Kaho Tumh Binu Grah Mero Kon Kaj

अनुरोध
कहौ तुम्ह बिनु गृह मेरो कौन काज ?
विपिन कोटि सुरपुर समान मोको, जो प्रिय परिहर् यो राज
वलकल विमल दुकूल मनोहर, कंदमूल – फल अमिय अनाज
प्रभु पद कमल विलोकहुँ छिन छिन इहितें, अधिक कहा सुख साज
हो रहौ भवन भोग लोलुप ह्वै, पति कानन कियो मुनि को साज
‘तुलसिदास’ ऐसे विरह वचन सुनि, कठिन हियो बिहरो न आज

Hari Dekhe Binu Kal Na Pare

विरह व्यथा
हरि देखे बिनु कल न परै
जा दिन तैं वे दृष्टि परे हैं, क्यों हूँ चित उन तै न टरै
नव कुमार मनमोहन ललना, प्रान जिवन-धन क्यौं बिसरै
सूर गोपाल सनेह न छाँड़ै, देह ध्यान सखि कौन करै

Hari Binu Meet Nahi Kou Tere

प्रबोधन
हरि बिनु मीत नहीं कोउ तेरे
सुनि मन, कहौं पुकारी तोसौं, भजो गोपालहिं मेरे
यह संसार विषय-विष सागर, रहत सदा सब घेरे
‘सूर’ श्याम बिन अंतकाल में, कोई न आवत नेरे

Shyam Binu Rahyo Na Jay

विरह व्यथा
स्याम बिनु रह्यो न जाय
खान पानमोहि फीको लागे, नैणा रहे मुरझाय
बार बार मैं अरज करूँ छूँ, रैण गई दिन जाय
‘मीराँ’ कहे हरि तुम मिलिया बिन, तरस तरस तन जाय

Shyam Binu Bairin Rain Bhai

विरह व्यथा
स्याम बिनु बैरिन रैन भई
काटे कटत न घटत एक पल, सालत नित्य नई
पल भर नींद नयन नहिं आये, तारे गिनत गई
उलटि-पुलटि करवट लैं काटूँ, ऐसी दशा भई
कहा बात मैं कहूँ गात की, जात न कछु कही
अँखियन में पावस सी छाई, जब पल रूकत नहीं
भये निठुर ऐसे नँदनंदन, सुधि हूँ नाहिं लई
कहा करुँ सजनी मोहन वश, ऐसी दशा भई