Jisne Nit Hari Ka Nam Liya

नाम महिमा
जिसने नित हरि का नाम लिया उसने अपना कल्याण किया
जिसने पशु पक्षी प्राणिमात्र का पालन पोषण नित्य किया
चाहे दान किसी को दिया न दिया, भवनिधि को उसने पार किया
सत्संग कथामृत पान किया, आजीवन सबका भला किया
चाहे पूजा पाठ किया न किया पर भक्ति-भाव को प्राप्त किया
गुरु का उपदेश हृदय धर के, आचरण शास्त्र अनुसार किया
चाहे व्रत उपवास किया न किया, मानव जीवन को सफल किया

Din Vyartha Hi Bite Jate Hain

चेतावनी
दिन व्यर्थ ही बीते जाते हैं
जिसने मानव तन हमें दिया, उन करुणा निधि को भुला दिया
जीवन की संध्या वेला में हम ऐसे ही पछताते हैं
घर पुत्र मित्र हे भाई मेरा, माया में इतना उलझ गया
धन हो न पास, जर्जर शरीर, ये कोई काम न आते हैं
दुनियादारी गोरख धंधा, आकण्ठ इसी में डूब रहे
मृगतृष्णा सिवा न कुछ भी ये, केवल हमको भरमाते हैं
बचपन, यौवन, पागलपन में, अनमोल समय सब गँवा दिया
कर्तव्य विमुख हम बने रहे, अब क्या हो, सोच न पाते हैं
जिसके साधे सब सध जाते, यह सत्य अरे क्यों याद नहीं
शरणागत हो जा उन प्रभु के जो भक्तों को अपनाते हैं
हे मानव तुझे विवेक मिला, अब चेत समय जो बचा शेष
आर्तस्तव हो हरि कीर्तन कर, वे बेड़ा पार लगाते हैं 

Prabhu Ki Apaar Maya

शरणागति
प्रभु की अपार माया, जिसने जगत् रचाया
सुख दुःख का नजारा, कहीं धूप कहीं छाँया
अद्भुत ये सृष्टि जिसको, सब साज से सजाया
ऋषि मुनि या देव कोई, अब तक न पार पाया
सब ही भटक रहे है, दुस्तर है ऐसी माया
मुझको प्रभु बचालो, मैं हूँ शरण में आया

Budhapa Bairi Tu Kyon Kare Takor

वृद्धा अवस्था
बुढ़ापा बैरी, तूँ क्यों करे टकोर
यौवन में जो साथ रहे, वे स्नेही बने कठोर
जीर्ण हो गया अब तन सारा, रोग व दर्द सताते
गई शक्ति बोलो कुछ भी तो, ध्यान कोई ना देते
चेत चेत रे मनवा अब तो, छोड़ सभी भोगों को
राम-कृष्ण का भजन किये बिन, ठोर नहीं हैं तुझको 

He Gouri Putra Ganesh Gajanan

श्री गणेश प्राकट्य
हे गौरी-पुत्र गणेश गजानन, सभी कामना पूर्ण करें
कलियुग में पूजा अर्चन से, सारे कष्टों को शीघ्र हरे
ब्रह्मा, विष्णु अरु रुद्र आप, अग्नि, वायु, रवि, चन्द्र आप
श्रद्धा पूर्वक जो स्मरण करे, हर लेते सारे पाप ताप
माँ पार्वती के सुत होकर के, प्रत्येक कल्प में जो आते
वे परब्रह्म-भगवान कृष्ण, माता को सुख ये पहुँचाते
मैं प्राप्त करूँ उत्तम बेटा, देवीजी के मन में आया
जब पुत्र रूप उत्पन्न हुए, श्रीकृष्ण वहाँ मंगल छाया
दर्शन पाकर ब्रह्मादिक को, सब देवों को भी हर्ष हुआ
शिशु पर जब शनि की दृष्टि पड़ी, धड़ से मस्तक विलीन हुआ
श्री विष्णु शीघ्र ही जाकर के, गज के मस्तक को ले आये
धड़ पर उसको फिर जोड़ दिया, सब देव वहाँ तब हुलसाये
श्री विष्णु ने तब स्तुति की, सर्वेश्वर, सत्य, सिद्धिदाता
वरणीय श्रेष्ठ सब देवों में, है विघ्न-विनाशक हे त्राता

