Jo Rahe Badalta Jagat Vahi

परिवर्ती जगत्
जो रहे बदलता जगत वही
रह सकता इक सा कभी न ये, जो समझे शांति भी मिले यहीं
जो चाहे कि यह नहीं बदले, उन लोगों को रोना पड़ता
हम नहीं हटेगें कैसे भी, विपदा में निश्चित वह फँसता
जो अपने मन में धार लिया,हम डटे रहेंगे उस पर ही
वे भूल गये यह अटल सत्य, विधि का विधान टल सके नहीं

Pahchan Le Prabhu Ko

परब्रह्म
पहचान ले प्रभु को, घट घट में जो है बसते
झूठे सभी है सारे, संसार के जो रिश्ते
जड़ हो कि या हो चेतन, सबमें वही तो बसते
प्रच्छन्न वे नहीं हैं, फिर भी न हमको दिखते
कस्तूरी नाभि में पर, मृग खोजता है वन में
सबके वही प्रकाशक, तूँ देख उनको मन में
वे प्रकृति वही पुरुष हैं, सृष्टि की वे ही शक्ति
वे ॐ द्वारा लक्षित, हो प्राप्त उनसे मुक्ति
जिनका न रूप कोई, हमको वही उबारे
गति सबकी, वे नियन्ता, सबके वही सहारे
अग्नि, धरा, पवन में, सागर, पहाड़ वन में
वे ही तो चराचर में, हर साँस में वही है
जिसने तुम्हें बनाया, उसने जगत् रचाया
उसमें ही तूँ भुलाया, यों उम्र जा रही है
भोगों को छोड़ प्यारे, अस्थिर है सब यहाँ पर
माया है तृष्णा ठगिनी, तुझको फँसा रही है
अब चेत जा तूँ प्यारे, जो नन्द के दुलारे
मन में उन्हें बसाले, पल का पता नहीं है

Prani Matra Prabhu Se Anupranit

प्रबोधन
प्राणिमात्र प्रभु से अनुप्राणित, जड़ चेतन में छाया
सबको अपने जैसा देखूँ, कोई नहीं पराया
जिसने राग द्वेष को त्यागा, उसने तुमको पाया
दंभ दर्प में जो भी डूबा, उसने तुमको खोया
कौन ले गया अब तक सँग में, धरा धाम सम्पत्ति
जो भी फँसा मोह माया में, उसको मिली विपत्ति
दो विवेक प्रभु मुझको कृपया, वैर न हो कोई से
सबसे प्रेम करूँ मैं स्वामी, प्रेम प्राप्त हो उनसे  

Mulyawan Yah Seekh Jo Mane

पुरुषार्थ
मूल्यवान यह सीख जो माने, भाग्यवान् वह व्यक्ति है
सत्कर्म करो बैठे न रहो, भगवद्गीता की उक्ति है
यह सृष्टि काल के वश में है, जो रुके नहीं चलती ही रहे
प्रमाद न हो गतिशील रहे, जीवन में जो भी समृद्धि चहे
सन्मार्ग चुनो शुभ कार्य करो, उत्तम जीवन का मर्म यही
जो यत्नशील रहता मनुष्य, प्रभु की सहाय का पात्र वही
निष्क्रियता तो मृत्यु सचमुच, रोगों से तब हम घिर जातें
जो सक्रिय हो, रहता प्रसन्न, उन्नतिशील वे ही होते

Sab Se Bada Dharma Ka Bal Hai

धर्म निष्ठा
सबसे बड़ा धर्म का बल है
वह पूजनीय जिसको यह बल, जीवन उसका ही सार्थक है
ऐश्वर्य, बुद्धि, विद्या, धन का, बल होता प्रायः लोगों को
चाहे शक्तिमान या सुन्दर हो, होता है अहंकार उसको
इन सबसे श्रेष्ठ धर्म का बल, भवसागर से जो पार करे
जिस ओर रहे भगवान् कृष्ण, निश्चय ही उनको विजय वरे 
संस्कारित जीवनसब भाँति श्रेष्ठ यह जीवन हो, आवश्यकीय सत्कार्य करें
ये धर्म, अर्थ अरु काम, मोक्ष, चारों को यथा विधि प्राप्त करें
परिवार, साधु के हित में ही, जीवन में धनोपार्जन हो
अनुचित उपाय से धन पाना, दुष्कर्म बड़ा जो कभी न हो
हम अर्थ, काम के सेवन में, मर्यादित हों श्रेयस्कर है
नश्वर है दोनों अतः धर्म का, मार्ग सनातन हितकर है
परहित सेवामय जीवन हो, मनुष्य मात्र का धर्म यही
दधीचि ने दे दी अस्थियाँ भी, प्रतिमान क्या ऐसा और कहीं
हम आत्मज्ञान को प्राप्त करें, तो मोक्ष हमें उपलब्ध यहीं
आत्मा परमात्मा पृथक नहीं, सच्चिदानन्द हैं भेद नहीं

