Bhaj Man Ram Charan Sukh Dai

भज मन राम-चरण सुखदाई
जिहि चरनन ते निकसी सुर-सरि, शंकर-जटा समाई
जटा शंकरी नाम पर्यो है, त्रिभुवन तारन आई
जिन चरनन की चरन-पादुका, भरत रह्यो लवलाई
सोई चरन केवट धोइ लीन्हे, तब हरि नाव चढ़ाई
सोई चरन संतन जन सेवत, सदा रहत सुखदाई
सोई चरन गौतम ऋषि-नारी, परसि परम पद पाई
दंडक वन प्रभु पावन कीन्हो, ऋषि मन त्रास मिटाई
सोई प्रभु त्रिलोक के स्वामी, कनक मृगा सँग धाई
कपि सुग्रीव बन्धु भय व्याकुल, तब जय छत्र फिराई
रिपु को अनुज विभीषण निसिचर, परसत लंका पाई
शिव सनकादिक अरु ब्रह्मादिक, शेष सहस मुख गाई
‘तुलसिदास’ मारुत-सुत की प्रभु, निज मुख करत बड़ाई

Kabhu Man Vishram N Manyo

संसार चक्र
कबहूँ मन विश्राम न मान्यो
निसिदिन भ्रमत बिसारि सहन सुख जहँ तहँ इंद्रिन तान्यो
जदपि विषय सँग सह्यो दुसह दुख, विषम जान उरझान्यो
तदपि न तजत मूढ़, ममता बस, जानतहूँ नहिं जान्यो
जन्म अनेक किये नाना विधि, कर्म कीच चित सान्यो
‘तुलसिदास’ ‘कब तृषा जाय सर खनतहिं’ जनम सिरान्यो

Rajan Ram Lakhan Ko Dije

विश्वामित्र की याचना
राजन! राम-लखन को दीजै
जस रावरो, लाभ बालक को, मुनि सनाथ सब कीजै
डरपत हौं, साँचे सनेह बस, सुत प्रभाव बिनु जाने
पूछो नाम देव अरु कुलगुरु, तुम भी परम सयाने
रिपु दल दलि, मख राखि कुसल अति, अल्प दिननि घर ऐंहैं
‘तुलसिदास’ रघुवंस तिलक की, कविकुल कीरति गेहैं

Jaki Gati Hai Hanuman Ki

हनुमान आश्रय
जाकी गति है हनुमान की
ताकी पैज पूजि आई, यह रेखा कुलिस पषान की
अघटि-घटन, सुघटन-विघटन, ऐसी विरुदावलि नहिं आन की
सुमिरत संकट सोच-विमोचन, मूरति मोद-निधान की
तापर सानुकूल गिरिजा, शिव, राम, लखन अरु जानकी
‘तुलसी’ कपि की कृपा-विलोकनि, खानि सकल कल्यान की

Bharat Bhai Kapi Se Urin Ham Nahi

कृतज्ञता
भरत भाई कपि से उऋण हम नाहीं
सौ योजन मर्याद सिन्धु की, लाँघि गयो क्षण माँही
लंका-जारि सिया सुधि लायो, गर्व नहीं मन माँही
शक्तिबाण लग्यो लछमन के, शोर भयो दल माँही
द्रोणगिरि पर्वत ले आयो, भोर होन नहीं पाई
अहिरावण की भुजा उखारी, पैठि गयो मठ माँही
जो भैया, हनुमत नहीं होते, को लावत जग माँही
आज्ञा भंग कबहुँ नहीं कीन्हीं, जहँ पठयऊँ तहँ जाई
‘तुलसिदास’, मारुतसुत महिमा, निज मुख करत बड़ाई

Kali Nam Kam Taru Ram Ko

राम स्मरण
कलि नाम कामतरु राम को
दलनिहार दारिद दुकाल दुख, दोष घोर धन धाम को
नाम लेत दाहिनों होत मन वाम विधाता वाम को
कहत मुनीस महेस महातम, उलटे सूधे नाम को
भलो लोक – परलोक तासु जाके बल ललित – ललाम को
‘तुलसी’ जग जानियत नामते, सोच न कूच मुकाम को

Ram Kam Ripu Chap Chadhayo

धनुष भंग
राम कामरिपु चाप चढ़ायो
मुनिहि पुलक, आनंद नगर, नभ सुरनि निसान बजायो
जेहि पिनाक बिनु नाक किये, नृप सबहि विषाद बढ़ायो
सोई प्रभु कर परसत टूटयो, मनु शिवशंभु पढ़ायो
पहिराई जय माल जानकी, जुबतिन्ह मंगल गायो
‘तुलसी’ सुमन बरसि सुर हरषे, सुजसु तिहूँ पुर छायो

Jake Priy Na Ram Vedehi

राम-पद-प्रीति
जाके प्रिय न राम वैदेही
तजिये ताहि कोटि बैरीसम, जद्यपि परम सनेही
तज्यो पिता प्रह्लाद, विभीषन बंधु, भरत महतारी
बलि गुरु तज्यो, कंत ब्रज – बनितनि, भये मुद – मंगलकारी
नाते नेह राम के मनियत सुहृद सुसेव्य जहाँ लौं
अंजन कहाँ आँखि जेहि फूटै, बहुतक कहौं कहाँ लौं
‘तुलसी’ सो सब भाँति परम हित पूज्य प्रान ते प्यारो
जासों होइ सनेह राम – पद, एतो मतो हमारो

Mangal Murati Marut Nandan

मारुति वंदना
मंगल-मूरति मारुत-नंदन, सकल अमंगल-मूल-निकंदन
पवन-तनय संतन-हितकारी, ह्रदय बिराजत अवध-बिहारी
मातु-पिता, गुरु, गनपति, सारद, सिवा-समेत संभु,सुक नारद
चरन बंदि बिनवौं सब काहू, देहु राम-पद-नेह-निबाहू
बंदौं राम-लखन वैदेही, जे ‘तुलसी’ के परम सनेही

Kahan Ke Pathik Kahan Kinh Hai Gavanwa

परिचय
कहाँ के पथिक कहाँ, कीन्ह है गवनवा
कौन ग्राम के, धाम के वासी, के कारण तुम तज्यो है भवनवा
उत्तर देस एक नगरी अयोध्या, राजा दशरथ जहाँ वहाँ है भुवानवा
उनही के हम दोनों कुँवरावा , मात वचन सुनि तज्यो है भवनवा
कौन सो प्रीतम कौन देवरवा ! साँवरो सो प्रीतम गौर देवरवा
‘तुलसिदास’ प्रभु आस चरन की मेरो मन हर लियो जानकी रमणवा