Hari Aawat Gaini Ke Pache

गो – चारण
हरि आवत गाइनि के पाछे
मोर-मुकुट मकराकृति कुंडल, नैन बिसाल कमल तैं आछे
मुरली अधर धरन सीखत हैं, वनमाला पीताम्बर काछे
ग्वाल-बाल सब बरन-बरन के, कोटि मदन की छबि किए पाछे
पहुँचे आइ स्याम ब्रजपुर में, धरहिं चले मोहन-बल आछे
‘सूरदास’ प्रभु दोउ जननि मिलिं, लेति बलाइ बोलि मुख बाँछे

Main Hari Charanan Ki Dasi

हरि की दासी
मैं हरि चरणन की दासी
मलिन विषय रस त्यागे जग के, कृष्ण नाम रस प्यासी
दुख अपमान कष्ट सब सहिया, लोग कहे कुलनासी
आओ प्रीतम सुन्दर निरुपम, अंतर होत उदासी
‘मीराँ’ के प्रभु गिरिधर नागर, चैन, नींद सब नासी

Charan Kamal Bando Hari Rai

वंदना
चरन-कमल बंदौं हरि राइ
जाकी कृपा पंगु गिरि लंघै, अंधे कौ सब कछु दरसाइ
बहिरो सुनै मूक पुनि बोलै, रंक चलै सिर छत्र धराइ
‘सूरदास’ स्वामी करुनामय, बार-बार बन्दौ तेहि पाइ

Baithe Hari Radha Sang

मुरली मोहिनी
बैठे हरि राधासंग, कुंजभवन अपने रंग
मुरली ले अधर धरी, सारंग मुख गाई
मनमोहन अति सुजान, परम चतुर गुन-निधान
जान बूझ एक तान, चूक के बजाई
प्यारी जब गह्यो बीन, सकल कला गुन प्रवीन
अति नवीन रूप सहित, तान वही सुनाई
‘वल्लभ’ गिरिधरनलाल, रीझ कियो अंकमाल
कहन लगे नन्दलाल, सुन्दर सुखदाई 

Hari Kilkat Jasumati Ki Kaniyan

माँ का स्नेह
हरि किलकत जसुमति की कनियाँ
मुख में तीनि लोक दिखराए, चकित भई नँद-रनियाँ
घर-घर आशीर्वाद दिवावति, बाँधति गरै बँधनियाँ
‘सूर’ स्याम की अद्भुत लीला, नहिं जानत मुनि जनियाँ

Suni Main Hari Aawan Ki

प्रतीक्षा
सुनी मैं हरि आवन की अवाज
महल चढ़ि चढ़ि देखूँ मोरी सजनी, कब आवे महाराज
दादुर मोर पपीहा बोलै, कोयल मधुरे साज
उमग्यो बदरा चहुँ दिस बरसे, दामिनि छोड़ी लाज
धरती रूप नवा नवा धरिया, इंद्र मिलन के काज
‘मीराँ’ के प्रभु गिरिधर नागर, बेग मिलो महाराज

Chadi Man Hari Vimukhan Ko Sang

प्रबोधन
छाड़ि मन, हरि-विमुखन को संग
जिनके संग कुमति उपजत है, परत भजन में भंग
कहा होत पय-पान कराए, विष नहिं तजत भुजंग
कागहिं कहा कपूर चुगाए, स्वान न्हवाए गंग
खर कौं कहा अरगजा-लेपन मरकट भूषन अंग
गज कौं कहा सरित अन्हवाए, बधुरि धरै वह ढंग
पाहन पतित बान नहिं बेधत, रीतो करत निषंग
‘सूरदास’ कारी कामरि पै, चढ़त न दूजौ रंग

Bhaj Le Pyare Hari Ka Nam

नाम स्मरण
भजले प्यारे हरि का नाम, इसमें लगे न कुछ भी दाम
कर न बुराई कभी किसी की, जप ले मन से हरि का नाम
नयनों से दर्शन हो हरि का, सुनों कान से प्रभु का गान
करो तीर्थ सेवन पैरों से, करो हाथ से समुचित दान
मन बुद्धि श्रद्धा से प्यारे, होय नित्य ही हरि का ध्यान
एकमात्र साधन यह कलि में, शास्त्र संत का यही विधान 

Hari Ko Herati Hai Nandrani

माँ का स्नेह
हरि को हेरति है नँदरानी
बहुत अबेर भई कहँ खेलत, मेरे साँरगपानी
सुनहति टेर, दौरि तहँ आये, कबके निकसे लाल
जेंवत नहीं बाबा तुम्हरे बिनु, वेगि चलो गोपाल
स्यामहिं ल्यायी महरि जसोदा, तुरतहिं पाँव पखारे
‘सूरदास’ प्रभु संग नंद के, बैठे हैं दोऊ बारे

Hari Tum Haro Jan Ki Pir

पीड़ा हरलो
हरि तुम हरो जन की भीर
द्रौपदी की लाज राखी, तुम बढ़ायो चीर
भक्त कारन रूप नरहरि, धर्यो आप सरीर
हरिणकस्यप मारि लीन्हौं, धर्यो नाहिं न धीर
बूड़तो गजराज राख्यौ, कियो बाहर नीर
दासी ‘मीराँ’ लाल गिरिधर, हरो म्हारी पीर