Kaho Tumh Binu Grah Mero Kon Kaj

अनुरोध
कहौ तुम्ह बिनु गृह मेरो कौन काज ?
विपिन कोटि सुरपुर समान मोको, जो प्रिय परिहर् यो राज
वलकल विमल दुकूल मनोहर, कंदमूल – फल अमिय अनाज
प्रभु पद कमल विलोकहुँ छिन छिन इहितें, अधिक कहा सुख साज
हो रहौ भवन भोग लोलुप ह्वै, पति कानन कियो मुनि को साज
‘तुलसिदास’ ऐसे विरह वचन सुनि, कठिन हियो बिहरो न आज

Udatta Charit Shri Raghav Ka

श्रीराम चरित्र
उदात्त चरित श्री राघव का
कर पाये थोड़ा अनुसरण, आदर्श बने जीवन उसका
शील, शक्ति व सदाचार का, संगम प्रभु का जीवन है
वे सत्वादी स्थित-प्रज्ञ, गम्भीर, गुणों के सागर है
श्री राम धर्म के विग्रह ही अन्यत्र जो मिलना दुर्लभ है
आदर्श पुत्र, भ्राता व मित्र पति की भी वे अभिव्यक्ति है
अधर्म, अनैतिकता के विरुद्ध, संघर्ष राम के जीवन में
वे स्नेह, दया, सुख-सागर हैं, बिठलाँय उन्हें मन-मंदिर में

He Gouri Putra Ganesh Gajanan

श्री गणेश प्राकट्य
हे गौरी-पुत्र गणेश गजानन, सभी कामना पूर्ण करें
कलियुग में पूजा अर्चन से, सारे कष्टों को शीघ्र हरे
ब्रह्मा, विष्णु अरु रुद्र आप, अग्नि, वायु, रवि, चन्द्र आप
श्रद्धा पूर्वक जो स्मरण करे, हर लेते सारे पाप ताप
माँ पार्वती के सुत होकर के, प्रत्येक कल्प में जो आते
वे परब्रह्म-भगवान कृष्ण, माता को सुख ये पहुँचाते
मैं प्राप्त करूँ उत्तम बेटा, देवीजी के मन में आया
जब पुत्र रूप उत्पन्न हुए, श्रीकृष्ण वहाँ मंगल छाया
दर्शन पाकर ब्रह्मादिक को, सब देवों को भी हर्ष हुआ
शिशु पर जब शनि की दृष्टि पड़ी, धड़ से मस्तक विलीन हुआ
श्री विष्णु शीघ्र ही जाकर के, गज के मस्तक को ले आये
धड़ पर उसको फिर जोड़ दिया, सब देव वहाँ तब हुलसाये
श्री विष्णु ने तब स्तुति की, सर्वेश्वर, सत्य, सिद्धिदाता
वरणीय श्रेष्ठ सब देवों में, है विघ्न-विनाशक हे त्राता

Kou Mai Leho Re Gopal

मुग्ध गोपी
कोउ माई लेहो रे गोपाल
दधि को नाम श्याम घन सुंदर, बिसर्यो चित ब्रजबाल
मटकी सीस भ्रमत ब्रज बीथिन, बोलत बचन रसाल
उफनत तक चूवत चहुँ दिसि तें, मन अटक्यो नँदलाल
हँसि मुसिकाइ ओट ठाड़ी ह्वै, चलत अटपटी चाल
‘सूर’ श्याम बिन और न भावे, यह बिरहिनी बेहाल

Dekhe Sab Hari Bhog Lagat

अन्नकूट
देखे सब हरि भोग लगात
सहस्र भुजा धर उत जेमत है, इन गोपन सों करत है बात
ललिता कहत देख हो राधा, जो तेरे मन बात समात
धन्य सबहिं गोकुल के वासी, संग रहत गोकुल के नाथ
जेमत देख नंद सुख दीनों, अति प्रसन्न गोकुल नर-नारी
‘सूरदास’ स्वामी सुख-सागर, गुण-आगर नागर दे तारी

Meri Shudhi Lijo He Brajraj

शरणागति
मेरी सुधि लीजौ हे ब्रजराज
और नहीं जग में कोउ मेरौ, तुमहिं सुधारो काज
गनिका, गीध, अजामिल तारे, सबरी और गजराज
‘सूर’ पतित पावन करि कीजै, बाहँ गहे की लाज

Lochan Bhaye Shyam Ke Nere

श्री कृष्ण छबि
लोचन भए स्याम के नेरे
एते पै सुख पावत कोटिक, मो न फेरि तन हेरे
हा हा करत, परिहरि चरननि, ऐसे बस भए उनहीं
उन कौ बदन बिलोकत निस दिन, मेरो कह्यौ न सुनहीं
ललित त्रिभंगी छबि पै अटके, फटके मौसौं तोरि
‘सूर’, दसा यह मेरी कीन्ही, आपुन हरि सौं जोरि

He Hari Nam Ko Aadhar

नाम स्मरण
है हरि नाम को आधार
और या कलिकाल नाहिन, रह्यो विधि ब्यौहार
नारदादि, सुकादि संकर, कियो यहै विचार
सकल श्रुति दधि मथत काढ्यो, इतो ही घृतसार
दसहुँ दिसि गुन करम रोक्यो, मीन को ज्यों जार
‘सूर’ हरि को सुजस गावत, जेहि मिटे भवभार

Dekhat Shyam Hase

सुदामा से भेंट
देखत श्याम हँसे, सुदामा कूँ देखत श्याम हँसे
फाटी तो फुलड़ियाँ पाँव उभाणे, चलताँ चरण घसे
बालपणे का मीत सुदामा, अब क्यूँ दूर बसे
कहा भावज ने भेंट पठाई, ताँदुल तीन पसे
कित गई प्रभु मेरी टूटी टपरिया, माणिक महल लसे
कित गई प्रभु मेरी गउअन बछियाँ, द्वार पे सब ही हँसे
‘मीराँ’ के प्रभु हरि अविनासी, सरणे तोरे बसे

Mere To Giridhar Gopal

गिरिधर गोपाल
मेरे तो गिरिधर गोपाल दूसरो न कोई
जाके सिर मोर –मुकुट, मेरो पति सोई
छाँड़ि दई कुल की कानि, कहा करि है कोई
संतन ढिग बैठि-बैठि, लोक लाज खोई
अँसुवन जल सींचि-सींचि, प्रेम-बेली बोई
अब तो बेल फैल गई, आनँद फल होई
दही की मथनिया, बड़े प्रेम से बिलोई
माखन सब काढ़ि लियो, छाछ पिये कोई
भगत देखि राजी भई, जगत देखि रोई
दासी ‘मीराँ’ लाल गिरिधर, तारो अब मोही