Man Madhav Ko Neku Niharhi

हरि पद प्रीति
मन माधव को नेकु निहारहि
सुनु सठ, सदा रंक के धन ज्यों, छिन छिन प्रभुहिं सँभारहि
सोभा-सील ज्ञान-गुन-मंदिर, सुन्दर परम उदारहि
रंजन संत, अखिल अघ गंजन, भंजन विषय विकारहि
जो बिनु जोग जग्य व्रत, संयम, गयो चहै भव पारहि
तो जनि ‘तुलसिदास’ निसि वासर, हरिपद कमल बिसारहि

Kari Gopal Ki Hoi

प्रारु
करी गोपाल की होई
जो अपनौं पुरुषारथ मानत, अति झूठौ है सोई
साधन, मंत्र, जंत्र, उद्यम, बल, ये सब डारौ धोई
जो कछु लिखि राखी नँदनंदन, मेटि सकै नहिं कोई
दुख-सुख लाभ-अलाभ समुझि तुम, कतहिं मरत हौ रोई
‘सूरदास’ स्वामी करुनामय, स्याम चरन मन पोई

Gwalin Kar Te Kor Chudawat

बालकृष्ण लीला
ग्वालिन कर ते कौर छुड़ावत
झूठो लेत सबनि के मुख कौ, अपने मुख लै नावत
षट-रस के पकवान धरे बहु, तामें रूचि नहिं पावत
हा हा करि करि माँग लेत हैं, कहत मोहि अति भावत
यह महिमा वे ही जन जानैं, जाते आप बँधावत
‘सूर’ श्याम सपने नहिं दरसत, मुनिजन ध्यान लगावत

Jewat Kanh Nand Ik Thore

भोजन माधुरी
जेंवत कान्ह नन्द इक ठौरे
कछुक खात लपटात दोउ कर, बाल केलि अति भोरे
बरा कौर मेलत मुख भीतर, मिरिच दसन टकटौरे
तीछन लगी नैन भरि आए, रोवत बाहर दौरे
फूँकति बदन रोहिनी ठाड़ी, लिए लगाइ अँकोरे
‘सूर’ स्याम को मधुर कौर दे, कीन्हे तात निहोरे

Dhanya Nand Dhani Jasumati Rani

धन्य नन्द-यशोदा
धन्य नन्द, धनि जसुमति रानी
धन्य ग्वाल गोपी जु खिलाए, गोदहि सारंगपानी
धन्य व्रजभूमि धन्य वृन्दावन, जहँ अविनासी आए
धनि धनि ‘सूर’ आह हमहूँ जो, तुम सब देख न पाए

Bichure Syam Bahut Dukh Payo

बिछोह
बिछुरे स्याम बहुत दुख पायौ
दिन-दिन पीर होति अति गाढ़ी, पल-पल बरष बिहायौ
व्याकुल भई सकल ब्रज-वनिता, नैक संदेस न पायो
‘सूरदास’ प्रभु तुम्हरे मिलन कौ, नैनन अति झर लायौ

Main Jogi Jas Gaya Bala

शिव द्वारा कृष्ण दर्शन
मैं जोगी जस गाया बाला, मैं जोगी जस गाया
तेरे सुत के दरसन कारन, मैं काशी तज आया
पारब्रह्म पूरन पुरुषोत्तम, सकल लोक जाकी माया
अलख निरंजन देखन कारन, सकल लोक फिर आया
जो भावे सो पावो बाबा, करो आपुनी दाया
देउ असीस मेरे बालक को, अविचल बाढ़े काया
ना लेहौं मैं पाट पाटंबर, ना तेरी कंचन माया
मुख देखों तेरे बालक को, यह मेरे मन भाया
कर जोरे बिनवै नंदरानी, सुन हे जोगी राया
मुख देखन नहीं देहौं बाबा, बालक जात डराया
जाकी दृष्टि सकल जग ऊपर, सो क्यों जात डराया
तीन लोक को मालिक मेरो, तेरे भवन छिपाया
बालकृष्ण को लाइ जसोदा, कर अंचल मुख छाया
गोद पसार चरन-रज बंदी, अति आनंद बढ़ाया
निरखि निरखि मुख पंकज लोचन, नैनन नीर बहाया
‘सूर’ परिकमा करके शिव ने, सींगी-नाद बजाया

Mohi Kahat Jubati Sab Chor

चित चोर
मोहिं कहति जुवति सब चोर
खेलत कहूँ रहौं मैं बाहिर, चितै रहतिं सब मेरी ओर
बोलि लेहिं भीतर घर अपने, मुख चूमति भर लेति अँकोर
माखन हेरि देति अपने कर, कई विधि सौं करति निहोर
जहाँ मोहिं देखति तँहै टेरति, मैं नहिं जात दुहाई तोर
‘सूर’ स्याम हँसि कंठ लगायौ, वे तरुनी कहँ बालक मोर

Sakhi Ri Sundarta Ko Rang

दिव्य सौन्दर्य
सखी री सुन्दरता को रंग
छिन-छिन माँहि परत छबि औरे, कमल नयन के अंग
स्याम सुभग के ऊपर वारौं, आली, कोटि अनंग
‘सूरदास’ कछु कहत न आवै, गिरा भई अति पंग

Ham To Nandgaon Ke Vasi

गोकुल की महिमा
हम तो नंदग्राम के वासी
नाम गोपाल, जाति कुल गोपहिं, गोप-गोपाल उपासी
गिरिवरधारी, गोधनचारी, वृन्दावन-अभिलाषी
राजा नंद जसोदा रानी, जलधि नदी जमुना सी
प्रान हमारे परम मनोहर, कमल नयन सुखरासी
‘सूरदास’ प्रभु कहौ कहाँ लौं, अष्ट महासिधि दासी