Mhari Sudh Kripa Kar Lijo

शरणागति
म्हारी सुध किरपा कर लीजो
पल पल ऊभी पंथ निहारूँ, दरसण म्हाने दीजो
मैं तो हूँ बहु ओगुणवाली, औगुण सब हर लीजो
मैं दासी थारे चरण-कँवल की, मिल बिछड़न मत कीजो
‘मीराँ’ के प्रभु गिरिधर नागर, हरि चरणाँ में लीजो

Bhagwan Radha Krishna Karuna Kar

प्रार्थना
भगवान् राधाकृष्ण करुणा कर मुझे अपनाइये
संसार-सागर में पड़ा, अविलम्ब आप बचाइये
धन बंधु बांधव मोह माया, जाल में हूँ मैं फँसा
आसक्ति से कर मुक्त, जीवन पर सुधा बरसाइये
प्रभु दोष मेरे अनगिनत, अपराध का भण्डार हूँ
गति हीन, साधन हीन के, सब क्लेश कष्ट निवारिये
मैं प्रिया प्रियतम राधिका श्री कृष्ण का चिन्तन करूँ
तन-मन वचन से आपका ही, हे शरण्य उबारिये
प्रभु दिव्य वृन्दावन-बिहारी के चरण में प्रार्थना
मुझ को बना कर दास अपना, विरुद आप निभाइये

Din Yu Hi Bite Jate Hain Sumiran Kar Le Tu Ram Nam

नाम स्मरण
दिन यूँ ही बीते जाते हैं, सुमिरन करले तूँ राम नाम
लख चौरासी योनी भटका, तब मानुष के तन को पाया
जिन स्वारथ में जीवन खोया, वे अंत समय पछताते हैं
अपना जिसको तूँने समझा, वह झूठे जग की है माया
क्यों हरि का नाम बीसार दिया, सब जीते जी के नाते हैं
विषयों की इच्छा मिटी नहीं, ये नाशवान सुन्दर काया
गिनती के साँस मिले तुझको, जाने पे फिर नहीं आते हैं
सच्चे मन से सुमिरन कर ले, अब तक मूरख मन भरमाया
साधु-संगत करले ‘कबीर’, तो निश्चित ही तर जाते हैं

Mat Kar Itana Pyar Tu Tan Se

देह से प्रेम
मत कर इतना प्यार तू तन से, नहीं रहेगा तेरा
बहुत सँवारा इत्र लगाया, और कहे यह मेरा
बढ़िया भोजन नित्य कराया, वस्त्रों का अंबार
बचपन, यौवन बीत गया तब, उतरा मद का भार
पति, पत्नी-बच्चों तक सीमित था तेरा संसार
स्वारथ के साथी जिन पर ही, लूटा रहा सब प्यार
सब कुछ तो नश्वर इस जग में, कहता काल पुकार
तन, धन छोड़ा सभी यहाँ पर, पहुँचा यम के द्वार

Mat Kar Moh Tu Hari Bhajan Ko Man Re

भजन महिमा
मत कर मोह तू, हरि-भजन को मान रे
नयन दिये दरसन करने को, श्रवण दिये सुन ज्ञान रे
वदन दिया हरि गुण गाने को, हाथ दिये कर दान रे
कहत ‘कबीर’ सुनो भाई साधो, कंचन निपजत खान रे

Re Man Ram So Kar Preet

श्री राम भजो
रे मन राम सों कर प्रीत
श्रवण गोविंद गुण सुनो, अरु गा तू रसना गीत
साधु-संगत, हरि स्मरण से होय पतित पुनीत
काल-सर्प सिर पे मँडराये, मुख पसारे भीत
आजकल में तोहि ग्रसिहै, समझ राखौ चीत
कहे ‘नानक’ राम भजले, जात अवसर बीत 

Ham To Ek Hi Kar Ke Mana

आत्म ज्ञान
हम तो एक ही कर के माना
दोऊ कहै ताके दुविधा है, जिन हरि नाम न जाना
एक ही पवन एक ही पानी, आतम सब में समाना
एक माटी के लाख घड़े है, एक ही तत्व बखाना
माया देख के व्यर्थ भुलाना, काहे करे अभिमाना
कहे ‘कबीर’ सुनो भाई साधो, हम हरि हाथ बिकाना

Sandesha Shyam Ka Le Kar

गोपियों का वियोग
संदेशा, श्याम का लेकर, उधोजी ब्रज में आये हैं
कहा है श्यामसुन्दर ने गोपियों दूर मैं नहीं हूँ
सभी में आत्मवत् हूँ मैं, चेतना मैं ही सबकी हूँ
निरन्तर ध्यान हो मेरा, रखो मन पास में मेरे
वृत्तियों से रहित होकर, रहोगी तुम निकट मेरे
गोपियों ने कहा ऊधो, सिखाते योग विद्या अब
मिलें निर्गुण से कैसे हम, ज्ञान की व्यर्थ बातें सब
उधोजी! सुधा अधरों की पिलाई, हम को प्यारे ने
संग में रासलीला की, लगीं फिर बिलख कर रोने
कहा फिर श्याम की चितवन, सभी को वश में करतीं है
चुराया चित्त हम सबका, नहीं हम भूल सकतीं है
चढ़ाई सिर पे उद्धव ने, चरण-रज गोपियों की है
सुनाई श्याम को जाके, दशा जो गोपियों की है  

Are Man Kar Prabhu Par Vishvas

प्रभु का भरोसा
अरे मन कर प्रभु पर विश्वास
भटक रहा क्यों इधर-उधर तूँ, झूठे सुख की आस
सुन्दर देह सुहावनि नारी, सब विधि भोग-विलास
क्या पाया घरबार पुत्र से, मिटी न यम की त्रास
क्षण-भङ्गुर सब भोग निरंतर, बने काल के ग्रास
मिले परम सुख, घटे कभी नहिं, जिनके मन विश्वास

Kar Chintan Shri Krishna Ka

श्री राधाकृष्ण
कर चिन्तन श्रीकृष्ण का, राधावर का ध्यान
अमृत ही अमृत झरे, करुणा-प्रेम निधान
जप तप संयम दान व्रत, साधन विविध प्रकार
श्रीकृष्ण से प्रेम ही, निगमागम का सार
कृष्ण कृष्ण कहते रहो, अमृत-मूरि अनूप
श्रुति-शास्त्र का मधुर फल, रसमय भक्ति स्वरूप
श्रीराधा की भक्ति में निहित प्यास का रूप
आदि अन्त इसमें नहीं, आनन्द अमित अनूप
पद-सरोज में श्याम के, मन भँवरा तज आन
रहे अभी से कैद हो, अन्त समय नहीं भान
कृष्ण प्रिया श्री राधिके, राधा प्रिय घनश्याम
एक सहारा आपका, बंधा रहा नित काम
युगल माधुरी चित चढ़े, राधा-कृष्ण ललाम
हे करुणाकर वास दो, श्री वृन्दावन धाम
श्री वृन्दावन कुंज में, राधा-कृष्ण ललाम
क्रीड़ा नित नूतन करें, अद्वितीय अभिराम