Tu Apne Ko Pahchan Re

जीवात्मा
तूँ अपने को पहचान रे
ईश्वर अंश जीव अविनाशी, तूँ चेतन को जान रे
घट घट में चेतन का वासा, उसका तुझे न भान रे
परम् ब्रह्म का यह स्वरूप है, जो यथार्थ में ज्ञान रे
रक्त मांस से बनी देह यह, जल जाती श्मशान रे
वे विश्व वद्य वे जग-निवास, कर मन में उनका ध्यान रे 

Pitaron Ka Shradha Avashya Kare

पितृ-श्राद्ध
पितरों का श्राद्ध अवश्य करें
श्रद्धा से करे जो पुत्र पौत्र, वे पितरों को सन्तुष्ट करें
जो देव रुद्र आदित्य वसु, निज ज्ञान-शक्ति के द्वारा ही
किस योनी में उत्पन्न कहाँ, कोई देव जानते निश्चय ही
ये श्राद्ध वस्तु देहानुरूप, दे देते हैं उन पितरों को
विधि पूर्वक होता श्राद्ध कर्म, आशीष सुलभ सन्तानों को
हरि-कीर्तन एवं पिण्ड दान भी इसी भाँति श्रेयस्कर है
हों उऋण सुखी हम पितरों से, परिवार हेतु आवश्यक है  

Pratah Sandhya Nit Manan Karen

आत्म चिन्तन
प्रातः संध्या नित मनन करें
मैं अंश ही हूँ परमात्मा का, सच्चिदानन्द मैं भी तो हूँ
मैं राग द्वेष में लिप्त न हूँ, मैं अजर अमर आनन्दमय हूँ
सुख-दुख में समता रहे भाव, मैं निर्मल हूँ अविनाशी हूँ
इन्द्रिय-विषयों से दूर नित्य, मैं शुद्ध बुद्ध अरु शाश्वत हूँ  

Manavka Tan Jinse Paya

भक्ति-भाव
मानव का तन जिनसे पाया, उन राम कृष्ण की भक्ति हो
आसक्ति त्याग कर दुनिया की, करुणानिधि में अनुरक्ति हो
श्रीरामचरितमानस हमको, भक्ति की समुचित शिक्षा दे
नवधा भक्ति के जो प्रकार, अनुगमन करें प्रभु शक्ति दे
सत्संग तथा हरिकथा सुने, गुरुसेवा प्रभु गुणगान करें
हो आस्था प्रभु का मंत्र जपें, इन्द्रिय -निग्रह, सत्कर्म करें
प्रभु के ही रूप में संत बड़े, उनका ही हृदय से करें मान
जो मिले उसी में हो राजी, औरों में त्रुटि का हो न भान
निष्कपट रहे बर्ताव सदा, सुख दुख में भी समदृष्टि हो
आवश्यकीय कीर्तन कलि में, श्रद्धापूर्वक प्रतिदिन ही हो

Samast Srushti Jis Ke Dwara

बुद्धियोग
समस्त सृष्टि जिसके द्वारा, सर्वात्मा ईश्वर एक वही
सब लोक महेश्वर शक्तिमान, सच्चिदानन्दमय ब्रह्म वही
जो कर्म हमारे भले बुरे, हो प्राप्त शुभाशुभ लोक हमें
उत्तम या अधम योनियाँ भी, मिलती हैं तद्नुसार हमें
हम शास्त्र विहित आचरण करें, शास्त्र निषिद्ध का त्याग करें
सांसारिक सुख सब नश्वर है, भगवत्प्राप्ति का यत्न करें
निष्काम कर्म समबुद्धि से, सेवा का व्रत, सद्गुण ये ही
प्रतिपादन करती गीताजी, जो बुद्धियोग वह मार्ग यही