Kabhu Man Vishram N Manyo

संसार चक्र
कबहूँ मन विश्राम न मान्यो
निसिदिन भ्रमत बिसारि सहन सुख जहँ तहँ इंद्रिन तान्यो
जदपि विषय सँग सह्यो दुसह दुख, विषम जान उरझान्यो
तदपि न तजत मूढ़, ममता बस, जानतहूँ नहिं जान्यो
जन्म अनेक किये नाना विधि, कर्म कीच चित सान्यो
‘तुलसिदास’ ‘कब तृषा जाय सर खनतहिं’ जनम सिरान्यो

Man Madhav Ko Neku Niharhi

हरि पद प्रीति
मन माधव को नेकु निहारहि
सुनु सठ, सदा रंक के धन ज्यों, छिन छिन प्रभुहिं सँभारहि
सोभा-सील ज्ञान-गुन-मंदिर, सुन्दर परम उदारहि
रंजन संत, अखिल अघ गंजन, भंजन विषय विकारहि
जो बिनु जोग जग्य व्रत, संयम, गयो चहै भव पारहि
तो जनि ‘तुलसिदास’ निसि वासर, हरिपद कमल बिसारहि

Ab To Pragat Bhai Jag Jani

प्रेमानुभूति
अब तो पगट भई जग जानी
वा मोहन सों प्रीति निरंतर, क्यों निबहेगी छानी
कहा करौं वह सुंदर मूरति, नयननि माँझि समानी
निकसत नाहिं बहुत पचिहारी, रोम-रोम उरझानी
अब कैसे निर्वारि जाति है, मिल्यो दूध ज्यौं पानी
‘सूरदास’ प्रभु अंतरजामी, उर अंतर की जानी

Kahi Main Aise Hi Mari Jeho

वियोग व्यथा
कहीं मैं ऐसै ही मरि जैहौं
इहि आँगन गोपाल लाल को कबहुँ कि कनियाँ लैहौं
कब वह मुख पुनि मैं देखौंगी, कब वैसो सुख पैंहौं
कब मोपै माखन माँगेगो, कब रोटी धरि दैंहौं
मिलन आस तन प्राण रहत है, दिन डस मारग चैहौं
जौ न ‘सूर’ कान्ह आइ हैं तो, जाइ जमुन धँसि जैहौं

Jamuna Tat Dekhe Nand Nandan

गोपी का प्रेम
जमुना तट देखे नंद-नन्दन
मोर-मुकुट मकराकृति कुण्डल, पीत वसन, तन चन्दन
लोचन तृप्त भए दरसन ते, उर की तपन बुझानी
प्रेम मगन तब भई ग्वालिनी, सब तन दसा हिरानी
कमल-नैन तट पे रहे ठाड़े, सकुचि मिली ब्रज-नारी
‘सूरदास’ प्रभु अंतरजामी, व्रत पूरन वपु धारी

Tum Meri Rakho Laj Hari

शरणागति
तुम मेरी राखौ लाज हरी
तुम जानत सब अंतरजामी, करनी कछु न करी
औगुन मोसे बिसरत नाहीं, पल-छिन घरी-घरी
सब प्रपंच की पोट बाँधिकैं, अपने सीस धरी
दारा-सुत-धन मोह लियो है, सुधि-बुधि सब बिसरी
‘सूर’ पतित को बेग उधारो, अब मेरी नाव भरी

Prabhu Tero Vachanbharoso Sancho

भक्त-वत्सलता
प्रभु तेरो वचन भरोसो साँचो
पोषन भरन विसंभर स्वामी, जो कलपै सो काँचौ
जब गजराज ग्राह सौं अटक्यौ, बली बहुत दुख पायौ
नाम लेट ताही छन हरिजू, गरुड़हि छाँड़ि छुड़ायौ
दुःशासन जब गही द्रौपदी, तब तिहिं वसन बढ़ायौ
‘सूरदास’ प्रभु भक्त बछल हैं, चरन सरन हौं आयौ

Muraliya Kahe Guman Bhari

मुरली का जादू
मुरलिया काहे गुमान भरी?
जड़ तोरी जानों, पेड़ पहिचानों, मधुवन की लकरी
कबहुँ मुरलिया प्रभु-कर सोहे, कबहुँ अधर धरी
सुर-नर-मुनि सब मोहि गये हैं, देवन ध्यान धरी
‘सूर’ श्याम अस बस भई ग्वालिन, हरि पे ध्यान धरी

Maiya Ri Mohi Makhan Bhawe

माखन का स्वाद
मैया री मोहिं माखन भावै
मधु मेवा पकवान मिठाई, मोहिं नहीं रूचि आवै
ब्रज-जुबती इक पाछे ठाढ़ी, सुनति श्याम की बातैं
मन मन कहति कबहुँ अपने घर, देखौं माखन खातैं
बैठे जाय मथनियाँ के ढिंग, मैं तब रहौं छिपानी
‘सूरदास’ प्रभु अंतरजामी, ग्वालिन मन की जानी

Re Man Murakh Janam Gawayo

असार संसार
रे मन मूरख जनम गँवायो
करि अभिमान विषय रस राच्यो, श्याम सरन नहिं आयो
यह संसार सुवा सेमर ज्यों, सुन्दर देखि भुलायो
चाखन लाग्यो रूई गई उड़ि, हाथ कछु नहीं आयो
कहा भयो अबके मन सोचे, पहिले पाप कमायो
कहत ‘सूर’ भगवंत भजन बिनु, सिर धुनि धुनि पछितायो