Vipin So Aawat Bhawan Kanhai

वन वापसी
विपिन सों आवत भवन कन्हाई
संग गोप गौअन की टोली और सुघड़ बल भाई
गोधूली बेला अति पावन, ब्रज रज वदन सुहाई
नील कमल पै जनु केसर की, सोहत अति सुखराई
साँझ समय यह आवन हरि की, निरखहिं लोग लुगाई
सो छबि निरखन को हमरे हूँ, नयना तरसहिं माई

Nam Liya Prabhu Ka Jisane

सदुपदेश
नाम लिया प्रभु का जिसने चाहे साधन और किया न किया
जड़ चेतन जग में भी जितने, घट में सम इनको जान सदा
परमारथ का नित कार्य किया, चाहे दान किसी को दिया न दिया
जिसके घर में हरि चर्चा हो, दिन रात छोड़ दुनियादारी
सत्संग कथामृत पान किया, चाहे तीर्थ का नीर पिया न पिया
गुरु के उपदेश व सत्सँग को, श्रद्धापूर्वक जो ग्रहण करे
‘ब्रह्मानंद’ स्वरूप को जान लिया, चाहे साधन योग किया न किया

Ayodhya Durjan Dosh Hare

अयोध्या
अयोध्या दुर्जय दोष हरे
परमधाम साकेत राम का, शान्ति प्रदान करे
सरयू-जल में स्नान ध्यान से, मन का मैल जरे
स्मरण राम की लीलाओं का, मन को मुदित करे
मनः बुद्धि निर्मल हो जाए, राघव कृपा करे 

Kab Aaoge Krishna Murare

प्रतीक्षा
कब आओगे कृष्ण मुरारे, आस में बैठी पंथ निहारूँ
सूरज डूबा साँझ भी आई, दर पे खड़ी हूँ आस लगाये
रात हुई और तारे निकले, कब आओगे कृष्ण मुरारे
आधी रात सुनसान गली है, मैं हूँ अकेली गगन में तारे
जागा सूरज सोए तारे, कब आओगे कृष्ण मुरारे
भोर भई जग सारा जागा, हुआ प्रकाश अँधेरा भागा
देर करो मत मोहन प्यारे, कब आओगे कृष्ण मुरारे

Guru Vishnu Vidhi Mahesh Hai

गुरु वन्दना
गुरु विष्णु, विधि महेश हैं, साक्षात् ही परमेश हैं
अभिमान का नहीं लेश है, वे ज्ञान रूप दिनेश हैं
धर्म की गति है गहन, उसको समझना है अगम
गुरु दूर करते मोह माया, दुर्ज्ञेय को करते सुगम
भव-सिन्धु को कैसे तरें, दुःख द्वेष का आगार हैं
यदि सद्गुरु करूणा करें, समझो कि बेड़ा पार है
अनिरूद्ध करते ज्ञान-पथ, सन्मार्ग दिखलाते गुरु
मद, मोह, तम का नाश कर, आलोक भरते हैं गुरु
गुरुदेव, सलिल-सरोज सम हैं, शुद्ध सद्गुण-धाम है
ऐसे कृपा-निधि देव को, प्रणिपात और प्रणाम है

Jagat Main Jivan Ke Din Char

नश्वर जीवन
जगत में जीवन के दिन चार
मिला विवेक प्रभु से हमको, इसका करो विचार
फँस मत जाना यहाँ मोह में, सभी कपट व्यवहार
किसका तूँ है कौन तुम्हारा, स्वार्थ पूर्ण संसार
मानव तन दुर्लभ दुनिया में, कर सेवा उपकार
प्रभु से प्रीति लगाले प्यारे, नहीं करें भव-पार 

Jhule Yugal Kishor

झूला
झूले युगल किशोर
अति आनन्द भरे रस गावत, लेत प्रिया चित चोर
कंचन मणि के खम्भ बनाये, श्याम घटा घन घोर
पीत वसन दामिनी छवि लज्जित, बोलन लागे मोर
रत्न जटित पटली पर बैठे, नागर नन्द किशोर

Nand Mahar Ghar Bajat Badhai

श्रीकृष्ण प्राकट्य
नंद महर घर बजत बधाई,
बड़े भाग्य जाये सुत जसुदा, सुनि हरषे सब लोग लुगाई
भाँति भाँति सो साज साजि सब, आये नंदराय गृह धाई
नाचहिं गावहिं हिय हुलसावहिं, भरि-भरि भाण्ड के लई मिठाई
भयो अमित आनन्द नंदगृह, करहिं महर सबकी पहुनाई
‘परमानँद’ छयो त्रिभुवन में, चिरजीवहु यह कुँवर कन्हाई

Prabhu Rakho Laj Hamari

शरणागति
प्रभु! राखो लाज हमारी
अमृत बना पिया विष मीरा, चरण-कमल बलिहारी
जिन भक्तों ने लिया सहारा, उनकी की रखवारी
खोया समय भोग में मैंने, तुमको दिया बिसारी
पापी कौन बड़ा मेरे से, तुम हो कलिमल हारी
प्रीति-पात्र मैं बनूँ तुम्हारा, संबल दो बनवारी
अविनय क्षमा करो नँदनंदन, आया शरण तुम्हारी
जो चाहे सो रूप धरो हरि, आओ कृष्ण मुरारी

Bhawani Dur Karo Dukh Maa

निवेदन
भवानी, दूर करो दु:ख माँ
तेरो बालक करे पुकार, भवानी! दूर करो दुख माँ
मैं तो हूँ अति कपटी पापी, औगुण को घर माँ
राग-द्वेष में डूब रह्यो नित, शुभ लक्षण नहीं माँ
पूजा-पाठ कछू नहीं जाणूँ, भक्ति न जाणू माँ
साधु-संगत कबहुँ न किन्ही, तीरथ व्रत नहीं माँ
बालपणो तरुणाई बीती, तन-जर्जर अब माँ
मनुज जनम पाकर भी मैं तो, विरथा खोयो माँ