Jay Shri Ram Hare

रामचन्द्र आरती
श्री राम हरे ॐ जय रघुवीर हरे
आरती करूँ तुम्हारी, संकट सकल टरे
कौशल्या-सुखवर्धन, नृप दशरथ के प्रान
श्री वैदेही-वल्लभ, भक्तों की प्रभु आन —-ॐ जय …
सत्-चित्-आनन्द रूपा, मनुज रूप धारी
शिव, ब्रह्मा, सुर वन्दित, महिमा अति भारी —-ॐ जय …
श्रीविग्रह की आभा, नव नीरद सम श्याम —-
सुभग सरोरुह लोचन, चितवन सौम्य ललाम —-ॐ जय …
कोटि मदन को लाजत, ॠषि-मुनि मन मोहे
पीताम्बर कटि राजत, रविकर द्युति सोहे —-ॐ जय …
रत्न हार गल शोभित, कुण्डल रुचिकारी —-
राजपाट सुख त्यागे, धनुष बाण धारी —-ॐ जय …
गौतम-नारि अहिल्या, शबरी को तारी —-
शिव धनु भंजत हरषे, मिथिला नर नारी —-ॐ जय …
रावणादि निशिचरगण, संहारे रघुवीर
मर्यादा पुरुषोत्तम, हरो हृदय की पीर —-ॐ जय … 

Aarti Shri Bhagwad Gita Ki

श्रीमद्भगवद्गीता आरती
आरती श्री भगवद्गीता की, श्री हरि-मुख निःसृत विद्या की
पृथा-पुत्र को हेतु बनाकर, योगेश्वर उपदेश सुनाये
अनासक्ति अरु कर्म-कुशलता, भक्ति, ज्ञान का पाठ पढ़ाये
करें कर्म-फल प्रभु को अर्पण, राग-द्वेष मद मोह नसाये
वेद उपनिषद् का उत्तम रस, साधु-संत-जन के मन भाये
करें सार्थक मानव जीवन, भव-बंधन, अज्ञान मिटायें
अद्भुत, गुह्य, पूजनीय गाथा, मानव जीवन सफल बनाये  

Raghu Nandan Ki Aarti Kije

राम आरती
रघुनन्दन की आरती कीजै, दिव्य स्वरूप बसा मन लीजै
पीताम्बर अद्वितीय कलेवर, संग जानकी माता सोहे
धनुष बाण धारे जगदीश्वर, भरत, लखन, रिपुसूदन मोहे
वैदेही लक्ष्मण है सँग में, राघवेन्द्र वनवास पधारे
ॠषि, मुनि, शबरी दर्शन पाये, खरदूषण राक्षस संहारे
साधुवेष धर रावण पहुँचा, वैदेही को तभी चुराया
रावणादि को मार युद्ध में, पृथ्वी का सब भार मिटाया
सकुशल लौट अवध सब आये, राम राज्य हो गया धरा पर
भक्ति दान दीजै प्रभु विनती, करुणा-निधि श्री राम कृपा कर

Aarti Shri Ramcharit Manas Ki

श्री रामचरित मानस- रामायण आरती
आरती रामचरित मानस की, रचना पावन चरित राम की
निगमागम का सार इसी में, वाल्मीकि ऋषि, तुलसी गाये
रामचरितमानस रामायण, निश्चल-भक्ति सुधा बरसाये
पति-व्रत, बन्धु-प्रेम, मर्यादा, माँ सीता का चरित सुहाये
आज्ञापालन, राज-धर्म, त्यागी जीवन आदर्श बताये
साधु-संत प्रिय, कलिमलहारी, दुःख शोक अज्ञान मिटाये
श्रद्धा-युत हो श्रवण करे जो, कहें सुने भव-ताप नसाये

Aarti Kije Shri Raghuvar Ki

राम आरती
आरती कीजै श्री रघुवर की, मर्यादा पुरुषोत्तम राम की
दशरथ-सुत कौसल्या-नंदन, चंद्र-वदन की शोभा भारी
सुर-मुनि-रक्षक, दैत्य-निकंदन, मर्यादित जीवन असुरारी
स्वर्ण-मुकुट मकराकृत कुण्डल, हीरक-हार छटा उजियारी
भुजा विशाल आभरण अनुपम, भाल तिलक की शोभा न्यारी
सूर्य चन्द्र कोटिक छबि लाजै, स्वर्णिम पीताम्बर कटि धारी
धीर वीर प्रभु जानकीवल्लभ, शिव, ब्रह्मा, ऋषि मुनि बलिहारी
सच्चिदानन्द भगवान् राम हैं, भव-भंजन, जन जन हितकारी

