Gopal Gokul Vallabhi

श्री कृष्ण वन्दना
गोपाल गोकुल बल्लभी प्रिय गोपगोसुत बल्लभं
चरनारबिंदमहं भजे भजनीय सुर मुनि दुर्लभं
घनश्याम काम अनेक छबि, लोकाभिराम मनोहरं
किंजल्क-वसन, किसोर मूरति, भूरि गुन करुनाकरं
सिर केकि-पच्छ बिलोल कुंडल, अरुन बनरुह लोचनं
गुंजावतंस विचित्र सब अँग धातु, भव-भय मोचनं
कच-कुटिल, सुंदर तिलक भ्रू, राका मयंक समाननं
अपहरन ‘तुलसीदास’ त्रास विहार वृंदा काननं

Ab Me Nachyo Bahut Gopal

मोह माया
अब मैं नाच्यौ बहुत गोपाल
काम क्रोध को पहिर चोलनो, कंठ विषय की माल
महा मोह के नूपुर बाजत, निन्दा शबद रसाल
भरम भर्यो मन-भयो पखावज, चलत कुसंगत चाल
तृष्णा नाद करत घट भीतर, नाना विधि दे ताल
माया को कटि फैंटा बाँध्यो, लोभ तिलक दियो भाल
कोटिक कला काछि दिखराई, जल थल सुधि नहीं काल
‘सूरदास’ की सबै अविद्या, दूरि करो नन्दलाल

Kari Gopal Ki Hoi

प्रारु
करी गोपाल की होई
जो अपनौं पुरुषारथ मानत, अति झूठौ है सोई
साधन, मंत्र, जंत्र, उद्यम, बल, ये सब डारौ धोई
जो कछु लिखि राखी नँदनंदन, मेटि सकै नहिं कोई
दुख-सुख लाभ-अलाभ समुझि तुम, कतहिं मरत हौ रोई
‘सूरदास’ स्वामी करुनामय, स्याम चरन मन पोई

Kou Mai Leho Re Gopal

मुग्ध गोपी
कोउ माई लेहो रे गोपाल
दधि को नाम श्याम घन सुंदर, बिसर्यो चित ब्रजबाल
मटकी सीस भ्रमत ब्रज बीथिन, बोलत बचन रसाल
उफनत तक चूवत चहुँ दिसि तें, मन अटक्यो नँदलाल
हँसि मुसिकाइ ओट ठाड़ी ह्वै, चलत अटपटी चाल
‘सूर’ श्याम बिन और न भावे, यह बिरहिनी बेहाल

Prat Bhayo Jago Gopal

प्रभाती
प्रात भयौ, जागौ गोपाल
नवल सुंदरी आई बोलत, तुमहिं सबै ब्रजबाल
प्रगट्यौ भानु, मन्द भयौ चंदा, फूले तरुन तमाल
दरसन कौं ठाढ़ी ब्रजवनिता, गूँथि कुसुम बनमाल
मुखहि धोई सुंदर बलिहारी, करहु कलेऊ लाल
‘सूरदास’ प्रभु आनंद के निधि, अंबुज-नैन बिसाल

Biharat Ras Rang Gopal

रास लीला
बिहरत रास रंग गोपाल
नवल स्यामहि संग सोभित, नवल सब ब्रजबाल
सरद निसि अति नवल उज्जवल, नव लता बन धाम
परम निर्मल पुलिन जमुना, कलपतरु विश्राम
कोस द्वादस रास परिमिति, रच्यो नंदकुमार
‘सूर’ प्रभु सुख दियो निसि रमि, काम कौतुक हार

Rani Tero Chir Jivo Gopal

चिरजीवो गोपाल
रानी तेरो चिरजीवो गोपाल
बेगि बढ्यो बड़ी होय बिरध लट, महरी मनोहर बाल,
उपजि पर्यो यह कूखि भाग्यबल, समुद्र सीप जैसे लाल
सब गोकुल के प्राण जीवनधर, बैरन के उर साल
‘सूर’ किते जिय सुख पावत है, देखत श्याम तमाल
राज अंजन लागो मेरी अँखियन, मिटे दोष जंजाल

He Govind He Gopal He Govind Rakho Sharan

शरणागति
हे गोविन्द, हे गोपाल, हे गोविन्द राखो शरण
अब तो जीवन हारे, हे गोविन्द, हे गोपाल
नीर पिवन हेतु गयो, सिन्धु के किनारे
सिन्धु बीच बसत ग्राह, चरन धरि पछारे
चार प्रहर युद्ध भयो, ले गयो मझधारे
नाक कान डूबन लागे, कृष्ण को पुकारे
द्वारका में शब्द गयो, शोर भयो भारे
शंख-चक्र, गदा-पद्म, गरूड़ ले सिधारे
‘सूर’ कहे श्याम सुनो, शरण है तिहारे
अबकी बार पार करो, नन्द के दुलारे

Mere To Giridhar Gopal

गिरिधर गोपाल
मेरे तो गिरिधर गोपाल दूसरो न कोई
जाके सिर मोर –मुकुट, मेरो पति सोई
छाँड़ि दई कुल की कानि, कहा करि है कोई
संतन ढिग बैठि-बैठि, लोक लाज खोई
अँसुवन जल सींचि-सींचि, प्रेम-बेली बोई
अब तो बेल फैल गई, आनँद फल होई
दही की मथनिया, बड़े प्रेम से बिलोई
माखन सब काढ़ि लियो, छाछ पिये कोई
भगत देखि राजी भई, जगत देखि रोई
दासी ‘मीराँ’ लाल गिरिधर, तारो अब मोही

Main To Tore Charan Lagi Gopal

शरणागत
मैं तो तोरे चरण लगी गोपाल
जब लागी तब कोउ न जाने, अब जानी संसार
किरपा कीजौ, दरसण दीजो, सुध लीजौ तत्काल
‘मीराँ’ कहे प्रभु गिरिधर नागर, चरण-कमल बलिहार