Rana Ji Ab Na Rahungi Tori Hatki

वैराग्य
राणाजी! अब न रहूँगी तोरी हटकी
साधु-संग मोहि प्यारा लागै, लाज गई घूँघट की
पीहर मेड़ता छोड्यो अपनो, सुरत निरत दोउ चटकी
सतगुरु मुकर दिखाया घट का, नाचुँगी दे दे चुटकी
महल किला कुछ मोहि न चहिये, सारी रेसम-पट की
भई दिवानी ‘मीराँ’ डोलै, केस-लटा सब छिटकी

Prabhu Ji Tum Bhakton Ke Hitkari

भक्त-वत्सल भगवान
प्रभुजी तुम भक्तों के हितकारी
हिरणाकश्यप ने भक्त प्रहलाद को कष्ट दिया जब भारी
नरसिंह रूप लिये प्रभु प्रकटें, भक्तों के रखवारी
जभी ग्राह ने पकड़ा गज को, आया शरण तुम्हारी
सुन गुहार के मुक्त किया गज, भारी विपदा टारी
दुष्ट दुःशासन खींच रहा था, द्रुपद-सुता की साड़ी
दौड़े आये लाज बचाई, हे श्रीकृष्ण मुरारी
भई अहिल्या शिला शापवश, जो गौतम ऋषि नारी
चरण छुआ उद्धार किया था, दीर्घ आपदा टारी
पृथा-पुत्र के बने सारथी, कौरव-सेना हारी
करुणा सागर आओ आओ, राखो हमारी

Aao Manmohan Ji Jou Thari Baat

प्रतीक्षा
आओ मनमोहनाजी, जोऊँ थारी बाट
खान-पान मोहि नेक न भावै, नयनन लगे कपाट
तुम देख्या बिन कल न पड़त है हिय में बहुत उचाट
मीराँ कहे मैं भई रावरी, छाँड़ो नहीं निराट

Rana Ji Ruthe To Mharo Kai Karsi

गोविंद का गान
राणाजी रूठे तो म्हारो काई करसी, मैं तो गोविन्द का गुण गास्याँ
राणाजी भले ही वाँको देश रखासी, मैं तो हरि रूठ्याँ कठे जास्याँ
लोक लाज की काँण न राखाँ मैं तो हरि-कीर्तन करास्याँ
हरि-मंदिर में निरत करस्याँ, मैं तो घुँघरिया घमकास्याँ
चरणामृत को नेम हमारो, मैं तो नित उठ दरसण जास्याँ
‘मीराँ’ के प्रभु गिरिधर नागर, मैं तो भवसागर तिर जास्याँ

Prabhu Ji Main Jagat Dekh Bharmaya

भ्रम की दुनिया
प्रभुजी, मैं जगत् देख भरमाया
किया अनुग्रह आप ही ने तो तब तो मनुज योनी में आया
भूल गया उपकार किन्तु मैं, किया सदा मन भाया
घट-घट वासी आप ही स्वामी, तथ्य समझ में आया
तेरी मेरी करके फिर भी, यूँ ही समय बिताया
वैभव देख दूसरों का मन मेरा भी ललचाया
मोह-पाश में फँसा रहा मैं, दुर्गम प्रभु की माया
खूब सँवारी मैंने काया, सुन्दर महल बनाया
और लगाये बाग-बगीचे, फूला नहीं समाया
दुष्ट-बुद्धि ऐसा मैं भगवत्, हीरा-जनम गँवाया

Chalo Re Man Jamna Ji Ke Tir

यमुना का तीर
चलो रे मन जमनाजी के तीर
जमनाजी को निरमल पाणी, सीतल होत शरीर
बंसी बजावत गावत कान्हो, संग लिये बलबीर
मोर मुकुट पीताम्बर सोहे, कुण्डल झलकत हीर
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, चरण-कँवल पर सीर

Shyam Mohi Mat Tarsavo Ji

विरह व्यथा
श्याम मोहि मत तरसावोजी
तुम्हरे कारन सब सुख छोड्या, अब क्यूँ देर लगावोजी
विरह विथा लागी उर अंतर, सो तुम आय बुझावोजी
अब मत छोड़ो मोहि प्रभुजी, हँस कर तुरत बुलावोजी
‘मीराँ’ दासी जनम-जनम की, अंग से अंग मिलावोजी

Prabhu Ji Main To Tharo Hi Tharo

समर्पण (राजस्थानी)
प्रभुजी मैं तो थारो ही थारो
भलो बुरो जैसो भी हूँ मैं, पर हूँ तो बस थारो
बिगड्यो भी तो थारो बिगड्यो, थे ही म्हने सुधारो
म्हारी बात जाय तो जाये, नाम बिगड़ सी थारो
चाहे कहे म्हने तो बिगडी, विरद न रहसी थारो
जँचे जिस तरे करो नाथ, थे मारो चाहे तारो  

Chod Mat Jajo Ji Maharaj

म्हारी लाज
छोड़ मत जाजो जी महाराज
मैं अबला बल नाहिं गुसाईं, तुम मेरे सिरताज
मैं गुणहीन गुण नाहिं गुसाईं, तुम समरथ महाराज
थाँरी होय के किणरे जाऊँ, तुम हिवड़ा रा साज
मीराँ के प्रभु और न कोई, राखो म्हारी लाज

Swami Sab Sansar Ka Ji Sancha Shri Bhagwan

संसार के स्वामी
स्वामी सब संसार का जी, साँचा श्री भगवान
दान में महिमा थाँरी देखी, हुई हरि मैं हैरान
दो मुठ्ठी चावल की फाँकी, दे दिया विभव महान
भारत में अर्जुन के आगे, आप हुया रथवान
ना कोई मारे, ना कोई मरतो, यो कोरो अज्ञान
चेतन जीव तो अजर अमर है, गीताजी को ज्ञान
म्हारा पे प्रभु किरपा करजो, दासी अपणी जान
‘मीराँ’ के प्रभु गिरिधर नागर, चरण-कमल में ध्यान