Janani Main Na Jiu Bin Ram

भरत की व्यथा
जननी मैं न जीऊँ बिन राम
राम लखन सिया वन को सिधाये, राउ गये सुर धाम
कुटिल कुबुद्धि कैकेय नंदिनि, बसिये न वाके ग्राम
प्रात भये हम ही वन जैहैं, अवध नहीं कछु काम
‘तुलसी’ भरत प्रेम की महिमा, रटत निरंतर नाम

Jay Jay Jag Janani Devi

पार्वती वन्दना
जय जय जग-जननि देवि, सुर-नर-मुनि-असुर-सेवी
भुक्ति-मुक्ति-दायिनि, भय-हरणि कालिका
मंगल-मुद-सिद्धि-सदनि, पर्व शर्वरीश-वदनि
ताप-तिमिर-तरुण-तरणि-किरण-पालिका
वर्म-चर्म कर कृपाण, शूल-शेल धनुष बाण
धरणि दलनि दानव दल रण करालिका
पूतना-पिशाच-प्रेत-डाकिनी-शाकिनि समेत
भूत-ग्रह-बेताल-खग-मृगाल-जालिका
जय महेश-भामिनी, अनेक रूप नामिनी
समस्त लोक स्वामिनी, हिम-शैल बालिका
रघुपति-पद-परम प्रेम, ‘तुलसी’ यह अचल नेम
देहु ह्वै प्रसन्न पाहि प्रणत-पालिका

Palna Syam Jhulavati Janani

पलना
पलना स्याम झुलावति जननी
अति अनुराग ह्रदय में, गावति, प्रफुलित मगन होति नँद घरनी
उमँगि- उमँगि प्रभु भुजा पसारत, हरषि जसोमति अंकम भरनी
‘सूरदास’ प्रभु मुदित जसोदा, पूरन भई पुरातन करनी

Janani Janki Jad Jivani Dhing Chyon Tum Aayi

श्री जानकी स्तुति
जननि जानकी! जड़ जीवनि ढिँग च्यौं तुम आयीं
च्यौं अति करुनामयी दुखद लीला दरसायीं
तब करुना के पात्र अज्ञ, जड़ जीव नहीं माँ
करुनावश ह्वै जगत हेतु, अति विपति सहीं माँ
हाय! कहाँ अति मृदुल पद, कहँ कंकड़युत पथ विकट
ह्वैकें अति प्रिय राम की, रहि न सकीं तिनके निकट

Jag Janani Radhika Ko Pranam

श्री राधा माहात्म्य
जगजननी राधिका को प्रणाम
सच्चिदानन्द विग्रह जिनका, लीला रस की वे दिव्य धाम
जो परमतत्व श्रीकृष्ण उन्हीं की, परम शक्ति हैं श्रीराधा
वे शक्तिमान की आत्मा ही, हर लें भक्तों की भव बाधा
जो सकल कलाओं की प्रसविनि, सुन्दरता की वे प्रतिमा हैं
भगवान कृष्ण के मन को वे मोहित आल्हादित करती हैं
श्री राधारानी हैं प्रकाश तो भुवन भास्कर माधव हैं
ज्योत्सना रूप तो श्रीराधा, वे पूर्णचन्द्र मुरलीधर हैं
एक ही स्वरूप दोनों का है, महिमा अनन्त राधाजी की
श्रीकृष्ण कृपा जिस पर होए, अनूभूति मिले प्रियाजी की

Shri Mahalakshmi Jag Janani Ka

श्रीमहालक्ष्मी स्तवन
श्री महालक्ष्मी जगजननी का, हम श्रद्धापूर्वक करें ध्यान
जिनका है वर्ण स्वर्ण जैसा, उनकी महिमा का करें गान
सद्भाव, अतिथि की सेवा हो, सत्कर्म जहाँ नित होता हो
देवार्चन-प्रेम भाव मन का, आवास वहीं हो माता का
माँ को अति प्रिय है शील सत्य, सत्संग कीर्तन जहाँ नित्य
जहाँ प्राणि-मात्र प्रति प्रेम भाव, वहाँ धन का नहीं होगा अभाव
जहाँ भोग, क्रूरता और क्लेश, दारिद्य वहाँ करता प्रवेश
व्यवहार कपट अरु वचन झूठ, महालक्ष्मी जाती वहाँ रूठ
सबके प्रति करुणा हो मन में, आस्तिकता श्रद्धा हो प्रभु में
करुणामयी मैया कृपा करो, कालुष्य हृदय का आप हरो