Pag Ghungaru Bandh Meera Nachi Re

समर्पण
पग घुँघरू बाँध मीरा नाची रे
मैं तो मेरे नारायण की, आपहिं हो गई दासी रे
लोग कहे मीराँ भई बावरी, न्यात कहे कुलनासी रे
विष को प्याला राणाजी भेज्यो, पीवत मीराँ हाँसी रे
‘मीराँ’ के प्रभु गिरिधर नागर, हरि चरणाँ की दासी रे

Main To Tore Charan Lagi Gopal

शरणागत
मैं तो तोरे चरण लगी गोपाल
जब लागी तब कोउ न जाने, अब जानी संसार
किरपा कीजौ, दरसण दीजो, सुध लीजौ तत्काल
‘मीराँ’ कहे प्रभु गिरिधर नागर, चरण-कमल बलिहार

Kalindi Kamniy Kulgat

श्री कृष्ण माधुर्य
कालिन्दी कमनीय कूलगत, बालु सुकोमल
ब्रज बाथिनि महँ बिछी रहे, बनिके तहँ निश्चल
तापै विहरत श्याम चरण, मनि नूपुर धारे
परम मृदुल मद भरे बजे, जहाँ जहाँ सुकुमारे
अब टक ब्रजरज मध्य में, अंकित जो पदचिन्ह हैं
तिनि चरननि वन्दन करौं, जो सबही तें भिन्न हैं
केशपाश अति सघन, वरन कारे घुँघरारे
मोर मुकुट तें कसे अलंकृत, प्यारे प्यारे
मन मोहन वर वेष जो, मम मन को मोहित करत
ताकूँ कब निरखूँ सतत्, दीठि ताहि खोजत फिरत
कैसे उपमा करें मधुर की, परम मधुर है
विग्रह प्रभु को सरस सबनि तें, मधुर मधुर है
मधुर बदन अरविन्द मधुर, तातें सुमधुर हैं
मन्द हँसनि गज चलनि, हँसनि सब मधुर-मधुर है
जाकी मादकता मधुर, सौरभ तातें भरित है
मन्द हँसनि चितवनि चलनि, मधुर-मधुर अति मधुर है

Aaj Sakhi Shyam Sundar

मुरली का जादू
आज सखी श्याम सुंदर बाँसुरी बजाये
मोर-मुकुट तिलक भाल, पग में नूपुर सुहाये
बिम्बाधर मुरलीधर, मधुर धुन सुनाये
यमुना को रुकत नीर, पक्षीगण मौन भये
धेनू मुख घास डार, धुनि में मन लाये
त्रिभुवन में गूँज उठी, मुरली की मधुर तान
समाधि भी गई टूट, योगी मन भाये
बंशी-स्वर सुन अपार, भूले मुनि मन विचार
‘ब्रह्मानंद’ गोपीजन, तन सुधि बिसराये

Chal Rahe Bakaiyan Manmohan

बालकृष्ण
चल रहे बकैयाँ मनमोहन, सन गये धूल में जो सोहन
जब नहीं दिखी मैया उनको किलकारी मारे बार बार
माँ निकट रसोईघर में थी, गोदी में लेकर किया प्यार
आँचल से अंगों को पोछा और दूध पिलाने लगी उन्हें
क्षीरोदधि में जो शयन करें, विश्वम्भर कहते शास्त्र जिन्हें

Dhuri Bhare Ati Shobhit Shyam Ju

श्री बालकृष्ण माधुर्य
धूरि-भरे अति शोभित स्यामजू, तैसी बनी सिर सुंदर चोटी
खेलत-खात फिरै अँगना, पग पैंजनी बाजति, पीरी कछौटी
वा छबि को रसखानि बिलोकत, बारत काम कलानिधि कोटी
काग के भाग कहा कहिए हरि, हाथ सों लै गयो माखन रोटी
शेष, महेश, गनेश, दिनेस, सुरेशहु जाहि निरन्तर गावैं
जाहि अनादि अखण्ड अछेद, अभेद सुवेद बतावैं
नारद से शुक्र व्यास रटैं पचि हारे तऊ पुनि पार न पावैं
ताहि अहीर की छोहरियाँ, छछिया भरि छाछ पै नाथ नचावैं
टेरत हेरत हारि पर्यौ, रसखानि बतायो न लोग लुगायन
देखो,दुर्यौ वह कुंज-कुटीर में, बैठ्यौ पलोटन राधिका पायन 

Bhajahun Re Man Shri Nand Nandan

नवधा भक्ति
भजहुँ रे मन श्री नँद-नन्दन, अभय चरण अरविन्द रे
दुर्लभ मानव-जनम सत्संग, तरना है भव-सिंधु रे
शीत, ग्रीष्म, पावस ऋतु, सुख-दुख, ये दिन आवत जात रे
कृपण जीवन भजन के बिन चपल सुख की आस रे
ये धन, यौवन, पुत्र, परिजन, इनसे मोह परितोष रे
कमल-नयन भज, जीवन कलिमल, करहुँ हरि से प्रीति रे
श्रवण, कीर्तन, स्मरण, वंदन, पाद-सेवन दास्य रे
सख्य, पूजन, आत्मनिवेदन, ‘गोविंददास’ अभिलाष रे

Shri Krishna Ka Virah

श्री चैतन्य महाप्रभु
श्री कृष्ण का विरह आपको आठों ही प्रहर सताये
श्री महाप्रभु चैतन्य वही जो राधा भाव दिखाये
राधा कान्ति कलेवर अनुपम, भक्तों के मन भाये
रोम रोम में हाव भाव में, गीत कृष्ण के गाये
प्रेमावतार महाप्रभु अन्तस में, राधावर छाये
ओत प्रोत है कृष्ण-भक्ति से, जन-मन वही लुभाये

Chalo Man Shri Vrindavan Dham

राधा कृष्ण
चलो मन श्री वृन्दावन धाम
किसी कुंज या यमुना-तट पे, मिल जायेंगे श्याम
सुन्दर छबिमय मोर-मुकुट में, सातो रंग ललाम
वही सुनहरे पीत-वसन में, शोभित शोभा-धाम
वनमाला के सुमन सुमन में, सुलभ शुद्ध अनुराग
और बाँसुरी की सुर-धुन में, राधा का बस राग
सुन्दरियों संग रास रमण में, प्रेम ज्योति अभिराम
राधा दीखे नँद-नन्दन में, राधा में घनश्याम 

Apurva Nratya Hanuman Kare

मारुति-सुत का नृत्य
अपूर्व नृत्य हनुमान करें
है दिव्य देह, सिन्दूर लेप, करताल करो में चित्त हरें
आनन्दित मुख की श्रेष्ठ छटा, श्रीराम नाम का गान करें
चरणों में मोहक घुँघरू, दो नयनों से प्रेमाश्रु झरें
कटि में शोभित है रक्ताम्बर, अंजनी-सुत हम पर कृपा करें