Mohan Ne Murali Adhar Dhari

मुरली का जादू
मोहन ने मुरली अधर धरी
वृन्दावन में ध्वनि गूंज रही, सुन राधे-स्वर सब मुग्ध हुए
कोई न बचा इस जादू से, सबके मन इसने चुरा लिए
जड़ भी चैतन्य हुए सुन कर, उन्मत्त दशा पशु पक्षी की
जल प्रवाह कालिन्दी में रुक गया, कला ये वंशी की
गोपीजन की गति तो विचित्र, वे उलट-पलट धर वस्त्र आज
चल पड़ी वेग से मिलने को, प्यारे से तज संकोच लाज
अधरामृत पीकर मोहन का, वंशी इतनी इतराती है
सखि! नाम हमारा ले उसमें, सौतन बन हमें बुलाती है
अधरों पर धर वंशी में श्याम, जब भी भरते हैं विविध राग
ऋषि, मुनि, योगी मोहित होते, टूटे समाधि मिटता विराग

Aarti Girivar Dhari Ki

राधाकृष्ण आरती
आरती गिरिवरधारी की, मोहिनी कीर्ति-कुमारी की
बैजंती माला उर धारी, पीत-पट की शोभा न्यारी
लाड़िली की शोभा भारी, वदन स्वर्णिम है मनहारी
युगल सुन्दरता सुखकारी, —-आरती ….
भाल पर तिलक बेंदी दमके, कान में कुण्डल भी चमके
चरण में नुपूर ध्वनि झमके, दिव्य शोभा मन में अटके
माधुरी मुख की रुचिकारी, —-आरती …..
मेघ सम अंग कांति काली, सुघड़ता-सागर वनमाली
प्रियाजी नील वसन वाली, प्रेम रूपा राधा लाली
चारु चितवन मंगलकारी, —-आरती ………
बसो मन-मंदिर में घनश्याम, संग में श्रीराधा अभिराम
लजाये कई कोटि रति काम, चरण में बारंबार प्रणाम
युगल श्री यमुना तट चारी, —-आरती ……….