Kabhu Man Vishram N Manyo

संसार चक्र
कबहूँ मन विश्राम न मान्यो
निसिदिन भ्रमत बिसारि सहन सुख जहँ तहँ इंद्रिन तान्यो
जदपि विषय सँग सह्यो दुसह दुख, विषम जान उरझान्यो
तदपि न तजत मूढ़, ममता बस, जानतहूँ नहिं जान्यो
जन्म अनेक किये नाना विधि, कर्म कीच चित सान्यो
‘तुलसिदास’ ‘कब तृषा जाय सर खनतहिं’ जनम सिरान्यो

Pawan Prem Ram Charan

रामनाम महिमा
पावन प्रेम राम-चरन-कमल जनम लाहु परम
राम-नाम लेत होत, सुलभ सकल धरम
जोग, मख, विवेक, बिरति, वेद-विदित करम
करिबे कहुँ कटु कठोर, सुनत मधुर नरम
‘तुलसी’ सुनि, जानि बूझि, भूलहि जनि भरम
तेहि प्रभु को होहि, जाहि सबही की सरम

Ram Kam Ripu Chap Chadhayo

धनुष भंग
राम कामरिपु चाप चढ़ायो
मुनिहि पुलक, आनंद नगर, नभ सुरनि निसान बजायो
जेहि पिनाक बिनु नाक किये, नृप सबहि विषाद बढ़ायो
सोई प्रभु कर परसत टूटयो, मनु शिवशंभु पढ़ायो
पहिराई जय माल जानकी, जुबतिन्ह मंगल गायो
‘तुलसी’ सुमन बरसि सुर हरषे, सुजसु तिहूँ पुर छायो

Aaju Meri Vrandawan Main

दधि लूटन
आजु मेरी वृन्दावन में दधि लूटी
कहाँ मेरो हार कहाँ नक बेसर, कहाँ मोतियन लर टूटी
बरजो यशोदा श्यामसुंदर को, झपटत गगरी फूटी
‘सूरदास’ हेरि के जु मिलन को, सर्वस दे ग्वालिन छूटी

Kou Mai Leho Re Gopal

मुग्ध गोपी
कोउ माई लेहो रे गोपाल
दधि को नाम श्याम घन सुंदर, बिसर्यो चित ब्रजबाल
मटकी सीस भ्रमत ब्रज बीथिन, बोलत बचन रसाल
उफनत तक चूवत चहुँ दिसि तें, मन अटक्यो नँदलाल
हँसि मुसिकाइ ओट ठाड़ी ह्वै, चलत अटपटी चाल
‘सूर’ श्याम बिन और न भावे, यह बिरहिनी बेहाल

Jamuna Tat Dekhe Nand Nandan

गोपी का प्रेम
जमुना तट देखे नंद-नन्दन
मोर-मुकुट मकराकृति कुण्डल, पीत वसन, तन चन्दन
लोचन तृप्त भए दरसन ते, उर की तपन बुझानी
प्रेम मगन तब भई ग्वालिनी, सब तन दसा हिरानी
कमल-नैन तट पे रहे ठाड़े, सकुचि मिली ब्रज-नारी
‘सूरदास’ प्रभु अंतरजामी, व्रत पूरन वपु धारी

Ter Suno Braj Raj Dulare

विनय
टेर सुनो ब्रज राज दुलारे
दीन-मलीन हीन सुभ गुण सों, आन पर्यो हूँ द्वार तिहारे
काम, क्रोध अरु कपट, लोभ, मद, छूटत नहिं प्राण ते पियारे
भ्रमत रह्यो इन संग विषय में, ‘सूरदास’ तव चरण बिसारे

Nandahi Kahat Jasoda Rani

मुख में सृष्टि
नंदहि कहत जसोदा रानी
माटी कैं मिस मुख दिखरायौ, तिहूँ लोक रजधानी
स्वर्ग, पताल, धरनि, बन, पर्वत, बदन माँझ रहे आनी
नदी-सुमेर, देखि भौंचक भई, याकी अकथ कहानी
चितै रहे तब नन्द जुवति-मुख, मन-मन करत बिनानी
सूरदास’ तब कहति जसोदा, गर्ग कही यह बानी

Prat Bhayo Jago Gopal

प्रभाती
प्रात भयौ, जागौ गोपाल
नवल सुंदरी आई बोलत, तुमहिं सबै ब्रजबाल
प्रगट्यौ भानु, मन्द भयौ चंदा, फूले तरुन तमाल
दरसन कौं ठाढ़ी ब्रजवनिता, गूँथि कुसुम बनमाल
मुखहि धोई सुंदर बलिहारी, करहु कलेऊ लाल
‘सूरदास’ प्रभु आनंद के निधि, अंबुज-नैन बिसाल

Murali Adhar Saji Balbir

मोहिनी मुरली
मुरली अधर सजी बलबीर
नाद सुनि वनिता विमोहीं, बिसरे उर के चीर
धेनु मृग तृन तजि रहे, बछरा न पीबत छीर
नैन मूँदें खग रहे ज्यौं, करत तप मुनि धीर
डुलत नहिं द्रुम पत्र बेली, थकित मंद समीर
‘सूर’ मुरली शब्द सुनि थकि, रहत जमुना नीर