Antarman Se Karu Archana

गायत्री स्तवन
अन्तर्मन से करूँ, अर्चना हे गायत्री माता
जपे आपका महामंत्र, वह सभी सिद्धियाँ पाता
अनुपम रूप आपका माता, वर्णन हो नहीं पाता
महिमा अपरम्पार आपकी, भक्तों की हो त्राता
दिव्य तेज की एक किरण से, मन प्रकाश भर जाता

Teertha Mahan Prayag Hamare Klesh Bhagaye

प्रयाग माहात्म्य
तीर्थ महान् प्रयाग हमारे क्लेश भगाये
स्नान करें त्रिवेणी जल में दुःख मिटाये
गंग श्वेत जल मिले श्याम जल यमुनाजी में
सरस्वती भी आन मिले अदृश्य इन्हीं में
योग बिना ही सिद्धि मिले, सेवें प्रयाग को
दर्शन और प्रणाम करें, हम तीर्थ-राज को  

Shri Krishnarjun Samvad Divya

श्रीमद्भगवद्गीता
श्री कृष्णार्जुन संवाद दिव्य, गीता ने हमें प्रदान किया
कालजयी यह ग्रंथ सभी धर्मों को समन्वित ज्ञान दिया
हर देश परिस्थिति में रचना, मानव को मार्ग दिखाती है
सर्वोत्कृष्ट यह ऐसी कृति, जो सदा प्रेरणा देती है
निन्दा, स्तुति, मानापमान, जो द्वन्द्व मचायें जीवन में
दुविधा में जब भी पड़ें कभी, जायें गीता के आश्रय में
जो गुणातीत हो, योग-क्षेम भगवान् स्वयं करते उसका
स्वाध्याय करें हम गीता का, दर्शन यह मानव के हित का
जो कार्य करें हम जीवन में, वह प्रभु को सदा समर्पित हो
किंचित न कामना फल की हो, बुद्धि संकल्पित स्थिर हो
सुख-दुख हो चाहे हानि लाभ, सम भाव रहें, निश्चल मन हो
शास्त्रानुसार निर्दिष्ट कर्म, निस्संग रूप में हम से हो  

Adbhut Shri Vrindavan Dham

वृन्दावन
धामअद्भुत श्री वृन्दावन धाम
यमुनाजी की धारा बहती, केलि राधिका श्याम
मुरली की ध्वनि मधुर गूँजती और नाचते मोर
इकटक निरख रहे पशु पक्षी, नटवर नन्द-किशोर
बंशी स्वर, मयूर नृत्य में, स्पर्धा रुचिकारी
पाँख मोर की निकल पड़ी, तो मोहन सिर पर धारी
राधारानी के मयूर की, भेंट मिली कान्हा को
इसीलिये सहर्ष श्याम ने, स्वीकारी है इसको

Duniya Main Kul Saat Dwip

भारतवर्ष
दुनियाँ में कुल सात द्वीप, उसमें जम्बू है द्वीप बड़ा
यह भारतवर्ष उसी में है, संस्कृति में सबसे बढ़ा चढ़ा
कहलाता था आर्यावर्त, प्राचीन काल में देश यही
सम्राट भरत थे कीर्तिमान, कहलाया भारतवर्ष वही
नाभिनन्दन थे ऋषभदेव, जिनमें यश, तेज, पराक्रम था
वासना विरक्त थे, परमहंस, स्वभाव पूर्णतः सात्विक था
सम्राट भरत इनके सुत थे, भगवत्सेवा में लीन रहे
उनका चरित्र था सर्वश्रेष्ठ, अनुसरण करे सुख शान्ति बहे

