Ek Ram Bharosa Hi Kali Main

राम भरोसा
एक राम भरोसा ही कलि में
वर्णाश्रम धर्म न दिखे कहीं, सुख ही छाया सबके मन में
दृढ़ इच्छा विषय भोग की ने, कर्म, भक्ति, ज्ञान को नष्ट किया
वचनों में ही वैराग्य बचा और वेष ने सबको लूट लिया
सच्चे मन से जो जीवन में, रामाश्रित कोई हो पाये
भगवान अनुग्रह से निश्चय, भवसागर पार उतर जाये 

Kishori Tere Charanan Ki Raj Pau

श्री श्री राधा महात्म्य
किशोरी तेरे चरणन की रज पाऊँ
बैठि रहौं कुंजन की कोने, श्याम राधिका गाऊँ
जो रज शिव सनकादिक लोचन, सो रज शीश चढाऊँ
राधा स्वामिनि की छवि निरखूँ, नित्य विमल यश गाऊँ
अद्वितीय सौन्दर्य तुम्हारा, मन-मंदिर बिठलाऊँ 

Goutam Rishi Patni Ahilya Hi

अहिल्या-उद्धार
गौतम ऋषि पत्नि अहिल्या ही, शापित होकर पाषाणहुई
श्रीराम चरण स्पर्श मिला, देवी तप-मूर्ति प्रकट भई
बड़भागिन प्रभु के चरणों से, होकर अधीर तब लिपट गई
बोली- ‘प्रभु मैं तो अभागिन हूँ, जो चरण शरण में हूँ आई
मुनिवर ने शाप दिया था जो अनुग्रह का रूप लिया उसने
वह दूर हुआ हरि दर्शन से, इस कारण प्राप्त किया मुझने’
‘प्रभु चरण-कमल में ध्यान लगे’ वरदान मिला इच्छानुसार
रघुवर की कृपा हुई उस पर, पति-लोक गई देवी तत्पर

Ghanshyam Mujhe Apna Leo

शरणागति
घनश्याम मुझे अपना लेओ, मैं शरण तुम्हारे आन पड़ी
मैंने मात, पिता घर बार तजे, तो लोग कहें मैं तो बिगड़ी
अब छोड़ सभी दुनियादारी, मैं आस लगा तेरे द्वार खड़ी
यौवन के दिन सब बीत गये, नहिं चैन मुझे अब एक घड़ी
हे प्राणेश्वर, हे मुरलीधर, मुझको है तुमसे आस बड़ी
वह नयन मनोहारी चितवन, मेरे उर के बीच में आन अड़ी

Jamuna Tat Kridat Nand Nandan

होली
जमुनातट क्रीड़त नँदनंदन, होरी परम सुहाई
युवती-यूथ संग ले राधा, सन्मुख खेलन आई
रत्नजटित पिचकारी भरि के, सखी एक ले धाई
प्राणप्रिया मुख निरख स्याम को, छिरकत मृदु मुसकाई
तब ही गुलाल भरी मुट्ठी में, पिय की ओर चलाई
मानों उमगि प्रीति अतिशय हो, बाहिर देत दिखाई
दौरि अचानक कुँवरि राधिका, गहे स्याम सुखदाई
प्रेम गाँठ में मन अरुझानो, सुरझत नहिं सुरझाई
ब्रजबनिता सब गारी गावैं, मीठे वचन सुनाई
सुर विमान चढ़ि कौतुक भूले, जय जय गोकुलराई

Jivan Main Har Nahi Mane

पराजय
जीवन में हार नहीं माने
घबराये नहीं विषमता से, आती हमको वे चेताने
जो गुप्त सुप्त शक्ति हममें, उसको ही वह जागृत करने
प्रतिकूल परिस्थिति आती है, एक बार पुन: अवसर देने
जब तक ये प्राण रहे तन में, कठिनाई जीते हमें नहीं
हम आश्रय ले परमात्मा का, आखिर में जीतेंगे हम ही

