Khatir Kar Le Nai Gujarya

रसिया
खातिर कर ले नई गुजरिया, रसिया ठाड़ो तेरे द्वार
ठाड़ौ तेरे द्वार रसिया, ठाड़ौ तेरे द्वार
ये रसिया तेरे नित नहिं आवै, प्रेम होय तो दर्शन पावै,
अधरामृत को भोग लगावै, कर मेहमानी अब मत चूके समय न बारम्बार
हिरदे की चौकी कर हेली, नेह को चंदन लगा नवेली,
दीक्षा ले बनि जैयो चेली, पुतरिन पलँग बिछाय, पलक की करले बंद किंवार
जो कछु रसिया कहै सो करियो, सास ननद को डर परिहरियो,
सौलह कर बत्तीस पहरियो, दे दे दाम सूम की सम्पद, जीवन है दिन चार
सब ते तोड़ नेह की डोरी, जमना पार उतर चल गोरी,
निडर खेली कहियो होरी, श्याम रंग चढ़ जाये जा दिन, हो जाय बेड़ा पार

Thali Bhar Kar Lai Main Khicado

नैवेद्य अर्पण
थाली भरकर लाई मैं खीचड़ो, ऊपर घी की वाटकी
जीमो म्हारा कृष्ण कन्हाई, जिमावै बेटी जाट की
बापू म्हारो गाँव गयो है, न जाणे कद आवेगो
बाट देख बैठ्या रहणे से, भूखो ही रह जावेगो
आज जिमाऊँ थने खीचड़ो, काल राबड़ी छाछ की
जीमो म्हारा कृष्ण कन्हाई, जिमावें बेटी जाट की
बार-बार पड़दो मैं करती, बार-बार मैं खोलती
कईयाँ कोनी जीमे मोहन, कड़वी कड़वी बोलती
तूँ जीमें जद ही मैं जीमूँ, बात न कोई आँट की
जीमो म्हारा कृष्ण कन्हाई, जिमावे बेटी जाट की
पड़दो भूल गई साँवरिया, पड़दो फेर लगायोजी
काँबलिया की ओट बैठकर , श्याम खीचड़ो खायोजी
साँचो प्रेम प्रभु में होय तो, मूरति बोले काठ की
जीमो प्यारा कृष्ण-कन्हाई, जिमावे बेटी जाट की  

Din Dukhi Bhai Bahano Ki Seva Kar Lo Man Se

जनसेवा
दीन दुःखी भाई बहनों की सेवा कर लो मन से
प्रत्युपकार कभी मत चाहो, आशा करो न उनसे
गुप्त रूप से सेवा उत्तम, प्रकट न हो उपकार
बनो कृतज्ञ उसी के जिसने, सेवा की स्वीकार
अपना परिचय उसे न देना, सेवा जिसकी होए
सेवा हो कर्तव्य समझ कर, फ लासक्ति नहीं होए
परहित कर्म करो तन मन से, किन्तु प्रचार न करना
फलासक्ति को तज कर के, बस यही भाव मन रखना

Gwalin Kar Te Kor Chudawat

बालकृष्ण लीला
ग्वालिन कर ते कौर छुड़ावत
झूठो लेत सबनि के मुख कौ, अपने मुख लै नावत
षट-रस के पकवान धरे बहु, तामें रूचि नहिं पावत
हा हा करि करि माँग लेत हैं, कहत मोहि अति भावत
यह महिमा वे ही जन जानैं, जाते आप बँधावत
‘सूर’ श्याम सपने नहिं दरसत, मुनिजन ध्यान लगावत

Nav Se Kar Do Ganga Paar

केवट का मनोभाव
नाव से कर दो गंगा पार
भाग्यवान् मैं हूँ निषाद प्रभु लेऊ चरण पखार
जब प्रभु देने लगे मुद्रिका जो केवट का नेग
बोला केवट प्रभु दोनों की जाति ही भी तो एक
चरण कमल के आश्रित हूँ प्रभु करो न लोकाचार
भवसागर के आप हो केवट करना मुझको पार

