Tera Koi Nahi Rokanhar

मग्न मीरा
तेरा कोइ नहिं रोकनहार, मगन होय मीराँ चली
लाज सरम कुल की मरजादा, सिर से दूर करी
मानापमान दोऊ घर पटके, निकसी हूँ ज्ञान गली
ऊँची अटरिया लाल किवड़िया, निरगुण सेज बिछी
पचरंगी झालर सुभ सोहे, फूलन फूल कली
बाजूबंद कठूला सोहे, माँग सिंदुर भरी
पूजन थाल हाथ में लीन्हा, सोभा अधिक भली
सेज सुखमणा’मीराँ’ सोवे, सुभ है आज घरी
तुम जावो राणा घर अपणे, मेरी तेरी नाहिं सरी

Mukhada Ni Maya Lagi Re

मोहन का सौंदर्य (गुजराती)
मुखड़ानी माया लागी रे, मोहन प्यारा
मुखड़ूँ मैं जोयुँ तारूँ, सब जग थयुँ खारूँ, मन मारूँ रह्युँ न्यारूँ रे
संसारी, नुँ सुख एवुँ, झाँझवाना नीर जेवुँ, तेने तुच्छ करी फरिये रे
‘मीराँबाई’ बलिहारी, आशा मने एक तारी, हवे हुँ तो बड़भागी रे

Hamro Pranam Banke Bihari Ko

मीरा का प्रणाम
हमरो प्रणाम बाँके बिहारी को
मोर मुकुट माथे तिलक बिराजै, कुण्डल अलका कारी को
अधर धर मुरली मधुर बजावै, रिझावै राधा प्यारी को
यह छबि देख मगन भई ‘मीराँ’, मोहन गिरिवर धारी को

Ram Bhaja So Hi Jag Main Jita

भजन महिमा
राम भजा सोहि जग में जीता
हाथ सुमिरनी, बगल कतरनी, पढ़े भागवत गीता
हृदय शुद्ध कीन्हों नहीं तेने, बातों में दिन बीता
ज्ञान देव की पूजा कीन्ही, हरि सो किया न प्रीता
धन यौवन तो यूँ ही जायगा, अंत समय में रीता
कहे ‘कबीर’ काल यों मारे, जैसे हरिण को चीता

Pyare Mohan Bhatak Na Jau

श्याम से लगन
प्यारे मोहन भटक न जाऊँ
तुम ही हो सर्वस्व श्याम, मैं तुम में ही रम जाऊँ
जब तक जिऊँ तुम्हारे ही हरि! अद्भुत गुण मैं गाऊँ
गा-गा गुण गौरव तब मन में, सदा सदा सरसाऊँ
भूल भरा हूँ नित्यनाथ! मैं तुमसे यही मनाऊँ
सदा प्रेरणा करना ऐसी, तुम्हें न कभी भुलाऊँ
तुम्हने दी है लगन नाथ! तो यह मन कहाँ लगाऊँ
कण कण में तुमको निहार, बस तुम पर प्राण लुटाऊँ

Shyam Ne Kaha Thagori Dari

श्याम की ठगौरी
स्याम ने कहा ठगोरी डारी
बिसरे धरम-करम, कुल-परिजन, लोक साज गई सारी
गई हुती मैं जमुना तट पर, जल भरिबे लै मटकी
देखत स्याम कमल-दल-लोचन, दृष्टि तुरत ही अटकी
मो तन मुरि मुसुकाए मनसिज, मोहन नंद-किसोर
तेहि छिन चोरि लियौ मन सरबस, परम चतुर चित-चोर

Ab Man Krishna Krishna Kahi Lije

श्रीकृष्ण स्मरण
अब मन कृष्ण कृष्ण कहि लीजे
कृष्ण कृष्ण कहि कहिके जग में, साधु समागम कीजे
कृष्ण नाम की माला लेके, कृष्ण नाम चित दीजे
कृष्ण नाम अमृत रस रसना, तृषावंत हो पीजै
कृष्ण नाम है सार जगत् में, कृष्ण हेतु तन छीजे
‘रूपकुँवरि’ धरि ध्यान कृष्ण को, कृष्ण कृष्ण कहि लीजे 

Karmo Ka Fal Hi Sukh Dukh Hai

कर्म-फल
कर्मों का फल ही सुख दुख है
जिसने जैसा हो कर्म किया, उसका फल वह निश्चित पायेगा
जो कर्म समर्पित प्रभु को हो, तो वह अक्षय हो जायेगा
जो भी ऐसा सत्कर्मी हो, वह उत्तम गति को पायेगा
जो व्यक्ति करे निष्काम कर्म, सर्वथा आश्रित प्रभु के ही
ऐसे भक्तों का निस्संदेह, उद्धार स्वयं प्रभु करते ही

Chahta Jo Param Sukh Tu

नाम जप
चाहता जो परम सुख तूँ, जाप कर हरिनाम का
परम पावन परम सुन्दर, परम मंगल धाम का
हैं सभी पातक पुराने, घास सूखे के समान
भस्म करने को उन्हें, हरि नाम है पावक महान
जाप करते जो चतुर नर, सावधानी से सदा
वे न बँधते भूलकर, यम-पाश दारुण में कदा
साथ मिलकर प्रेम से, हरिनाम करते गान वो
मुक्त होते मोह से, कर प्रेम-अमृत-पान वो

Jin Ke Sarvas Jugal Kishor

युगल श्री राधाकृष्ण
जिनके सर्वस जुगलकिशोर
तिहिं समान अस को बड़भागी, गनि सब के सिरमौर
नित्य विहार निरंतर जाको, करत पान निसि भोर
‘श्री हरिप्रिया’ निहारत छिन-छिन, चितय नयन की कोर