Jay Jayti Jay Raghuvansh Bhushan

श्री राम वन्दना
जय जयति जय रघुवंशभूषण राम राजिवलोचनम्
त्रैताप खंडन जगत्-मंडन ध्यानगम्य अगोचरम्
अद्वैत अविनाशी अनिन्दित, मोक्षप्रद अरि गंजनम्
तव शरण भवनिधि-पारदायक, अन्य जगत् विडम्बनम्
हे दीन-दारिद के विदारक, दयासिन्धु कृपाकरम
हे भक्तजन के राम जीवन-मूल मंगल मंगलम्

Raghuvar Tumko Meri Laj

विरूद
रघुवर तुमको मेरी लाज
सदा सदा मैं सरन तिहारी, तुम बड़े गरीब-निवाज
पतित उधारन विरूद तिहारो, श्रवनन सुनी आवाज
हौं तो पतित पुरातन कहिये, पार उतारो जहाज
अघ खंडन, दुख-भंजन जन के, यही तिहारो काज,
‘तुलसिदास’ पर किरपा करिये, भक्ति दान देहु आज

Kutiya Par Raghav Aaye To Shabari

शबरी का प्रेम
कुटिया पर राघव आये तो, शबरी की साधना पूर्ण हुई
तन मन की सुधि वह भूल गई, प्रभु के चरणों में लिपट गई
आसन देकर वह रघुवर को, छबड़ी में बेरों को लाई
चख चख कर मीठे बेर तभी, राघव को दे मन हर्षाई
यह स्नेह देख कर शबरी का, निज माँ की याद त्वरित आई
होकर प्रसन्न तब तो प्रभु ने, निज धाम में उसको भेज दिया
इस भाँति अनेकों भक्तों का, करुणानिधि ने कल्याण किया 

Shat Shat Pranam Prabhu Raghav Ko

राघव को प्रणाम
शत शत प्रणाम प्रभु राघव को
कोई ऊँच नीच का भेद नहीं, सब लोग ही प्रेम करे उनको
जो राजपाट को त्याग रहे, चौदह वर्षों तक वन में ही
शबरी के जूठे बेर खाय, अरु गले लगाये केवट को
वियोग हुआ वैदेही से, कई कष्ट सहे भी तुमने ही
जब राक्षस रावण मार दिया, जा मिले प्रिया वैदेही को
मर्यादा को चरितार्थ किया, आदर्श दिये राघव ने ही
रामायण का हो स्वाध्याय, शिक्षा दे मंगलमय हमको

Jay Ram Rama Ramnam Samanam

श्री राम वन्दना
जय राम रमा- रमनं समनं , भव-ताप भयाकुल पाहिजनं
अवधेस, सुरेस, रमेस विभो, सरनागत माँगत पाहि प्रभो
दस-सीस-बिनासन बीस भुजा, कृत दूरि महा-महि भूरि-रुजा
रजनी-चर-वृन्द-पतंग रहे, सर-पावक-तेज प्रचंड दहे
महि-मंडल-मंडन चारुतरं, धृत-सायक-चाप-निषंग-बरं
मद-मोह-महा ममता-रजनी, तमपुंज दिवाकर-तेज-अनी
मनजात किरात निपात किए, मृग, लोभ कुभोग सरेनहिए
हति नाथ अनाथनि पाहि हरे, विषया वन पाँवर भूलि परे
बहु रोग वियोगन्हि लोग हए, भव दंघ्रि निरादर के फल ए
भव-सिन्धु अगाध परे नर ते, पद-पंकज-प्रेम न जे करते
अतिदिन मलीन दुखी नितहीं, जिनके पद पंकज प्रति नहीं
अवलंब भवन्त कथा जिन्हकें, प्रिय सन्त अनन्त सदा तिन्हकें
नहि राग न लोभ न मान मदा, तिन्हके सम वैभव वा विपदा
एहि ते तव सेवक होत मुदा, मुनि त्यागत जोग भरोस सदा
करि प्रेम निरन्तर नेम लिए, पद पंकज सेवत शुद्ध हिए
सम मानि निरादर आदर ही, सब सन्त सुखी विचरन्त मही
मुनि मानस पंकज भृंग भजे, रघुवीर महा रनधीर अजे
तब नाम जपामि ननामि हरी, भव रोग महागद मान अरी
गुनसील कृपा परमायतनं, प्रनमामि निरंतर श्री रमनं
रघुनन्द निकन्दय द्वन्द्वघनं, महिपाल विलोकय दीन जनं

Raghav Gidh God Kari Linho

गिद्ध पर कृपा
राघव गीध गोद करि लीन्हों
नयन-सरोज सनेह-सलिल सुचि मनहुँ अर्घ्य जल दीन्हों
बहु विधि राम कह्यो तनु राखन, परम धीर नहिं डोल्यो
रोकि प्रेम अवलोकि बदन-बिधु, वचन मनोहर बोल्यो
‘तुलसी’ प्रभु झूठे जीवन लगि, समय न धोखे लैहों
जाको नाम मरत मुनि दुर्लभ तुमहिं कहाँ पुनि पैहों

Guru Charno Me Shish Nava Ke Raghuvar

धनुष-भंग (राजस्थानी)
गुरुचरणों में सीस नवा के, रघुवर धनुष उठायोजी
बाण चढ़ावत कोई न देख्यो, झटपट तोड़ गिरायोजी
तीन लोक अरु भवन चतुर्दश, सबद सुणत थर्रायोजी
धरणी डगमग डोलन लागी, शेष नाग चकरायोजी
शूरवीर सब धुजण लाग्या, सबको गरब मिटायो जी 

Shri Ram Ko Maa Kaikai Ne

राम वनगमन
श्रीराम को माँ कैकयी ने दिया जभी वनवास
उनके मुख पर कहीं निराशा का, न तभी आभास
मात कौसल्या और सुमित्रा विलपे, पिता अचेत
उर्मिला की भी विषम दशा थी, त्यागे लखन निकेत
जटा बनाई वल्कल पहने, निकल पड़े रघुनाथ
जनक-नन्दिनी, लक्ष्मण भाई, गये उन्हीं के साथ
आज अयोध्या के नर नारी, विह्वल और उदास
विदा कर रहे अश्रु नयन में, राम गये वनवास

Jau Kahan Taji Charan Tumhare

रामाश्रय
जाऊँ कहाँ तजि चरन तुम्हारे
काको नाम पतित पावन जग, केहि अति दीन पियारे
कौनहुँ देव बड़ाइ विरद हित, हठि हठि अधम उधारे
खग मृग व्याध, पषान, विटप जड़यवन कवन सुर तारे
देव दनुज, मुनि, नाग, मनुज सब माया-विवश बिचारे
तिनके हाथ दास ‘तुलसी’ प्रभु, कहा अपुनपौ हारे

Ram Kam Ripu Chap Chadhayo

धनुष भंग
राम कामरिपु चाप चढ़ायो
मुनिहि पुलक, आनंद नगर, नभ सुरनि निसान बजायो
जेहि पिनाक बिनु नाक किये, नृप सबहि विषाद बढ़ायो
सोई प्रभु कर परसत टूटयो, मनु शिवशंभु पढ़ायो
पहिराई जय माल जानकी, जुबतिन्ह मंगल गायो
‘तुलसी’ सुमन बरसि सुर हरषे, सुजसु तिहूँ पुर छायो