Kathinai Se Dhan Arjan Ho

सात्विक दान
कठिनाई से धन अर्जन हो, और दान कर पाये
धन का लोभ सदा ही रहता, त्याग कठिन हो जाये
याद रहे अधिकांश धर्म में व्यय हो, कमी न आये
कुएँ से जल जितना निकले, फिर से वह भर जाये
धन कमाय जो भी ईमान से, वह सात्विक कहलाये
कृषि एवं व्यवसाय से अर्जित, राजस श्रेणी पाये 

Rahte Ho Saath Nitya Prabhu Ji

पूजा
रहते हो साथ नित्य प्रभुजी, आठ प्रहर दिन रात ही
क्यों देख नहीं पाते तुमको, यह अचरज मुझको खलता ही
मैं बैठ के नित्य ही आसन पर, लेकर सामग्री हाथों में
पूजा करता हूँ विधिवत ही, तब भी दर्शन नहीं पाता मैं
आरती दीप से करता हूँ, स्तुति गान भी हूँ गाता
तब भी तुम क्यों न पिघलते हो, अनुभव भी नहीं मुझे होता
यह कैसा खेल तुम्हारा है, कुछ नहीं समझ में भी आता
लगता अभाव श्रद्धा का ही, जिसकी न पूर्णता कर पाता

Kahe Kanhaiya Bada Ho Gaya

गौचारण लीला
कहे कन्हैया बड़ा हो गया, सुन जसुमति हर्षाये
नेह नीर भर के नयनों में, लाला को समझाये
नटखट बालकृष्ण नहीं माने, नन्दराय मुसकाये
करा कलेवा ग्वाल-बाल सँग, वन को लाल पठाये
लिये लकुटिया हाथ, कामरी कंधे पर लटकाये
मोर-मुकुट सिर सोहे, कटि में पीत वसन लहराये
पावन अधिक आज वृन्दावन, मुरली मधुर सुनाये
सन्ध्या समय देर से लौटे, तब मैया अकुलाये
पचरंगी माला, मुख पे रज, ब्रज निहाल हो जाये

Ramanuj Lakshman Ki Jay Ho

श्री लक्ष्मण
रामानुज लक्ष्मण की जय हो
भगवान् राम के भक्तों का, सारे संकट को हरते हो
शेषावतार को लिये तुम्ही, पृथ्वी को धारण करते हो
हो प्राणनाथ उर्मिला के, सौमित्र तुम्हीं कहलाते हो
महान पराक्रमी, सत्-प्रतिज्ञ, रघुवर के काज सँवारते हो
मुनि विश्वामित्र, जनक राजा, श्री रामचन्द्र के प्यारे हो
अभिमान परशुरामजी का जो भी, तुम ही तो उसे मिटाते हो
अनुरक्त राम की सेवा में, दिन रात तुम्ही तो रहते हो

Kya Yagya Ka Uddeshya Ho

यज्ञ
क्या यज्ञ का उद्देश्य हो
दम्भ अथवा अहं हो नहीं, शुद्ध सेवा भाव हो
हो समर्पण भावना, अरु विश्व का कल्याण हो
इन्द्रिय-संयम भी रहे, अवशिष्ट भोगे यज्ञ में
शाकल्य का मंत्रों सहित, हो हवन वैदिक यज्ञ में
संयम रूपी अग्नि में, इन्द्रिय-सुखों का हवन हो
अध्यात्म की दृष्टि से केवल, शास्त्र का स्वाध्याय हो
इस भाँति ज्ञानाग्नि में साधक, अज्ञान की आहूति दे
आहार संयम भी रहे, तो यज्ञ-साधन मुक्ति दे
द्रव्यों से होता यज्ञ उससे, ज्ञान-यज्ञ ही श्रेष्ठ है
अज्ञान एवं अहं को, ज्ञानाग्नि करती नष्ट है

Chahe Puja Path Stavan Ho

कर्तव्य निष्ठा
चाहे पूजा पाठ स्तवन हो, सब नित्य कर्म के जैसा ही
मन में श्रद्धा तन्मयता हो, तब उपादेय होता वोही
हम आँखे खोल तनिक देखें, कुछ भला कार्य क्या कर पाये
बस माया मोह में फँसे रहे, दिन रात यूँ ही बीता जाये
पूजन में जो नहीं बसे देव तो उसे छोड़ कर गये कहाँ
जहाँ दीन हीन बसते किसान, जोते जमीन वे रहे वहाँ
गर्मी की तेज तपन में वे, जी तोड़ परिश्रम करते हैं
करते वे घोर तपस्या ही और दान अन्न का देते हैं
मैं समझ गया वे लोग सभी जो कर्मयोग अपनाते हैं
सत्कर्म करें निस्वार्थ जभी, प्रभु योग-क्षेम तब करते हैं

Kabhuk Ho Ya Rahni Rahongo

संत-स्वभाव
कबहुँक हौं या रहनि रहौंगो
श्री रघुनाथ कृपालु-कृपातें, संत स्वभाव गहौंगो
जथा लाभ संतोष सदा, काहू सों कछु न चहौंगो
परहित निरत निरंतर मन क्रम वचन नेम निबहौंगो
परिहरि देह जनित चिंता, दुख-सुख समबुद्धि सहौंगो
‘तुलसिदास’ प्रभुयहि पथ अविचल, रहि हरि-भगति लहौंगो

Jo Karna Ho Karlo Aaj Hi

वर्तमान
जो करना हो कर लो आज ही
अनुकूल समय का मत सोचो, मृत्यु का कुछ भी पता नहीं
चाहे भजन ध्यान या धर्म कार्य, इनमें विलम्ब हम नहीं करें
सत्कार्य जो सोचा हो मन में, कार्यान्वित वह तत्काल करे
वैभव नहिं शाश्वत, तन अनित्य, शुभ कर्मों में मन लगा रहे
कल करना हो वह आज करे, संभव शरीर कल नहीं रहे

Tu Dayalu Din Ho Tu Dani Ho Bhikhari

शरणागति
तू दयालु, दीन हौं, तू दानि, हौं भिखारी
हौं प्रसिद्ध पातकी, तू पाप – पुंज – हारी
नाथ तू अनाथ को, अनाथ कौन मोसो
मो समान आरत नहिं, आरतहर तोसो
ब्रह्म तू, हौं जीव, तू ठाकुर, हौं चेरो
तात, मात, गुरु, सखा तू, सब बिधि हितू मेरो
तोहि मोहिं नाते अनेक, मानियै जो भावै
ज्यों – त्यों ‘तुलसी’, कृपालु! चरन – सरन पावै

Tum Prem Ke Ho Ghanshyam

प्रेमवश प्रभु
तुम प्रेम के हो घनश्याम
गोपीजन के ऋणी बने तुम, राधा वल्लभ श्याम
शबरी के जूँठे फल खाये, सीतापति श्रीराम
लंका राज विभीषण पायो, राम भक्ति परिणाम
बंधन मुक्त करे निज जन को, जसुमति बाँधे दाम
गाढ़ी प्रीत करी ग्वालन संग, यद्यपि पूरम-काम
व्यंजन त्याग साग को भोजन, कियो विदुर के ठाम
राजसूय में जूँठ उठाई, प्रीति बढ़ाई श्याम
तंदुल लेकर दियो सुदामा, कंचन माणिक धाम
भज मन प्रेमनिधे उन प्रभु को, निशि दिन आठो याम