Shivshankar Se Jo Bhi Mange

औढरदानी शिव
शिवशंकर से जो भी माँगे, वर देते उसको ही वैसा
औढरदानी प्रभु आशुतोष, दूजा न देव कोई ऐसा
कर दिया भस्म तो कामदेव, पर वर प्रदान करते रति को
वे व्यक्ति भटकते ही रहते, जो नहीं पूजते शंकर को
काशी में करे जो देह त्याग, निश्चित ही मुक्त वे हो जाते
महादेव अनुग्रह हो जिस पर, मनवांछित फल को वे पाते

Jo Kuch Bhi Milta Hai Hamko

सेवा धर्म
जो कुछ भी मिलता है हमको, उसमें सबका हिस्सा जान
उससे सुलभ हमें होएगी, निश्चित ही सुख शांति महान
विद्यादान करो अनपढ़ को,रोगी को औषधि का दान
वस्त्रहीन को वस्त्रदान दो, किन्तु न करो जरा अहसान
भूखे को तो भोजन देना, गृह विहीन को आश्रय दान
भूले को सन्मार्ग बता दो, सभी रूप ईश्वर का जान

Jo Param Shant Shri Lakshmikant

श्री नारायण स्तुति
जो परम शांत श्री लक्ष्मी-कांत, जो शेष-नाग पर शयन करें
वे पद्मनाभ देवाधिदेव, वे जन्म मरण का कष्ट हरें
है नील मेघ सम श्याम वर्ण, पीताम्बर जिनके कटि राजे
हे अंग सभी जिनके सुन्दर, शोभा पे कोटि मदन लाजे
ब्रह्मादि देव अरू योगी जन, जिनका हृदय में धरे ध्यान
वे कमल नयन सच्चिदानन्द, सब वेद-उपनिषद करें गान
वे शंख चक्र अरु, गदा पद्म, धारण करते कर कमलों में
मैं सादर उन्हें प्रणाम करूँ, जो नारायण जड़ चेतन में

Shivshankar Ka Jo Bhajan Kare

आशुतोष शिव
शिवशंकर का जो भजन करें, मनचाहा वर प्रभु से पाते
वे आशुतोष औढरदानी, भक्तों के संकट को हरते
जप में अर्जुन थे लीन जहाँ पर, अस्त्र-शस्त्र जब पाने को
दुर्योधन ने निशिचर भेजा, अर्जुन का वध करने को
मायावी शूकर रूप धरे, शीघ्र ही वहाँ पर जब आया
शिव ने किरात का रूप लिया, कुन्तीसुत समझ नहीं पाया
रण-कौशल द्वारा अर्जुन ने, जब शौर्य दिखाया शम्भु को
प्रभु सौम्य रूप धर प्रकट हुए, आश्चर्य हो गया अर्जुन को
दर्शन पाकर गिर गया पार्थ, तव आशुतोष के चरणों में
तो अस्त्र पाशुपत दिया उसे, जो चाहा था उसने मन में  

Jo Bhaje Hari Ko Sada

हरि-भजन
जो भजे हरि को सदा, सोई परमपद पायेगा
देह के माला तिलक अरुछाप नहीं कुछ काम के
प्रेम भक्ति के बिना नहीं, नाथ के मन भायेगा
दिल के दर्पण को सफा कर, दूर कर अभिमान को
शरण जा गुरु के चरण में, तो प्रभु मिल जायेगा
छोड़ दुनियाँ के मजे सब, बैठकर एकांत में
ध्यान धर हरि की छबि का, फिर जनम नहीं पायेगा
दृढ़ भरोसा करके मन में, जो जपे हरि नाम को
कहत ‘ब्रह्मानंद’ तब आवागमन मिट जायेगा

Jo Paanch Tatva Se Deh Bani

तत्व चिन्तन
जो पाँच तत्व से देह बनी, वह नाशवान ऐसा जानो
जीना मरना तो साथ लगा, एक तथ्य यही जो पहचानो
परमात्मा ही चेतन स्वरूप और जीव अंश उसका ही है
सच्चिदानंद दोनों ही तो, निर्गुण वर्णन इसका ही है
जैसे की सींप में रजत दिखे, मृगतृष्णा जल होता न सत्य
सम्पूर्ण जगत् ही मिथ्या है, माया का जादू जो असत्य

Aaj Jo Harihi N Shastra Gahau

भीष्म प्रतिज्ञा
आज जो हरिहिं न शस्त्र गहाऊँ
तौं लाजौं गंगा-जननी को, सांतनु-सुत न कहाऊँ
स्यंदन खंडि महारथ खंडौं, कपिध्वज सहित डुलाऊँ
इती न करो सपथ मोहिं हरि की, क्षत्रिय-गतिहि न पाऊँ
पांडव-दल सन्मुख हौं धाऊँ, सरिता रुधिर बहाऊँ
‘सूरदास’ रण-भूमि विजय बिनु, जियत न पीठ दिखाऊँ

Satsang Kare Jo Jivan Main

शिव स्तवन
सत्संग करे जो जीवन में, हो जाये बेड़ा पार
काशी जाये मधुरा जाये, चाहे न्हाय हरिद्वार
चार धाम यात्रा कर आये, मन में रहा विकार
बिन सत्संग ज्ञान नहीं उपजे, हो चाहे यत्न हजार
‘ब्रह्मानंद’ मिले जो सदगुरु, हो अवश्य उद्धार

Jo Pran Tyage Dharma Hit

प्राणोत्सर्ग
जो प्राण त्यागे धर्म हित, वह सद्गति को प्राप्त हो
सम्राट नामी थे दिलीप, गौ-नन्दिनी भयग्रस्त थी
दबोच रक्खा था उसे बली सिंह ने, संकट में थी
तब गौ की रक्षा हेतु से, महाराज बोले सिंह को
अपनी क्षुधा को शान्त कर, खा ले तूँ मेरी देह को
गौ कामधेनु की सुता थी, जिसको न डर था सिंह का
बोली तभी महाराज तुमको, सुख मिले सन्तान का
महाराज शिवि को गोद में, डर कर कबूतर आ गया
कुछ क्षणों में बाज उसको, मारने भी आ गया
बोला कि यह आहार मेरा, छोड़ दो राजन इसे
अपने ही तन का मांस, शिवि देने लगे तत्पर उसे
ये इन्द्र अग्नि देव ही थे, पक्षियों के रूप में
होकर प्रकट आशीष दी, वापस गये फिर स्वर्ग में

Gwalin Jo Dekhe Ghar Aay

माखन चोरी
ग्वालिन जो देखे घर आय
माखन खाय चुराय श्याम तब, आपुन रही छिपाय
भीतर गई तहाँ हरि पाये, बोले अपने घर मैं आयो
भूल भई, गोरस में चींटी, काढ़न में भरमायो
सुन-सुन वचन चतुर मोहन के, ग्वालिनि मुड़ मुसकानी
‘सूरदास’ प्रभु नटनागर की, सबै बात हम जानी