Gyan Mohi Dije Maharani

देवी स्तवन
ज्ञान मोहिं दीजै महारानी
मैं धरूँ तिहारो ध्यान, भक्ति मोहिं दीजै महारानी
मैं करूँ सदा गुणगान, ज्ञान मोहि दीजै महारानी
ब्रह्मा-शिव-हरि तुमको ध्यावे, हे अभीष्ट दानी
ऋषि-मुनि जन सब करे वन्दना, हे माँ कल्याणी
जय दुर्गे दुर्गति, दुःख नाशिनि अमित प्रभा वाली
देवि सरस्वति लक्ष्मी रूपिणि, ललिता, महाकाली
कर्णफूल, केयूर अरु कंगन, रत्न माल सोहे
जगमग किरीट, शीश पर बिन्दी, अर्ध-चन्द्र मोहे
विद्याधरियाँ, सकल सिद्धियाँ, सेवत दिन-राती
खड्ग, चक्र, अंकुश कर धारे, महिषासुर घाती
हे गजवदन षडानन माता, शिवशंकर प्यारी
त्रिपुर-सुन्दरी, शुद्ध स्वरूपा, प्रतिपालन हारी
दुष्ट, कुटिल, पापी होकर भी, मैं संतति तेरी
हे जगदम्बे कष्ट निवारो, हे मैया मेरी

Tha Magh Mas Braj Balayen

चीर हरण
था माघ मास ब्रज बालाएँ, यमुना जल में सब स्नान करें
होता था ऊषाकाल जभी, श्रीकृष्ण चरित गुणगान करें
जल क्रीडा में थी मग्न सभी, तत्काल श्याम वहाँ पहुँच गये
अभिलाषा जो उनके मन में, सर्वेश्वर उसको जान गये
ले वस्त्र उठा बालाओं के, वे तरु कदम्ब पर चढ़े तभी
वे बोले सुन्दरियों से आओ ले जाओ अपने वस्त्र सभी
वे हुई प्रेम से सराबोर बोली-प्यारे दो वस्त्र हमें
जाड़े के मारे ठिठुर रहीं, सच सच कहती गोविन्द तुम्हें
निर्वसन स्नान यमुना जल में, जो किया गोपियाँ दोष वही
प्रणाम करो तुम हाथ जोड़, हरि बोले फिर लो वस्त्र यहीं
कर नमस्कार बालाओं ने, अपने वस्त्रों को पहन लिया
बोले मोहन तुमने सखियों, सब कुछ ही अर्पण मुझे किया
वरदान दिया उनको सबको तब करना क्रीड़ा मेरे सँग में
उनके संग विहार किया, आगामी शरद् रात्रि में 

Nand Nandan Bado Natkhati Hai

नटखट कन्हैया
नँदनंदन बड़ो नटखटी है
मैं दधिमाखन बेचन जाऊँ, पथ रोक ले मेरो धाय के
जो नहीं देऊँ मैं माखन तो,वो लूट ले आँख दिखाय के
जब भी घर से बाहर जाऊँ, चुपके से घर में आय के
तब ग्वाल-बाल को संग में ले, मटको फोड़े दधि खाय के
घर की भी सुधि नहीं लेने दे, वो वंशी तान सुनाय के
मुझे रात में सोने दे भी नहिं, सपने में चित्त चुराय के 

Naitik Aachar Ho Jivan Main

मर्यादा
नैतिक आचार हो जीवन में
सम्माननीय वह व्यक्ति जो मर्यादित जीवन ही जीये
सार्थक जीना तो उसका ही परहित के जिसने कार्य किये
हमको शरीर जो प्राप्त हुआ, वरदान प्रभु से मिला यही
पालन हो सत्य अहिंसा का, हरि नाम स्मरण आवश्यक ही
जहाँ प्राणिमात्र प्रति प्रेम रहे, है धन्य धन्य व्यक्ति ऐसा
भोगों में जो धन खर्च करे, जीवन उसका तो पशु जैसा
ये नाशवान संपत्ति वैभव, मोहासक्ति में फँसे नहीं
मन का निग्रह भी अनिवार्य, इन्द्रिय-सुख में फँस जाय कहीं