Jo Kuch Hai Vah Parmeshwar Hai

तत्व चिंतन
जो कुछ है वह परमेश्वर है वे जगत् रूप प्रकृति माया
यदि साक्षी भाव से चिंतन हो मेरा पन तो केवल छाँया
हम करें समर्पण अपने को, उन परमपिता के चरणों में
और करें तत्व का जो विचार, सद्मार्ग सुलभ हो तभी हमें
जो तत्व मसि का महावाक्य ‘वह तूँ है’ उनके सिवा नहीं
ये ही तो आत्मनिवेदन है, तब जन्म मरण छुट जाय वहीं

Nishchint Huve Baithe Na Raho

प्रबोधन
निश्चिंत हुए बैठे न रहो
शाश्वत जीवन यहाँ किसका है, पैदा होए वे मरते भी
दिन कभी एक से नहीं रहे, इसका विचार तुम करो अभी
जब जन्म दिवस आता है तो, खुशियाँ सब लोग मनाते हैं
कम वर्ष हो गये जीवन के, समझे जो नहीं पछताते हैं 

Prabhu Se Jo Sachcha Prem Kare

हरि-भक्ति
प्रभु से जो सच्चा प्रेम करे, भव-सागर को तर जाते हैं
हरिकथा कीर्तन भक्ति करे, अर्पण कर दे सर्वस्व उन्हें
हम एक-निष्ठ उनके प्रति हों, प्रभु परम मित्र हो जाते हैं
लाक्षागृह हो या चीर-हरण, या युद्ध महाभारत का हो
पाण्डव ने उनसे प्रेम किया, वे उनका काम बनाते है
हो सख्य-भाव उनसे अपना, करुणा-निधि उसे निभायेंगे
सुख-दुख की बात कहें उनसे, वे ही विपदा को हरते हैं  

Man Main Shubh Sankalp Ho

अभिलाषा
मन में शुम संकल्प हों, शुरू करूँ जब काम
सर्वप्रथम सुमिरन करूँ, नारायण का नाम
मनोवृत्ति वश में रहे, कार्यसिद्धि को पाय
ऋद्धि-सिद्धि गणपति सहित, पूजूँ विघ्न न आय
नहीं चाहिये जगत् या राज्य स्वर्ग सुख-भोग
प्राणिमात्र का दुख हरूँ, सुखी रहें सब लोग
सभी रोग से रहित हों, सबका हो कल्याण
दीन दुखी कोई न हो, भरें खेत, खलिहान
नहीं कामना स्वर्ग की, ना चाहूँ निर्वाण
राजपाट नहिं चाहता, सबका हो कल्याण
गो, ब्राह्मण का हो भला, सभी सुखी हों लोग
पृथ्वी का पालन करें, शासक करें न भोग
नहीं किसी से बैर हो, और नहीं हो मोह
रहे सदा यह भावना, प्राणिमात्र से छोह
शुभ ही देखें नयन से, सुनें शब्द शुभ कान
पूर्ण आयु होकर जियें, सेवा कर्म महान् 

Satyam Shivam Sundaram

सत्यं शिवं सुन्दरम्
सत्यं शिवं सुन्दरम् ही तो श्री हरि का रूप है
सुख शांति का यह सार है, अकल्पनीय अनूप है
जीवन मे सत्य विचार हो, व्यवहार वाणी शुद्ध हो
उत्तम यही तो मार्ग है अन्तःकरण भी शुद्ध हो
शिव-भाव से तात्पर्य है, कल्याणमय जीवन रहे
सारे अमंगल दूर हों, मालिन्य को न जरा गहे
कण कण में प्रभु ही व्याप्त है, सौन्दर्य की सीमा नहीं
सुन्दर ही सारी सृष्टि है, सब शास्त्र वेद कहें यही
हम सत्य का अर्चन करें, उत्कृष्ट ये ही धर्म है
सुख शांति हेतु प्रयास ही, सबसे बड़ा सत्कर्म है

