Moko Kahan Dhundhe Re Bande

आत्मज्ञान
मोको कहाँ ढूँढे रे बन्दे, मैं तो तेरे पास में
ना मंदिर में ना मस्जिद में, ना पर्वत के वास में
ना जप ताप में, ना ही योग में, ना मैं व्रत उपवास में
कर्म काण्ड में मैं नहीं रहता, ना ही मैं सन्यास में
खोज होय साँची मिल जाऊँ, इक पल की ही तलाश में
कहे ‘कबीर’ सुनो भाई साधो, मैं तो हूँ विश्वास में

Udho Kahan Sikhvo Yog

मोहन से योग
ऊधौ! कहा सिखावौ जोग
हमरो नित्य-जोग प्रियतम सौं, होय न पलक बियोग
वे ही हमरे मन मति सर्वस, वे ही जीवन प्रान
वे ही अंग-अंग में छाये, हमको इसका भान

Prabhu Ki Satta Hai Kahan Nahi

सर्व शक्तिमान्
प्रभु की सत्ता है कहाँ नहीं
घट घट वासी, जड़ चेतन में, वे सर्व रूप हैं सत्य सही
प्रतिक्षण संसार बदलता है, फिर भी उसमें जो रम जाये
जो नित्य प्राप्त परमात्म तत्व, उसका अनुभव नहीं हो पाये
स्थित तो प्रभु हैं कहाँ नहीं, पर आवृत बुद्धि हमारी है
मन, बुद्धि, इन्द्रियों से अतीत, लीला सब उनकी न्यारी है

Kahan Ke Pathik Kahan Kinh Hai Gavanwa

परिचय
कहाँ के पथिक कहाँ, कीन्ह है गवनवा
कौन ग्राम के, धाम के वासी, के कारण तुम तज्यो है भवनवा
उत्तर देस एक नगरी अयोध्या, राजा दशरथ जहाँ वहाँ है भुवानवा
उनही के हम दोनों कुँवरावा , मात वचन सुनि तज्यो है भवनवा
कौन सो प्रीतम कौन देवरवा ! साँवरो सो प्रीतम गौर देवरवा
‘तुलसिदास’ प्रभु आस चरन की मेरो मन हर लियो जानकी रमणवा

Jau Kahan Taji Charan Tumhare

रामाश्रय
जाऊँ कहाँ तजि चरन तुम्हारे
काको नाम पतित पावन जग, केहि अति दीन पियारे
कौनहुँ देव बड़ाइ विरद हित, हठि हठि अधम उधारे
खग मृग व्याध, पषान, विटप जड़यवन कवन सुर तारे
देव दनुज, मुनि, नाग, मनुज सब माया-विवश बिचारे
तिनके हाथ दास ‘तुलसी’ प्रभु, कहा अपुनपौ हारे

Kahan Lage Mohan Maiya Maiya

कहन-लागे-मोहन मैया मैया
नंद महर सौ बाबा-बाबा, अरु हलधर सौं भैया
ऊँचे चढ़ि चढ़ि कहति जसोदा, लै लै नाम कन्हैया
दूर खेलन जिनि जाहु लला रे, मारेगी कोउ गैया
गोपी-ग्वाल करत कौतूहल, घर घर बजति बधैया
‘सूरदास’ प्रभु तुम्हे दरस कौ, चरननि की बलि जैया

Mero Man Anat Kahan Sukh Pawe

अद्वितीय प्रेम
मेरो मन अनत कहाँ सुख पावै
जैसे उड़ि जहाज को पंछी, फिरि जहाज पर आवै
कमल नैन को छाड़ि महातम और दैव को ध्यावै
परम गंग को छाड़ि पियासों, दुर्मति कूप खनावै
जिहिं मधुकर अंबुज रस चाख्यौ, क्यों करील-फल खावै
‘सूरदास’ प्रभु कामधेनु तजि, छेरी कौन दुहावै

Mohi Taj Kahan Jat Ho Pyare

हृदयेश्वर श्याम
मोहि तज कहाँ जात हो प्यारे
हृदय-कुंज में आय के बैठो, जल तरंगवत होत न न्यारे
तुम हो प्राण जीवन धन मेरे, तन-मन-धन सब तुम पर वारे
छिपे कहाँ हो जा मनमोहन, श्रवण, नयन, मन संग तुम्हारे
‘सूर’ स्याम अब मिलेही बनेगी, तुम सरबस हो कान्ह हमारे