Pawan Prem Ram Charan

रामनाम महिमा
पावन प्रेम राम-चरन-कमल जनम लाहु परम
राम-नाम लेत होत, सुलभ सकल धरम
जोग, मख, विवेक, बिरति, वेद-विदित करम
करिबे कहुँ कटु कठोर, सुनत मधुर नरम
‘तुलसी’ सुनि, जानि बूझि, भूलहि जनि भरम
तेहि प्रभु को होहि, जाहि सबही की सरम

Prem Vastra Ke Bicha Panwde

शबरी का प्रेम
प्रेम-वस्त्र के बिछा पाँवड़े, अर्घ्य नमन जल देकर
निज कुटिया पर लाई प्रभु को, चरण कमल तब धोकर
आसन प्रस्तुत कर राघव को, पूजा फिर की शबरी ने
चख कर मीठे बेर प्रभु को, भेंट किये भिलनी ने
स्वाद सराहा प्रभु ने फल का, प्रेम से भोग लगाया
प्रेम-लक्षणा-भक्ति रूप, फल प्रभु से उसने पाया

Ab To Sanjh Bit Rahi Shyam

होली
अब तो साँझ बीत रही श्याम, छोड़ो बहियाँ मोरी
तुम ठहरे ब्रजराज कुँवरजी, हम ग्वालिन अति भोरी
आनंद मगन कहूँ मैं मोहन,अब तो जाऊँ पौरी
लाज बचेगी मोरी
सास, ननद के चुपके छाने, तुम संग खेली होरी
अँगुली पकरत पहुँचो पकरयो और करी बरजोरी
हम हैं ब्रज की छोरी
मीठी-मीठी तान बजाकर, लेन सखिन चित चोरी
‘सूरदास’ प्रभु कुँवर कन्हाई, मुख लपटावत रोरी
बोलत हो हो होरी

Chadi Man Hari Vimukhan Ko Sang

प्रबोधन
छाड़ि मन, हरि-विमुखन को संग
जिनके संग कुमति उपजत है, परत भजन में भंग
कहा होत पय-पान कराए, विष नहिं तजत भुजंग
कागहिं कहा कपूर चुगाए, स्वान न्हवाए गंग
खर कौं कहा अरगजा-लेपन मरकट भूषन अंग
गज कौं कहा सरित अन्हवाए, बधुरि धरै वह ढंग
पाहन पतित बान नहिं बेधत, रीतो करत निषंग
‘सूरदास’ कारी कामरि पै, चढ़त न दूजौ रंग

Nand Dham Khelat Hari Dolat

बाल क्रीड़ा
नन्द –धाम खेलत हरि डोलत
जसुमति करति रसोई भीतर, आपुन किलकत बोलत
टेरि उठी जसुमति मोहन कौं, आवहु काहैं न धाइ
बैन सुनत माता पहिचानी, चले घुटुरुवनि पाइ
लै उठाइ अंचल गहि पोंछै, धूरि भरी सब देह
‘सोर्दास’ जसुमति रज झारति, कहाँ भरी यह खेह

Maiya Main To Chand Khilona

कान्हा की हठ
मैया, मैं तौ चंद-खिलौना लैहौं
जैहौं, लोटि धरनि पर अबहीं, तेरी गोद न ऐहौं
सुरभी कौ पे पान न करिहौं, बेनी सिर न गुहैहौं
ह्वैहौं पूत नंद बाबा कौ, तेरौ सुत न कहैहौं
आगै आउ, बात सुनि मेरी, बलदेवहि न जनैहौं
हँसि समुझावति, कहति जसोमति, नई दुल्हनिया दैहौं
तेरी सौं, मेरी सुनि मैया, अबहिं बियाहन जैहौं
‘सूरदास’ ह्वै कुटिल बराती, गीत सुमंगल गैहौं

Sikhavati Chalat Jashoda Maiya

माँ का स्नेह
सिखवति चलत जसोदा मैया
घबराये ले पकर हाथ को, डगमगात धरती धरे पैया
बलदाऊ को टेरि बुलावति, इहिं आँगन खेलो दोउ भैया
कबहुक कुल देवता मनावति, चिर जियो मेरो कुँवर कन्हैया
कबहुँक ठाड़ी वदन निहारत, मनमोहन की लेत बलैया
‘सूरदास’ प्रभु सब सुखदाता, अति अनंद विलसत नंदरैया

Koi Kahiyo Re Prabhu Aawan Ki

विरह व्यथा
कोई कहियौ रे प्रभु आवन की, आवन की मन भावन की
आप न आवै, लिख नहिं भेजै, बान पड़ी ललचावन की
ए दोऊ नैन कह्यो नहिं माने, नदियाँ बहे जैसे सावन की
कहा करूँ कछु नहिं बस मेरो, पाँख नहीं उड़ जावन की
‘मीराँ’ के प्रभु कब रे मिलोगे, चेरी भई तेरे दामन की

Piya Bin Rahyo Na Jay

विरह व्यथा
पिया बिन रह्यो न जाय
तन-मन मेरो पिया पर वारूँ, बार-बार बलि जाय
निस दिन जोऊँ बाट पिया की, कब रे मिलोगे आय
‘मीराँ’ को प्रभु आस तुम्हारी, लीज्यो कण्ठ लगाय

Mhane Chakar Rakho Ji

चाकर राखो
म्हाने चाकर राखोजी, गिरधारी म्हाने चाकर राखोजी
चाकर रहस्यूँ बाग लगास्यूँ, नित उठ दरसण पास्यूँ
वृन्दावन की कुंज गलिन में, थारी लीला गास्यूँ
चाकरी में दरसण पास्यूँ, सुमिरण पाऊँ खरची
भाव भगति जागीरी पास्यूँ, तीनूँ बाताँ सरसी
मोर मुकुट पीताम्बर सोहे, गल बैजन्ती माला
वृन्दावन में धेनु चरावे, मोहन मुरली वाला
हरे-हरे नित बाग लगास्यूँ बिच बिच राखूँ क्यारी
साँवरिया का दरसन पास्यूँ, पहर कसूँमल सारी
‘मीराँ’ के प्रभु गहर गंभीरा, हृदय धरोजी धीरा
आधी रात प्रभु दरसन दिजो, जमनाजी के तीरा