Sobhit Kar Navneet Liye

बाल कृष्ण माधुर्य
सोभित कर नवनीत लिये
घुटुरुन चलत रेनु तन मंडित, मुख दधि लेप किये
चारू कपोल, लोल लोचन, गोरोचन तिलक दिये
लत लटकनि मनौ मत्त मधुप गन, माधुरि मधुहि पिये
कठुला कंठ वज्र के हरि नख, राजत रुचिर हिये
धन्य ‘सूर’ एकेउ पल यहि सुख, का सत् कल्प जियें

Prabhu Ko Prasanna Ham Kar Paye

श्रीमद्भागवत
प्रभु को प्रसन्न हम कर पाये
चैतन्य महाप्रभु की वाणी, श्री कृष्ण भक्ति मिल जाये
कोई प्रेम भक्ति के बिना उन्हें, जो अन्य मार्ग को अपनाये
सखि या गोपी भाव रहे, संभव है दर्शन मिल जाये
हम दीन निराश्रय बन करके, प्रभु प्रेमी-जन का संग करें
भगवद्भक्तों की पद-रज को, अपने माथे पर स्वतः धरें
यशुमति-नंदन श्री कृष्णचन्द्र, आराध्य परम एक मात्र यही
दुनिया के बंधन तोड़ सभी, हम वरण करें बस उनको ही
उत्कृष्ट ग्रन्थ श्रीमद्भागवत, सब शास्त्रों का है यही सार
हम पढ़ें, नित्य संकीर्तन हो, प्रभु भक्ति का उत्तम प्रकार

Mhari Sudh Kripa Kar Lijo

शरणागति
म्हारी सुध किरपा कर लीजो
पल पल ऊभी पंथ निहारूँ, दरसण म्हाने दीजो
मैं तो हूँ बहु ओगुणवाली, औगुण सब हर लीजो
मैं दासी थारे चरण-कँवल की, मिल बिछड़न मत कीजो
‘मीराँ’ के प्रभु गिरिधर नागर, हरि चरणाँ में लीजो

Bhagwan Radha Krishna Karuna Kar

प्रार्थना
भगवान् राधाकृष्ण करुणा कर मुझे अपनाइये
संसार-सागर में पड़ा, अविलम्ब आप बचाइये
धन बंधु बांधव मोह माया, जाल में हूँ मैं फँसा
आसक्ति से कर मुक्त, जीवन पर सुधा बरसाइये
प्रभु दोष मेरे अनगिनत, अपराध का भण्डार हूँ
गति हीन, साधन हीन के, सब क्लेश कष्ट निवारिये
मैं प्रिया प्रियतम राधिका श्री कृष्ण का चिन्तन करूँ
तन-मन वचन से आपका ही, हे शरण्य उबारिये
प्रभु दिव्य वृन्दावन-बिहारी के चरण में प्रार्थना
मुझ को बना कर दास अपना, विरुद आप निभाइये

Din Yu Hi Bite Jate Hain Sumiran Kar Le Tu Ram Nam

नाम स्मरण
दिन यूँ ही बीते जाते हैं, सुमिरन करले तूँ राम नाम
लख चौरासी योनी भटका, तब मानुष के तन को पाया
जिन स्वारथ में जीवन खोया, वे अंत समय पछताते हैं
अपना जिसको तूँने समझा, वह झूठे जग की है माया
क्यों हरि का नाम बीसार दिया, सब जीते जी के नाते हैं
विषयों की इच्छा मिटी नहीं, ये नाशवान सुन्दर काया
गिनती के साँस मिले तुझको, जाने पे फिर नहीं आते हैं
सच्चे मन से सुमिरन कर ले, अब तक मूरख मन भरमाया
साधु-संगत करले ‘कबीर’, तो निश्चित ही तर जाते हैं