Kahan Ke Pathik Kahan Kinh Hai Gavanwa

परिचय
कहाँ के पथिक कहाँ, कीन्ह है गवनवा
कौन ग्राम के, धाम के वासी, के कारण तुम तज्यो है भवनवा
उत्तर देस एक नगरी अयोध्या, राजा दशरथ जहाँ वहाँ है भुवानवा
उनही के हम दोनों कुँवरावा , मात वचन सुनि तज्यो है भवनवा
कौन सो प्रीतम कौन देवरवा ! साँवरो सो प्रीतम गौर देवरवा
‘तुलसिदास’ प्रभु आस चरन की मेरो मन हर लियो जानकी रमणवा

Karmo Ka Fal Hi Sukh Dukh Hai

कर्म-फल
कर्मों का फल ही सुख दुख है
जिसने जैसा हो कर्म किया, उसका फल वह निश्चित पायेगा
जो कर्म समर्पित प्रभु को हो, तो वह अक्षय हो जायेगा
जो भी ऐसा सत्कर्मी हो, वह उत्तम गति को पायेगा
जो व्यक्ति करे निष्काम कर्म, सर्वथा आश्रित प्रभु के ही
ऐसे भक्तों का निस्संदेह, उद्धार स्वयं प्रभु करते ही

Mila Hai Janma Manav Ka

प्रबोधन
मिला है जन्म मानव का, गँवाया किन्तु यौवन को
साथ में कुछ न जायेगा, चेत जा, याद कर प्रभु को
अभी से आत्मचिंतन हो, पढ़ो तुम नित्य गीता को
निदिध्यासन मनन भी हो, छुड़ा दे मोह माया को
साधना के अनेकों पंथ भी, निर्गुण सगुण कोई
श्रेष्ठ पर ज्ञान ही का मार्ग, दिखा सकते गुरू सोई
स्वयं एक बात को समझो, देह नश्वर है यह तो तथ्य
ब्रह्म ही सर्व व्यापक है, सनातन है वही एक सत्य
जला दो भक्ति रूपी योग से, सारे ही कर्मों को
करो सत्संग सन्तों का, मिटा देंगे अविद्या को

Jaki Gati Hai Hanuman Ki

हनुमान आश्रय
जाकी गति है हनुमान की
ताकी पैज पूजि आई, यह रेखा कुलिस पषान की
अघटि-घटन, सुघटन-विघटन, ऐसी विरुदावलि नहिं आन की
सुमिरत संकट सोच-विमोचन, मूरति मोद-निधान की
तापर सानुकूल गिरिजा, शिव, राम, लखन अरु जानकी
‘तुलसी’ कपि की कृपा-विलोकनि, खानि सकल कल्यान की

Krishna Ghar Nand Ke Aaye Badhai Hai Badhai Hai

श्रीकृष्ण प्राकट्य
कृष्ण घर नंद के आये, बधाई है बधाई है
करो सब प्रेम से दर्शन, बधाई है बधाई है
भाद्र की अष्टमी पावन में प्रगटे श्याम मनमोहन
सुखों की राशि है पाई, बधाई है बधाई है
मुदित सब बाल, नर-नारी, चले ले भेंट हाथों में
देख शोभा अधिक हर्षित, बधाई है बधाई है
कृष्ण हैं गोद जननी के, खिल उठे हृदय पंकज दल
करें सब भेंट अति अनुपम, बधाई है बधाई है
सुर मुनि हुए हर्षित जो, बने थे ग्वाल अरु गोपी
परम आनन्द उर छाया, बधाई है बधाई है
बज उठी देव-दुंदुभियाँ, गान करने लगे किन्नर
स्वर्ग से पुष्प बरसाये, बधाई है बधाई है

