Ganga Ganga Kahe Nitya

गंगा महिमा
गंगा गंगा कहें नित्य गंगा जल पीवैं
सदा बसै तट निकट, गंग- जल हीतें जीवैं
गंगारज तन लाइ, नहावैं गंगा जल महँ
बसैं गंगपथ परसि अनिल, बिहरैं जिहिं थल महँ
श्री गंगा के नाम तें, कोटि जनम पातक नसहिं
भोगे भू पै भोग बहु, अन्त जाहि सुरपुर बसहिं

Nav Se Kar Do Ganga Paar

केवट का मनोभाव
नाव से कर दो गंगा पार
भाग्यवान् मैं हूँ निषाद प्रभु लेऊ चरण पखार
जब प्रभु देने लगे मुद्रिका जो केवट का नेग
बोला केवट प्रभु दोनों की जाति ही भी तो एक
चरण कमल के आश्रित हूँ प्रभु करो न लोकाचार
भवसागर के आप हो केवट करना मुझको पार

Jay Ganga Maiya

गंगा आरती
जय गंगा मैया, माँ जय सुरसरि मैया
आरती करे तुम्हारी, भव-निधि की नैया
हरि-पद-पद्म-प्रसूति, विमल वारिधारा
ब्रह्म द्रव भागीरथि, शुचि पुण्यागारा
शंकर-जटा विहारिणि, भव-वारिधि-त्राता
सगर-पुत्र गण-तारिणि, स्नेहमयी माता
‘गंगा-गंगा’ जो जन, उच्चारे मुख से
दूर देश स्थित भी, पाये मुक्तिभय से
मृत व्यक्ति की अस्थियाँ जो प्रवेश पाये
वो भी पावन होकर परम धाम जाये
हे माता करुणामयी, शरण मुझे दीजै
आरती करें तुम्हारी, आप कृपा कीजै