Ab Sonp Diya Is Jiwan Ka

समर्पण
अब सौंप दिया इस जीवन को, सब भार तुम्हारे हाथों में
है जीत तुम्हारे हाथो में और हार तुम्हारे हाथों में
मेरा निश्चय बस एक यही, एक बार तुम्हें पा जाऊँ मैं
अर्पण कर दूँ दुनिया भर का, सब प्यार तुम्हारे हाथों में
जो जग में रहूँ तो ऐसे रहूँ, ज्यों जल में कमल का फूल रहे
मेरे गुण दोष समर्पित हों, श्रीकृष्ण तुम्हारें हाथों में
यदि मानव का मुझे जन्म मिले, तो तव चरणों का पुजारी बनूँ
इस पूजक की इक-इक रग का, हो तार तुम्हारे हाथों में
जब जब संसार का कैदी बनूँ, निष्काम भाव से कर्म करूँ
फिर अन्त समय में प्राण तजूँ, भगवान तुम्हारे हाथों में
मुझ में तुम में बस भेद यही, मैं नर हूँ तुम नारायण हो
मैं हूँ संसार के हाथों में, संसार तुम्हारे हाथों में

Omkar Rup Shri Gajanan

श्री गणपति वन्दन
ओंकार (ॐ) रूप श्री गजानन, प्रत्यक्ष तत्व ब्रह्म स्वरूप
कर्ता, धर्ता एवं हर्ता, भगवान् आपके कर्इं रूप
तीनों गुण से हो परे आप, योगीजन जिनका ध्यान धरें
प्रभु वक्र-तुण्ड लम्बोदर हैं, जो सुमिरें उनका विघ्न टरें
‘ॐ गं गणपतये नमः’ मंत्र, जो जपे कामना सिद्ध करें
जो लाल पुष्प द्वारा पूजे, उनके गणपति सब कष्ट हरें
नित अथर्वशीर्ष का पाठ करे, सर्वत्र सदा ही सुख जाये
लड्डू हजार से यजन करे, मन-वांछित वह फल पाये

Ganapati Gaao Re Vigan Nahi Aayega

श्री गणेश स्तुति
गणपति गाओ रे, विघन नहीं आयगा
सिद्धि सदन सुर-नर-मुनि वंदित, करता भरता रे, विघन नहीं आएगा
ब्रह्मा, विष्णु, महेश तुम्हीं हो, संकट हरता रे, विघन नहीं आयगा
कोटि सूर्य सम प्रभा तुम्हारी, बुद्धि प्रदाता रे, विघन नहीं आयगा
शंकर-सुवन, पार्वती-नंदन, आनँद मनाओ रे, विघन नहीं आयगा
जो जन सुमिरन करे तिहारो, भय नहीं पाता रे, विघन नहीं आयगा

Jag Janani Radhika Ko Pranam

श्री राधा माहात्म्य
जगजननी राधिका को प्रणाम
सच्चिदानन्द विग्रह जिनका, लीला रस की वे दिव्य धाम
जो परमतत्व श्रीकृष्ण उन्हीं की, परम शक्ति हैं श्रीराधा
वे शक्तिमान की आत्मा ही, हर लें भक्तों की भव बाधा
जो सकल कलाओं की प्रसविनि, सुन्दरता की वे प्रतिमा हैं
भगवान कृष्ण के मन को वे मोहित आल्हादित करती हैं
श्री राधारानी हैं प्रकाश तो भुवन भास्कर माधव हैं
ज्योत्सना रूप तो श्रीराधा, वे पूर्णचन्द्र मुरलीधर हैं
एक ही स्वरूप दोनों का है, महिमा अनन्त राधाजी की
श्रीकृष्ण कृपा जिस पर होए, अनूभूति मिले प्रियाजी की

Jo Nishchal Bhakti Kare

शिव आराधना
जो निश्छल भक्ति करे उसको, भोले शम्भू अपना लेते
वे धारण करें रजोगुण को, और सृष्टि की रचना करते
होकर के युक्त सत्त्वगुण से, वे ही धारण पोषण करते
माया त्रिगुणों से परे प्रभु, शुद्ध स्वरूप स्थित होते
ब्रह्मा, विष्णु, अरु, रुद्र, रूप, सृष्टि, पालन,लय वहीं करें
हैं पूर्ण ब्रह्म प्रभु आशुतोष, अपराध हमारे क्षमा करें

