Kabhuk Ho Ya Rahni Rahongo

संत-स्वभाव
कबहुँक हौं या रहनि रहौंगो
श्री रघुनाथ कृपालु-कृपातें, संत स्वभाव गहौंगो
जथा लाभ संतोष सदा, काहू सों कछु न चहौंगो
परहित निरत निरंतर मन क्रम वचन नेम निबहौंगो
परिहरि देह जनित चिंता, दुख-सुख समबुद्धि सहौंगो
‘तुलसिदास’ प्रभुयहि पथ अविचल, रहि हरि-भगति लहौंगो

Abki Tek Hamari, Laj Rakho Girdhari

शरणागति
अबकी हमारी, लाज राखो गिरिधारी
जैसी लाज राखी अर्जुन की, भारत-युद्ध मँझारी
सारथि होके रथ को हाँक्यो, चक्र सुदर्शन धारी
भक्त की टेक न टारी
जैसी लाज राखी द्रोपदी की, होन न दीनि उघारी
खेंचत खेंचत दोउ भुज थाके, दुःशासन पचि हारी
चीर बढ़ायो मुरारी
सूरदास की लज्जा राखो, अब को है रखवारी
राधे राधे श्रीवर प्यारी, श्री वृषभानु-दुलारी
शरण मैं आयो तिहारी

Jabahi Ban Murli Stravan Padi

मुरली का जादू
जबहिं बन मुरली स्रवन पड़ी
भौंचक भई गोप-कन्या सब, काम धाम बिसरी
कुल मर्जाद वेद की आज्ञा, नेकहुँ नाहिं डरी
जो जिहि भाँति चली सो तेसेंहि, निसि में उमंग भरी
सुत, पति-नेह, भवन-जन-संका, लज्जा नाहिं करी
‘सूरदास’ प्रभु मन हर लीन्हों, नागर नवल हरी

Pratham Saneh Duhun Man Janyo

राधे श्याम मिलन
प्रथम सनेह दुहुँन मन जान्यो
सैन-सैन कीनी सब बातें, गुपत प्रीति सिसुता प्रगटान्यो
खेलन कबहुँ हमारे आवहु, नंद-सदन ब्रज – गाँउँ
द्वारे आइ टेरि मोहि लीजो, कान्ह है मेरो नाउँ
जो कहियै घर दूरि तुम्हारो, बोलत सुनियै टेर
तुमहिं सौंह वृषभानु बबा की, प्रात-साँझ इक फेर
सूधी निपट देखियत तुमकों, तातें करियत साथ
‘सूर’ श्याम नागर उत नागरि, राधा दोऊ मिलि साथ

Maiya Ri Tu Inaka Janati

राधा कृष्ण प्रीति
मैया री तू इनका जानति बारम्बार बतायी हो
जमुना तीर काल्हि मैं भूल्यो, बाँह पकड़ी गहि ल्यायी हो
आवत इहाँ तोहि सकुचति है, मैं दे सौंह बुलायी हो
‘सूर’ स्याम ऐसे गुण-आगर, नागरि बहुत रिझायी हो

Sundar Shyam Piya Ki Jori

राधा-कृष्ण माधुरी
सुन्दर स्याम पिया की जोरी
रोम रोम सुंदरता निरखत, आनँद उमँग बह्योरी
वे मधुकर ए कुंज कली, वे चतुर एहू नहिं भोरी
प्रीति परस्पर करि दोउ सुख, बात जतन की जोरी
वृंदावन वे, सिसु तमाल ए, कनक लता सी गोरी
‘सूर’ किसोर नवल नागर ए, नागरि नवल-किसोरी

Ghadi Ek Nahi Aavade

विरह व्यथा
घड़ी एक नहीं आवड़े, तुम दरशन बिन मोय
तुम हो मेरे प्राणजी, किस विधि जीना होय
दिवस तो हाय बिता दियो रे, रैन जँवाई सोय
जो मैं ऐसो जाणती रे, प्रीति किया दुख होय
नगर ढिंढोरो पीटती रे, प्रीति न करियो कोय
पंथ निहारूँ डगर बुहारूँ, ऊभी मारग जोय
‘मीराँ’ को प्रभु कब रे मिलोगे, तुम मिलिया सुख होय

Prabhu Ji The To Chala Gaya Mhara Se Prit Lagay

पविरह व्यथा
प्रभुजी थें तो चला गया, म्हारा से प्रीत लगाय
छोड़ गया बिस्वास हिय में, प्रेम की बाती जलाय
विरह जलधि में छोड़ गया थें, नेह की नाव चलाय
‘मीराँ’ के प्रभु कब रे मिलोगे, तुम बिन रह्यो न जाय

Rana Jimhe To Govind Ka Gun Gasyan

भक्ति भाव
राणाजी! म्हे तो गोविन्द का गुण गास्याँ
चरणामृत को नेम हमारे, नित उठ दरसण जास्याँ
हरि मंदिर में निरत करास्याँ, घूँघरिया धमकास्याँ
राम नाम का झाँझ चलास्याँ, भव सागर तर जास्याँ
यह संसार बाड़ का काँटा, सो संगत नहिं करस्याँ
‘मीराँ’ कहे प्रभु गिरिधर नागर, निरख परख गुण गास्याँ

Deh Dhara Koi Subhi Na Dekha

दुःखी दुनिया
देह धरा कोई सुखी न देखा, जो देखा सो दुखिया रे
घाट घाट पे सब जग दुखिया, क्या गेही वैरागी रे
साँच कहूँ तो कोई न माने, झूट कह्यो नहिं जाई रे
आसा तृष्णा सब घट व्यापे, कोई न इनसे सूना रे
कहत ‘कबीर’ सभी जग दुखिया, साधु सुखी मन जीता रे