Jiwan Ke Din Bas Char Bache

भक्ति भाव
जीवन के दिन बस चार बचे, क्यों व्यर्थ गँवाये जाता है
क्यों भक्ति योग का आश्रय ले, कल्याण प्राप्त नहीं करता है
अज्ञान तिमिर को दूर करे, भगवान कपिल उपदिष्ट यही
माँ देवहूति को प्राप्त वही, जो नहीं सुलभ अन्यत्र कहीं
श्रद्धापूर्वक निष्काम भाव से, नित्य कर्म अति उत्तम है
प्रतिमा दर्शन,पूजा सेवा, स्तुति भजन श्रेयस्कर है
तू, काम, क्रोध से होए मुक्त, सारे संकट भी हो समाप्त
कर्तव्य, भक्ति में लीन रहे, तो परम सिद्धि हो सहज प्राप्त
जो जीव मात्र में प्राण रूप, अन्तर्यामी चैतन्य विभो
अध्यात्म शास्त्र का श्रवण करे,लीला जो करते वही प्रभो
अपने जैसा सबको समझे, यम नियम आदि का पालन हो
है त्याज्य अहं, प्राणी हिंसा, सत्संग करें संकीर्तन हो

Din Dukhi Bhai Bahano Ki Seva Kar Lo Man Se

जनसेवा
दीन दुःखी भाई बहनों की सेवा कर लो मन से
प्रत्युपकार कभी मत चाहो, आशा करो न उनसे
गुप्त रूप से सेवा उत्तम, प्रकट न हो उपकार
बनो कृतज्ञ उसी के जिसने, सेवा की स्वीकार
अपना परिचय उसे न देना, सेवा जिसकी होए
सेवा हो कर्तव्य समझ कर, फ लासक्ति नहीं होए
परहित कर्म करो तन मन से, किन्तु प्रचार न करना
फलासक्ति को तज कर के, बस यही भाव मन रखना

Prabhu Ki Upaasana Nitya Kare

पूजन-अर्चन
प्रभु की उपासना नित्य करे
जो सत्य अलौकिक देव-भाव, जीवन में उनको यहीं भरे
मन बुद्धि को जो सहज ही में, श्री हरि की प्रीति प्रदान करे
भौतिक उपचारों के द्वारा, यह संभव होता निश्चित ही
पूजन होए श्रद्धापूर्वक, अनिष्ट मिटे सारे तब ही
पूजा का समापन आरती से, हरि भजन कीर्तन भी होए
तन्मयता से जब कीर्तन हो, प्रभु की अनुकम्पा को पाए 

Bhagvad Gita Sandesh Amar

श्रीमद्भगवद् गीता
भगवद्गीता-संदेश अमर
उपहार अनूठा करें ग्रहण, जैसे पुष्पों से सार भ्रमर
गीताजी ऐसा क्रान्ति ग्रन्थ, मानव का जीवन सार्थक हो
जिस पथ पर गये महाजन वो, हम चलें तभी अभ्युदय हो
विपरीत परिस्थिति में जब हम, घिर जायँ न सूझे मार्ग हमें
भ्रम दूर करें, निर्देश करें, गीताजी का कोई श्लोक हमें
हम निश्चयात्मक बुद्धि से, करणीय कर्म करते जायें
फल छोड़े प्रभु के हाथों में, स्थित-प्रज्ञता भी आये
कर्म, ज्ञान या भक्ति मार्ग, अनुकूल हमें हो अपनाये
भक्ति का पथ है सुगम जहाँ, श्री कृष्ण-दरस भी हो जाये

Rasna Kyon Na Ram Ras Piti

राम रसपान
रसना क्यों न राम रस पीती
षट-रस भोजन पान करेगी, फिर रीती की रीती
अजहूँ छोड़ कुबान आपनी, जो बीती सो बीती
वा दिन की तू सुधि बिसराई, जा दिन बात कहीती
जब यमराज द्वार आ अड़िहैं, खुलिहै तब करतूती
‘रूपकुँवरि’ मन मान सिखावन, भगवत् सन कर प्रीती