Shri Bhagvad Gita Divya Shastra

गीतोपदेश
श्री भगवद्गीता दिव्य शास्त्र जिसमें वेदों का भरा सार
वाणी द्वारा इसका माहात्म्य, अद्भुत कोई पाता न पार
भगवान् कृष्ण-मुख से निसृत, यह अमृत इसका पान करे
स्वाध्याय करे जो गीता का, उसके यह सारे क्लेश हरे
मृगतृष्णा-जल जैसी दुनिया, आसक्ति मोह का त्याग करें
कर्तापन का अभिमान छोड़, हम शास्त्र विहित ही कर्म करें
सच्चिदानन्दघन वासुदेव, हैं व्याप्त पूर्णतः सृष्टि में
निष्काम भाव से कर्म करें, हो योग-क्षेम तब प्राप्त हमें

Anupranit Vaidik Dharma Kiya

आद्य शंकराचार्य
अनुप्राणित वैदिक धर्म किया, श्रद्धा से उनका स्मरण करें
वे ज्ञान मूर्ति शंकर ही थे, हम सादर उन्हें प्रणाम करें
जब धर्म अवैदिक फैल गया तो ब्रह्मवाद हो गया मन्द
अवतरित हुए शंकराचार्य तो श्रुति विरोध का हुआ अंत
आचार्य-चरण से सुलभ हमें स्तुतियाँ श्रेष्ठ प्रभु-विग्रह की
श्रद्धापूर्वक हम गान करें, हो सुदृढ़ भावना भक्ति की
आत्मा ही तो परमात्मा, उपनिषद् का सिद्धांत यही
आदर्श समन्वय का प्रकार, दृढ़ता से निरूपित किया वही

Do Rupon Main Avtar Liya

नर नारायण स्तुति
दो रूपों में अवतार लिया नर नारायण को हम नमन करें
अंशावतार वे श्री हरि के, बदरीवन में तप वहीं करें
वक्षस्थल पर श्रीवत्स चिन्ह चौड़ा ललाट सुन्दर भौंहे
दोनों ही वेष तपस्वी में, मस्तक पर घनी जटा सोहें
तप से शंकित शचि पति प्रेरित, रति काम वहाँ पर जब आये
सामर्थ्य यही नारायण का, होकर परास्त वापस जाये
सब शास्त्र और सम्पूर्ण वेद, जिनकी महिमा को गाते हैं
नर नारायण का पूजन व ध्यान, उन परमात्मा का करते हैं
आदर्श यही मन के विकार, तप के द्वारा क्षय होते है
गीता का उपदेश पार्थ को श्रीकृष्ण तो देते है

Shrimad Bhagawat Ki Dhwani Hi Se

श्रीमद्भागवत् महिमा
श्रीमद्भागवत् की ध्वनि ही से, सब दोष नष्ट हो जाते हैं
यह वासुदेव वाङ्मय स्वरूप, इसका दर्शन नित सेवन हो
फलरूप वेद-उपनिषद् का ये, दुख शोक नाश यह करता है
सर्वोच्च है सभी पुराणों में, इसकी महिमा का पार नहीं
रसपूर्ण कथा आयोजित हो, वहाँ भक्ति देवि आ जाती है
भगवान् कृष्ण की लीलाओं का, इसके द्वारा पान करें
इसका सेवन यदि नित्य करे, श्रीकृष्ण हृदय में आते हैं
श्रद्धा से पाठ करे इसका, तो पाप सभी जल जाते हैं
सप्ताह श्रवण हो कलियुग में, दुर्भाग्य दुःख मिट जाते हैं

Anant Guno Ke Jo Sagar

प्रभु संकर्षण वंदना
अनन्त गुणों के जो सागर, प्रभु संकर्षण को नमस्कार
मस्तक उनके जो हैं सहस्त्र, एक ही पर पृथ्वी का अधार
देवता असुर गन्धर्व, सिद्ध, मुनिगण भी पाये नहीं पार
एक कान में कुण्डल जगमगाय, शोभित है अंग पे नीलाम्बर
कर हल की मठू पर रखा हुआ, वक्ष:स्थल पे वैजन्ती हार
भगवान कृष्ण के अग्रज की लीला का मन में धरें ध्यान
जो गौर वर्ण बलराम प्रभु, हम को करुणा का करें दान