Chadi Man Hari Vimukhan Ko Sang

प्रबोधन
छाड़ि मन, हरि-विमुखन को संग
जिनके संग कुमति उपजत है, परत भजन में भंग
कहा होत पय-पान कराए, विष नहिं तजत भुजंग
कागहिं कहा कपूर चुगाए, स्वान न्हवाए गंग
खर कौं कहा अरगजा-लेपन मरकट भूषन अंग
गज कौं कहा सरित अन्हवाए, बधुरि धरै वह ढंग
पाहन पतित बान नहिं बेधत, रीतो करत निषंग
‘सूरदास’ कारी कामरि पै, चढ़त न दूजौ रंग

Ab To Hari Nam Lo Lagi

चैतन्य महाप्रभु
अब तो हरी नाम लौ लागी
सब जग को यह माखन चोरा, नाम धर्यो बैरागी
कित छोड़ी वह मोहक मुरली, कित छोड़ी सब गोपी
मूँड मुँडाई डोरी कटि बाँधी, माथे मोहन टोपी
मात जसोमति माखन कारन, बाँधे जाके पाँव
श्याम किसोर भयो नव गौरा, चैतन्य जाको नाँव
पीताम्बर को भाव दिखावे, कटि कोपीन कसै
गौर कृष्ण की दासी ‘मीराँ’ रसना कृष्ण बसै

Bhaj Le Pyare Hari Ka Nam

नाम स्मरण
भजले प्यारे हरि का नाम, इसमें लगे न कुछ भी दाम
कर न बुराई कभी किसी की, जप ले मन से हरि का नाम
नयनों से दर्शन हो हरि का, सुनों कान से प्रभु का गान
करो तीर्थ सेवन पैरों से, करो हाथ से समुचित दान
मन बुद्धि श्रद्धा से प्यारे, होय नित्य ही हरि का ध्यान
एकमात्र साधन यह कलि में, शास्त्र संत का यही विधान 

Jasoda Hari Palne Jhulawe

पालना
जसोदा हरि पालना झुलावै
मेरे लाल की आउ निंदरिया, काहे न आन सुवावै
तूँ काहैं नहि बेगिहि आवै, तोको कान्ह बुलावै
कबहुँ पलक हरि मूँदि लेत हैं, कबहुँ अधर फरकावै
सौवत जानि मौन ह्वैके रहि, करि करि सैन बतावै
जो सुख ‘सूर’ देव मुनि दुरलभ, सो नँद भामिनि पावें

Jaao Hari Nirmohiya Re

स्वार्थ की प्रीति
जाओ हरि निरमोहिया रे, जाणी थाँरी प्रीत
लगन लगी जब और प्रीत थी, अब कुछ उलटी रीत
अमृत पाय जहर क्यूँ दीजे, कौण गाँव की रीत
‘मीराँ’ कहे प्रभु गिरधर नागर, आप गरज के मीत

Main Apno Man Hari So Joryo

मोहन से प्रीति
मैं अपनो मन हरि सों जोर्यो, हरि सों जोरि सबनसो तोर्यो
नाच नच्यों तब घूँघट कैसो, लोक-लाज डर पटक पिछोर्यो
आगे पाछे सोच मिट गयो, मन-विकार मटुका को फोर्यो
कहनो थो सो कह्यो सखी री, काह भयो कोऊ मुख मोर्यो
नवल लाल गिरिधरन पिया संग, प्रेम रंग में यह तन बोर्यो
‘परमानंद’ प्रभु लोग हँसन दे, लोक वेद तिनका ज्यों तोर्यो

Tum Meri Rakho Laj Hari

शरणागति
तुम मेरी राखौ लाज हरी
तुम जानत सब अंतरजामी, करनी कछु न करी
औगुन मोसे बिसरत नाहीं, पल-छिन घरी-घरी
सब प्रपंच की पोट बाँधिकैं, अपने सीस धरी
दारा-सुत-धन मोह लियो है, सुधि-बुधि सब बिसरी
‘सूर’ पतित को बेग उधारो, अब मेरी नाव भरी

Meera Magan Hari Ke Gun Gay

मग्न मीरा
मीराँ मगन हरि के गुण गाय
साँप-पिटारा राणा भेज्या, मीराँ हाथ दियो जाय
न्हाय धोय जब देखण लागी, सालिगराम गई पाय
जहर को प्याला राणाजी भेज्या, अमृत दियो बनाय
न्हाय धोय जब पीवण लागी, हो गई अमर अँचाय
सूल सेज राणाजी भेजी, दीज्यो मीराँ सुलाय
साँझ भई मीराँ सोवण लागी, मानो फूल बिछाय
‘मीराँ’ के प्रभु सदा सहाई, राखो विघन हटाय
भजन भाव में मगन डोलती, गिरिधर पै बलि जाय

Main Hari Main Hari Main Hari O Giridhari

प्रतीक्षा
मैं हारी, मैं हारी, मैं हारी ओ गिरिधारी
आप बिसारे, पर ना हारी, पंथ निहारे हारी
मैं हारी….
पतझर बीता डाल डाल पर नये पात फिर छाये,
पर ना दुखिया मन में मेरे, फिरे भाग फिर आये
सुख के दिन क्या बीत चले, मैं आशा धारे हारी
मैं हारी…
आँचल भींग गये आँसू से, जी की जलन न जाये
अहो मीत राधा के मन के,मुझको क्यों बिसराये
कुंज-कुंज भटकी पचि हारी, पिया पुकारे हारी
मैं हारी…
वर्षा इन नयनों में उमड़े, पतझर छाया मन में,
साँसों में आशा की आहें, जैसे जेठ-पवन में
नींद कहाँ! मोहन-आहट में, नैन उघाड़े हारी
मैं हारी…

Dekhe Sab Hari Bhog Lagat

अन्नकूट
देखे सब हरि भोग लगात
सहस्र भुजा धर उत जेमत है, इन गोपन सों करत है बात
ललिता कहत देख हो राधा, जो तेरे मन बात समात
धन्य सबहिं गोकुल के वासी, संग रहत गोकुल के नाथ
जेमत देख नंद सुख दीनों, अति प्रसन्न गोकुल नर-नारी
‘सूरदास’ स्वामी सुख-सागर, गुण-आगर नागर दे तारी