Aaj Grah Nand Mahar Ke Badhai

जन्मोत्सव
आज गृह नंद महर के बधाई
प्रात समय मोहन मुख निरखत, कोटि चंद छवि छाई
मिलि ब्रज नागरी मंगल गावति, नंद भवन में आई
देति असीस, जियो जसुदा-सुत, कोटिन बरस कन्हाई
अति आनन्द बढ्यौ गोकुल में, उपमा कही न जाई
‘सूरदास’ छवि नंद की घरनी, देखत नैन सिराई

Jab Jab Murli Knah Bajawat

मुरली मोहिनी
जब जब मुरली कान्ह बजावत
तब तब राधा नाम उचारत, बारम्बार रिझावत
तुम रमनी, वे रमन तुम्हारे, वैसेहिं मोहि जनावत
मुरली भई सौति जो माई, तेरी टहल करावत
वह दासी, तुम्ह हरि अरधांगिनि, यह मेरे मन आवत
‘सूर’ प्रगट ताही सौं कहि कहि, तुम कौं श्याम बुलावत

Nainan Nirkhi Syam Swarup

विराट स्वरूप
नैनन निरखि स्याम-स्वरूप
रह्यौ घट-घट व्यापि सोई, जोति-रूप अनूप
चरन सातों लोक जाके, सीस है आकास
सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र, पावक, ‘सूर’ तासु प्रकास

Maiya Mori Main Nahi Makhan Khayo

माखन चोरी
मैया मोरी मैं नहिं माखन खायौ
भोर भयो गैयन के पाछे, मधुवन मोहि पठायौ
चार पहर वंशीवट भटक्यो, साँझ परे घर आयौ
मैं बालक बहियन को छोटो, छींको केहि विधि पायौ
ग्वाल-बाल सब बैर परे हैं, बरबस मुख लपटायौ
तू जननी मन मन की अति भोरी, इनके कहे पतियायौ
जिय तेरे कछु भेद उपजि है, जानि परायो जायौ
यह लै अपनी लकुटि कमरिया, बहुतहि नाच नचायौ
‘सूरदास’ तब बिहँसि यसोदा, लै उर-कंठ लगायौ

Sun Ri Sakhi Bat Ek Mori

ठिठोली
सुन री सखी, बात एक मेरी
तोसौं धरौं दुराई, कहौं केहि, तू जानै सब चित की मेरी
मैं गोरस लै जाति अकेली, काल्हि कान्ह बहियाँ गही मेरी
हार सहित अंचल गहि गाढ़े, इक कर गही मटुकिया मेरी
तब मैं कह्यौ खीझि हरि छोड़ौ, टूटेगी मोतिन लर मेरी
‘सूर’ स्याम ऐसे मोहि रीझयौ, कहा कहति तूँ मौसौं मेरी

Ghar Aavo Pritam Pyara

विरह व्यथा
घर आओ प्रीतम प्यारा, अब आओ प्रीतम प्यारा
है तुम बिन सब जग खारा, घर आओ प्रीतम प्यारा
तन मन धन सब भेंट करूँ, व भजन करूँ मैं थारा
तुम गुणवंत बड़े नटनागर, मोमें औगुण न्यारा
मैं निगुणी कुछ गुण तो नाहीं, तुम में ही गुण सारा
‘मीराँ’ के प्रभु कब रे मिलोगे, बिन दर्शन दुख भारा

Prabhu Ji The To Chala Gaya Mhara Se Prit Lagay

पविरह व्यथा
प्रभुजी थें तो चला गया, म्हारा से प्रीत लगाय
छोड़ गया बिस्वास हिय में, प्रेम की बाती जलाय
विरह जलधि में छोड़ गया थें, नेह की नाव चलाय
‘मीराँ’ के प्रभु कब रे मिलोगे, तुम बिन रह्यो न जाय

Mhare Janam Maran Ra Sathi

म्हारा साथी
म्हारे जनम-मरण रा साथी, थाँने नहिं बिसरूँ दिन राती
थाँ देख्याँ बिन कल न पड़त है, जाणत मोरी छाती
ऊँची चढ़-चढ़ पंथ निहारूँ, रोय-रोय अँखिया राती
यो संसार सकल जग झूँठो, झूँठा कुल रा न्याती
दोउ कर जोड्याँ अरज करूँ छू, सुणल्यो म्हारी बाती
यो मन मेरो बड़ो हरामी, ज्यूँ मदमातो हाथी
सत्गुरू हाथ धर्यो सिर ऊपर, आँकुस दे समझाती
पल-पल पिय को रूप निहारूँ, निरख निरख सुख पाती
‘मीराँ’ के प्रभु गिरिधर नागर, हरि चरणाँ चित राती

Hari Ju Hamari Aur Niharo

शरणागति
हरिजू! हमरी ओर निहारो
भटकि रहे भव-जलनिधि माँही, पकरो हाथ हमारो
मत्सर, मोह, क्रोध, लोभहु, मद, काम ग्राह ग्रसि डारो
डूबन चाहत नहीं अवलम्बन, केवट कृष्ण निकारो
बन पाषान परे इत उत हम, चरननि ठोकर मारो
केवल किरपा प्रभु ही सहारो, नाथ न निज प्रन टारो

Anguli Par Dhar Giriraj

गिरिधारी
अँगुली पर धर गिरिराज नाम गिरधारी पायो है
बन्द हुयो सुरपति पूजन, गिरिराज पुजायो है
सवा लाख मण सामग्री को, भोग लगायो है
पड़ी स्वर्ग में खबर, क्रोध शचीपति को आयो है
मूसलधार अपार बहुत ही, जल बरसायो है
पड़ी न ब्रज पर बूँद, इन्द्र मन में घबरायो है
ब्रजवासी सब कहें श्याम, गिरिराज उठायो है