Jag Uthe Bhagya Bharat Ke

श्री राधा प्राकट्य
जग उठे भाग्य भारत के, परम आनन्द है छाया
श्याम की प्रियतमा राधा, प्रकट का काल शुभ आया
बज उठीं देव-दुन्दुभियाँ, गान करने लगे किन्नर
सुर लगे पुष्प बरसाने, अमित आनन्द उर में भर
चले सब ग्वाल नर नारी, वृद्ध बालक सुसज्जित हो
सभी मन में प्रफुल्लित हो, देवियाँ देव हर्षित हो
यशोदा नन्द परमानंद पाकर हो उठे विहृल
चले बरसाने को ले भेंट, खिल उठे हृदय पंकज दल

Pragati Anup Rup Vrashbhanu

श्री राधा प्राकट्य
प्रगटी अनूप रूप, वृषभानु की दुलारी
राधा शुचि मधुर-मधुर, कीर्तिदा-कुमारी
चंद्र-वदन रूप सौम्य, दोऊ कर-कमल मधुर
विशद नयन-कमल मधुर, आनँद विस्तारी
अरुन चरन-पद्म सदृश, भौंह मधुर भाव मधुर
अधरनि मुसकान मधुर, सरवस बलिहारी
आए तहँ दरसन हित, शिव, ऋषि व्रतधारी
रासेश्वरि श्री राधा के, कान्हा की प्यारी

Pragati Nagari Rup Nidhan

श्री राधा प्राकट्य
प्रगटी नागरि रूप-निधान
निरख निरख सब कहे परस्पर, नहिं त्रिभुवन में आन
कृष्ण-प्रिया का रूप अद्वितीय, विधि शिव करे बखान
उपमा कहि कहि कवि सब हारे, कोटि कोटि रति-खान
‘कुंभनदास’ लाल गिरधर की, जोरी सहज समान

Braj Main Ghar Ghar Bajat Badhai

श्री राधा प्राकट्य
ब्रिज में घर घर बजत बधाई
अतिशय रूप निरख कन्या का माँ कीरति है हर्षाई
सकल लोक की सुंदरता, वृषभानु गोप के आई
जाको जस सुर मुनी सब कोई, भुवन चतुर्दश गाई
नवल-किशोरी गुन निधि श्यामा, कमला भी ललचाई
प्रगटे पुरुषोत्तम श्री राधा द्वै विधि रूप बनाई 

Aaj Barsane Bajat Badhai

श्री राधा प्राकट्य
आज बरसाने बजत बधाई
प्रगट भई वृषभानु गोप के सबही को सुखदाई
आनँद मगन कहत युवती जन, महरि बधावन आई
बंदीजन, मागध, याचक, गुन, गावत गीत सुहाई
जय जयकार भयो त्रिभुवन में, प्रेम बेलि प्रगटाई
‘सूरदास’ प्रभु की यह जीवन-जोरी सुभग बनाई

Aaj Vrashbhanu Geh Anand

श्री राधा जन्मोत्सव
आज वृषभानु गेह आनन्द
वदन प्रभा सी लागत मानो, प्रगट्यो पूरन-चंद
बजे बाजने नाचे गाये, कोइ सुनावत टेर
सुनि सब नारि बधावन आई, किये बिना कछु देर
नंदराय अरु जसुमति रानी, न्योता पा चलि आये
सुनतहि सबन भरे आनंद में, हुलसि भेंट को लाये
अपने अपने मन को भाये, करत सकल ब्रज लोग
‘सूरदास’, प्रगटी पृथ्वी पर, भक्तजन के हितजोग

Pragat Bhai Sobha Tribhuwan Ki

राधा प्राकट्य
प्रगट भई सोभा त्रिभुवन की, श्रीवृषभानु गोप के आई
अद्भुत रूप देखि ब्रजबनिता, रीझि – रीझि के लेत बलाई
नहिं कमला न शची, रति, रंभा, उपमा उर न समाई
जा हित प्रगट भए ब्रजभूषन, धन्य पिता, धनि माई
जुग-जुग राज करौ दोऊ जन, इत तुम, उत नँदराई
उनके मनमोहन, इत राधा, ‘सूरदास’ बलि जाई

Ho Ik Nai Bat Suni Aai

श्री राधा प्राकट्य
हौं इक नई बात सुनि आई
कीरति रानी कुँवरी जाई, घर-घर बजत बधाई
द्वारे भीर गोप-गोपिन की, महिमा बरनि न जाई
अति आनंद होत बरसाने, रतन-भूमि निधि छाई
नाचत तरुन वृद्ध अरु बालक, गोरस-कीच मचाई
‘सूरदास’ स्वामिनि सुखदायिनि, मोहन-सुख हित आई

Radha Ras Ki Khani Sarasta Sukh Ki Beli

श्री राधा
राधा रस की खानि, सरसता सुख की बेली
नन्दनँदन मुखचन्द्र चकोरी, नित्य नवेली
नित नव नव रचि रास, रसिक हिय रस बरसावै
केलि कला महँ कुशल, अलौकिक सुख सरसावै
यह अवनी पावन बनी, राधा पद-रज परसि के
जिह राज सुरगन इन्द्र अज, शिव सिर धारें हरषि के

Hamari Radha Ati Sukumari

श्री राधा
हमारी राधा अति सुकुमारी
विहरत है वृषभानु महल में, चहुँ दिशि करत उजारी
लोचन युगल खिले पंकज दोउ, मातु बजावति तारी
आवति दौरि अङक में उछरैं, हँसनि देत किलकारी
गोरो अंग श्याम हिय धारति, श्यामा श्याम बिहारी
दुग्ध धवलिया तनु छाया सम, होंहि न पियते न्यारी