Dulha Ban Aaya Tripurari

शिव विवाह (राजस्थानी)
दूल्हा बणआया त्रिपुरारी
पारबती की सखियाँ प्यारी, गावे हिलि मिलि गारी
भसम रमाय बाघंबर पहर्यो, गल मुण्डमाला धारी
हाथ त्रिशूल बजावत डमरू, नंदी की असवारी
भूत पिशाच बराती बणग्या, नाचै दै दै तारी
सरप करे फुंकार कण्ठ में, डरप रह्या नर नारी
सीस जटा बिच गंगा विहरे, भाल चाँद छबि न्यारी
निरखत ही सब पाप नसाये, महिमा अपरमपारी

Nain Bhar Dekhon Nand Kumar

श्रीकृष्ण प्राकट्य
नैन भर देखौं नंदकुमार
जसुमति कोख चन्द्रमा प्रकट्यो, जो ब्रज को उजियार
हरद दूब अक्षत दधि कुमकुम मंडित सब घर द्वार
पूरो चौक विविध रंगो से, गाओ मंगलाचार
चहुँ वेद-ध्वनि करत मुनि जन, होए हर्ष अपार
पुण्य-पुंज परिणाम साँवरो, सकल सिद्धि दातार
गोप-वधू आनन्दित निरखै, सुंदरता को सार
दास ‘चतुर्भुज’ प्रभु सुख सागर गिरधर प्रानाधार

Prabhu Ji Main To Tharo Hi Tharo

समर्पण (राजस्थानी)
प्रभुजी मैं तो थारो ही थारो
भलो बुरो जैसो भी हूँ मैं, पर हूँ तो बस थारो
बिगड्यो भी तो थारो बिगड्यो, थे ही म्हने सुधारो
म्हारी बात जाय तो जाये, नाम बिगड़ सी थारो
चाहे कहे म्हने तो बिगडी, विरद न रहसी थारो
जँचे जिस तरे करो नाथ, थे मारो चाहे तारो  

Bhagwan Krishna Ke Charno Main

स्तुति
भगवान् कृष्ण के चरणों में, मैं करूँ वंदना बारंबार
जो प्राणि-मात्र के आश्रय हैं, भक्तों के कष्ट वही हरतें
ब्रह्मादि देव के भी स्वामी, मैं करूँ प्रार्थना बारंबार
जो आदि अजन्मा भी यद्यपि हैं, पर विविध रूप धारण करते
पृथ्वी पर लीलाएँ करते, मैं करूँ स्तवन बारंबार
जब संकट से हम घिर जाते, करूणानिधि ही रक्षा करते
उन के पूजन से दु:ख कटे, मैं करूँ अर्चना बारंबार
जो परम तेज, जो परम ब्रह्म, अज्ञान पाप को वे हरते
स्वामी त्रिलोक के वासुदेव, मैं करूँ वंदना बारंबार

Manavka Tan Jinse Paya

भक्ति-भाव
मानव का तन जिनसे पाया, उन राम कृष्ण की भक्ति हो
आसक्ति त्याग कर दुनिया की, करुणानिधि में अनुरक्ति हो
श्रीरामचरितमानस हमको, भक्ति की समुचित शिक्षा दे
नवधा भक्ति के जो प्रकार, अनुगमन करें प्रभु शक्ति दे
सत्संग तथा हरिकथा सुने, गुरुसेवा प्रभु गुणगान करें
हो आस्था प्रभु का मंत्र जपें, इन्द्रिय -निग्रह, सत्कर्म करें
प्रभु के ही रूप में संत बड़े, उनका ही हृदय से करें मान
जो मिले उसी में हो राजी, औरों में त्रुटि का हो न भान
निष्कपट रहे बर्ताव सदा, सुख दुख में भी समदृष्टि हो
आवश्यकीय कीर्तन कलि में, श्रद्धापूर्वक प्रतिदिन ही हो