Kaho Tumh Binu Grah Mero Kon Kaj

अनुरोध
कहौ तुम्ह बिनु गृह मेरो कौन काज ?
विपिन कोटि सुरपुर समान मोको, जो प्रिय परिहर् यो राज
वलकल विमल दुकूल मनोहर, कंदमूल – फल अमिय अनाज
प्रभु पद कमल विलोकहुँ छिन छिन इहितें, अधिक कहा सुख साज
हो रहौ भवन भोग लोलुप ह्वै, पति कानन कियो मुनि को साज
‘तुलसिदास’ ऐसे विरह वचन सुनि, कठिन हियो बिहरो न आज

Main Hari Patit Pawan Sune

पतित-पावन
मैं हरि पतित-पावन सुने
मैं पतित तुम पतित पावन दोइ बानक बने
व्याध, गनिका, गज, अजामिल, साखि निगमनि भने
और अधम अनेक तारे, जात कापै गने
जानि नाम अजानि लीन्हें, नरक सुरपुर मने
दास तुलसी सरन आयो, राखिये आपने

Aaj Jo Harihi N Shastra Gahau

भीष्म प्रतिज्ञा
आज जो हरिहिं न शस्त्र गहाऊँ
तौं लाजौं गंगा-जननी को, सांतनु-सुत न कहाऊँ
स्यंदन खंडि महारथ खंडौं, कपिध्वज सहित डुलाऊँ
इती न करो सपथ मोहिं हरि की, क्षत्रिय-गतिहि न पाऊँ
पांडव-दल सन्मुख हौं धाऊँ, सरिता रुधिर बहाऊँ
‘सूरदास’ रण-भूमि विजय बिनु, जियत न पीठ दिखाऊँ

Kyon Tu Govind Nam Bisaro

नाम स्मरण
क्यौं तू गोविंद नाम बिसारौ
अजहूँ चेति, भजन करि हरि कौ, काल फिरत सिर ऊपर भारौ
धन-सुत दारा काम न आवै, जिनहिं लागि आपुनपौ हारौ
‘सूरदास’ भगवंत-भजन बिनु, चल्यो पछिताइ नयन जल ढारौ

Jewat Kanh Nand Ik Thore

भोजन माधुरी
जेंवत कान्ह नन्द इक ठौरे
कछुक खात लपटात दोउ कर, बाल केलि अति भोरे
बरा कौर मेलत मुख भीतर, मिरिच दसन टकटौरे
तीछन लगी नैन भरि आए, रोवत बाहर दौरे
फूँकति बदन रोहिनी ठाड़ी, लिए लगाइ अँकोरे
‘सूर’ स्याम को मधुर कौर दे, कीन्हे तात निहोरे

Dekho Ri Nand Nandan Aawat

श्री चरण
देखौ री नँदनंदन आवत
वृन्दावन तैं धेनु-वृंद बिच, बेनु अधर धर गावत
तन घनश्याम कमल-दल-लोचन, अंग-अंग छबि पावत
कारी-गोरी, धौरी-धूमरि, लै लै नाम बुलावत
बाल गोपाल संग सब सोभित, मिलि कर-पत्र बजावत
‘सूरदास’ मुख निरखत ही मुख, गोपी-प्रेम बढ़ावत

Prat Kal Uthi Makhan Roti

बालकृष्ण की बान
प्रातकाल उठि माखन रोटी, को बिनु माँगे दैहै
अब उहि मेरे कुँवर कान्ह को, छिन-छिन गोदी लैहै
कहियौ पथिक जाइ, घर आवहु, राम कृष्ण दोउ भैया
दोउ बालक कत होत दुखारी, जिनके मो सी मैया
‘सूर’ पथिक सुनि, मोहि रैन-दिन, बढ्यो रहत उर सोच
मेरो अलक-लड़ैतो मोहन, करत बहुत संकोच

Mere Nayan Nirakhi Sachu Pawe

रूप माधुरी
मेरे नयन निरखि सचु पावै
बलि बलि जाऊँ मुखारविंद पै, बन ते पुनि ब्रज आवै
गुंजाफल वनमाल मुकुटमनि, बेनु रसाल बजावे
कोटि किरन मुख तें जो प्रकाशित, शशि की प्रभा लजावै
नटवर रूप अनूप छबीलो, सबही के मन भावै
‘सूरदास’ प्रभु पवन मंदगति, विरहिन ताप नसावै

Mo Sam Kon Kutil Khal Kami

शरणागति
मो सम कौन कुटिल खल कामी
जेहिं तनु दियौ ताहिं बिसरायौ, ऐसौ नोनहरामी
भरि भरि उदर विषय कों धावौं, जैसे सूकर ग्रामी
हरिजन छाँड़ि हरी-विमुखन की, निसिदिन करत गुलामी
पापी कौन बड़ो है मोतें, सब पतितन में नामी
‘सूर’ पतित को ठौर कहाँ है, सुनिए श्रीपति स्वामी

Lochan Bhaye Shyam Ke Nere

श्री कृष्ण छबि
लोचन भए स्याम के नेरे
एते पै सुख पावत कोटिक, मो न फेरि तन हेरे
हा हा करत, परिहरि चरननि, ऐसे बस भए उनहीं
उन कौ बदन बिलोकत निस दिन, मेरो कह्यौ न सुनहीं
ललित त्रिभंगी छबि पै अटके, फटके मौसौं तोरि
‘सूर’, दसा यह मेरी कीन्ही, आपुन हरि सौं जोरि