Jo Paanch Tatva Se Deh Bani

तत्व चिन्तन
जो पाँच तत्व से देह बनी, वह नाशवान ऐसा जानो
जीना मरना तो साथ लगा, एक तथ्य यही जो पहचानो
परमात्मा ही चेतन स्वरूप और जीव अंश उसका ही है
सच्चिदानंद दोनों ही तो, निर्गुण वर्णन इसका ही है
जैसे की सींप में रजत दिखे, मृगतृष्णा जल होता न सत्य
सम्पूर्ण जगत् ही मिथ्या है, माया का जादू जो असत्य

Nishkam Karma Se Shanti Mile

निष्काम कर्म
निष्काम कर्म से शान्ति मिले
जीवन में चाहों के कारण, केवल अशांति मन छायेगी
सुख शांति सुलभ निश्चित, संतृप्ति भाव मन में होगी
सम्मान प्राप्ति का भाव रहे, तो कुण्ठाएँ पैदा होगी
संयम बरते इच्छाओं पर, मन में न निराशा तब होगी
स्वाभाविक जो भी कर्म करें, फल की इच्छा न रखें मन में
संदेश यही गीताजी का, होगी न हताशा जीवन में 

Prabhu Se Priti Badhaye

हरि से प्रीति
प्रभु से प्रीति बढ़ायें
मुरलीधर की छटा मनोहर, मन-मंदिर बस जाये
माया मोह कामनाओं का, दृढ़ बंधन कट जाये
सब सम्बन्धी सुख के संगी, कोई साथ न आये
संकट ग्रस्त गजेन्द्र द्रौपदी, हरि अविलम्ब बचाये
भजन कीर्तन नंद-नन्दन का, विपदा दूर भगाये
अन्त समय जो भाव रहे, चित वैसी ही गति पाये
हरि भक्ति ही साधन जो तब, विपदा कष्ट दुराये

Manwa Nahi Vichari Re

पछतावा (राजस्थानी)
मनवा नहीं विचारी रे
थारी म्हारी करता उमर बीति सारी रे
बालपणा में लाड़-लड़ायो, माता थारी रे
भर जोबन में लगी लुगाई सबसे प्यारी रे
बूढ़ो हुयो समझ में आई, ऊमर हारी रे
व्यर्थ बिताई करी एक बस, थारी म्हारी रे
मिनख जनम खो दियो, तू जप ले कृष्ण मुरारी रे
अन्तकाल थारो सुधर जायगो वो ही रखवारी रे 

Satswarup Hai Aatma

सत्य दर्शन
सत्स्वरूप है आत्मा, जो स्वभावतः सत्य
झूठ बाहरी वस्तु है, जो अवश्य ही त्याज्य
धन आसक्ति प्रमादवश, व्यक्ति बोलता झूठ
सत्य आचरण ही करें, प्रभु ना जाए रूठ
छद्म पूर्ण हो चरित तो, कहीं न आदर पाय
कपट शून्य हो आचरण, विश्वासी हो जाय
काम क्रोध व लोभ है, सभी नरक के द्वार
धनोपार्जन में रहे, सात्विक शुद्ध विचार  
सद्गुणसद्गुण जीवन में अपनायें
क्या भला बुरा इसका निर्णय, सद्ग्रन्थों से ही मिल पाये
साधु संतों का संग करे, आदर्श उन्हीं का जीवन हो
तब भाव बुरे टिक नहिं पाये, सद्बुद्धि जागृत मन में हो
करुणानिधान प्रभु कृपा करें, जीवन कृतार्थ तब हो जाये
जो कुछ भी सद्गुण दिखें कहीं, उनको हम तत्क्षण अपनायें  
जगद्गुरुसद्गुरु का मिलना दुर्लभ है, उद्धार हमारा कैसे हो
जो महापुरुष होते सच में, शायद ही शिष्य बनाते हों
उद्धार शिष्य का कर न सकें, इसलिए मना कर देते हों
भगवान् कृष्ण हैं जगद्गुरु, श्रीभगवद्गीता कहे यही
अर्जुन का मोह विनष्ट किया, वे पूज्य गुरु से बढ़ कर ही