Prabhu Ji Main Jagat Dekh Bharmaya

भ्रम की दुनिया
प्रभुजी, मैं जगत् देख भरमाया
किया अनुग्रह आप ही ने तो तब तो मनुज योनी में आया
भूल गया उपकार किन्तु मैं, किया सदा मन भाया
घट-घट वासी आप ही स्वामी, तथ्य समझ में आया
तेरी मेरी करके फिर भी, यूँ ही समय बिताया
वैभव देख दूसरों का मन मेरा भी ललचाया
मोह-पाश में फँसा रहा मैं, दुर्गम प्रभु की माया
खूब सँवारी मैंने काया, सुन्दर महल बनाया
और लगाये बाग-बगीचे, फूला नहीं समाया
दुष्ट-बुद्धि ऐसा मैं भगवत्, हीरा-जनम गँवाया

Chalo Re Man Jamna Ji Ke Tir

यमुना का तीर
चलो रे मन जमनाजी के तीर
जमनाजी को निरमल पाणी, सीतल होत शरीर
बंसी बजावत गावत कान्हो, संग लिये बलबीर
मोर मुकुट पीताम्बर सोहे, कुण्डल झलकत हीर
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, चरण-कँवल पर सीर

Shyam Mohi Mat Tarsavo Ji

विरह व्यथा
श्याम मोहि मत तरसावोजी
तुम्हरे कारन सब सुख छोड्या, अब क्यूँ देर लगावोजी
विरह विथा लागी उर अंतर, सो तुम आय बुझावोजी
अब मत छोड़ो मोहि प्रभुजी, हँस कर तुरत बुलावोजी
‘मीराँ’ दासी जनम-जनम की, अंग से अंग मिलावोजी

Prabhu Ji Main To Tharo Hi Tharo

समर्पण (राजस्थानी)
प्रभुजी मैं तो थारो ही थारो
भलो बुरो जैसो भी हूँ मैं, पर हूँ तो बस थारो
बिगड्यो भी तो थारो बिगड्यो, थे ही म्हने सुधारो
म्हारी बात जाय तो जाये, नाम बिगड़ सी थारो
चाहे कहे म्हने तो बिगडी, विरद न रहसी थारो
जँचे जिस तरे करो नाथ, थे मारो चाहे तारो  

Chod Mat Jajo Ji Maharaj

म्हारी लाज
छोड़ मत जाजो जी महाराज
मैं अबला बल नाहिं गुसाईं, तुम मेरे सिरताज
मैं गुणहीन गुण नाहिं गुसाईं, तुम समरथ महाराज
थाँरी होय के किणरे जाऊँ, तुम हिवड़ा रा साज
मीराँ के प्रभु और न कोई, राखो म्हारी लाज

Swami Sab Sansar Ka Ji Sancha Shri Bhagwan

संसार के स्वामी
स्वामी सब संसार का जी, साँचा श्री भगवान
दान में महिमा थाँरी देखी, हुई हरि मैं हैरान
दो मुठ्ठी चावल की फाँकी, दे दिया विभव महान
भारत में अर्जुन के आगे, आप हुया रथवान
ना कोई मारे, ना कोई मरतो, यो कोरो अज्ञान
चेतन जीव तो अजर अमर है, गीताजी को ज्ञान
म्हारा पे प्रभु किरपा करजो, दासी अपणी जान
‘मीराँ’ के प्रभु गिरिधर नागर, चरण-कमल में ध्यान

Prabhu Ji Tumko Arpit Yah Jiwan

मेरी भावना
प्रभुजी! तुमको अर्पित यह जीवन
जीवन बीते सत्कर्मों में, श्रद्धा हो प्रभु की पूजा में
करो हृदय में ध्यान सदा, लगूँ नहीं कभी दुष्कर्मों में
इच्छा न जगे कोई मन में, प्रभु प्रेम-भाव से तृप्त रहूँ
सुख दुख आये जो जीवन में, प्रभु का प्रसाद में जान गहूँ
जो मात-पिता वे जीवन-धन, उनकी सेवा तन मन से हो
हर लो माया सद मोह सकल, प्रभु भक्ति-भाव मय जीवन हो  

Tori Savari Surat Nandlala Ji

साँवरी सूरत
तोरी साँवरी सुरत नन्दलालाजी
जमुना के तीरे धेनु चरावत, काली कामली वालाजी
मोर-मुकुट पीताम्बर शोभे, कुण्डल झलकत लालाजी
‘मीराँ’ के प्रभु गिरिधर नागर, भक्तन के प्रति पालाजी

Sanwara Mhari Prit Nibhajyo Ji

शरणागति
साँवरा म्हारी प्रीत निभाज्यो जी
थें छो सगला गुण रा सागर, म्हारा औगुण थे बिसराज्यो जी
लोक न धीजै, मन न पतीजै, मुखड़े शब्द सुणाज्यो जी
दासी थारी जनम-जनम री, म्हारै आँगण आज्यो जी
‘मीराँ’ के प्रभु गिरिधर नागर, बेड़ो पार लगाज्यो जी

Mano Mano Nand Ji Ke Lal

होली
मानो मानो नंदजी के लाल
चूनर, चोली भिगा दी सारी, डारो न और गुलाल
जमुना से जल भर मैं आई, तब भी करी ढिठाई
दौड़ के मोरी गगरी गिराई, कैसो कर दियो हाल
गीली चुनरिया सास लड़ेगी, ननँद साथ नहीं देगी
काहू भाँति नहीं बात बनेगी, नटखट करी कुचाल
नंदकुँवर खेली जो होरी, करी अधिक बरजोरी
एकटक निरख रहीं ब्रज बाल, आज तो कर दी उसे निहाल