Kachu Pat Pahinati Rahi

बंसी का जादू
कछु पट पहिनति रही, कछुक आभूषण धारति
कछु दर्पन महँ देखि माँग, सिन्दूर सम्हारति
जो जो कारज करति रही, त्यागो सो तिनने
चलीं बेनु सुनि काज अधुरे छोड़े उनने
बरजी पति पितु बन्धु ने, रोकी बहुत पर नहीं रुकी
कही बहुत पर ते नहीं, लोक लाज सम्मुख झुकी

Van Te Aawat Shri Giridhari

वन से वापसी
वनतैं आवत श्रीगिरिधारी
सबहिं श्रवन दै सुनहु सहेली, बजी बाँसुरी प्यारी
धेनु खुरनि की धुरि उड़त नभ, कोलाहल अति भारी
गावत गीत ग्वाल सब मिलिकें, नाचत बीच बिहारी
मलिन मुखी हम निशि सम नारी, बिनु हरि सदा दुखारी
कृष्णचन्द्र ब्रजचन्द्र खिलें नभ, तब हम चन्द्र उजारी
मिटै ताप संताप तबहिं जब, दृष्टि परैं बनवारी
चलो चलें चित-चोर विलोकें, ठाढ़े कृष्ण मुरारी

Ka Mere Man Mah Base Vrindawan Var Dham

अभिलाषा
कब मेरे मन महँ बसै, वृन्दावन वर धाम
कब रसना निशि दिन रटै, सुखते श्यामा श्याम
कब इन नयननिते लखूँ, वृन्दावन की धूरि
जो रसिकनि की परम प्रिय, पावन जीवन मूरि
कब लोटूँ अति विकल ह्वै, ब्रजरज महँ हरषाय
करूँ कीच कब धूरि की, नयननि नीर बहाय
कब रसिकनि के पैर परि, रोऊँ ह्वैके दीन
कब प्रिय दर्शन बिनु बनूँ, विकल नीर बिनु मीन
कब अति कोमल चित रसिक, मोकूँ हिये लगाय
गहकि मिलैं सिर कर धरैं, मगन होहिं अपनाय
वृन्दावन महँ सखिनि संग, कब निरखूँ नँद नन्द
मोर मुकुट सिर बेनु कर, कारी कमरी कन्ध
कब मोकूँ यशुमति तनय, सखा समुझि लै संग
खेलैं वृन्दा-विपिन महँ, परसे मेरो अंग
कदँब तले ठाड़े उभय, दीये युगल गल बाँह
मोर मुकुट में चन्द्रिका, सटी कपोल उछाँह
राधा बाधा हरन द्वै, अच्छर हिय में धारी
भवसागर तरि जाइगो, सबही सोच बिसारि

Swamin Pashupate Prabho Das Ke Pas Chudao

शिवाशीव स्तुति
स्वामिन्! पशुपति! प्रभो! दास के पास छुड़ाओ
जगदम्बा! माँ! उमा वत्स कूँ हृदय लगाओ
भटक्यो जग महँ जनक! शरन चरनन महँ दीजे
माँ! अब गोद बिठाय चूमि मुख सुत कूँ लीजे
यद्यपि हौं अति अधमहूँ, तऊ पिता! अपनाइ लैं
मैं जो साधन रहित सुत, कूँ हिय तें चिपकाइ लैं

Kalindi Kamniy Kulgat

श्री कृष्ण माधुर्य
कालिन्दी कमनीय कूलगत, बालु सुकोमल
ब्रज बाथिनि महँ बिछी रहे, बनिके तहँ निश्चल
तापै विहरत श्याम चरण, मनि नूपुर धारे
परम मृदुल मद भरे बजे, जहाँ जहाँ सुकुमारे
अब टक ब्रजरज मध्य में, अंकित जो पदचिन्ह हैं
तिनि चरननि वन्दन करौं, जो सबही तें भिन्न हैं
केशपाश अति सघन, वरन कारे घुँघरारे
मोर मुकुट तें कसे अलंकृत, प्यारे प्यारे
मन मोहन वर वेष जो, मम मन को मोहित करत
ताकूँ कब निरखूँ सतत्, दीठि ताहि खोजत फिरत
कैसे उपमा करें मधुर की, परम मधुर है
विग्रह प्रभु को सरस सबनि तें, मधुर मधुर है
मधुर बदन अरविन्द मधुर, तातें सुमधुर हैं
मन्द हँसनि गज चलनि, हँसनि सब मधुर-मधुर है
जाकी मादकता मधुर, सौरभ तातें भरित है
मन्द हँसनि चितवनि चलनि, मधुर-मधुर अति मधुर है

Hamari Radha Ati Sukumari

श्री राधा
हमारी राधा अति सुकुमारी
विहरत है वृषभानु महल में, चहुँ दिशि करत उजारी
लोचन युगल खिले पंकज दोउ, मातु बजावति तारी
आवति दौरि अङक में उछरैं, हँसनि देत किलकारी
गोरो अंग श्याम हिय धारति, श्यामा श्याम बिहारी
दुग्ध धवलिया तनु छाया सम, होंहि न पियते न्यारी

Ganga Ganga Kahe Nitya

गंगा महिमा
गंगा गंगा कहें नित्य गंगा जल पीवैं
सदा बसै तट निकट, गंग- जल हीतें जीवैं
गंगारज तन लाइ, नहावैं गंगा जल महँ
बसैं गंगपथ परसि अनिल, बिहरैं जिहिं थल महँ
श्री गंगा के नाम तें, कोटि जनम पातक नसहिं
भोगे भू पै भोग बहु, अन्त जाहि सुरपुर बसहिं

Hari Ju Hamari Aur Niharo

शरणागति
हरिजू! हमरी ओर निहारो
भटकि रहे भव-जलनिधि माँही, पकरो हाथ हमारो
मत्सर, मोह, क्रोध, लोभहु, मद, काम ग्राह ग्रसि डारो
डूबन चाहत नहीं अवलम्बन, केवट कृष्ण निकारो
बन पाषान परे इत उत हम, चरननि ठोकर मारो
केवल किरपा प्रभु ही सहारो, नाथ न निज प्रन टारो

Jagat Main Radha Nam Amol

श्री राधा स्मरण
जगत में राधा नाम अमोल
व्यर्थ न करो बकवाद बावरे, राधा राधा बोल
राधा नाम सरस अति सुन्दर, हीरा सम अनमोल
जातें सुखद वस्तु नहिं जग में, भक्तनि लीयो तोल
राधा कच कारे घुँघराले, बाँके लोचन लोल
हिय मनहर कटि छीन उदर बर, रूप अनूप सुडोल

He Hanumat Ham Adham Daya Kari Ke Apnao

श्री हनुमान स्तुति
हे हनुमत! हम अधम दया करिके अपनाओ
हे मारुति! भव-जलधि बहि रहो पार लगाओ
हे अञ्जनि के तनय! शरन अपनी लै लीजै
हे करुनाकर! कृपा कि’रनि पै करि दीजै
हे कपि कौशल स्वामि प्रिय, तव नामनि मुखतें कहूँ
हे केशरिसुत! तव चरन, चंचरीक बनि नित रहूँ