Patiyan Main Kaise Likhu Likhi Hi Na Jay

विरह व्यथा
पतियाँ मैं कैसे लिखूँ, लिखि ही न जाई
कलम धरत मेरो कर कंपत है, हियड़ो रह्यो घबराई
बात कहूँ पर कहत न आवै, नैना रहे झर्राई
किस बिधि चरण कमल मैं गहिहौं, सबहि अंग थर्राई
‘मीराँ’ के प्रभु गिरिधर नागर, बेगि मिल्यो अब आई

Main To Mohan Rup Lubhani

रूप लुभानी
मैं तो मोहन रूप लुभानी
सुंदर वदन कमल-दल लोचन, चितवन की मुसकानी
जमना के नीर तीरे धेनु चरावै, मुरली मधुर सुहानी
तन मन धन गिरिधर पर वारूँ, ‘मीराँ’ पग लपटानी

Dhuri Dhusrit Nil Kutil Kach Kare Kare

अन्तर्धान लीला
धुरि धूसरित नील कुटिल कच, कारे कारे
मुखपै बिथुरे मधुर लगें, मनकूँ अति प्यारे
झोटा खात बुलाक, मोर को मुकुट मनोहर
ऐसो वेष बनाइ जाउ जब, बन तुम गिरिधर
तब पल-पल युग-युग सरिस, बीतत बिनु देखे तुम्हें
अब निशिमहँ बन छाँड़ि तुम, छिपे छबीले छलि हमें

Udho Vo Sanwari Chavi Ne

विरथ व्यथा
उधो वो साँवरी छवि ने, हमारा दिल चुराया है
बजाकर बाँसुरी मीठी, सुनाकर गीत गोविन्द ने
रचाकर रास कुंजन में, प्रेम हमको लगाया है
छोड़ कर के हमें रोती, बसे वो मधुपुरी जाकर
खबर भी ली नहीं फिर के, हमें दिल से भुलाया है
हमारा हाल जाकर के, सुनाना श्यामसुन्दर को
वो ‘ब्रह्मानन्द’ मोहन रूप को, मन में बसाया हैकर्म विपाक
काहे को सोच करे मनवा तू, भाग्य लिखा सो होता प्यारे
होनहार कोई मेट न पाये, कोटि यतन करके सब हारे
हरिश्चन्द्र, श्रीराम, युधिष्ठिर, राज्य छोड़ वनवास सिधारे
जैसी करनी वैसी भरनी, शत्रु न मित्र न कोई हमारे
‘ब्रह्मानंद’ सुमिर जगदीश्वर, क्लेश दुःख विपदा को टारें

Chalo Man Kalindi Ke Tir

कालिंदी कूल
चलो मन कालिन्दी के तीर
दरशन मिले श्यामसुन्दर को, हरे हिये की पीर
तरु कदम्ब के नीचे ठाड़े, कूजत कोयल कीर
अधर धरे मुरली नट-नागर, ग्वाल बाल की भीर
मोर-मुकुट बैजंती माला, श्रवणन् लटकत हीर
मन्द मन्द मुस्कान मनोहर, कटि सुनहरो चीर
रास विलास करे मनमोहन, मन्थर बहे समीर
शोभित है श्री राधा-माधव, पावन यमुना नीर  

Nand Grah Bajat Aaj Badhai

श्रीकृष्ण प्राकट्य
नंद गृह बाजत आज बधाई
जुट गई भीर तभी आँगन में, जन्मे कुँवर कन्हाई
दान मान विप्रन को दीनो, सबकी लेत असीस
पुष्प वृष्टि सब करें, देवगण जो करोड़ तैंतीस
व्रज-सुंदरियाँ सजी धजी, कर शोभित कंचन थाल
‘परमानंद’ प्रभु चिर जियो, गावत गीत रसाल

Bhajo Man Nish Din Shyam Sundar

नाम-स्मरण
भजो मन निश-दिन श्यामसुन्दर, सुख-सागर भजो श्री राधावर
सकल जगत् के जीवन-धन प्रभु करत कृपा अपने भक्तों पर
ब्रज सुन्दरियों से सेवित जो, नव नीरद सम वर्ण मनोहर
त्रिभुवन-मोहन वेष विभूषित, शोभा अतुलित कोटि काम हर
तरु कदम्ब तल यमुना तट पे, मुरली में भरते मीठा स्वर
चरण-कमल में नूपुर बाजत, कटि धारे स्वर्णिम पीताम्बर
कालिय मर्दन, गिरिवर धारण, लीला अतिशय सुन्दर सुखकर
रास रचायो वृन्दावन में, धरो हृदय में रूप निरन्तर

Shri Krishna Chandra Madhurati Madhur

श्रीकृष्ण का माधुर्य
श्री कृष्णचन्द्र मधुरातिमधुर
है अधर मधुर मुख-कमल मधुर, चितवनी मधुर रुचि-वेश मधुर
है भृकटि मधुर अरु तिलक मधुर, सिर मुकुट मधुर कच कुटिल मधुर
है गमन मधुर अरु नृत्य मधुर, नासिका मधुर नखचन्द्र मधुर
है रमण मधुर अरु हरण मधुर, महारास मधुर संगीत मधुर
है गोप मधुर, गोपियाँ मधुर, संयोग मधुर उद्गार मधुर
है हास्य मधुर मुसकान मधुर, स्पर्श मधुर कर-कमल मधुर
गुंजा-माला, पट-पीत मधुर, यमुना-तट क्रीड़ा भ्रमण मधुर
माखन चोरी, बंशी-वादन, गोचारण गिरिधर चरित मधुर
शुचि वन-विहार रसमय लीला, अरु प्रणय-निरीक्षण भाव मधुर
राधावल्लभ घनश्याम मधुर, किंकिणी मधुर नूपुर मधुर
न्योछावर कोटि मदन शोभा, राधिका कृष्ण मधुरातिमधुर

Ankhiyan Hari Darsan Ki Pyasi

वियोग
अँखिया हरि दरसन की प्यासी
देख्यो चाहत कमलनैन को, निसिदिन रहत उदासी
आयो ऊधौ फिरि गये आँगन, डारि गये गल फाँसी
केसरि तिलक मोतिन की माला, वृन्दावन को वासी
काहु के मनकी कोउ न जानत, लोगन के मन हाँसी
‘सूरदास’ प्रभु तुमरे दरस बिन, लेहौं करवत कासी

Gwalin Jo Dekhe Ghar Aay

माखन चोरी
ग्वालिन जो देखे घर आय
माखन खाय चुराय श्याम तब, आपुन रही छिपाय
भीतर गई तहाँ हरि पाये, बोले अपने घर मैं आयो
भूल भई, गोरस में चींटी, काढ़न में भरमायो
सुन-सुन वचन चतुर मोहन के, ग्वालिनि मुड़ मुसकानी
‘सूरदास’ प्रभु नटनागर की, सबै बात हम जानी