पट भूषण बहुत सुहाये
अति प्रसन्न हो भोजन परसे, भाई के मन भाये
तत्पश्चात् तिलक बीड़ा दे, बहन अधिक सुख पाये
श्रीफल और मिठाई से भाई की गोद भराई
‘रामदास’ प्रभु तुम चिर-जीवौ, दे अशीष हरषाई 

Mrig Naini Ko Pran Naval Rasiya

रसिया
मृगनैनी को प्रान नवल रसिया, मृगनैनी
बड़ि-बड़ि अखिंयन कजरा सोहे, टेढ़ी चितवन मेरे मन बसिया
अतलस को याकें लहेंगा सोहे, प्यारी झुमक मेरे मन बसिया
छोटी अंगुरिन मुँदरी सोहे, बीच में आरसी मन बसिया
बाँह बड़ो बाजूबन्द सोहे, हियरे में हार दीपत छतिया
‘पुरुषोत्तम’ प्रभु की छबि निरखत, सबै छोड़ ब्रज में बसिया
रंग महल में सेज बिछाई, लाल पलंग पचरंग तकिया

Aab Jago Mohan Pyare

प्रभाती
अब जागो मोहन प्यारे, तुम जागो नन्द दुलारे
हुआ प्रभात कभी से लाला, धूप घरों पर छाई
गोपीजन आतुरतापूर्वक, तुम्हें देखने आर्इं
ग्वाल-बाल सब खड़े द्वार पर, कान्हा ली अँगड़ाई
गोपीजन सब मुग्ध हो रहीं, निरखें लाल कन्हाई
जसुमति मैया उठा लाल को, छाती से लिपटाये
चन्द्रवदन को धुला तभी, माँ मक्खन उसे खिलाये