Anurag Mai Vardan Mai

भारत माता
अनुरागमयी वरदानमयी भारत जननी भारत माता!
मस्तक पर शोभित शतदल सा, यह हिमगिरि है शोभा पाता
नीलम-मोती की माला सा, गंगा-यमुना जल लहराता
वात्सल्यमयी तू स्नेहमयी, भारत जननी भारत माता
सूरज की सुनहरी किरणों से गूंथी लेकर के मालाएँ
सौंदर्यमयी श्रृंगारमयी, भारत जननी भारत माता
तेरे पग पूजन को आतीं, सागर लहरों की बालाएँ
तू तपोमयी तू सिद्धमयी, भारत जननी भारत माता

Ek Hi Swaroop Radhika Krishna

युगल सरकार
एक ही स्वरूप राधिका कृष्ण, लीला रस हेतु ही पृथक रूप
एक प्राण हैं श्री राधा मोहन, अरु प्रीति परस्पर भी अनूप
राधा रानी है पूर्ण शक्ति, गोवर्धन-धारी शक्तिमान
श्रीकृष्ण पुकारे राधा को, मुरली में गूँजे वही तान
आह्लाद रूपिणी श्री राधा, श्री विग्रह उनका चपला सा
मुख की सुंदरता अद्वितीय और हाव-भाव लक्ष्मी जैसा
नित नूतन यौवन मन्द हास्य, गतिमान नयन मन को मोहे
उनका विशिष्ठ है अधर-राग, आभूषण अंगों पर सोहे
रासेश्वरी को शत शत प्रणाम, श्रीकृष्ण करें चिन्तन जिनका
वृषभानु-सुता का करें ध्यान, हो स्वतः गान नँदनंदन का  

Khelat Gupal Nav Sakhin Sang

होली
खेलत गुपाल नव सखिन संग, अंबर में छायो रंग रंग
बाजत बेनु डफ और चंग, कोकिला कुहुक भरती उमंग
केसर कुमकुम चंदन सुंगध, तन मन सुध बिसरी युवति वृंद
कोइ निरखत है लोचन अघाय,लीनो लपेटि आनंदकंद
झोरी भर-भर डारत गुलाल, मन में छाई भारी तरंग 

Chod Jhamela Jhuthe Jag Ka Kah Gaye Das Kabir

मिथ्या संसार
छोड़ झमेला झूठे जग का, कह गये दास कबीर
उड़ जायेगा साँस का पंछी, शाश्वत नहीं शरीर
तुलसीदास के सीता राघव उनसे मन कर प्रीति
रामचरित से सीख रे मनवा, मर्यादा की रीति
बालकृष्ण की लीलाओं का धरो हृदय में ध्यान
सूरदास से भक्ति उमड़े करो उन्हीं का गान
मीरा के प्रभु गिरिधर नागर करो उन्हीं से छोह
कृष्ण मिलन का भाव रहे मन छोड़ जगत का मोह

Jo Kuch Hai Vah Parmeshwar Hai

तत्व चिंतन
जो कुछ है वह परमेश्वर है वे जगत् रूप प्रकृति माया
यदि साक्षी भाव से चिंतन हो मेरा पन तो केवल छाँया
हम करें समर्पण अपने को, उन परमपिता के चरणों में
और करें तत्व का जो विचार, सद्मार्ग सुलभ हो तभी हमें
जो तत्व मसि का महावाक्य ‘वह तूँ है’ उनके सिवा नहीं
ये ही तो आत्मनिवेदन है, तब जन्म मरण छुट जाय वहीं

Din Vyartha Hi Bite Jate Hain

चेतावनी
दिन व्यर्थ ही बीते जाते हैं
जिसने मानव तन हमें दिया, उन करुणा निधि को भुला दिया
जीवन की संध्या वेला में हम ऐसे ही पछताते हैं
घर पुत्र मित्र हे भाई मेरा, माया में इतना उलझ गया
धन हो न पास, जर्जर शरीर, ये कोई काम न आते हैं
दुनियादारी गोरख धंधा, आकण्ठ इसी में डूब रहे
मृगतृष्णा सिवा न कुछ भी ये, केवल हमको भरमाते हैं
बचपन, यौवन, पागलपन में, अनमोल समय सब गँवा दिया
कर्तव्य विमुख हम बने रहे, अब क्या हो, सोच न पाते हैं
जिसके साधे सब सध जाते, यह सत्य अरे क्यों याद नहीं
शरणागत हो जा उन प्रभु के जो भक्तों को अपनाते हैं
हे मानव तुझे विवेक मिला, अब चेत समय जो बचा शेष
आर्तस्तव हो हरि कीर्तन कर, वे बेड़ा पार लगाते हैं 

