Chal Rahe Bakaiyan Manmohan

बालकृष्ण
चल रहे बकैयाँ मनमोहन, सन गये धूल में जो सोहन
जब नहीं दिखी मैया उनको किलकारी मारे बार बार
माँ निकट रसोईघर में थी, गोदी में लेकर किया प्यार
आँचल से अंगों को पोछा और दूध पिलाने लगी उन्हें
क्षीरोदधि में जो शयन करें, विश्वम्भर कहते शास्त्र जिन्हें

Jay Jayati Jay Raghuvansh Bhushan

श्रीराम स्तुति
जय जयति जय रघुवंश भूषण, राम राजिव लोचनम्
त्रय ताप खण्डन जगत् मण्डन ध्यान गम्य अगोचरम्
अद्वैत अविनाशी अनिन्दित, मोद प्रद अरि गंजनम्
भव वारिधि के आप तारक, अन्य जगत् विडम्बनम्
हे दीन दारिद के विदारक! दयासिन्धु कृपा करम्
हे आश्रितों के आप पालक! दु:ख शोक विनाशकम् 

Tulsi Mira Sur Kabir

भक्त कवि
तुलसी मीरा सूर कबीर, एक तूणीर में चारों तीर
इन तीरों की चोट लगे तब रक्त नहीं, बहे प्रेम की नीर
एक तूणीर में चारो तीर, तुलसी मीरा सूर कबीर
तुलसीदास हैं राम पुजारी, मीरा के प्रभु गिरधारी
सूरदास सूरज सम चमके, सहज दयालु संत कबीर
एक तूणीर में चारो तीर, तुलसी मीरा सूर कबीर
रामचरित मानस तुलसी की, माया मोह का दूर करे
प्रेम सुधा मीरा बरसावे, पीकर सारा जगत् तरे
एक तूणीर में चारों तीर, तुलसी मीरा सूर कबीर
सूर लुटाये कृष्ण प्रेम को, हर लेते अज्ञान कबीर
भजन नित्य इनके जो गाये, नहीं सताये जग की पीर
एक तूणीर में चारो तीर, तुलसी मीरा सूर कबीर

Nirbal Ke Pran Pukar Rahe Jagdish Hare

जगदीश स्तवन
निर्बल के प्राण पुकार रहे, जगदीश हरे जगदीश हरे
साँसों के स्वर झंकार रहे, जगदीश हरे जगदीश हरे
आकाश हिमालय सागर में, पृथ्वी पाताल चराचर में
ये शब्द मधुर गुंजार रहे, जगदीश हरे जगदीश हरे
जब दयादृष्टि हो जाती है, जलती खेती हरियाती है
इस आस पे जन उच्चार रहे, जगदीश हरे जगदीश हरे
तुम हो करुणा के धाम सदा, शरणागत राधेश्याम सदा
बस मन में यह विश्वास रहे, जगदीश हरे जगदीश हरे

Bangala Bhala Bana Maharaj

नश्वर देह
बंगला भला बना महाराज, जिसमें नारायण बोले
पाँच तत्व की र्इंट बनाई, तीन गुणों का गारा
छत्तीसों की छत बनाई, चेतन चिनने हारा
इस बँगले के दस दरवाजे, बीच पवन का थम्भा
आवत जावत कछू ना दीखे, ये ही बड़ा अचम्भा
इस बँगले में चौपड़ माँडी, खेले पाँच पचीसा
कोर्ई तो बाजी हार चला है, कोई चला जुग जीता
इस बँगले में पातर नाचे, मनुवा ताल बजाये
निरत सुरत के पहन घुँघरू, राग छत्तीसों गाये
कहे ‘मछन्दर’ सुन ले गोरख, जिन यह बँगला गाया
इस बंगले का गाने वाला, फेर जनम नहिं पाया

Manmohan Hamko Ati Pyare

बालकृष्ण प्रति प्रेम
मनमोहन हम को अति प्यारे
बार-बार किलकारी मारे, चले कन्हैया घुटनों से
ब्रज-वधुएँ आनन्दित होकर, उसे लगायें छाती से
कहें-इसे हम जभी देखतीं, प्यार उमड़ता हम सबको
रोक नहीं पाती उमंग को, सुध-बुध रहे नहीं हमको
कितनी बार गोद में लेतीं, किन्तु न मन ही भरता है
धन्य प्रेम इनका कान्हा प्रति, कहीं न इसकी समता है

Rasiya Ko Nar Banao Ri

होली
रसिया को नार बनाओ री, रसिया को
कटि लहँगा, उर माँहि कंचुकी, चूनर आज ओढ़ाओरी
बिंदी भाल नयन में कजरा, नक बेसर पहनाओरी
सजा धजा जसुमति के आगे, याको नाच नचाओरी
होरी में न लाज रहे सखियाँ, मिल कर के आज चिढ़ाओरी 

Shivshankar Se Jo Bhi Mange

औढरदानी शिव
शिवशंकर से जो भी माँगे, वर देते उसको ही वैसा
औढरदानी प्रभु आशुतोष, दूजा न देव कोई ऐसा
कर दिया भस्म तो कामदेव, पर वर प्रदान करते रति को
वे व्यक्ति भटकते ही रहते, जो नहीं पूजते शंकर को
काशी में करे जो देह त्याग, निश्चित ही मुक्त वे हो जाते
महादेव अनुग्रह हो जिस पर, मनवांछित फल को वे पाते

Sanakadik Devon Ke Purvaj

श्री सनकादि का उपदेश
सनकादिक देवों के पूर्वज, ब्रह्माजी के मानस ये पूत
मन में जिनके आसक्ति नहीं, वे तेजस्वी प्रज्ञा अकूत
है सदुपदेश उनका ये ही ‘धन इन्द्रिय-सुख के हों न दास’
पुरुषार्थ चतुष्टय उपादेय, सद्भाव, चरित का हो विकास
विद्या सम कोई दान नहीं, सत् के समान तप और नहीं
आसक्ति सदृश न दुख कोई, तप के जैसा सुख नहीं कहीं

Bharat Bhai Kapi Se Urin Ham Nahi

कृतज्ञता
भरत भाई कपि से उऋण हम नाहीं
सौ योजन मर्याद सिन्धु की, लाँघि गयो क्षण माँही
लंका-जारि सिया सुधि लायो, गर्व नहीं मन माँही
शक्तिबाण लग्यो लछमन के, शोर भयो दल माँही
द्रोणगिरि पर्वत ले आयो, भोर होन नहीं पाई
अहिरावण की भुजा उखारी, पैठि गयो मठ माँही
जो भैया, हनुमत नहीं होते, को लावत जग माँही
आज्ञा भंग कबहुँ नहीं कीन्हीं, जहँ पठयऊँ तहँ जाई
‘तुलसिदास’, मारुतसुत महिमा, निज मुख करत बड़ाई