Jay Jayti Jay Raghuvansh Bhushan

श्री राम वन्दना
जय जयति जय रघुवंशभूषण राम राजिवलोचनम्
त्रैताप खंडन जगत्-मंडन ध्यानगम्य अगोचरम्
अद्वैत अविनाशी अनिन्दित, मोक्षप्रद अरि गंजनम्
तव शरण भवनिधि-पारदायक, अन्य जगत् विडम्बनम्
हे दीन-दारिद के विदारक, दयासिन्धु कृपाकरम
हे भक्तजन के राम जीवन-मूल मंगल मंगलम्

Aab Tum Meri Aur Niharo

शरणागति
अब तुम मेरी ओर निहारो
हमरे अवगुन पै नहि जाओ, अपनो बिरुद सम्भारो
जुग जुग साख तुम्हारी ऐसी, वेद पुरानन गाई
पतित उधारन नाम तिहारो, यह सुन दृढ़ता आई
मैं अजान तुम सम कुछ जानों, घट घट अंतरजामी
मैं तो चरन तुम्हारे लागी, शरणागत के स्वामी
हाथ जोरि के अरज करति हौं, अपनालो गहि बाहीं
द्वार तुम्हारे आन पड़ी हौं, पौरुष मोमें नाहीं

Aatma Ka Bhojan Prarthana

प्रार्थना
आत्मा का भोजन प्रार्थना, भूले नहीं, प्रतिदिन करें
अन्तःकरण से प्रार्थना, सब शोक चिन्ता को हरें
जीवन में सच्ची शांति सुख, प्रभु प्रार्थना से प्राप्त हो
दत्त चित्त हो प्रार्थना करें, प्रतीति निश्चित सुलभ हो
मीराँ के मन में प्रेम था, तो विष भी अमृत हो गया
निष्काम होए प्रार्थना, समझो प्रभु ने सुन लिया
अध्यात्म की गहराइयों में, डूब कर हो प्रार्थना
हो भाव मन में समर्पण का, वरना तो मात्र प्रवंचना 

Ek Ram Bharosa Hi Kali Main

राम भरोसा
एक राम भरोसा ही कलि में
वर्णाश्रम धर्म न दिखे कहीं, सुख ही छाया सबके मन में
दृढ़ इच्छा विषय भोग की ने, कर्म, भक्ति, ज्ञान को नष्ट किया
वचनों में ही वैराग्य बचा और वेष ने सबको लूट लिया
सच्चे मन से जो जीवन में, रामाश्रित कोई हो पाये
भगवान अनुग्रह से निश्चय, भवसागर पार उतर जाये 

Kashyap Aditi Ke Putra Rup

भगवान् वामन
कश्यप अदिति के पुत्र रूप जन्मे हरि, शिव अज हर्षाये
वामन का रूप धरा हरिने, बलियज्ञ भूमि पर वे आये
स्वागत करके बलि यों बोले, जो चाहे कुछ तो माँगो भी
हरि बोले ‘भूमि दो तीन पैर, हो जरा न कम या ज्यादा भी’
बलि ने ज्योंही हामी भरदी, वामन ने रूप अनन्त किया
सारी पृथ्वी व सत्यलोक को, दो पग में ही नाप लिया
श्री-चरण पखारे ब्रह्मा ने, वह जल ही गंगा रूप हुआ
जल उसका तो हरि का स्वरूप, सब लोकों में आनन्द हुआ
‘बलि तृतीय पग धरती का तो पूरा ही तुमने कहाँ किया’
राजा ने प्रभु की स्तुति की, तो सुतल लोक का राज्य दिया

Khatir Kar Le Nai Gujarya

रसिया
खातिर कर ले नई गुजरिया, रसिया ठाड़ो तेरे द्वार
ठाड़ौ तेरे द्वार रसिया, ठाड़ौ तेरे द्वार
ये रसिया तेरे नित नहिं आवै, प्रेम होय तो दर्शन पावै,
अधरामृत को भोग लगावै, कर मेहमानी अब मत चूके समय न बारम्बार
हिरदे की चौकी कर हेली, नेह को चंदन लगा नवेली,
दीक्षा ले बनि जैयो चेली, पुतरिन पलँग बिछाय, पलक की करले बंद किंवार
जो कछु रसिया कहै सो करियो, सास ननद को डर परिहरियो,
सौलह कर बत्तीस पहरियो, दे दे दाम सूम की सम्पद, जीवन है दिन चार
सब ते तोड़ नेह की डोरी, जमना पार उतर चल गोरी,
निडर खेली कहियो होरी, श्याम रंग चढ़ जाये जा दिन, हो जाय बेड़ा पार

