Ab To Nibhayan Saregi Rakh Lo Mhari Laj

शरणागति
अब तो निभायाँ सरेगी, रख लो म्हारी लाज
प्रभुजी! समरथ शरण तिहारी, सकल सुधारो काज
भवसागर संसार प्रबल है, जामे तुम ही जहाज
निरालम्ब आधार जगत्-गुरु, तुम बिन होय अकाज
जुग जुग भीर हरी भक्तन की, तुम पर उनको नाज
‘मीराँ’ सरण गही चरणन की, पत राखो महाराज

Tu So Raha Ab Tak Musafir

चेतावनी
तूँ सो रहा अब तक मुसाफिर, जागता है क्यों नहीं
था व्यस्त कारोबार में,अब भोग में खोया कहीं
मोहवश जैसे पतिंगा, दीपक की लौ में जल मरे
मतिमान तूँ घर बार में फिर, प्रीति इतनी क्यों करे
लालच में पड़ता कीर ज्यों, पिंजरे में उसका हाल ज्यों
फिर भी उलझता जा रहा, संसार माया जाल क्यों
भगवान का आश्रय ग्रहण जग से नाता तोड़ दें
प्राणियों के वे सुहद, भव-निधि से तुझको तार दे  

Ab To Hari Nam Lo Lagi

चैतन्य महाप्रभु
अब तो हरी नाम लौ लागी
सब जग को यह माखन चोरा, नाम धर्यो बैरागी
कित छोड़ी वह मोहक मुरली, कित छोड़ी सब गोपी
मूँड मुँडाई डोरी कटि बाँधी, माथे मोहन टोपी
मात जसोमति माखन कारन, बाँधे जाके पाँव
श्याम किसोर भयो नव गौरा, चैतन्य जाको नाँव
पीताम्बर को भाव दिखावे, कटि कोपीन कसै
गौर कृष्ण की दासी ‘मीराँ’ रसना कृष्ण बसै

Rana Ji Ab Na Rahungi Tori Hatki

वैराग्य
राणाजी! अब न रहूँगी तोरी हटकी
साधु-संग मोहि प्यारा लागै, लाज गई घूँघट की
पीहर मेड़ता छोड्यो अपनो, सुरत निरत दोउ चटकी
सतगुरु मुकर दिखाया घट का, नाचुँगी दे दे चुटकी
महल किला कुछ मोहि न चहिये, सारी रेसम-पट की
भई दिवानी ‘मीराँ’ डोलै, केस-लटा सब छिटकी

Ab Odhawat Hai Chadariya Vah Dekho Re Chalti Biriya

अंतिम अवस्था
अब ओढ़ावत है चादरिया, वह देखो रे चलती बिरिया
तन से प्राण जो निकसन लागे, उलटी नयन पुतरिया
भीतर से जब बाहर लाये, छूटे महल अटरिया
चार जने मिल खाट उठाये, रोवत चले डगरिया
कहे ’कबीर’ सुनो भाई साधो, सँग में तनिक लकड़िया

Ab Tum Kab Simaroge Ram

हरिनाम स्मरण
अब तुम कब सुमरो गे राम, जिवड़ा दो दिन का मेहमान
गरभापन में हाथ जुड़ाया, निकल हुआ बेइमान
बालापन तो खेल गुमाया, तरूनापन में काम
बूढ़ेपन में काँपन लागा, निकल गया अरमान
झूठी काया झूठी माया, आखिर मौत निदान
कहत ‘कबीर’ सुनो भाई साधो, क्यों करता अभिमान

Muraliya Mat Baje Ab Aur

मुरली का जादू
मुरलिया! मत बाजै अब और
हर्यौ सील-कुल-मान करी बदनाम मोय सब ठौर
रह्यो न मोपै जाय सुनूँ जब तेरी मधुरी तान
उमगै हियौ, नैन झरि लागै, भाजन चाहैं प्रान
कुटिल कान्ह धरि तोय अधर पर, राधा राधा टेरे
रहै न मेरौ मन तब बस में, गिनै न साँझ सवेरे

Ab Lo Nasani

भजन के पद
शुभ संकल्प
अब लौं नसानी, अब न नसैंहौं
राम-कृपा भव-निसा सिरानी, जागे फिरि न डसैंहौं
पायउँ नाम चारु चिंतामनि, उर करतें न खसैंहौं
श्याम रूप सुचि रुचिर कसौटी, चित कंचनहिं कसैंहौं
परबस जानी हँस्यो इन इंद्रिन, निज बस ह्वै न हँसैंहौं
मन मधुकर पन करके ‘तुलसी’, रघुपति पद-कमल बसैंहौं

Ab Nithurai Tajo Brajrani

बालकृष्ण बंधन
अब निठुराई तजो ब्रजरानी
ऐसो लाल बाँधवे लायक, द्युति आनन कुम्हलानी
भाग बड़े विधि दयो एक सुत, पूजत शंभु-भवानी
ताको उदर दाम ते बाँध्यो, करुणा कितै गँवानी
नित नवनीत खात हरि हमरो, गोपीन की मनभानी
मात जसोदा जरा न मानी, गोप-वधुन की बानी
बाँध दियो जब बाल-कृष्ण को, फिर मन में पछतानी

Ab To Pragat Bhai Jag Jani

प्रेमानुभूति
अब तो पगट भई जग जानी
वा मोहन सों प्रीति निरंतर, क्यों निबहेगी छानी
कहा करौं वह सुंदर मूरति, नयननि माँझि समानी
निकसत नाहिं बहुत पचिहारी, रोम-रोम उरझानी
अब कैसे निर्वारि जाति है, मिल्यो दूध ज्यौं पानी
‘सूरदास’ प्रभु अंतरजामी, उर अंतर की जानी