Jhulat Ram Palne Sohe

झूला
झूलत राम पालने सोहैं, भूरि-भाग जननीजन जोहैं
तन मृदु मंजुल मे चकताई, झलकति बाल विभूषन झाँई
अधर – पानि – पद लोहित लोने, सर – सिंगार – भव सारस सोने
किलकत निरखि बिलोल खेलौना, मनहुँ विनोद लरत छबि छौना
रंजित – अंजन कंज – विलोचन, भ्रातज भाल तिलक गोरोचन
लस मसिबिंदु बदन – बिधुनीको, चितवत चित चकोर ‘तुलसी’ को

Aaj Barsane Bajat Badhai

श्री राधा प्राकट्य
आज बरसाने बजत बधाई
प्रगट भई वृषभानु गोप के सबही को सुखदाई
आनँद मगन कहत युवती जन, महरि बधावन आई
बंदीजन, मागध, याचक, गुन, गावत गीत सुहाई
जय जयकार भयो त्रिभुवन में, प्रेम बेलि प्रगटाई
‘सूरदास’ प्रभु की यह जीवन-जोरी सुभग बनाई

Jadyapi Man Samujhawat Log

स्मृति
जद्यपि मन समुझावत लोग
सूल होत नवनीत देख मेरे, मोहन के मुख जोग
प्रातः काल उठि माखन-रोटी, को बिन माँगे दैहै
को है मेरे कुँवर कान्ह कौं, छिन-छिन अंकन लैहै
कहियौ पथिक जाइ घर आवहु, राम कृष्ण दौउ भैया
‘सूर’ श्याम किन होइ दुखारी, जिनके मो सी मैया

Dou Sut Gokul Nayak Mere

वियोग
दोउ सुत गोकुल नायक मेरे
काहे नंद छाँड़ि तुम आये, प्रान जीवन सबके रे
तिनके जात बहुत दुख पायो, शोक भयो ब्रज में रे
गोसुत गाय फिरत चहूँ दिसि में, करे चरित नहिं थोरे
प्रीति न करी राम दसरथ की, प्रान तजे बिन हेरे
‘सूर’ नन्द सों कहति जसोदा, प्रबल पाप सब मेरे

Mai Moko Chand Lagyo Dukh Den

विरह व्यथा
माई, मोकौं चाँद लग्यौ दुख दैन
कहँ वे स्याम, कहाँ वे बतियाँ, कहँ वह सुख की रैन
तारे गिनत गिनत मैं हारी, टपक न लागे नैन
‘सूरदास’ प्रभु तुम्हारे दरस बिनु, विरहिनि कौं नहिं चैन

Radha Te Hari Ke Rang Ranchi

अभिन्नता
राधा! मैं हरि के रंग राँची
तो तैं चतुर और नहिं कोऊ, बात कहौं मैं साँची
तैं उन कौ मन नाहिं चुरायौ, ऐसी है तू काँची
हरि तेरौ मन अबै चुरायौ, प्रथम तुही है नाची
तुम औ’ स्याम एक हो दोऊ, बात याही तो साँची
‘सूर’ श्याम तेरे बस राधा! कहति लीक मैं खाँची

Shyam Liyo Giriraj Uthai

गिरिराज धरण
स्याम लियो गिरिराज उठाई
धीर धरो हरि कहत सबनि सौं, गिरि गोवर्धन करत सहाई
नंद गोप ग्वालिनि के आगे, देव कह्यो यह प्रगट सुनाई
काहै कौ व्याकुल भै डोलत, रच्छा करत देवता आई
सत्य वचन गिरिदेव कहत हैं, कान्ह लेहिं मोहिं कर उचकाई
‘सूरदास’ नारी नर ब्रज के, कहत धन्य तुम कुँवर कन्हाई

Jaago Bansi Ware Lalna

प्रभाती
जागो बंसीवारे ललना, जागो मोहन प्यारे
रजनी बीती भोर भयो है, घर घर खुले किवारे
गोपी दही मथत सुनियत है, कँगना के झनकारे
उठो लालजी भोर भयो है, सुर नर ठाड़े द्वारे
ग्वाल बाल सब करत कुलाहल, जय जय सबद उचारे
माखन रोटी करो कलेवा, गउवन के रखवारे
‘मीराँ’ के प्रभु गिरिधर नागर, शरणागत कूँ तारे

Barse Badariya Sawan Ki

प्रतीक्षा
बरसे बदरिया सावन की, सावन की मनभावन की
सावन में उमग्यो मेरो मनवा, भनक सुनी हरि आवन की
नन्हीं-नन्हीं बूँदन मेहा बरसे, शीतल पवन सुहावन की
‘मीराँ’ के प्रभु गिरिधर नागर, आनँद मंगल गावन की

Rana Ji Ruthe To Mharo Kai Karsi

गोविंद का गान
राणाजी रूठे तो म्हारो काई करसी, मैं तो गोविन्द का गुण गास्याँ
राणाजी भले ही वाँको देश रखासी, मैं तो हरि रूठ्याँ कठे जास्याँ
लोक लाज की काँण न राखाँ मैं तो हरि-कीर्तन करास्याँ
हरि-मंदिर में निरत करस्याँ, मैं तो घुँघरिया घमकास्याँ
चरणामृत को नेम हमारो, मैं तो नित उठ दरसण जास्याँ
‘मीराँ’ के प्रभु गिरिधर नागर, मैं तो भवसागर तिर जास्याँ