Chalo Man Shri Vrindavan Dham

राधा कृष्ण
चलो मन श्री वृन्दावन धाम
किसी कुंज या यमुना-तट पे, मिल जायेंगे श्याम
सुन्दर छबिमय मोर-मुकुट में, सातो रंग ललाम
वही सुनहरे पीत-वसन में, शोभित शोभा-धाम
वनमाला के सुमन सुमन में, सुलभ शुद्ध अनुराग
और बाँसुरी की सुर-धुन में, राधा का बस राग
सुन्दरियों संग रास रमण में, प्रेम ज्योति अभिराम
राधा दीखे नँद-नन्दन में, राधा में घनश्याम 

Chaitanya Maha Prabhu Ki Jay Jay

चैतन्य महाप्रभु
चैतन्य महाप्रभु की जय जय, जो भक्ति भाव रस बरसाये
वे विष्णुप्रिया के प्राणनाथ, इस धरा धाम पर जो आये
वे शचीपुत्र गौरांग देव प्रकटे, सबके मन हर्षाये
हे देह कान्ति श्री राधा सी, जो भक्तों के मन को भाये
रस के सागर चैतन्य देव, श्री गौर चन्द्र वे कहलाये
आसक्ति शून्य वह भक्त वेष, जो हरि कीर्तन में सुख पाये
वे भाव राधिका से भावित, प्रेमामृत को जो बरसाये
हो शुद्ध प्रेम इनके जैसा, अज्ञान अविद्या मिट जाये
नयनों से अश्रु गिरे उनके, तो प्रेम छलक बाहर आये
हो कृपा राधिका रानी की, उसका परलोक सुधर जाये
सत्संग कीर्तन नित्य करें, मानव जीवन में सुख पाये

Jay Durge Giriraj Nandini

देवी स्तवन
जय दुर्गे गिरिराज नन्दिनी जय अम्बे उज्ज्वल द्युति दामिनि
जय भगवती महादेव भामिनी, जय स्कन्द गजानन पालिनि
कान्तिमयी दुर्गा महारानी, महामर्दिनी वांछित फल दायिनी
हरि, हर ब्रह्मा वेद बखानी, ध्यान धरत सुर-नर-मुनि ज्ञानी
विकसित कमल नयन कात्यायिनि, शंख, पद्म कर धरे भवानी
सत्चित-सुखमय व्याधि विमोचनि, गदा, चक्र, बाणाकुंश शोभिनि
आदि शक्ति चण्डमुण्ड विनाशिनि मधु,कैटभ, महिषासुर मर्दिनि
रत्न हार कटि किंकिणी सोहिनि नक बेसर बिंदी मन मोहिनि
त्रिपुरसुन्दरी भवभय भंजनि, लोक पावनी जय जगजननी

Jo Janme Maharaj Nabhi Ki

श्री ऋषभदेव
जो जन्मे महाराज नाभि के, पुत्र रूप से
विष्णु ही थे जो कहलाये, ऋषभ नाम से
बड़े हुए तो किया अध्ययन वेदशास्त्र का
सौंपा तब दायित्व पिता ने राजकाज का
सुख देकर सन्तुष्ट किया, भलीभाँति प्रजा को
हुई इन्द्र को ईर्ष्या तो, रोका वर्षा को
ऋषभदेव ने वर्षा कर दी, योग शक्ति से
शची-पति लाज्जित हुए, सुता को व्याहा उनसे
वनवासी हो, अपनाया अवधूत वृत्ति को
रूप मनोहर किन्तु कोई दे गाली उनको
खाने कोई देता कुछ भी खा लेते वे
ईश्वरीय सामर्थ्य छिपाकर रहते थे वे
यद्यपि दिखते पागल जैसे, परमहंस थे
वन्दनीय उनका चरित्र, वे राजर्षि थे