Udho Hot Kaha Samjhaye

हरि की याद
ऊधौ! होत कहा समुझाये
चित्त चुभी वह साँवरी मूरति, जोग कहाँ तुम लाए
पा लागौं कहियो हरिजू सों दरस देहु इक बेर
‘सूरदास’ प्रभु सों विनती करि यहै सुनैयो टेर

Kaha Sukh Braj Ko So Sansar

ब्रज-महिमा
कहाँ सुख ब्रज कौ सौ संसार
कहाँ सुखद बंसी-वट जमुना, यह मन सदा विचार
कहाँ बन धाम कहाँ राधा सँग, कहाँ संग ब्रज वाम
कहाँ विरह सुख बिन गोपिन सँग, ‘सूर’ स्याम मन साम

Kaha Kahati Tu Mohi Ri Mai

मनोवेग
कहा कहति तू मोहि री माई
नंदनँदन मन हर लियो मेरौ, तब तै मोकों कछु न सुहाई
अब लौं नहिं जानति मैं को ही, कब तैं तू मेरे ढ़िंग आई
कहाँ गेह, कहँ मात पिता हैं, कहाँ सजन गुरुजन कहाँ भाई
कैसी लाज कानि है कैसी, कहा कहती ह्वै ह्वै रिसहाई
अब तौ ‘सूर’ भजी नन्दलालै, के अपशय के होइ बड़ाई

Kaha Pardesi Ko Patiyaro

वियोग
कहापरदेसी कौ पतियारौ
प्रीति बढ़ाई चले मधुबन कौ, बिछुरि दियौ दुख भारौ
ज्यों जल-हीन मीन तरफत त्यौं, व्याकुल प्राण हमारौ
‘सूरदास’ प्रभु गति या ब्रज की, दीपक बिनु अँधियारौ

Shyam Ne Kaha Thagori Dari

श्याम की ठगौरी
स्याम ने कहा ठगोरी डारी
बिसरे धरम-करम, कुल-परिजन, लोक साज गई सारी
गई हुती मैं जमुना तट पर, जल भरिबे लै मटकी
देखत स्याम कमल-दल-लोचन, दृष्टि तुरत ही अटकी
मो तन मुरि मुसुकाए मनसिज, मोहन नंद-किसोर
तेहि छिन चोरि लियौ मन सरबस, परम चतुर चित-चोर

Kaha Karun Vaikuntha Hi Jaaye

ब्रज महिमा
कहा कँरू वैकुण्ठ ही जाये
जहाँ नहिं नंद जहाँ न जसोदा, जहाँ न गोपी ग्वाल न गायें
जहाँ न जल जमुना को निर्मल, जहँ नहिं मिले कदंब की छायें
जहाँ न वृन्दावन में मुरली वादन सबका चित्त चुराये
‘परमानंद’ प्रभु चतुर ग्वालिनि, व्रज तज मेरी जाय बलाये 

Jasoda Kaha Kahon Hon Baat

लाला की करतूत
जसोदा! कहा कहों हौं बात
तुम्हरे सुत के करतब मोसे, कहत कहे नहिं जात
भाजन फोरि, ढोलि सब गोरस, ले माखन-दधि खात
जो बरजौं तो आँखि दिखावै, रंचु-नाहिं सकुचात
और अटपटी कहलौं बरनौ, छुवत पान सौं गात
दास ‘चतुर्भुज’ गिरिधर-गुन हौं, कहति कहति सकुचात 

Mo Se Kaha Na Jay Kaha Na Jay

मोहन के गुण
मो से कहा न जाय, कहा न जाय,
मनमोहन के गुण सारे
अविनाशी घट घट वासी, यशुमति नन्द दुलारे
लाखों नयना दरस के प्यासे, वे आँखों के तारे
गोपियन के संग रास रचाये, मुरलीधर मतवारे
शरद पूर्णिमा की रजनी थी, रास रचायो प्यारे
उनके गुण सखि कितने गाऊँ, वे सर्वस्व हमारे