Purte Nikasi Raghuvir Vadhu

वन में सीता राम
पुरतें निकसी रघुवीर वधू धरि धीर दए मग में डग द्वै
झलकीं भरि भाल कनीं जल कीं, पुट सूखि गए मधुराधर वै
फिरि बूझति है, चलनो अब केतिक पर्ण कुटी करिहौ कित ह्वै
तिय की लखि आतुरता पिय की अखियाँ अति चारु चलीं जल च्वै

Aavat Mohan Dhenu Charay

गो-चारण
आवत मोहन धेनु चराय
मोर-मुकुट सिर, उर वनमाला, हाथ लकुटि, गो-रज लपटाय
कटि कछनी, किंकिन-धुनि बाजत, चरन चलत नूपुर-रव लाय
ग्वाल-मंडली मध्य स्यामघन, पीतवसन दामिनिहि लजाय
गोप सखा आवत गुण गावत, मध्य स्याम हलधर छबि छाय
सूरदास प्रभु असुर सँहारे, ब्रज आवत मन हरष बढ़ाय

Jasumati Palna Lal Jhulave

यशोदा का स्नेह
जसुमति पलना लाल झुलावे, निरखि निरखि के मोद बढ़ावे
चीते दृष्टि मन अति सचु पावे, भाल लपोल दिठोना लावे
बार बार उर पास लगावे, नन्द उमंग भरे मन भावे
नेति नेति निगम जेहि गावे, सो जसुमति पयपान करावे
बड़भागी ब्रज ‘सूर’ कहावे, मैया अति हर्षित सुख पावे

Nand Gharni Sut Bhalo Padhayo

बाल क्रीड़ा
नंद-घरनि! सुत भलौ पढ़ायौ
ब्रज-बीथिनि पुर-गलिनि, घरै घर, घात-बाट सब सोर मचायौ
लरिकनि मारि भजत काहू के, काहू कौ दधि –दूध लुटायौ
काहू कैं घर में छिपि जाये, मैं ज्यों-त्यों करि पकरन पायौ
अब तौ इन्हें जकरि के बाँधौ, इहिं सब तुम्हरौ गाँव भगायौ
‘सूर’ श्याम-भुज गहि नँदरानी, बहुरि कान्ह ने खेल रचायौ

Meri Shudhi Lijo He Brajraj

शरणागति
मेरी सुधि लीजौ हे ब्रजराज
और नहीं जग में कोउ मेरौ, तुमहिं सुधारो काज
गनिका, गीध, अजामिल तारे, सबरी और गजराज
‘सूर’ पतित पावन करि कीजै, बाहँ गहे की लाज

Re Man Krishna Nam Kah Lije

नाम स्मरण
रेमन, कृष्ण-नाम कह लीजै
गुरु के वचन अटल करि मानहु, साधु-समागम कीजै
पढ़ियै-सुनियै भगति-भागवत, और कथा कहि लीजै
कृष्ण-नाम बिनु जनम वृथा है, वृथा जनम कहाँ जीजै
कृष्ण-नाम-रस बह्यौ जात है, तृषावन्त ह्वै पीजै
‘सूरदास’ हरि-सरन ताकियै, जनम सफल करि लीजै

Hamare Nirdhan Ke Dhan Ram

प्रबोधन
हमारे निर्धन के धन राम
चोर न लेत घटत नहिं कबहूँ, आवत गाढ़ैं काम
जल नहिं बूड़त, अगिनि न दाहत, है ऐसो हरि नाम
वैकुण्ठनाथ सकल सुख दाता, ‘सूरदास’ सुख-धाम

Jo Tum Todo Piya Main Nahi Todu Re

अटूट प्रीति
जो तुम तोड़ो पिया, मैं नाहीं तोड़ूँ
तोरी प्रीत तोड़ के मोहन, कौन संग जोड़ूँ
तुम भये तरुवर मैं भई पँखियाँ, तुम भये सरवर मैं भई मछियाँ
तुम भये गिरिवर मैं भई चारा, तुम भये चन्दा, मैं भई चकोरा
तुम भये मोती प्रभु, मैं भई धागा, तुम भये सोना, मैं भई सुहागा
‘मीराँ’ कहे प्रभु ब्रज के बासी, तुम मोरे ठाकुर, मैं तोरी दासी

Bala Main Beragan Hungi

वैराग्य
बाला, मैं वैरागण हूँगी
जिन भेषाँ म्हारो साहिब रीझे, सो ही भेष धरूँगी
सील संतोष धरूँ घट भीतर, समता पकड़ रहूँगी
जाको नाम निरंजन कहिए, ताको ध्यान धरूँगी
गुरु के ज्ञान रगूँ तन कपड़ा, मन-मुद्रा पैरूँगी
प्रेम-प्रीत सूँ हरि-गुण गाऊँ, चरणन लिपट रहूँगी
या तन की मैं करूँ कींगरी, रसना नाम रटूँगी
‘मीराँ’ के प्रभु गिरिधर नागर, हरि चरणाँ चित दूँगी

Shyam Milan Ro Ghano Umavo

मिलन की प्यास
श्याम मिलणरो घणो उमावो, नित उठ जोऊँ बाट
लगी लगन छूटँण की नाहीं, अब कुणसी है आँट
बीत रह्या दिन तड़फत यूँ ही, पड़ी विरह की फाँस
नैण दुखी दरसण कूँ तरसै, नाभि न बैठे साँस
रात दिवस हिय दुःखी मेरो, कब हरि आवे पास
‘मीराँ’ के प्रभु कब रे मिलोगे, पूरवो मन की आस