Aaj Jo Harihi N Shastra Gahau

भीष्म प्रतिज्ञा
आज जो हरिहिं न शस्त्र गहाऊँ
तौं लाजौं गंगा-जननी को, सांतनु-सुत न कहाऊँ
स्यंदन खंडि महारथ खंडौं, कपिध्वज सहित डुलाऊँ
इती न करो सपथ मोहिं हरि की, क्षत्रिय-गतिहि न पाऊँ
पांडव-दल सन्मुख हौं धाऊँ, सरिता रुधिर बहाऊँ
‘सूरदास’ रण-भूमि विजय बिनु, जियत न पीठ दिखाऊँ

Jo Janme Maharaj Nabhi Ki

श्री ऋषभदेव
जो जन्मे महाराज नाभि के, पुत्र रूप से
विष्णु ही थे जो कहलाये, ऋषभ नाम से
बड़े हुए तो किया अध्ययन वेदशास्त्र का
सौंपा तब दायित्व पिता ने राजकाज का
सुख देकर सन्तुष्ट किया, भलीभाँति प्रजा को
हुई इन्द्र को ईर्ष्या तो, रोका वर्षा को
ऋषभदेव ने वर्षा कर दी, योग शक्ति से
शची-पति लाज्जित हुए, सुता को व्याहा उनसे
वनवासी हो, अपनाया अवधूत वृत्ति को
रूप मनोहर किन्तु कोई दे गाली उनको
खाने कोई देता कुछ भी खा लेते वे
ईश्वरीय सामर्थ्य छिपाकर रहते थे वे
यद्यपि दिखते पागल जैसे, परमहंस थे
वन्दनीय उनका चरित्र, वे राजर्षि थे

Gwalin Jo Dekhe Ghar Aay

माखन चोरी
ग्वालिन जो देखे घर आय
माखन खाय चुराय श्याम तब, आपुन रही छिपाय
भीतर गई तहाँ हरि पाये, बोले अपने घर मैं आयो
भूल भई, गोरस में चींटी, काढ़न में भरमायो
सुन-सुन वचन चतुर मोहन के, ग्वालिनि मुड़ मुसकानी
‘सूरदास’ प्रभु नटनागर की, सबै बात हम जानी

Jo Kuch Hai Vah Parmeshwar Hai

तत्व चिंतन
जो कुछ है वह परमेश्वर है वे जगत् रूप प्रकृति माया
यदि साक्षी भाव से चिंतन हो मेरा पन तो केवल छाँया
हम करें समर्पण अपने को, उन परमपिता के चरणों में
और करें तत्व का जो विचार, सद्मार्ग सुलभ हो तभी हमें
जो तत्व मसि का महावाक्य ‘वह तूँ है’ उनके सिवा नहीं
ये ही तो आत्मनिवेदन है, तब जन्म मरण छुट जाय वहीं

Jo Tu Krishna Nam Dhan Dharto

नाम महिमा
जो तूँ कृष्ण नाम धन धरतो
अब को जनम आगिलो तेरो, दोऊ जनम सुधरतो
जन को त्रास सबै मिटि जातो, भगत नाँउ तेरो परतो
‘सूरदास’ बैकुण्ठ लोक में, कोई न फेंट पकरतो

Jo Dhanush Ban Dhare

श्रीराम स्तवन
जो धनुष-बाण धारे, कटि पीत वस्त्र पहने
वे कमल-नयन राघव, सर्वस्व हैं हमारे
वामांग में प्रभु के, माँ जानकी बिराजै
नीरद सी जिनकी आभा, आया शरण तुम्हारे
रघुनाथ के चरित का, कोई न पार पाये
यश-गान होता जिनका, रघुनाथ पाप हारी
शिव-धनुष जिसने तोड़ा, मिथिला से नाता जोड़ा
असुरों के जो विनाशक, रक्षा करें हमारी
श्रीराम, रामचन्द्र, श्री रामभद्र राघव
नामों को जो भी जपते, सुख शांति उनको देते
रावणारि, रामचन्द्र, लोकाभिराम रघुवर
नामों का घोष सुनकर यमदूत भाग जाते
स्तवन ‘राम-रक्षा-स्तोत्र’ का जो करते
श्रीराम रक्षा करते, सुख शांति उसको देते
वाल्मीकि रूप कोकिल भी, महिमा जिनकी गाते
हनुमान जिनके सेवक, भवनिधि से पार करते

Jo Lo Man Kamna N Chute

कामना का त्यचक्ष
जो लौं मन कामना न छूटै
तो कहा जोग जज्ञ व्रत कीन्हैं, बिनु कन तुस को कूटै
कहा असनान किये तीरथ के, राग द्वेष मन लूटै
करनी और कहै कछु औरे, मन दसहूँ दिसी टूटै
काम, क्रोध, मद, लोभ शत्रु हैं, जो इतननि सों छूटै
‘सूरदास’ तब ही तम नासै, ज्ञान – अगिनि झर फूटै

Jo Nishchal Bhakti Kare

शिव आराधना
जो निश्छल भक्ति करे उसको, भोले शम्भू अपना लेते
वे धारण करें रजोगुण को, और सृष्टि की रचना करते
होकर के युक्त सत्त्वगुण से, वे ही धारण पोषण करते
माया त्रिगुणों से परे प्रभु, शुद्ध स्वरूप स्थित होते
ब्रह्मा, विष्णु, अरु, रुद्र, रूप, सृष्टि, पालन,लय वहीं करें
हैं पूर्ण ब्रह्म प्रभु आशुतोष, अपराध हमारे क्षमा करें

Jo Sukh Braj Me Ek Ghari

ब्रज का सुख
जो सुख ब्रज में एक घरी
सो सुख तीनि लोक में नाहीं, धनि यह घोष पुरी
अष्ट सिद्धि नव निधि कर जोरे, द्वारैं रहति खरी
सिव-सनकादि-सुकादि-अगोचर, ते अवतरे हरी
धन्य धन्य बड़ भागिनि जसुमति, निगमनि सही परी
ऐसे ‘सूरदास’ के प्रभु को, लीन्हौ अंक भरी

Jo Param Shant Shri Lakshmikant

श्री नारायण स्तुति
जो परम शांत श्री लक्ष्मी-कांत, जो शेष-नाग पर शयन करें
वे पद्मनाभ देवाधिदेव, वे जन्म मरण का कष्ट हरें
है नील मेघ सम श्याम वर्ण, पीताम्बर जिनके कटि राजे
हे अंग सभी जिनके सुन्दर, शोभा पे कोटि मदन लाजे
ब्रह्मादि देव अरू योगी जन, जिनका हृदय में धरे ध्यान
वे कमल नयन सच्चिदानन्द, सब वेद-उपनिषद करें गान
वे शंख चक्र अरु, गदा पद्म, धारण करते कर कमलों में
मैं सादर उन्हें प्रणाम करूँ, जो नारायण जड़ चेतन में