Janani Main Na Jiu Bin Ram

भरत की व्यथा
जननी मैं न जीऊँ बिन राम
राम लखन सिया वन को सिधाये, राउ गये सुर धाम
कुटिल कुबुद्धि कैकेय नंदिनि, बसिये न वाके ग्राम
प्रात भये हम ही वन जैहैं, अवध नहीं कछु काम
‘तुलसी’ भरत प्रेम की महिमा, रटत निरंतर नाम

Tum Bin Meri Kon Khabar Le Govardhan Giridhari

लाज
तुम बिन मोरी कौन खबर ले, गोवर्धन गिरधारी
मोर-मुकुट पीतांबर सोहै, कुण्डल की छबि न्यारी
द्रुपद सुता की लाज बचाई, राखो लाज हमारी
‘मीराँ’ के प्रभु गिरिधर नागर, चरण-कमल बलिहारी

Piya Bin Rahyo Na Jay

विरह व्यथा
पिया बिन रह्यो न जाय
तन-मन मेरो पिया पर वारूँ, बार-बार बलि जाय
निस दिन जोऊँ बाट पिया की, कब रे मिलोगे आय
‘मीराँ’ को प्रभु आस तुम्हारी, लीज्यो कण्ठ लगाय

Piya Bin Suno Che Ji Mharo Des

विरह व्यथा
पिया बिन सूनो छे जी म्हारो देस
ऐसो है कोई पिवकूँ मिलावै, तन मन करूँ सब पेस
तुम्हरे कारण बन बन डोलूँ, कर जोगण रो भेस
अवधि बीती अजहूँ न आये, पंडर हो गया केस
‘मीराँ’ के प्रभु कब रे मिलोगे, तज दियो नगर नरेस

Bin Kaju Aaj Maharaj Laj Gai Meri

द्रोपदी का विलाप
बिन काज आज महाराज लाज गई मेरी
दुख हरो द्वारिकानाथ शरण मैं तेरी
दुःशासन वंश कठोर, महा दुखदाई
खैंचत वह मेरो चीर लाज नहिं आई
अब भयो धर्म को नास, पाप रह्यो छाई
यह देख सभा की ओर नारि बिलखाई
शकुनि दुर्योधन, कर्ण खड़े खल घेरी
दुख हरो द्वारिकानाथ शरण मैं तेरी
तुम दीनन की सुध लेत देवकी-नन्दन
महिमा अनन्त भगवन्त भक्त-भय भंजन
तुम कियो सिया दुख दूर शम्भु-धनु खण्डन
अति आर्ति-हरण गोपाल मुनिन मन-रंजन
करुणानिधान भगवान करी क्यों देरी
दुख हरो द्वारिकानाथ शरण में तेरी
बैठा जहाँ राज समाज, नीति सब खोई
नहिं कहत धर्म की बात सभा में कोई
पाँचो पति बैठे मौन कौन गति होई
ले नन्दनँदन को नाम द्रोपदी रोई
करि करि विलाप सन्ताप सभा में हेरी
दुख हरो द्वारिकानाथ शरण मैं तेरी
तुम सुनी गजेन्द्र की टेर, विष्णु अनिवासी
ग्रह मारि छुड़ायो बन्दि काटि पग फाँसी
मै जपूँ तुम्हारो नाम द्वारिका वासी
अब काहे राज समाज करावत हाँसी
अब कृपा करो यदुनाथ जान चित चेरी
दुख हरो द्वारिकानाथ शरण में तेरी

Tum Bin Jiwan Bhar Bhayo

शरणागति
तुम बिन जीवन भार भयो!
कब लगि भटकाओगे प्रीतम, हिम्मत हार गयो
कहाँ करों अब सह्यो जात नहिं, अब लौ बहुत सह्यो
अपनो सब पुरुषारथ थाक्यों, तव पद सरन गह्यो
सरनागत की पत राखत हो, सब कोऊ यही कह्यो
करुणानिधि करुणा करियो मोहि, मन विश्वास भयो

Bhajan Bin Jiwan Manahu Masan

भजन महिमा
भजन बिन जीवन मनहुँ मसान
जीवन के जीवन मनमोहन, उन बिन मरन समान
चलत फिरत दीखत जो यह तन,सो जनु प्रेत समान
कहा काम आवहिगो वैभव, जब तन को अवसान
जो कछु मिल्यौ न फल्यौ जगत में, कियो न हरि गुण-गान
है बस यही चातुरी साँची, भजै स्याम रसखान

Tum Bin Pyare Kahun Sukh Nahi

स्वार्थी संसार
तुम बिन प्यारे कहुँ सुख नाहीं
भटक्यो बहुत स्वाद-रस लम्पट, ठौर ठौर जग माहीं
जित देखौं तित स्वारथ ही की निरस पुरानी बातें
अतिहि मलिन व्यवहार देखिकै, घृणा आत है तातें
जानत भले तुम्हारे बिनु सब, व्यर्थ ही बीतत सांसे
‘हरिचन्द्र’ नहीं टूटत है ये, कठिन मोह की फाँसे

Badi Maa Kaise Jiun Bin Ram

भरत का प्रेम
बड़ी माँ! जीऊँ कैसे बिन राम
सिया, राम, लछमन तो वन में, पिता गये सुरधाम
कुटिल बुद्धि माँ कैकेयी की, बसिये न ऐसे ग्राम
भोर भये हम भी वन जैहें, अवध नहीं कछु काम
अद्भुत प्रेम भरत का, प्रस्थित गये मिलन को राम