Kahi Main Aise Hi Mari Jeho

वियोग व्यथा
कहीं मैं ऐसै ही मरि जैहौं
इहि आँगन गोपाल लाल को कबहुँ कि कनियाँ लैहौं
कब वह मुख पुनि मैं देखौंगी, कब वैसो सुख पैंहौं
कब मोपै माखन माँगेगो, कब रोटी धरि दैंहौं
मिलन आस तन प्राण रहत है, दिन डस मारग चैहौं
जौ न ‘सूर’ कान्ह आइ हैं तो, जाइ जमुन धँसि जैहौं

Chaitanya Swarup Hi Atma Hai

आत्मानुभूति
चैतन्य स्वरूप ही आत्मा है
यह शुद्ध देह का शासक है, अन्तःस्थित वही शाश्वत है
आत्मा शरीर को मान लिया, मिथ्या-विचार अज्ञान यही
यह देह मांसमय अपवित्र और नाशवान यह ज्ञान सही है
इच्छाओं का तो अन्त नहीं, मन में जिनका होता निवास
मृग-तृष्णा के ही तो सदृश, मानव आखिर होता निराश
यह राग द्वेष से भरा हुआ, संसार स्वप्नवत् नहीं टिकता
अज्ञान निवृत जब हो जाये, सारा प्रपंच ही मिट जाता  

Jag Me Jiwat Hi Ko Nato

मोह माया
जग में जीवत ही को नातो
मन बिछुरे तन छार होइगो, कोउ न बात पुछातो
मैं मेरो कबहूँ नहिं कीजै, कीजै पंच-सुहातो
विषयासक्त रहत निसि –वासर, सुख सियारो दुःख तातो
साँच झूँट करि माया जोरी, आपन रूखौ खातो
‘सूरदास’ कछु थिर नहिं रहई, जो आयो सो जातो

Jiwan Bit Gaya Sab Yun Hi

शरणागति
जीवन बीत गया सब यूँ ही, भला न कुछ कर पाया
तेरी मेरी करके ही बस, सारा समय बिताया
कहीं हुआ सम्मान जरा तो, अहंकार मन आया
कितना बड़ा आदमी हूँ मैं, सोच व्यर्थ इठलाया
जड़ चेतन में तूँ ही तू है, फिर भी क्यों भरमाया
किया एक से राग, और दूजे को ठुकराया
जीवन की संध्या में समझा, व्यर्थ मोह सब माया
अपना कोई नहीं यहाँ पर, शरण आपकी आया

Patiyan Main Kaise Likhu Likhi Hi Na Jay

विरह व्यथा
पतियाँ मैं कैसे लिखूँ, लिखि ही न जाई
कलम धरत मेरो कर कंपत है, हियड़ो रह्यो घबराई
बात कहूँ पर कहत न आवै, नैना रहे झर्राई
किस बिधि चरण कमल मैं गहिहौं, सबहि अंग थर्राई
‘मीराँ’ के प्रभु गिरिधर नागर, बेगि मिल्यो अब आई

Jo Karna Ho Karlo Aaj Hi

वर्तमान
जो करना हो कर लो आज ही
अनुकूल समय का मत सोचो, मृत्यु का कुछ भी पता नहीं
चाहे भजन ध्यान या धर्म कार्य, इनमें विलम्ब हम नहीं करें
सत्कार्य जो सोचा हो मन में, कार्यान्वित वह तत्काल करे
वैभव नहिं शाश्वत, तन अनित्य, शुभ कर्मों में मन लगा रहे
कल करना हो वह आज करे, संभव शरीर कल नहीं रहे

Mero Man Ram Hi Ram Rate Re

नाम की महिमा
मेरो मन रामहि राम रटै रे
राम नाम जप लीजै प्राणी, कोटिक पाप कटे रे
जनम जनम के लेख पुराने, नामहि लेत फटे रे
कनक कटोरे अमृत भरियो, पीवत कौन नटे रे
‘मीराँ’ कहे प्रभु हरि अविनासी, तन-मन ताहि पटे रे

Trashna Hi Dukh Ka Karan Hai

तृष्णा
तृष्णा ही दुःख का कारण है
इच्छाओं का परित्याग करे, संतोष भाव आ जाता है
धन इतना ही आवश्यक है जिससे कुटंब का पालन हो
यदि साधु सन्त अतिथि आये, उनका भी स्वागत सेवा हो
जो सुलभ हमें सुख स्वास्थ्य कीर्ति, प्रारब्ध भोग इसको कहते
जो झूठ कपट से धन जोड़ा, फलस्वरूप अन्ततः दुख सहते
उसकी रक्षा की चिन्ता हो, कुछ भी तो साथ नहीं जाता
सत्कर्म किया हो जीवन में, सद्भाव काम में तब आता 

Din Yu Hi Bite Jate Hain Sumiran Kar Le Tu Ram Nam

नाम स्मरण
दिन यूँ ही बीते जाते हैं, सुमिरन करले तूँ राम नाम
लख चौरासी योनी भटका, तब मानुष के तन को पाया
जिन स्वारथ में जीवन खोया, वे अंत समय पछताते हैं
अपना जिसको तूँने समझा, वह झूठे जग की है माया
क्यों हरि का नाम बीसार दिया, सब जीते जी के नाते हैं
विषयों की इच्छा मिटी नहीं, ये नाशवान सुन्दर काया
गिनती के साँस मिले तुझको, जाने पे फिर नहीं आते हैं
सच्चे मन से सुमिरन कर ले, अब तक मूरख मन भरमाया
साधु-संगत करले ‘कबीर’, तो निश्चित ही तर जाते हैं

Din Vyartha Hi Bite Jate Hain

चेतावनी
दिन व्यर्थ ही बीते जाते हैं
जिसने मानव तन हमें दिया, उन करुणा निधि को भुला दिया
जीवन की संध्या वेला में हम ऐसे ही पछताते हैं
घर पुत्र मित्र हे भाई मेरा, माया में इतना उलझ गया
धन हो न पास, जर्जर शरीर, ये कोई काम न आते हैं
दुनियादारी गोरख धंधा, आकण्ठ इसी में डूब रहे
मृगतृष्णा सिवा न कुछ भी ये, केवल हमको भरमाते हैं
बचपन, यौवन, पागलपन में, अनमोल समय सब गँवा दिया
कर्तव्य विमुख हम बने रहे, अब क्या हो, सोच न पाते हैं
जिसके साधे सब सध जाते, यह सत्य अरे क्यों याद नहीं
शरणागत हो जा उन प्रभु के जो भक्तों को अपनाते हैं
हे मानव तुझे विवेक मिला, अब चेत समय जो बचा शेष
आर्तस्तव हो हरि कीर्तन कर, वे बेड़ा पार लगाते हैं