Aiso Ko Udar Jagmahi

राम की उदारता
ऐसो को उदार जग माहीं
बिनु सेवा जो द्रवै दीन पर, राम सरिस कोउ नाहीं
जो गति जोग बिराग जतन करि, नहिं पावत मुनि ग्यानी
सो गति देत गीध सबरी कहँ, प्रभु न बहुत जिय जानी
जो संपत्ति दस सीस अरपि करि रावन सिव पहँ लीन्हीं
सोई संपदा विभीषन कहँअति, सकुच सहित हरि दीन्हीं
‘तुलसिदास’ सब भांति सकल सुख, जो चाहसि मन मेरो
तौ भजु राम, काम सब पूरन करैं कृपानिधि तेरो

Pawan Prem Ram Charan

रामनाम महिमा
पावन प्रेम राम-चरन-कमल जनम लाहु परम
राम-नाम लेत होत, सुलभ सकल धरम
जोग, मख, विवेक, बिरति, वेद-विदित करम
करिबे कहुँ कटु कठोर, सुनत मधुर नरम
‘तुलसी’ सुनि, जानि बूझि, भूलहि जनि भरम
तेहि प्रभु को होहि, जाहि सबही की सरम

Sis Jata Ur Bahu Visal

राम से मोह
सीस जटा उर बाहु विसाल, विलोचन लाल, तिरीछी सी भौहें
बान सरासन कंध धरें, ‘तुलसी’ बन-मारग में सुठि सौहें
सादर बारहिं बार सुभायँ चितै, तुम्ह त्यों हमरो मनु मोहैं
पूछति ग्राम वधु सिय सौं, कहौ साँवरे से सखि रावरे कौ हैं

Prem Vastra Ke Bicha Panwde

शबरी का प्रेम
प्रेम-वस्त्र के बिछा पाँवड़े, अर्घ्य नमन जल देकर
निज कुटिया पर लाई प्रभु को, चरण कमल तब धोकर
आसन प्रस्तुत कर राघव को, पूजा फिर की शबरी ने
चख कर मीठे बेर प्रभु को, भेंट किये भिलनी ने
स्वाद सराहा प्रभु ने फल का, प्रेम से भोग लगाया
प्रेम-लक्षणा-भक्ति रूप, फल प्रभु से उसने पाया

Kab Dekhongi Nayan Vah Madhur Murati

राम का माधुर्य
कब देखौंगी नयन वह मधुर मूरति
राजिव दल नयन, कोमल-कृपा अयन, काम बहु छबि अंगनि दूरति
सिर पर जटा कलाप पानि सायक चाप उर रुचिर वनमाल मूरति
‘तुलसिदास’ रघुबीर की सोभा सुमिरि, भई मगन, नहीं तन की सूरति

Bethi Sagun Manavati Mata

माँ की आतुरता
बैठी सगुन मनावति माता
कब ऐहैं मेरे बाल कुसल घर, कहहु, काग ! फुरि बाता
दूध-भात की दौनी दैहौं, सोने चोंच मढ़ैहौं
जब सिय-सहित विलोकि नयन भरि, राम-लषन उर लैहौं
अवधि समीप जानि जननी जिय अति आतुर अकुलानी
गनक बोलाइ, पाँय परि पूछति, प्रेम मगन मृदु बानी
तेहि अवसर कोउभरत निकट तें, समाचार लै आयो
प्रभु-आगमन सुनत ‘तुलसी’ मनु, मीन मरत जल पायो

