Dhara Par Pragte Palanhar

श्रीकृष्ण प्राकट्य
धरा पर प्रगटे पालनहार, बिरज में आनँद छायो रे
पीत पताका घर घर फहरे, मंगल गान हर्ष की लहरें
गूँजे पायल की झंकार, विरज में आनँद छायो रे
नर-नारी नाचे गोकुल में, मात यशोदा बलि बलि जाए
द्वारे भीर गोप-गोपिन की, बिरज में आनंद छायो रे
दान दे रहे नंद जसोदा, माणिक मोती धेनु वसन का
याचक लूटे हाथ पसारे, विरज में आनंद छायो रे
यशुमति पुत्र अद्वितीय जायो, श्याम सलोनो हृदय सुहायो
हरेंगे वसुधा का प्रभु भार, विरज में आनँद छायो रे

Aaj Grah Nand Mahar Ke Badhai

जन्मोत्सव
आज गृह नंद महर के बधाई
प्रात समय मोहन मुख निरखत, कोटि चंद छवि छाई
मिलि ब्रज नागरी मंगल गावति, नंद भवन में आई
देति असीस, जियो जसुदा-सुत, कोटिन बरस कन्हाई
अति आनन्द बढ्यौ गोकुल में, उपमा कही न जाई
‘सूरदास’ छवि नंद की घरनी, देखत नैन सिराई

Dhuri Bhare Ati Shobhit Shyam Ju

श्री बालकृष्ण माधुर्य
धूरि-भरे अति शोभित स्यामजू, तैसी बनी सिर सुंदर चोटी
खेलत-खात फिरै अँगना, पग पैंजनी बाजति, पीरी कछौटी
वा छबि को रसखानि बिलोकत, बारत काम कलानिधि कोटी
काग के भाग कहा कहिए हरि, हाथ सों लै गयो माखन रोटी
शेष, महेश, गनेश, दिनेस, सुरेशहु जाहि निरन्तर गावैं
जाहि अनादि अखण्ड अछेद, अभेद सुवेद बतावैं
नारद से शुक्र व्यास रटैं पचि हारे तऊ पुनि पार न पावैं
ताहि अहीर की छोहरियाँ, छछिया भरि छाछ पै नाथ नचावैं
टेरत हेरत हारि पर्यौ, रसखानि बतायो न लोग लुगायन
देखो,दुर्यौ वह कुंज-कुटीर में, बैठ्यौ पलोटन राधिका पायन 

Karat Shrangar Maiya Man Bhavat

श्रृंगार
करत श्रृंगार मैया मन भावत
शीतल जल तातो करि राख्यो, ले लालन को बैठ न्हवावत
अंग अँगोछ चौकी बैठारत, प्रथमही ले तनिया पहरावत
देखो लाल और सब बालक, घर-घर ते कैसे बन आवत
पहर्यो लाल झँगा अति सुंदर, आँख आँज के तिलक बनावत
‘सूरदास’, प्रभु खेलत आँगन, लेत बलैंया मोद बढ़ावत

Nand Grah Bajat Aaj Badhai

श्रीकृष्ण प्राकट्य
नंद गृह बाजत आज बधाई
जुट गई भीर तभी आँगन में, जन्मे कुँवर कन्हाई
दान मान विप्रन को दीनो, सबकी लेत असीस
पुष्प वृष्टि सब करें, देवगण जो करोड़ तैंतीस
व्रज-सुंदरियाँ सजी धजी, कर शोभित कंचन थाल
‘परमानंद’ प्रभु चिर जियो, गावत गीत रसाल

Kahan Lage Mohan Maiya Maiya

कहन-लागे-मोहन मैया मैया
नंद महर सौ बाबा-बाबा, अरु हलधर सौं भैया
ऊँचे चढ़ि चढ़ि कहति जसोदा, लै लै नाम कन्हैया
दूर खेलन जिनि जाहु लला रे, मारेगी कोउ गैया
गोपी-ग्वाल करत कौतूहल, घर घर बजति बधैया
‘सूरदास’ प्रभु तुम्हे दरस कौ, चरननि की बलि जैया

Nand Ghar Pragte Anand Kand

श्रीकृष्ण प्राकट्य
नन्द घर प्रकटे आनँद कंद
हुआ पुत्र यशुमति मैया को, छायो परमानन्द
जात कर्म संस्कार हो गया, विपुल दियो है दान
भेंट करें सब ग्वाल गोपियाँ, गाये मंगल गान
दुन्दुभियाँ भेरी भी बाजे, करें मंगलाचार
सजे सभी घर ब्रज मण्डल में, शोभित वन्दनवार
आगन्तुक को रोहिणी मैया, करें जहाँ सत्कार
नन्दमहल में ऋद्धि सिद्धियाँ, छाई सभी प्रकार

Kanh Kahat Dadhi Dan N Deho

जकाती श्याम
कान्ह कहत दधि दान न दैहों
लैहों छीनि दूध दधि माखन, देखत ही तुम रैहों
सब दिन को भरि लेहुँ आज ही, तब छाँड़ौं मैं तुमको
तुम उकसावति मात पिता को, नहीं जानो तुम हमको
(सखी) हम जानत हैं तुमको मोहन, लै लै गोद खिलाए
‘सूर’ स्याम अब भये जकाती, वे दिन सब बिसराए

Nand Mahar Ghar Bajat Badhai

श्रीकृष्ण प्राकट्य
नंद महर घर बजत बधाई,
बड़े भाग्य जाये सुत जसुदा, सुनि हरषे सब लोग लुगाई
भाँति भाँति सो साज साजि सब, आये नंदराय गृह धाई
नाचहिं गावहिं हिय हुलसावहिं, भरि-भरि भाण्ड के लई मिठाई
भयो अमित आनन्द नंदगृह, करहिं महर सबकी पहुनाई
‘परमानँद’ छयो त्रिभुवन में, चिरजीवहु यह कुँवर कन्हाई

Khijat Jat Makhan Khat

बाल-माधुर्य
खीजत जात माखन खात
अरुण लोचन भौंह टेढ़ी, बार-बार जँभात
कबहुँ रुनझुन चलत घुटुरुनि, छुटि धूसर गात
कबहुँ झुकि के अलक खैंचत, नैन जल भरि जात
कबहुँ तोतरे बोल बोलत, कबहुँ बोलत तात
‘सूर’ हरि की निरखि सोभा, पलक तजत न जात