Jay Ganga Maiya

गंगा आरती
जय गंगा मैया, माँ जय सुरसरि मैया
आरती करे तुम्हारी, भव-निधि की नैया
हरि-पद-पद्म-प्रसूति, विमल वारिधारा
ब्रह्म द्रव भागीरथि, शुचि पुण्यागारा
शंकर-जटा विहारिणि, भव-वारिधि-त्राता
सगर-पुत्र गण-तारिणि, स्नेहमयी माता
‘गंगा-गंगा’ जो जन, उच्चारे मुख से
दूर देश स्थित भी, पाये मुक्तिभय से
मृत व्यक्ति की अस्थियाँ जो प्रवेश पाये
वो भी पावन होकर परम धाम जाये
हे माता करुणामयी, शरण मुझे दीजै
आरती करें तुम्हारी, आप कृपा कीजै  

Jay Jay Bal Krishna

कृष्ण आरती
जय जय बालकृष्ण शुभकारी, मंगलमय प्रभु की छबि न्यारी
रत्न दीप कंचन की थारी, आरति करें सकल नर-नारी
नन्दकुमार यशोदानन्दन, दुष्ट-दलन, गो-द्विज हितकारी
परब्रह्म गोकुल में प्रकटे, लीला हित हरि नर-तनु धारी
नव-जलधर सम श्यामल सुन्दर, घुटुरन चाल अमित मनहारी
पीत झगा उर मौक्तिक-माला, केशर तिलक दरश प्रियकारी
दंतुलिया दाड़िम सी दमके, मृदुल हास्य मोहक रुचिकारी
कर-कंकण, चरणों में नूपुर गूँजत आँगन में झंकारी
मुग्ध होत ब्रज के नर नारी, तन मन या छबि ऊपर वारी
वेद-पुराण विमल यश गाये, सुषमा-सागर कलि-मल हारी

Aarti Kalindi Maiya

यमुना आरती
आरती कालिंदी मैया की, कृष्ण-प्रिया श्री जमुनाजी की
जय श्यामा शुभदायिनी जय जय, मन वांछित फलदायिनि जय जय
जय ब्रज-मण्डल-वासिनि जय जय, सरिता पाप-विनाशिनि जय जय
जय कलि-कलुष-नसावनि जय जय, मंगलमय माँ पावनी, जय जय
जय गोलोक-प्रदायिनि जय जय, जय मधु गन्ध-विलासिनि जय जय

Om Jay Govind Hare

कृष्ण आरती
ॐ जय गोविन्द हरे, प्रभु जय गोपाल हरे
सत्य सनातन सुन्दर, मन-वच-बुद्धि परे
नव नीरद सम श्यामल, शोभा अति भारी
चपल कमल दल लोचन, ब्रज जन-बलिहारी
शरद पूर्णिमा शशि सम, मुख-मण्डल अभिराम
मृग-मद तिलक विराजत, कुंचित केश ललाम
मोर-मुकुट कर मुरली, पीताम्बर धारी
गल बैजंती माला, राजत बनवारी —-
नवनीत चोर कहावे, विश्वम्भर गोपाल
भव बंधन को काटे, बँधे यशोदा-लाल
राधा के मन रंजन, ब्रजबाला चितचोर
जसुमति नयनन तारे, नन्दित नन्द-किशोर
पार्थ-सारथी होकर, हरा धरा का भार
गीतामृत दोहन कर, किया जगत उद्धार
सुखनिधि, प्रेम के सिन्धु केशव कृष्ण हरे
प्रणत क्लेश को नाशे, मन में मोद भरे
आरतिहर की आरति, जो कोई जन गाये
करे प्रेम से कीर्तन, भव-निधि तर जाये

Aarti Reva Ki Kije

नर्मदा आरती
आरती रेवा की कीजै, अमृत-पय मन भर पी लीजै
साधु संतों की प्रियकारी, सुभग सौभाग्य कीर्तिवारी
नर्मदे बहती करि हर हर, सुधा सम जल में नित भीजै
दरस से दुख दुष्कृत काटो, अमृत-रस भक्तों को बाँटो
सतत यमदूतों को डाँटो, शरण चरणों की माँ दीजै
शम्भु की पुत्री सुकुमारी, जननि गिरिजा की अति प्यारी
विंध्य-सुता मेकल सिर धारी, कृपा बिनु जीवन यह छीजै
जननि तव महिमा को गाऊँ, मनोहर मूरति नित ध्याऊँ
पाद-पद्मों में सिर नाऊँ, हमें माँ अपनो करि लीजै आरती….