Khijat Jat Makhan Khat

बाल-माधुर्य
खीजत जात माखन खात
अरुण लोचन भौंह टेढ़ी, बार-बार जँभात
कबहुँ रुनझुन चलत घुटुरुनि, छुटि धूसर गात
कबहुँ झुकि के अलक खैंचत, नैन जल भरि जात
कबहुँ तोतरे बोल बोलत, कबहुँ बोलत तात
‘सूर’ हरि की निरखि सोभा, पलक तजत न जात

Nand Rani Ji Ke Putra Hua

श्रीकृष्ण प्राकट्य
नन्दरानीजी के पुत्र हुआ
यह सुन करके ब्रज में सबके मन में भारी आनन्द हुआ
कई मनौतियाँ अरु पुण्यों के परिणाम रूप बेटा आया
तभी बधाई में दाई ने, मनचाहा रत्न हार पाया
गोप गोपियाँ सजे धजे, आशीष दे रहे लाला को
चिरजीवों यशोदा के लाल, परिपूर्ण कर दिया आशा को
डफ झाँझ लिये नाचे गावें, हल्दी से मिले हुवे दधि को
ग्वाले आपस में छिड़क रहे, दे रहे भेंट इक दूजे को
नन्दराय आज हैं अति प्रसन्न, जिसने जो माँगा उसे दिया
ब्रज में समृद्धि भरपूर हुई, कोई न पार इसका पाया

Khelan Ko Hari Duri Gayo Ri

यशोदा की चिन्ता
खेलन कौं हरि दूरि गयौ री
संग-संग धावत डोलत हैं, कह धौं बहुत अबेर भयौ री
पलक ओट भावत नहिं मोकौं, कहा कहौं तोहि बात
नंदहिं तात-तात कहि बोलत, मोहि कहत है मात
इतनो कहत स्याम-घन आये, ग्वाल सखा सब चीन्हे
दौरि जाइ उर लाइ ‘सूर’ प्रभु, हरषि जसोदा लीन्हे

Nain Bhar Dekhon Nand Kumar

श्रीकृष्ण प्राकट्य
नैन भर देखौं नंदकुमार
जसुमति कोख चन्द्रमा प्रकट्यो, जो ब्रज को उजियार
हरद दूब अक्षत दधि कुमकुम मंडित सब घर द्वार
पूरो चौक विविध रंगो से, गाओ मंगलाचार
चहुँ वेद-ध्वनि करत मुनि जन, होए हर्ष अपार
पुण्य-पुंज परिणाम साँवरो, सकल सिद्धि दातार
गोप-वधू आनन्दित निरखै, सुंदरता को सार
दास ‘चतुर्भुज’ प्रभु सुख सागर गिरधर प्रानाधार

Jasumati Man Abhilash Kare

माँ की अभिलाषा
जसुमति मन अभिलाष करे
कब मेरो लाल घुटुरूअन रैंगे, कब धरती पग धरै
कब द्वै दाँत दूध के देखौ, कब तोतरे मुख वचन झरै
कब नंद ही बाबा कहि बोले, कब जननी कहि मोहि ररै
‘सूरदास’ यही भाँति मैया , नित ही सोच विचार करै

Pragate Abhiram Shyam

श्री कृष्ण प्राकट्य
प्रगटे अभिराम श्याम, रसिक ब्रज-बिहारी
गोकुल को नंद-भवन, जन-मन सुखकारी
आनँद अपार छयौ, दुःख-शोक भागि गयौ
हरन विषम भूमि-भार, आये अवतारी
सबके अति हिय हुलास, नंद-सुअन-दरस-आस
दौरे तजि तजि निवास, आतुरता भारी
पहुँचे सब नन्द-भवन, दरसन करि अति निहाल
पायौ सब सुख अपार, गोकुल नर-नारी  

Nand Ghar Aaj Bhayo Anand

श्री कृष्ण प्राकट्य
नन्द घर आज भयो आनन्द
मातु यशोदा लाला जायो, ज्यों पूनों ने चन्द
गोपी गोप गाय गायक-गन, सब हिय सरसिज वृन्द
नन्दनँदन रवि उदित भये हिय, विकसे पंकज वृन्द
वसुधा मुदित समीर बहत वर, शीतल मन्द सुगन्ध
गरजत मन्द मन्द घन नभ महँ, प्रकटे आनँद कन्द
माया बन्धु सिन्धु सब सुख के, स्वयं सच्चिदानन्द
‘प्रभु’ के प्रभु विभु विश्वविदित वर, काटैं यम के फन्द

Avatarit Hue Bhagwan Krishna

श्रीकृष्ण प्राकट्य
अवतरित हुए भगवान कृष्ण, पृथ्वी पर मंगल छाया है
बज गई स्वर्ग की दुन्दुभियाँ,चहुँ दिशि आनन्द समाया है
था गदा, चक्र अरु कमल, शंख, हाथों में शोभित बालक के
श्रीवत्स चिन्ह वक्षःस्थल पे, कटि में भी पीताम्बर झलके
वसुदेव देवकी समझ गये, यह परमपुरुष पुरुषोत्तम है
जो पुत्र रूप में प्राप्त हुआ, साक्षात् वही विश्वात्मा है
होकर प्रसन्न दोनों ही ने, तब हाथ जोड़ स्तवन किया
तभी योगमाया से हरि ने, औसत शिशु का रूप लिया
बालक की तब रक्षा करने, वसुदेव ले गये गोकुल को
उस समय यशोदा मैया ने, वहाँ जन्म दिया था कन्या को
वसुदेव ने उसको उठा लिया, वहीं बालकृष्ण को सुला दिया
कन्या को ले मथुरा लौटे, देवकी-शैया पर लिटा दिया

Aaj Braj Main Chayo Anand

श्रीकृष्ण प्राकट्य
आज व्रज में छायो आनन्द
नंद महर घर ढोटा आयो, पूरण परमानंद
विविध भाँति बाजे बाजत हैं, वेद पढ़त द्विज-वृंद
छिरकत दूध दही घृत माखन, मोहन-मुख अरविन्द
देत दान ब्रजराज मगन मन, फूलत नाहिं समाय
देते असीस सबहिं जन ब्रज के, बार-बार बलि जाय

Aaj Sakhi Nandnandan Pragate

श्रीकृष्ण प्राकट्य
आजु सखी, नँद-नंदन प्रगटे, गोकुल बजत बधाई री
कृष्णपक्ष की अष्टमी भादौ, योग लग्न घड़ी आई री
गृह-गृह ते सब बनिता आई, गावत गीत बधाई री
जो जैसे तैसे उठि धाई, आनन्द उर न समाई री
चौवा चन्दन और अरगजा, दधि की कीच मचाई री
बन्दीजन सुर नर गुन गावें, शोभा बरनि न जाई री
‘चन्द्रसखी’ भज बालकृष्ण छबि, चरन कमल चित लाई री