Anant Guno Ke Jo Sagar

प्रभु संकर्षण वंदना
अनन्त गुणों के जो सागर, प्रभु संकर्षण को नमस्कार
मस्तक उनके जो हैं सहस्त्र, एक ही पर पृथ्वी का अधार
देवता असुर गन्धर्व, सिद्ध, मुनिगण भी पाये नहीं पार
एक कान में कुण्डल जगमगाय, शोभित है अंग पे नीलाम्बर
कर हल की मठू पर रखा हुआ, वक्ष:स्थल पे वैजन्ती हार
भगवान कृष्ण के अग्रज की लीला का मन में धरें ध्यान
जो गौर वर्ण बलराम प्रभु, हम को करुणा का करें दान

Prabhu Se Jo Sachcha Prem Kare

हरि-भक्ति
प्रभु से जो सच्चा प्रेम करे, भव-सागर को तर जाते हैं
हरिकथा कीर्तन भक्ति करे, अर्पण कर दे सर्वस्व उन्हें
हम एक-निष्ठ उनके प्रति हों, प्रभु परम मित्र हो जाते हैं
लाक्षागृह हो या चीर-हरण, या युद्ध महाभारत का हो
पाण्डव ने उनसे प्रेम किया, वे उनका काम बनाते है
हो सख्य-भाव उनसे अपना, करुणा-निधि उसे निभायेंगे
सुख-दुख की बात कहें उनसे, वे ही विपदा को हरते हैं  

Chahta Jo Param Sukh Tu

नाम जप
चाहता जो परम सुख तूँ, जाप कर हरिनाम का
परम पावन परम सुन्दर, परम मंगल धाम का
हैं सभी पातक पुराने, घास सूखे के समान
भस्म करने को उन्हें, हरि नाम है पावक महान
जाप करते जो चतुर नर, सावधानी से सदा
वे न बँधते भूलकर, यम-पाश दारुण में कदा
साथ मिलकर प्रेम से, हरिनाम करते गान वो
मुक्त होते मोह से, कर प्रेम-अमृत-पान वो

Mulyawan Yah Seekh Jo Mane

पुरुषार्थ
मूल्यवान यह सीख जो माने, भाग्यवान् वह व्यक्ति है
सत्कर्म करो बैठे न रहो, भगवद्गीता की उक्ति है
यह सृष्टि काल के वश में है, जो रुके नहीं चलती ही रहे
प्रमाद न हो गतिशील रहे, जीवन में जो भी समृद्धि चहे
सन्मार्ग चुनो शुभ कार्य करो, उत्तम जीवन का मर्म यही
जो यत्नशील रहता मनुष्य, प्रभु की सहाय का पात्र वही
निष्क्रियता तो मृत्यु सचमुच, रोगों से तब हम घिर जातें
जो सक्रिय हो, रहता प्रसन्न, उन्नतिशील वे ही होते

Jo Kamal Nayan Prasanna Vadan

श्रीराम स्तुति
जो कमल-नयन प्रसन्न वदन, पीताम्बर लंकृत श्रीराम
प्रभु असुर-निकंदन, हितकारी गो-द्विज के, राघव को प्रणाम
जिनकी माया के वशीभूत, यह जगत् सत्य लगता हमको
नौका हैं चरण कमल जिनके, भवसागर से तर जाने को
है अविनाशी घटघट वासी, इन्द्रियातीत सच्चिदानन्द
हे भव-भय-भंजन, मुनि-जन रंजन, लक्ष्मीपति करुणानिधि मुकुन्द
शारदा, शेष, सुर, ऋषिमुनि भी, यशगान आपका ही करते
हे सहज कृपालु श्री रामचन्द्र, जो प्राणी मात्र का दु:ख हरते 

Shivshankar Se Jo Bhi Mange

औढरदानी शिव
शिवशंकर से जो भी माँगे, वर देते उसको ही वैसा
औढरदानी प्रभु आशुतोष, दूजा न देव कोई ऐसा
कर दिया भस्म तो कामदेव, पर वर प्रदान करते रति को
वे व्यक्ति भटकते ही रहते, जो नहीं पूजते शंकर को
काशी में करे जो देह त्याग, निश्चित ही मुक्त वे हो जाते
महादेव अनुग्रह हो जिस पर, मनवांछित फल को वे पाते

Jo Karna Ho Karlo Aaj Hi

वर्तमान
जो करना हो कर लो आज ही
अनुकूल समय का मत सोचो, मृत्यु का कुछ भी पता नहीं
चाहे भजन ध्यान या धर्म कार्य, इनमें विलम्ब हम नहीं करें
सत्कार्य जो सोचा हो मन में, कार्यान्वित वह तत्काल करे
वैभव नहिं शाश्वत, तन अनित्य, शुभ कर्मों में मन लगा रहे
कल करना हो वह आज करे, संभव शरीर कल नहीं रहे

Shivshankar Ka Jo Bhajan Kare

आशुतोष शिव
शिवशंकर का जो भजन करें, मनचाहा वर प्रभु से पाते
वे आशुतोष औढरदानी, भक्तों के संकट को हरते
जप में अर्जुन थे लीन जहाँ पर, अस्त्र-शस्त्र जब पाने को
दुर्योधन ने निशिचर भेजा, अर्जुन का वध करने को
मायावी शूकर रूप धरे, शीघ्र ही वहाँ पर जब आया
शिव ने किरात का रूप लिया, कुन्तीसुत समझ नहीं पाया
रण-कौशल द्वारा अर्जुन ने, जब शौर्य दिखाया शम्भु को
प्रभु सौम्य रूप धर प्रकट हुए, आश्चर्य हो गया अर्जुन को
दर्शन पाकर गिर गया पार्थ, तव आशुतोष के चरणों में
तो अस्त्र पाशुपत दिया उसे, जो चाहा था उसने मन में  

Aaj Jo Harihi N Shastra Gahau

भीष्म प्रतिज्ञा
आज जो हरिहिं न शस्त्र गहाऊँ
तौं लाजौं गंगा-जननी को, सांतनु-सुत न कहाऊँ
स्यंदन खंडि महारथ खंडौं, कपिध्वज सहित डुलाऊँ
इती न करो सपथ मोहिं हरि की, क्षत्रिय-गतिहि न पाऊँ
पांडव-दल सन्मुख हौं धाऊँ, सरिता रुधिर बहाऊँ
‘सूरदास’ रण-भूमि विजय बिनु, जियत न पीठ दिखाऊँ

Jo Janme Maharaj Nabhi Ki

श्री ऋषभदेव
जो जन्मे महाराज नाभि के, पुत्र रूप से
विष्णु ही थे जो कहलाये, ऋषभ नाम से
बड़े हुए तो किया अध्ययन वेदशास्त्र का
सौंपा तब दायित्व पिता ने राजकाज का
सुख देकर सन्तुष्ट किया, भलीभाँति प्रजा को
हुई इन्द्र को ईर्ष्या तो, रोका वर्षा को
ऋषभदेव ने वर्षा कर दी, योग शक्ति से
शची-पति लाज्जित हुए, सुता को व्याहा उनसे
वनवासी हो, अपनाया अवधूत वृत्ति को
रूप मनोहर किन्तु कोई दे गाली उनको
खाने कोई देता कुछ भी खा लेते वे
ईश्वरीय सामर्थ्य छिपाकर रहते थे वे
यद्यपि दिखते पागल जैसे, परमहंस थे
वन्दनीय उनका चरित्र, वे राजर्षि थे