Neel Kamal Mukh Shobhit

श्रीकृष्ण माधुर्य
नील-कमल मुख शोभित, अलकें घुँघराली
कौस्तुभ मणि-माल कण्ठ, शोभित वनमाली
पीताम्बर श्याम-अंग ऐसो सखि सोहे
मानो घन-श्याम बीच, चपला मन मोहे
माथे पर मोर मुकुट, चन्द्रिका बिराजे
भाल तिलक केसर की अनुपम छवि छाजे
कुण्डल की झलक चपल लग रही निराली
त्रिभुवन में गूँज रही, वंशी धुन आली
पूनम की रात मृदुल,पूर्ण चन्द्रिका विलास
जमुना तट वंशीवट, जीव ब्रह्म करत रास
राधा है कृष्ण रूप, कृष्ण ही तो राधा
राधे-कृष्ण नाम जपे, छूटे भव बाधा

Prabhu Ne Vedon Ko Pragat Kiya

चतुर्वेद महिमा
प्रभु ने वेदों को प्रगट किया
भगवान् व्यास ने वेदों को देकर हम पर उपकार किया
ऋग्वेद के द्वारा निस्संदेह, विज्ञान सृष्टि को जान सके
हम यजुर्वेद का मनन करें, क्या अन्तरिक्ष पहचान सके
हम सामवेद का छन्द पढ़ें, ब्रह्मोपासना सुलभ बने
हो अथर्ववेद का पारायण, तो स्वास्थ्य हमारा भला बने
जो शिरोभाग में उपनिषद्, वे वेद-ज्ञान प्रस्तुत करते
हम करें अध्ययन भलीभाँति, जीवन का ध्येय यही देते
ब्राह्मण, आरण्यक, शास्त्र तथा सारे पुराण सोपान ही तो
समुचित उपयोग करें इनका, वेदों को समझ सकें तब तो
वैदिक भाषा में सुलभ हमें, यह ज्ञानामृत की शुभ धारा
पहुँचा दे हम सारे जग में, सुख शांति भाव इसके द्वारा 

Bhakta Ke Vash Main Hain Bhagwan

भक्त वत्सलता
भक्त के वश में हैं भगवान
जब जब स्मरण किया भक्तों ने, रखली तुमने आन
चीर खिंचा जब द्रुपद-सुता का, दु:शासन के द्वारा
लिया वस्त्र अवतार, द्रौपदी ने जब तुम्हें पुकारा
लगी बाँधने यशुमति मैया, जब डोरी से तुमको
थकी यशोदा पर न बँधे, तो बँधवाया अपने को
दुर्वासा संग शिष्य जीमने, पाण्डव-कुटि पर आये
कुन्ती थी हैरान भात में, भोजन रूप समाये
दीन सुदामा गये द्वारका, जभी तुम्हीं से मिलने
देख दुर्दशा दुखी हुए, ऐश्वर्य दिया तब तुमने 

Mat Yashoda Shri Ganesh Ki

श्री गणेश-श्री कृष्ण
मात यशोदा श्री गणेश की पूजा करने को आई
मोदक भर कर थाल सजाया, कान्हा को सँग में लाई
नटवर की नटखट चालों की, याद उन्हें जैसे आई
विघ्न न पूजा में हो जाये, शंका मन में जब आई
तभी कन्हैया को खम्भे से, डोरी से जो बाँध दिया
फिर विघ्नेश्वर की पूजा में, निश्चित हो कर ध्यान किया
श्रीगणेश ने आँखे खोली, श्रीहरि को प्रणाम किया
और सूँड से मोदक लेकर, उनके मुख में डाल दिया
मात यशोदा ने देखा तो, मति उनकी चकराई है
फिर तो अपनी चतुराई पर, बार बार पछताई है