Kab Dekhongi Nayan Vah Madhur Murati

राम का माधुर्य
कब देखौंगी नयन वह मधुर मूरति
राजिव दल नयन, कोमल-कृपा अयन, काम बहु छबि अंगनि दूरति
सिर पर जटा कलाप पानि सायक चाप उर रुचिर वनमाल मूरति
‘तुलसिदास’ रघुबीर की सोभा सुमिरि, भई मगन, नहीं तन की सूरति

Bharat Bhai Kapi Se Urin Ham Nahi

कृतज्ञता
भरत भाई कपि से उऋण हम नाहीं
सौ योजन मर्याद सिन्धु की, लाँघि गयो क्षण माँही
लंका-जारि सिया सुधि लायो, गर्व नहीं मन माँही
शक्तिबाण लग्यो लछमन के, शोर भयो दल माँही
द्रोणगिरि पर्वत ले आयो, भोर होन नहीं पाई
अहिरावण की भुजा उखारी, पैठि गयो मठ माँही
जो भैया, हनुमत नहीं होते, को लावत जग माँही
आज्ञा भंग कबहुँ नहीं कीन्हीं, जहँ पठयऊँ तहँ जाई
‘तुलसिदास’, मारुतसुत महिमा, निज मुख करत बड़ाई

Ankhiyan Hari Darsan Ki Pyasi

वियोग
अँखिया हरि दरसन की प्यासी
देख्यो चाहत कमलनैन को, निसिदिन रहत उदासी
आयो ऊधौ फिरि गये आँगन, डारि गये गल फाँसी
केसरि तिलक मोतिन की माला, वृन्दावन को वासी
काहु के मनकी कोउ न जानत, लोगन के मन हाँसी
‘सूरदास’ प्रभु तुमरे दरस बिन, लेहौं करवत कासी

Kahiya Jasumati Ki Aasis

वियोग
कहियो जसुमति की आसीस
जहाँ रहौ तहँ नंद – लाडिलौ, जीवौ कोटि बरीस
मुरली दई दोहनी घृत भरि ऊधौ धरि लई सीस
इह घृत तो उनही सुरभिन को, जो प्यारी जगदीस
ऊधौ चलत सखा मिलि आये, ग्वाल-बाल दस-बीस
अब के इहाँ ब्रज फेरि बसावौ, ‘सूरदास’ के ईस

Jab Jab Murli Knah Bajawat

मुरली मोहिनी
जब जब मुरली कान्ह बजावत
तब तब राधा नाम उचारत, बारम्बार रिझावत
तुम रमनी, वे रमन तुम्हारे, वैसेहिं मोहि जनावत
मुरली भई सौति जो माई, तेरी टहल करावत
वह दासी, तुम्ह हरि अरधांगिनि, यह मेरे मन आवत
‘सूर’ प्रगट ताही सौं कहि कहि, तुम कौं श्याम बुलावत

Tum Taji Aur Kon Pe Jau

परम आश्रय
तुम तजि और कौन पै जाऊँ
काके द्वार जाइ सिर नाऊँ, पर हथ कहाँ बिकाऊँ
ऐसे को दाता है समरथ, जाके दिये अघाऊँ
अंतकाल तुम्हरै सुमिरन गति, अनत कहूँ नहिं पाऊँ
भव-समुद्र अति देखि भयानक, मन में अधिक डराऊँ
कीजै कृपा सुमिरि अपनो प्रन, ‘सूरदास’ बलि जाऊँ

Pati Madhuwan Te Aai

श्याम की पाती
पाती मधुवन तै आई
ऊधौ हरि के परम सनेही, ताके हाथ पठाई
कोउ पढ़ति फिरि फिरि ऊधौ, हमको लिखी कन्हाई
बहूरि दई फेरि ऊधौ कौ, तब उन बाँचि सुनाई
मन में ध्यान हमारौ राख्यो, ‘सूर’ सदा सुखदाई

Mai Moko Chand Lagyo Dukh Den

विरह व्यथा
माई, मोकौं चाँद लग्यौ दुख दैन
कहँ वे स्याम, कहाँ वे बतियाँ, कहँ वह सुख की रैन
तारे गिनत गिनत मैं हारी, टपक न लागे नैन
‘सूरदास’ प्रभु तुम्हारे दरस बिनु, विरहिनि कौं नहिं चैन

Maiya Mohi Dau Bahut Khijayo

खीजना
मैया, मोहिं दाऊ बहुत खिझायौ
मोंसो कहत मोल को लीन्हौं, तोहिं जसुमति कब जायौ
कहा कहौं यहि रिस के मारे, खेलन हौं नहिं जात
पुनि पुनि कहत कौन है माता, को है तेरो तात
गोरे नन्द जसोदा गोरी, तुम कत श्याम शरीर
चुटकी दै दै हँसत ग्वाल सब, सिखे देत बलबीर
तू मोहीं को मारन सीखी, दाउहिं कबहुँ न खीझै
मोहन को मुख रिस समेत लखि, जसुमति सुनि सुनि रीझै
सुनहु कान्ह बलभद्र चबाई, जनमत ही कौ धूत
‘सूर’ श्याम मोहिं गोधन की सौं, हौं माता तू पूत

Re Man Krishna Nam Kah Lije

नाम स्मरण
रेमन, कृष्ण-नाम कह लीजै
गुरु के वचन अटल करि मानहु, साधु-समागम कीजै
पढ़ियै-सुनियै भगति-भागवत, और कथा कहि लीजै
कृष्ण-नाम बिनु जनम वृथा है, वृथा जनम कहाँ जीजै
कृष्ण-नाम-रस बह्यौ जात है, तृषावन्त ह्वै पीजै
‘सूरदास’ हरि-सरन ताकियै, जनम सफल करि लीजै