The To Aarogo Ji Madan Gopal

दुग्ध अर्पण
थे तो आरोगोजी मदनगोपाल! कटोरो ल्याई दूध को भर्यो
दूधाजी दीनी भोलावण, जद में आई चाल
धोली गाय को दूध गरम कर, ल्याई मिसरी घाल
कईयाँ रूठ गया हो म्हारा नाथ! कटोरो….
कद ताई रूठ्या रोगा थे बोलो जी महाराज
दूध-कटोरो धर्यो सामने, पीवणरी काँई लाज
भूखा मरता तो चिप जासी थारा चिकणा गाल! कटोरो…
श्याम सलोना दूध आरोगो, साँची बात सुनाऊँ
बिना पियाँ यो दूध-कटोरो, पाछो ले नहीं जाऊँ
देस्यूँ साँवरिया चरणा में देही त्याग! कटोरो
करुण भरी विनती सुण प्रभुजी, लियो कटोरो हाथ
गट-गट दूध पिवण ने लाग्या, भक्त जणारा नाथ
थे तो राखो हो भगताँ री जाती लाज! कटोरो…

Prabhu Ji The To Chala Gaya Mhara Se Prit Lagay

पविरह व्यथा
प्रभुजी थें तो चला गया, म्हारा से प्रीत लगाय
छोड़ गया बिस्वास हिय में, प्रेम की बाती जलाय
विरह जलधि में छोड़ गया थें, नेह की नाव चलाय
‘मीराँ’ के प्रभु कब रे मिलोगे, तुम बिन रह्यो न जाय

Nand Rani Ji Ke Putra Hua

श्रीकृष्ण प्राकट्य
नन्दरानीजी के पुत्र हुआ
यह सुन करके ब्रज में सबके मन में भारी आनन्द हुआ
कई मनौतियाँ अरु पुण्यों के परिणाम रूप बेटा आया
तभी बधाई में दाई ने, मनचाहा रत्न हार पाया
गोप गोपियाँ सजे धजे, आशीष दे रहे लाला को
चिरजीवों यशोदा के लाल, परिपूर्ण कर दिया आशा को
डफ झाँझ लिये नाचे गावें, हल्दी से मिले हुवे दधि को
ग्वाले आपस में छिड़क रहे, दे रहे भेंट इक दूजे को
नन्दराय आज हैं अति प्रसन्न, जिसने जो माँगा उसे दिया
ब्रज में समृद्धि भरपूर हुई, कोई न पार इसका पाया

Mhane Chakar Rakho Ji

चाकर राखो
म्हाने चाकर राखोजी, गिरधारी म्हाने चाकर राखोजी
चाकर रहस्यूँ बाग लगास्यूँ, नित उठ दरसण पास्यूँ
वृन्दावन की कुंज गलिन में, थारी लीला गास्यूँ
चाकरी में दरसण पास्यूँ, सुमिरण पाऊँ खरची
भाव भगति जागीरी पास्यूँ, तीनूँ बाताँ सरसी
मोर मुकुट पीताम्बर सोहे, गल बैजन्ती माला
वृन्दावन में धेनु चरावे, मोहन मुरली वाला
हरे-हरे नित बाग लगास्यूँ बिच बिच राखूँ क्यारी
साँवरिया का दरसन पास्यूँ, पहर कसूँमल सारी
‘मीराँ’ के प्रभु गहर गंभीरा, हृदय धरोजी धीरा
आधी रात प्रभु दरसन दिजो, जमनाजी के तीरा

Prabhu Ji Tum Chandan Ham Paani

दास्य भक्ति
प्रभुजी! तुम चंदन हम पानी, जाकी अँग-अँग बास समानी
प्रभुजी! तुम घन वन हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा
प्रभुजी! तुम दीपक हम बाती, जाकी जोति बरे दिन राती
प्रभुजी! तुम मोती हम धागा, जैसे सोनहि मिलत सुहागा
प्रभुजी! तुम स्वामी हम दासा, ऐसी भक्ति करे ‘रैदासा’

Rana Ji Ab Na Rahungi Tori Hatki

वैराग्य
राणाजी! अब न रहूँगी तोरी हटकी
साधु-संग मोहि प्यारा लागै, लाज गई घूँघट की
पीहर मेड़ता छोड्यो अपनो, सुरत निरत दोउ चटकी
सतगुरु मुकर दिखाया घट का, नाचुँगी दे दे चुटकी
महल किला कुछ मोहि न चहिये, सारी रेसम-पट की
भई दिवानी ‘मीराँ’ डोलै, केस-लटा सब छिटकी

Prabhu Ji Tum Bhakton Ke Hitkari

भक्त-वत्सल भगवान
प्रभुजी तुम भक्तों के हितकारी
हिरणाकश्यप ने भक्त प्रहलाद को कष्ट दिया जब भारी
नरसिंह रूप लिये प्रभु प्रकटें, भक्तों के रखवारी
जभी ग्राह ने पकड़ा गज को, आया शरण तुम्हारी
सुन गुहार के मुक्त किया गज, भारी विपदा टारी
दुष्ट दुःशासन खींच रहा था, द्रुपद-सुता की साड़ी
दौड़े आये लाज बचाई, हे श्रीकृष्ण मुरारी
भई अहिल्या शिला शापवश, जो गौतम ऋषि नारी
चरण छुआ उद्धार किया था, दीर्घ आपदा टारी
पृथा-पुत्र के बने सारथी, कौरव-सेना हारी
करुणा सागर आओ आओ, राखो हमारी

Aao Manmohan Ji Jou Thari Baat

प्रतीक्षा
आओ मनमोहनाजी, जोऊँ थारी बाट
खान-पान मोहि नेक न भावै, नयनन लगे कपाट
तुम देख्या बिन कल न पड़त है हिय में बहुत उचाट
मीराँ कहे मैं भई रावरी, छाँड़ो नहीं निराट

Rana Ji Ruthe To Mharo Kai Karsi

गोविंद का गान
राणाजी रूठे तो म्हारो काई करसी, मैं तो गोविन्द का गुण गास्याँ
राणाजी भले ही वाँको देश रखासी, मैं तो हरि रूठ्याँ कठे जास्याँ
लोक लाज की काँण न राखाँ मैं तो हरि-कीर्तन करास्याँ
हरि-मंदिर में निरत करस्याँ, मैं तो घुँघरिया घमकास्याँ
चरणामृत को नेम हमारो, मैं तो नित उठ दरसण जास्याँ
‘मीराँ’ के प्रभु गिरिधर नागर, मैं तो भवसागर तिर जास्याँ

Prabhu Ji Main Jagat Dekh Bharmaya

भ्रम की दुनिया
प्रभुजी, मैं जगत् देख भरमाया
किया अनुग्रह आप ही ने तो तब तो मनुज योनी में आया
भूल गया उपकार किन्तु मैं, किया सदा मन भाया
घट-घट वासी आप ही स्वामी, तथ्य समझ में आया
तेरी मेरी करके फिर भी, यूँ ही समय बिताया
वैभव देख दूसरों का मन मेरा भी ललचाया
मोह-पाश में फँसा रहा मैं, दुर्गम प्रभु की माया
खूब सँवारी मैंने काया, सुन्दर महल बनाया
और लगाये बाग-बगीचे, फूला नहीं समाया
दुष्ट-बुद्धि ऐसा मैं भगवत्, हीरा-जनम गँवाया