Man Pachite Hai Avsar Bite

नश्वर माया
मन पछितै है अवसर बीते
दुरलभ देह पाइ हरिपद भजु, करम, वचन अरु हीते
सहसबाहु, दसवदन आदि नृप, बचे न काल बलीते
हम-हम करि धन-धाम सँवारे, अंत चले उठि रीते
सुत-बनितादि जानि स्वारथ रत, न करू नेह सबही ते
अंतहुँ तोहिं तजैंगे पामर! तू न तजै अब ही ते
अब नाथहिं अनुरागु, जागु जड़, त्यागु दुरासा जी ते
बुझै न काम-अगिनि ‘तुलसी’ कहुँ, विषय-भोग बहु घीते

Kahiyo Syam So Samjhai

श्याम की याद
कहियौ स्याम सौ समझाइ
वह नातौ नहि मानत मोहन, मनौ तुम्हारी धाइ
बारहिं बार एकलौ लागी, गहे पथिक के पाँइ
‘सूरदास’ या जननी को जिय, राखै बदन दिखाइ

Tum Pe Kon Dehave Gaiya

गौ-दोहन
तुम पै कौन दुहावै गैया
लिये रहत कर कनक दोहनी, बैठत हो अध पैया
इत चितवत उत धार चलावत, एहि सखियो है मैया
‘सूरदास’ प्रभु झगरो सीख्यौ, गोपिन चित्त चुरैया

Makhan Ki Chori Te Sikhe

चित चोर
माखन की चोरी तै सीखे, कारन लगे अब चित की चोरी
जाकी दृष्टि परें नँद-नंदन, फिरति सु मोहन के सँग भोरी
लोक-लाज, कुल कानि मेटिकैं, बन बन डोलति नवल-किसोरी
‘सूरदास’ प्रभु रसिक सिरोमनि, देखत निगम-बानि भई भोरी

Re Man Govind Ke Hve Rahiye

प्रबोधन
रे मन, गोविंद के ह्वै रहियै
विरत होय संसार में रहिये, जम की त्रास न सहियै
सुख, दुख कीरति भाग्य आपने, मिल जाये सो गहियै
‘सूरदास’ भगवंत-भजन करि, भवसागर तरि जइयै

Hari Ko Herati Hai Nandrani

माँ का स्नेह
हरि को हेरति है नँदरानी
बहुत अबेर भई कहँ खेलत, मेरे साँरगपानी
सुनहति टेर, दौरि तहँ आये, कबके निकसे लाल
जेंवत नहीं बाबा तुम्हरे बिनु, वेगि चलो गोपाल
स्यामहिं ल्यायी महरि जसोदा, तुरतहिं पाँव पखारे
‘सूरदास’ प्रभु संग नंद के, बैठे हैं दोऊ बारे

Thane Kai Kai Samjhawan

विरह व्यथा
थाने काँईं काँईं समझाँवा, म्हारा साँवरा गिरधारी
पुरब जनम की प्रीत हमारी, अब नहीं जाय बिसारी
रोम रोम में अँखियाँ अटकी, नख सिख की बलिहारी
सुंदर बदन निरखियो जब ते, पलक न लागे म्हाँरी
अब तो बेग पधारो मोहन, लग्यो उमावो भारी
‘मीराँ’ के प्रभु गिरिधर नागर, सुधि लो तुरत ही म्हारी

Mere To Giridhar Gopal

गिरिधर गोपाल
मेरे तो गिरिधर गोपाल दूसरो न कोई
जाके सिर मोर –मुकुट, मेरो पति सोई
छाँड़ि दई कुल की कानि, कहा करि है कोई
संतन ढिग बैठि-बैठि, लोक लाज खोई
अँसुवन जल सींचि-सींचि, प्रेम-बेली बोई
अब तो बेल फैल गई, आनँद फल होई
दही की मथनिया, बड़े प्रेम से बिलोई
माखन सब काढ़ि लियो, छाछ पिये कोई
भगत देखि राजी भई, जगत देखि रोई
दासी ‘मीराँ’ लाल गिरिधर, तारो अब मोही

Hari Mere Jivan Pran Adhar

प्राणाधार
हरि मेरे जीवन प्राण अधार
और आसरो है नहीं तुम बिन, तीनूँ लोक मँझार
आप बिना मोहि कछु न सुहावै, निरख्यौ सब संसार
‘मीराँ’ कहे मैं दासि रावरी, दीज्यौ मती बिसार

Ham To Ek Hi Kar Ke Mana

आत्म ज्ञान
हम तो एक ही कर के माना
दोऊ कहै ताके दुविधा है, जिन हरि नाम न जाना
एक ही पवन एक ही पानी, आतम सब में समाना
एक माटी के लाख घड़े है, एक ही तत्व बखाना
माया देख के व्यर्थ भुलाना, काहे करे अभिमाना
कहे ‘कबीर’ सुनो भाई साधो, हम हरि हाथ बिकाना