Jankinath Sahay Kare Tab

रामाश्रय
जानकीनाथ सहाय करे, तब कौन बिगाड़ सके नर तेरो
सूरज, मंगल, सोम, भृगुसुत, बुध और गुरु वरदायक तेरो
राहु केतु की नाहिं गम्यता, तुला शनीचर होय है चेरो
दुष्ट दुशासन निबल द्रौपदी, चीर उतारण मंत्र विचारो
जाकी सहाय करी यदुनन्दन, बढ़ गयो चीरको भाग घनेरो
गर्भकाल परीक्षित राख्यो, अश्वत्थामा को अस्त्र निवार्यो
भारत में भूरही के अंडा, तापर गज को घंटो गेर्यो
जिनकी सहाय करे करूणानिधि, उनको जग में भाग्य घनेरो
रघुवंशी संतन सुखदायी, ‘तुलिदास’ चरनन को चेरो

Kaha Sukh Braj Ko So Sansar

ब्रज-महिमा
कहाँ सुख ब्रज कौ सौ संसार
कहाँ सुखद बंसी-वट जमुना, यह मन सदा विचार
कहाँ बन धाम कहाँ राधा सँग, कहाँ संग ब्रज वाम
कहाँ विरह सुख बिन गोपिन सँग, ‘सूर’ स्याम मन साम

Ter Suno Braj Raj Dulare

विनय
टेर सुनो ब्रज राज दुलारे
दीन-मलीन हीन सुभ गुण सों, आन पर्यो हूँ द्वार तिहारे
काम, क्रोध अरु कपट, लोभ, मद, छूटत नहिं प्राण ते पियारे
भ्रमत रह्यो इन संग विषय में, ‘सूरदास’ तव चरण बिसारे

Braj Ghar Ghar Pragati Yah Bat

माखन चोरी
ब्रज घर-घर प्रगटी यह बात
दधि-माखन चोरी करि ले हरि, ग्वाल-सखा सँग खात
ब्रज-बनिता यह सुनि मन हर्षित, सदन हमारें आवैं
माखन खात अचानक पावैं, भुज हरि उरहिं छुवावै
मन ही मन अभिलाष करति सब, ह्रदय धरति यह ध्यान
‘सूरदास’ प्रभु कौं हम दैहों, उत्तम माखन खान

Radha Nain Neer Bhari Aai

मिलन उत्सुकता
राधा नैन नीर भरि आई
कबहौं स्याम मिले सुन्दर सखि, यदपि निकट है आई
कहा करौं केहि भाँति जाऊँ अब, देखहि नहिं तिन पाई
‘सूर’ स्याम सुन्दर धन दरसे, तनु की ताप बुझाई

Ham Bhaktan Ke Bhakta Hamare

भक्त के भगवान
हम भक्तन के, भक्त हमारे
सुन अर्जुन, परतिग्या मेरी, यह व्रत टरत न टारे
भक्तै काज लाज हिय धरिकैं, पाय-पियादे धाऊँ
जहँ-जहँ भीर परै भक्तन पै, तहँ-तहँ जाइ छुड़ाऊँ
जो मम भक्त सों बैर करत है, सो निज बैरी मेरो
देखि बिचारि, भक्तहित-कारन, हाँकत हौं रथ तेरो
जीते जीत भक्त अपने की, हारे हारि बिचारौं
‘सूरदास’ सुनि भक्त-विरोधी, चक्र सुदर्शन धारौ

Tum Bin Meri Kon Khabar Le Govardhan Giridhari

लाज
तुम बिन मोरी कौन खबर ले, गोवर्धन गिरधारी
मोर-मुकुट पीतांबर सोहै, कुण्डल की छबि न्यारी
द्रुपद सुता की लाज बचाई, राखो लाज हमारी
‘मीराँ’ के प्रभु गिरिधर नागर, चरण-कमल बलिहारी

Meera Magan Hari Ke Gun Gay

मग्न मीरा
मीराँ मगन हरि के गुण गाय
साँप-पिटारा राणा भेज्या, मीराँ हाथ दियो जाय
न्हाय धोय जब देखण लागी, सालिगराम गई पाय
जहर को प्याला राणाजी भेज्या, अमृत दियो बनाय
न्हाय धोय जब पीवण लागी, हो गई अमर अँचाय
सूल सेज राणाजी भेजी, दीज्यो मीराँ सुलाय
साँझ भई मीराँ सोवण लागी, मानो फूल बिछाय
‘मीराँ’ के प्रभु सदा सहाई, राखो विघन हटाय
भजन भाव में मगन डोलती, गिरिधर पै बलि जाय

Sanwara Mhari Prit Nibhajyo Ji

शरणागति
साँवरा म्हारी प्रीत निभाज्यो जी
थें छो सगला गुण रा सागर, म्हारा औगुण थे बिसराज्यो जी
लोक न धीजै, मन न पतीजै, मुखड़े शब्द सुणाज्यो जी
दासी थारी जनम-जनम री, म्हारै आँगण आज्यो जी
‘मीराँ’ के प्रभु गिरिधर नागर, बेड़ो पार लगाज्यो जी

Rahna Nahi Des Birana Hai

नश्वर संसार
रहना नहीं देस बिराना है
यह संसार कागद की पुड़िया, बूँद पड़े घुल जाना है
यह संसार काँट की बाड़ी, उलझ उलझ मरि जाना है
यह संसार झाड़ और झाँखर, आग लगे बरि जाना है
कहत ‘कबीर’ सुनो भाई साधो, सतगुरु नाम ठिकाना है