Abhilasha Ashumati Man Jagi

यशोदा की लालसा
अभिलाषा यशुमति मन जागी, मुसकाया जैसे ही लाला
कब तुतला करके मैया कह, ये मुझे पुकारेगा लाला
यह आयेगा दिन कब ऐसा, जब आँचल पकड़ेगा लाला
हठ कर गोदी में आने को, मचलेगा मेरा यह लाला
कब मंगलमय दिन आयेगा, हँस करके बोलेगा लाला

Kanhaiya Pe Tan Man Lutane Chali

समर्पण
कन्हैया पे तन मन लुटाने चली
भूल गई जीवन के सपने, भूल गई मैं जग की प्रीति,
साँझ सवेरे मैं गाती हूँ, कृष्ण-प्रेम के मीठे गीत
अब अपने को खुद ही मिटाने चली, कन्हैया पे तन मन लुटाने चली
लिखा नहीं है भाग्य में मिलना, पर मैं मिलने जाती हूँ,
दुःख के सागर में फँसकर भी हँसकर नाव चलाती हूँ
मैं किस्मत से बाजी लगाने चली, कन्हैया पे तन मन लुटाने चली
काशी की गलियों को छाना, अरु मथुरा के मंदिर को,
मैंने पाया अपने मन में, तब ही प्यारे मोहन को
मैं दुनियाँ को यही एक बताने चली, कन्हैया पे तन मन लुटाने चली

Gayon Ke Hit Ka Rahe Dhyan

गो माता
गायों के हित का रहे ध्यान
गो-मांस करे जो भी सेवन, निर्लज्ज व्यक्ति पापों की खान
गौ माँ की सेवा पुण्य बड़ा, भवनिधि से करदे हमें पार
वेदों ने जिनका किया गान, शास्त्र पुराण कहे बार-बार
गौ-माता माँ के ही सदृश, वे दु:खी पर हम चुप रहते
माँ की सेवा हो तन मन से, भगवान कृष्ण को वह पाते

Jagat Main Jivan Ke Din Char

नश्वर जीवन
जगत में जीवन के दिन चार
मिला विवेक प्रभु से हमको, इसका करो विचार
फँस मत जाना यहाँ मोह में, सभी कपट व्यवहार
किसका तूँ है कौन तुम्हारा, स्वार्थ पूर्ण संसार
मानव तन दुर्लभ दुनिया में, कर सेवा उपकार
प्रभु से प्रीति लगाले प्यारे, नहीं करें भव-पार 

Jo Paanch Tatva Se Deh Bani

तत्व चिन्तन
जो पाँच तत्व से देह बनी, वह नाशवान ऐसा जानो
जीना मरना तो साथ लगा, एक तथ्य यही जो पहचानो
परमात्मा ही चेतन स्वरूप और जीव अंश उसका ही है
सच्चिदानंद दोनों ही तो, निर्गुण वर्णन इसका ही है
जैसे की सींप में रजत दिखे, मृगतृष्णा जल होता न सत्य
सम्पूर्ण जगत् ही मिथ्या है, माया का जादू जो असत्य

Dushton Ka Sang Na Kabhi Karen

दुष्टों का संग
दुष्टों का संग न कभी करें
आचार जहाँ हो निंदनीय, मन में वह कलुषित भाव भरें
दुष्कर्मी का जहँ संग रहे, सद्गुण की वहाँ न चर्चा हो
क्रोधित हो जाता व्यक्ति तभी, विपरीत परिस्थिति पैदा हो
होता अभाव सद्बुद्धि का, मानवता वहाँ न टिक पाती
अभिशप्त न हो मानव जीवन, अनुकम्पा प्रभु की जब होती 

Patit Pawani Narmade

नर्मदा वंदन
पतित पावनि नर्मदे, भव-सिन्धु से माँ तार दे
जो यश बखाने आपका, आगम, निगम, सुर, शारदे
फोड़कर पाताल, तुम बह्ती धुआँ की धार दे
है नाव मेरी भँवर में, अब पुण्य की पतवार दे
बज रहे नूपुर छमाछम, ज्यों बँधे हो पाँव में
मंद कल-कल गुँजता, स्वर पंथ के हर गाँव में
सतपुड़ा एवं विन्ध्याचल को सौंप कर वन-संपदा
मालवा को उर्वरा कर, हरती सब की आपदा
तट पे तेरे भृगु-मुनि संतों ने करके तप घना
दे दिया देवत्व हर कंकड़ को शंकर सा बना

Prabhu Shakti Pradan Karo Aisi

शरणागति
प्रभु शक्ति प्रदान करो ऐसी, मन का विकार सब मिट जाये
चाहे निंदा हो या तिरस्कार, मुझको कुछ नहीं सता पाये
भोजन की चिन्ता नहीं मुझे, जब पक्षी जी भर खाते ही
मुझको मानव का जन्म दिया, तो खाने को भी देंगे ही
बतलाते हैं कुछ लोग मुझे, अन्यत्र कहीं सुख का मेला
देखा तो कुछ भी नहीं मिला, बस धोखे का था वह खेला
दुनियादारी का बोझ छोड़, प्रभु आया शरण तुम्हारी मैं
प्रभु दीनों के तुम रखवाले, विश्वास अडिग मेरा तुम में  

Bhagwan Krishna Lilamrut Ka

ब्रह्माजी का भ्रम
भगवान् कृष्णलीलामृत का, हम तन्मय होकर पान करें
ब्रह्मा तक समझ नहीं पाये, उन सर्वात्मा का ध्यान धरें
यमुनाजी का रमणीय-पुलीन, जहाँ ग्वाल बाल भी सँग में हैं
मंडलाकार आसीन हुए, भगवान् बीच में शोभित हैं
बछड़े चरते थे हरी घास, मंडली मग्न थी भोजन में
भगवान कृष्ण की लीला से, ब्रह्मा भी पड़े अचम्भे में
मौका पाकर के ब्रह्मा ने, अन्यत्र छिपाया बछड़ों को
दधि-भात-कौर को हाथ लिये, श्रीकृष्ण ढूँढते तब उनको
अवसर का लाभ उठा ब्रह्मा ने, ग्वाल बाल भी छिपा दिये
खिलवाड़ चला यह एक वर्ष, कोई न समझ इसको पाये
ब्रह्माजी को जब ज्ञान हुआ, गिर पड़े प्रभु के चरणों में
तन मन उनका रोमांचित था, अरु अश्रु भरे थे नैनों में

Maya Se Tarna Dustar Hai

माया
माया से तरना दुस्तर है
आसक्ति के प्रति हो असंग, दूषित ममत्व बाहर कर दें
मन को पूरा स्थिर करके, प्रभु सेवा में अर्पित कर दें
पदार्थ सुखी न दुखी करते, व्यर्थ ही भ्रम को मन में रखते
होता न ह्रास वासना का, विपरीत उसकी वृद्धि करते
मन को नहीं खाली छोड़े हम, सत्संग संत से करते हों
उनके कथनों का चिन्तन हो, जिससे मन की परिशुद्धि हो
स्वाध्याय, प्रार्थना, देवार्चन, अथवा दिन में जो कार्य करे
पल भर भी प्रभु को नहीं भूले, मन को उनसे संलग्न करे