Kahan Ke Pathik Kahan Kinh Hai Gavanwa

परिचय
कहाँ के पथिक कहाँ, कीन्ह है गवनवा
कौन ग्राम के, धाम के वासी, के कारण तुम तज्यो है भवनवा
उत्तर देस एक नगरी अयोध्या, राजा दशरथ जहाँ वहाँ है भुवानवा
उनही के हम दोनों कुँवरावा , मात वचन सुनि तज्यो है भवनवा
कौन सो प्रीतम कौन देवरवा ! साँवरो सो प्रीतम गौर देवरवा
‘तुलसिदास’ प्रभु आस चरन की मेरो मन हर लियो जानकी रमणवा

Bethi Sagun Manavati Mata

माँ की आतुरता
बैठी सगुन मनावति माता
कब ऐहैं मेरे बाल कुसल घर, कहहु, काग ! फुरि बाता
दूध-भात की दौनी दैहौं, सोने चोंच मढ़ैहौं
जब सिय-सहित विलोकि नयन भरि, राम-लषन उर लैहौं
अवधि समीप जानि जननी जिय अति आतुर अकुलानी
गनक बोलाइ, पाँय परि पूछति, प्रेम मगन मृदु बानी
तेहि अवसर कोउभरत निकट तें, समाचार लै आयो
प्रभु-आगमन सुनत ‘तुलसी’ मनु, मीन मरत जल पायो

Shabri Sagun Manawat Hai

शबरी की प्रीति
शबरी सगुन मनावत है, मेरे घर आवेंगे राम
बीज बीन फल लाई शबरी, दोना न्यारे न्यारे
आरति सजा प्रार्थना कीन्ही, छिन मंदिर छिन द्वारे
ऋषि के वचन सुनत मनमाहीं, हर्ष न ह्रदय समाई
घर को काम सकल तज दीन्हों, गुन रघुपति के गाई
अनुज सहित प्रभु दरसन दीन्हों, परी चरन लपटाई
‘तुलसीदास’ प्रभु अधम उधारन, दीन्ह जानि अपनाई

Udho Mohi Braj Bisarat Nahi

ब्रज की याद
ऊधौ, मोहिं ब्रज बिसरत नाहीं
वृंदावन गोकुल की स्मृति, सघन तृनन की छाहीं
प्रात समय माता जसुमति अरु नंद देखि सुख पावत
मीठो दधि अरु माखन रोटी, अति हित साथ खवावत
गोपी ग्वाल-बाल संग खेलत, सब दिन हँसत सिरात
‘सूरदास’ धनि धनि ब्रजबासी जिनसों हँसत ब्रजनाथ

Khijat Jat Makhan Khat

बाल-माधुर्य
खीजत जात माखन खात
अरुण लोचन भौंह टेढ़ी, बार-बार जँभात
कबहुँ रुनझुन चलत घुटुरुनि, छुटि धूसर गात
कबहुँ झुकि के अलक खैंचत, नैन जल भरि जात
कबहुँ तोतरे बोल बोलत, कबहुँ बोलत तात
‘सूर’ हरि की निरखि सोभा, पलक तजत न जात

Jasumati Man Abhilash Kare

माँ की अभिलाषा
जसुमति मन अभिलाष करे
कब मेरो लाल घुटुरूअन रैंगे, कब धरती पग धरै
कब द्वै दाँत दूध के देखौ, कब तोतरे मुख वचन झरै
कब नंद ही बाबा कहि बोले, कब जननी कहि मोहि ररै
‘सूरदास’ यही भाँति मैया , नित ही सोच विचार करै

Tiharo Krishna Kahat Ka Jat

चेतावनी
तिहारौ कृष्ण कहत का जात
बिछुड़ैं मिलै कबहुँ नहिं कोई, ज्यों तरुवर के पात
पित्त वात कफ कण्ठ विरोधे, रसना टूटै बात
प्रान लिये जैम जात मूढ़-मति! देखत जननी तात
जम के फंद परै नहि जब लगि, क्यों न चरन लपटात
कहत ‘सूर’ विरथा यह देही, ऐतौ क्यों इतरात

Nand Dham Khelat Hari Dolat

बाल क्रीड़ा
नन्द –धाम खेलत हरि डोलत
जसुमति करति रसोई भीतर, आपुन किलकत बोलत
टेरि उठी जसुमति मोहन कौं, आवहु काहैं न धाइ
बैन सुनत माता पहिचानी, चले घुटुरुवनि पाइ
लै उठाइ अंचल गहि पोंछै, धूरि भरी सब देह
‘सोर्दास’ जसुमति रज झारति, कहाँ भरी यह खेह

Bali Bali Ho Kuwari Radhika

राधा कृष्ण प्रीति
बलि बलि हौं कुँवरि राधिका, नन्दसुवन जासों रति मानी
वे अति चतुर, तुम चतुर-शिरोमनि, प्रीत करी कैसे रही छानी
बेनु धरत हैं, कनक पीतपट, सो तेरे अन्तरगत ठानी
वे पुनि श्याम, सहज तुम श्यामा, अम्बर मिस अपने उर आनी
पुलकित अंग अवहि ह्वै आयो, निरखि सखी निज देह सयानी
‘सूर’ सुजान सखी को बूझे, प्रेम प्रकास भयौ बिकसानी

Mere Nayan Nirakhi Sachu Pawe

रूप माधुरी
मेरे नयन निरखि सचु पावै
बलि बलि जाऊँ मुखारविंद पै, बन ते पुनि ब्रज आवै
गुंजाफल वनमाल मुकुटमनि, बेनु रसाल बजावे
कोटि किरन मुख तें जो प्रकाशित, शशि की प्रभा लजावै
नटवर रूप अनूप छबीलो, सबही के मन भावै
‘सूरदास’ प्रभु पवन मंदगति, विरहिन ताप नसावै