Ishwar Ans Jiv Avinasi

सुभाषित
ईश्वर अंस जीव अविनासी, चेतन अमल सहज सुखरासी
उलटा नाम जपत जगजाना, वाल्मीकि भये ब्रह्म समाना
जहाँ सुमति तहँ संपति नाना, जहाँ कुमति तहँ विपति निदाना
जा पर कृपा राम की होई, तापर कृपा करहिं सब कोई
जिनके कपट, दम्भ नहिं माया, तिनके ह्रदय बसहु रघुराया
जिन हरि –भक्ति ह्रदय नहिं आनी, जीवत शव समान ते आनी
जो मारग श्रुति संत दिखावै, तेहि पथ चलत सबै सुख पावै
जो माया बस भयहुँ गोसाईं, बँधेऊ कीर मरकट की नाईं
दुख सुर अरु अपमान बड़ाई, सब सम लेखहि विपति बिहाई
नहिं असत्य सम पातक पुंजा, गिरि सम होहिं कि कोटिक गुंजा
कलियुग जोग जग्य नहिं ज्ञाना, एक आधार राम गुन गाना
परहित सरिस धर्म नहिं भाई, पर पीड़ा सम नहिं अधमाई
बिनु सत्संग विवेक न होई, रामकृपा बिनु सुलभ न सोई
भाव कुभाव अनख आलसहूँ, नाम जपत मंगल दिसि दसहूँ
मैं अरु मोर तोर मैं माया, जेहि बस कीन्हे जीव निकाया,
रघुपति भक्ति सुलभ सुखकारी, ते त्रयताप सोक भयहारी
राम एक तापस तिय तारी, नाम कोटि खल कुमति सुधारी,
रामहि केवल प्रेम पियारा, जानि लेहि जो जान निहारा
सत्य मूल सब सुकृत सुहाये, वेद-पुरान विदित अस गाये
सिया राम मय सब जगजानी, करहुँ प्रनाम जोरि जुग पानी
सुमति कुमति सबके उर बसही, नाथ पुरान निगम अस कहई
सुर नर मुनि सबही की रीती, स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती
होइ है वे सोइ जो राम रचि राखा, को करि तर्क बढ़ावहिं साखा

Badi Maa Kaise Jiun Bin Ram

भरत का प्रेम
बड़ी माँ! जीऊँ कैसे बिन राम
सिया, राम, लछमन तो वन में, पिता गये सुरधाम
कुटिल बुद्धि माँ कैकेयी की, बसिये न ऐसे ग्राम
भोर भये हम भी वन जैहें, अवध नहीं कछु काम
अद्भुत प्रेम भरत का, प्रस्थित गये मिलन को राम 

Kabhuk Ho Ya Rahni Rahongo

संत-स्वभाव
कबहुँक हौं या रहनि रहौंगो
श्री रघुनाथ कृपालु-कृपातें, संत स्वभाव गहौंगो
जथा लाभ संतोष सदा, काहू सों कछु न चहौंगो
परहित निरत निरंतर मन क्रम वचन नेम निबहौंगो
परिहरि देह जनित चिंता, दुख-सुख समबुद्धि सहौंगो
‘तुलसिदास’ प्रभुयहि पथ अविचल, रहि हरि-भगति लहौंगो

Bhaye Prakat Krapala Din Dayala

श्री राम जन्म
भए प्रकट कृपाला दीनदयाला, कौसल्या हितकारी
हरषित महतारी मुनि मन हारी, अद्भुत रूप विचारी
लोचन अभिरामा तनु घनश्यामा, निज आयुध भुज चारी
भूषन वनमाला नयन विशाला, सोभा सिंधु खरारी
कह दुइ कर जोरी अस्तुति तोरी, केहि बिधि करौं अनंता
माया गुन ज्ञानातीत अमाना, वेद पुरान भनंता
करुना-सुख-सागर सब गुन आगर, जेहि गावहिं श्रुति संता
सो मम हित लागी जन अनुरागी, भयउ प्रकट श्रीकंता
ब्रह्माण्ड निकाया निर्मित माया, रोम रोम प्रति वेद कहै
मम उर सो वासी यह उपहासी, सुनत धीर मति थिर न रहै
उपजा जब ज्ञाना प्रभु मुसकाना, चरित बहुत विधि कीन्ह चहै
कहि कथा सुनाई मातु बुझाई, जेहि प्रकार सुत प्रेम लहै
माता पुनि बोली सो मति डोली, तजहु तात यह रूपा
कीजै सिसु लीला अति प्रियसीला यह सुख परम अनूपा
सुनि वचन सुजाना रोदन ठाना, होई बालक सुर भूपा
यह चरित जे गावहिं हरि पद पावहिं, ते न परहिं भवकूपा
छंद – विप्र, धेनु, सुर संत हित लीन्ह मनुज अवतार
निज इच्छा निर्मित तनु माया गुन गो पार