Yashoda Nand Gopijan Dukhi Hai

विरह वेदना
यशोदा, नन्द, गोपीजन, दुखी है विरह पीड़ा से
परम प्यारा सभी का मैं, कहे यो श्याम उद्धव से
उधोजी ब्रज में जाकर के, मिले तब नन्द बाबा से
कभी गोविंद आयेंगे, यों पूछा नन्द ने उनसे
बही तब आँसुओं की धार, यशोदा नन्द नयनों से
रुँध गया कण्ठ दोनों का, बोल ना पाय उधो से
बँधाया धैर्य उद्धव ने, कहा श्रीकृष्ण आयेंगे
कहा था जो मैं आऊँगा, कथन को वे निभायेंगे
कहा है श्यामसुन्दर ने ‘विलग मैं हूँ नहीं तुमसे’
रखो मन पास में मेरे, सुलभ हूँ प्रेम भक्ति से 

Man Pachite Hai Avsar Bite

नश्वर माया
मन पछितै है अवसर बीते
दुरलभ देह पाइ हरिपद भजु, करम, वचन अरु हीते
सहसबाहु, दसवदन आदि नृप, बचे न काल बलीते
हम-हम करि धन-धाम सँवारे, अंत चले उठि रीते
सुत-बनितादि जानि स्वारथ रत, न करू नेह सबही ते
अंतहुँ तोहिं तजैंगे पामर! तू न तजै अब ही ते
अब नाथहिं अनुरागु, जागु जड़, त्यागु दुरासा जी ते
बुझै न काम-अगिनि ‘तुलसी’ कहुँ, विषय-भोग बहु घीते

Koi Manushya Hai Nich Nahi

भरत-केवट मिलाप
कोई मनुष्य है नीच नहीं, भगवान भक्त हो, बड़ा वही
श्री भरत मिले केवट से तो, दोनों को ही आनन्द हुआ
मालूम हुआ केवट से ही, राघव का उससे प्रेम हुआ
तब भरत राम के जैसे ही, छाती से उसको लगा रहे
केवट को इतना हर्ष हुआ, आँखों से उसके अश्रु बहे
जाति से यद्यपि तुच्छ रहा, राघव को प्राणों सा प्यारा
फूलों की वर्षा करे देव, प्रेमानुराग सबसे न्यारा

Yah Jiwan Kitna Sundar Hai

मानव जीवन
यह जीवन कितना सुन्दर है
जो सदुपयोग ना कर पाये, फिर तो पाया क्या जीवन में
खाया पीया अरु भोग किया, अन्तर न रहा नर पशुओं में
जो सोच समझने की शक्ति, वरदान रूप में मिली हमें
उद्देश्य पूर्ण जीवन जीते, सुर दुर्लभ जीवन मिला हमें
संस्कार साथ में ही जाते, इसका कुछ सोच विचार करें
आत्मोद्धार अरु सेवा में, जीवन को सदा व्यतीत करें

प्रभु का ध्यान
यह विनती है पल-पल, क्षण-क्षण,रहे ध्यान तुम्हारे चरणों में
चाहे बैरी सब संसार बने, चाहे जीवन मुझ पर भार बने
चाहे मौत गले का हार बने, रहे ध्यान तुम्हारे चरणों में
चाहे संकट ने मुझे घेरा हो, चाहे चारों ओर अँधेरा हो
पर मन नहीं मेरा डगमग हो, रहे ध्यान तुम्हारे चरणों में
जब-जब संसार का कैदी बनूँ, निष्काम भाव से कर्म करूँ
जय-हार तुम्हारे हाथों में, रहे ध्यान तुम्हारे चरणों में
जिह्वा पे तुम्हारा नाम रहे, दिन रात हृदय से स्मरण करूँ
मन-मन्दिर में घनश्याम रहे, रहे ध्यान तुम्हारे चरणों में

Shabri Sagun Manawat Hai

शबरी की प्रीति
शबरी सगुन मनावत है, मेरे घर आवेंगे राम
बीज बीन फल लाई शबरी, दोना न्यारे न्यारे
आरति सजा प्रार्थना कीन्ही, छिन मंदिर छिन द्वारे
ऋषि के वचन सुनत मनमाहीं, हर्ष न ह्रदय समाई
घर को काम सकल तज दीन्हों, गुन रघुपति के गाई
अनुज सहित प्रभु दरसन दीन्हों, परी चरन लपटाई
‘तुलसीदास’ प्रभु अधम उधारन, दीन्ह जानि अपनाई