Bichure Syam Bahut Dukh Payo

बिछोह
बिछुरे स्याम बहुत दुख पायौ
दिन-दिन पीर होति अति गाढ़ी, पल-पल बरष बिहायौ
व्याकुल भई सकल ब्रज-वनिता, नैक संदेस न पायो
‘सूरदास’ प्रभु तुम्हरे मिलन कौ, नैनन अति झर लायौ

Mohan Lalpalne Jhule Jasumati Mat Jhulave Ho

झूला
मोहनलाल पालने झूलैं, जसुमति मात झुलावे हो
निरिख निरखि मुख कमल नैन को, बाल चरित जस गावे हो
कबहुँक सुरँग खिलौना ले ले, नाना भाँति खिलाये हो
चुटकी दे दे लाड़ लड़ावै, अरु करताल बजाये हो
पुत्र सनेह चुचात पयोधर, आनँद उर न समाये हो
चिरजीवौ सुत नंद महर को, ‘सूरदास’ हर्षाये हो

Sun Ri Sakhi Bat Ek Mori

ठिठोली
सुन री सखी, बात एक मेरी
तोसौं धरौं दुराई, कहौं केहि, तू जानै सब चित की मेरी
मैं गोरस लै जाति अकेली, काल्हि कान्ह बहियाँ गही मेरी
हार सहित अंचल गहि गाढ़े, इक कर गही मटुकिया मेरी
तब मैं कह्यौ खीझि हरि छोड़ौ, टूटेगी मोतिन लर मेरी
‘सूर’ स्याम ऐसे मोहि रीझयौ, कहा कहति तूँ मौसौं मेरी

Govind Kabahu Mile Piya Mera

विरह व्यथा
गोविन्द कबहुँ मिले पिया मेरा
चरण कँवल को हँस-हँस देखूँ, राखूँ नैणा नेरा
निरखण को मोहि चाव घणेरो, कब देखूँ मुख तेरा
व्याकुल प्राण धरत नहीं धीरज, तुम सो प्रेम घनेरा
‘मीराँ’ के प्रभु गिरिधर नागर, ताप तपन बहुतेरा

Piya Itani Vinati Suno Mori

शरणागति
पिया इतनी विनती सुनो मोरी
औरन सूँ रस-बतियाँ करत हो, हम से रहे चित चोरी
तुम बिन मेरे और न कोई, मैं सरणागत तोरी
आवण कह गए अजहूँ न आये, दिवस रहे अब थोरी
‘मीराँ’ के प्रभु कब रे मिलोगे, अरज करूँ कर जोरी

Main Hari Charanan Ki Dasi

हरि की दासी
मैं हरि चरणन की दासी
मलिन विषय रस त्यागे जग के, कृष्ण नाम रस प्यासी
दुख अपमान कष्ट सब सहिया, लोग कहे कुलनासी
आओ प्रीतम सुन्दर निरुपम, अंतर होत उदासी
‘मीराँ’ के प्रभु गिरिधर नागर, चैन, नींद सब नासी

Jivan Ke Din Char Re Man Karo Punya Ke Kam

नाशवान संसार
जीवन के दिन चार रे, मन करो पुण्य के काम
पानी का सा बुदबुदा, जो धरा आदमी नाम
कौल किया था, भजन करूँगा, आन बसाया धाम
हाथी छूटा ठाम से रे, लश्कर करी पुकार
दसों द्वार तो बन्द है, निकल गया असवार
जैसा पानी ओस का, वैसा बस संसार
झिलमिल झिलमिल हो रहा, जात न लागे बार
मक्खी बैठी शहद पे, लिये पंख लपटाय
कहे ‘कबीर’ सुनो भाई साधो, लालच बुरी बलाय

Janani Janki Jad Jivani Dhing Chyon Tum Aayi

श्री जानकी स्तुति
जननि जानकी! जड़ जीवनि ढिँग च्यौं तुम आयीं
च्यौं अति करुनामयी दुखद लीला दरसायीं
तब करुना के पात्र अज्ञ, जड़ जीव नहीं माँ
करुनावश ह्वै जगत हेतु, अति विपति सहीं माँ
हाय! कहाँ अति मृदुल पद, कहँ कंकड़युत पथ विकट
ह्वैकें अति प्रिय राम की, रहि न सकीं तिनके निकट

Man Ga Tu Madhav Rag Re

चेतावनी
मन गा तू माधव राग रे, कर माधव से अनुराग रे
कृष्ण भजन को नर तन पाया, यहाँ आय जग में भरमाया
छोड़ छोड़ यह माया छाया, श्याम सुधारस पाग रे
माधव ही तेरा अपना है, और सभी कोरा सपना है
दुनिया से जुड़ना फँसना है, इस बंधन से भाग रे
मोह निशा में बयस बिताई, अन्तकाल की वेला आई
कब तक यों सोयेगा भाई, तू हरि स्मरण हित जाग रे

Jagat Main Jivan Hai Din Char

सदुपदेश
जगत में जीवन है दिन चार
खरी कमाई से ही भोगो, किंचित सुख संसार
मात-पिता गुरुजन की सेवा, कीजै पर उपकार
पशु पक्षी जड़ सब के भीतर, ईश्वर अंश निहार
द्वेष भाव मन से बिसराओ, करो प्रेम व्यवहार
‘ब्रह्मानंद’ तोड़ भव-बंधन, यह संसार असार