Ram Kam Ripu Chap Chadhayo

धनुष भंग
राम कामरिपु चाप चढ़ायो
मुनिहि पुलक, आनंद नगर, नभ सुरनि निसान बजायो
जेहि पिनाक बिनु नाक किये, नृप सबहि विषाद बढ़ायो
सोई प्रभु कर परसत टूटयो, मनु शिवशंभु पढ़ायो
पहिराई जय माल जानकी, जुबतिन्ह मंगल गायो
‘तुलसी’ सुमन बरसि सुर हरषे, सुजसु तिहूँ पुर छायो

Gwalin Kar Te Kor Chudawat

बालकृष्ण लीला
ग्वालिन कर ते कौर छुड़ावत
झूठो लेत सबनि के मुख कौ, अपने मुख लै नावत
षट-रस के पकवान धरे बहु, तामें रूचि नहिं पावत
हा हा करि करि माँग लेत हैं, कहत मोहि अति भावत
यह महिमा वे ही जन जानैं, जाते आप बँधावत
‘सूर’ श्याम सपने नहिं दरसत, मुनिजन ध्यान लगावत

Nand Gharni Sut Bhalo Padhayo

बाल क्रीड़ा
नंद-घरनि! सुत भलौ पढ़ायौ
ब्रज-बीथिनि पुर-गलिनि, घरै घर, घात-बाट सब सोर मचायौ
लरिकनि मारि भजत काहू के, काहू कौ दधि –दूध लुटायौ
काहू कैं घर में छिपि जाये, मैं ज्यों-त्यों करि पकरन पायौ
अब तौ इन्हें जकरि के बाँधौ, इहिं सब तुम्हरौ गाँव भगायौ
‘सूर’ श्याम-भुज गहि नँदरानी, बहुरि कान्ह ने खेल रचायौ

Main To Ta Din Kajara Dehon

श्री कृष्ण से प्रीति
मैं तो ता दिन कजरा दैहौं
जा दिन नंदनँदन के नैननि, अपने नैन मिलैहौं
सुन री सखी, यही जिय मेरे, भूलि न और चितैहौं
अब हठ ‘सूर’ यहै व्रत मेरौ विष खाकरि मरि जैहौ

Shyam Tan Shyam Man Shyam Hai Hamaro Dhan

प्राण धन
श्याम तन, श्याम मन, श्याम है हमारो धन
आठो जाम ऊधौ हमें, श्याम ही सो काम है
श्याम हिये, श्याम तिये, श्याम बिनु नाहिं जियें
आँधे की सी लाकरी, अधार श्याम नाम है
श्याम गति, श्याम मति, श्याम ही है प्रानपति
श्याम सुखदाई सो भलाई सोभाधाम है
ऊधौ तुम भये बौरे, पाती लैकै आये दौरे
‘सूर’ जोग राखें कहाँ ! रोम-रोम स्याम है

Ab To Hari Nam Lo Lagi

चैतन्य महाप्रभु
अब तो हरी नाम लौ लागी
सब जग को यह माखन चोरा, नाम धर्यो बैरागी
कित छोड़ी वह मोहक मुरली, कित छोड़ी सब गोपी
मूँड मुँडाई डोरी कटि बाँधी, माथे मोहन टोपी
मात जसोमति माखन कारन, बाँधे जाके पाँव
श्याम किसोर भयो नव गौरा, चैतन्य जाको नाँव
पीताम्बर को भाव दिखावे, कटि कोपीन कसै
गौर कृष्ण की दासी ‘मीराँ’ रसना कृष्ण बसै

Naina Nipat Shyam Chabi Atke

श्याम की मोहिनी
नैना निपट श्याम छबि अटके
देखत रूप मदनमोहन को, पियत पीयूष न भटके
टेढ़ी कटि टेढ़ी कर मुरली, टेढ़ी पाग लर लटके
‘मीराँ’ प्रभु के रूप लुभानी, गिरिधर नागर नट के

Main To Sanware Ke Rang Rachi

प्रगाढ़ प्रीति
मैं तो साँवरे के रँग राची
साजि सिंगार बाँधि पग घुँघरू, लोक-लाज तजि नाची
गई कुमति लई साधु की संगति, स्याम प्रीत जग साँची
गाय गाय हरि के गुण निस दिन, काल-ब्याल सूँ बाँची
स्याम बिना जग खारो लागत, और बात सब काँची
‘मीराँ’ गिरिधर-नटनागर वर, भगति रसीली जाँची

Janam Dhokhe Main Khoy Dayo

मोह माया
जनम धोखे में खोय दयो
बारह बरस बालपन बीते, बीस में युवा भयो
तीन बरस के अंत में जाग्यो, बाढ्यो मोह नयो
धन और धाम पुत्र के कारण, निस दिन सोच भयो
बरस पचास कमर भई टेढ़ी, सोचत खात लह्यो
बरस साठ सत्तर के ऊपर, केस सफ़ेद भयो
कहत ‘कबीर’ सुनो भाई साधो, जीवन वृथा गयो

Ganga Ganga Kahe Nitya

गंगा महिमा
गंगा गंगा कहें नित्य गंगा जल पीवैं
सदा बसै तट निकट, गंग- जल हीतें जीवैं
गंगारज तन लाइ, नहावैं गंगा जल महँ
बसैं गंगपथ परसि अनिल, बिहरैं जिहिं थल महँ
श्री गंगा के नाम तें, कोटि जनम पातक नसहिं
भोगे भू पै भोग बहु, अन्त जाहि सुरपुर बसहिं