Aaj Grah Nand Mahar Ke Badhai

जन्मोत्सव
आज गृह नंद महर के बधाई
प्रात समय मोहन मुख निरखत, कोटि चंद छवि छाई
मिलि ब्रज नागरी मंगल गावति, नंद भवन में आई
देति असीस, जियो जसुदा-सुत, कोटिन बरस कन्हाई
अति आनन्द बढ्यौ गोकुल में, उपमा कही न जाई
‘सूरदास’ छवि नंद की घरनी, देखत नैन सिराई

Hari Aawat Gaini Ke Pache

गो – चारण
हरि आवत गाइनि के पाछे
मोर-मुकुट मकराकृति कुंडल, नैन बिसाल कमल तैं आछे
मुरली अधर धरन सीखत हैं, वनमाला पीताम्बर काछे
ग्वाल-बाल सब बरन-बरन के, कोटि मदन की छबि किए पाछे
पहुँचे आइ स्याम ब्रजपुर में, धरहिं चले मोहन-बल आछे
‘सूरदास’ प्रभु दोउ जननि मिलिं, लेति बलाइ बोलि मुख बाँछे

Anant Guno Ke Jo Sagar

प्रभु संकर्षण वंदना
अनन्त गुणों के जो सागर, प्रभु संकर्षण को नमस्कार
मस्तक उनके जो हैं सहस्त्र, एक ही पर पृथ्वी का अधार
देवता असुर गन्धर्व, सिद्ध, मुनिगण भी पाये नहीं पार
एक कान में कुण्डल जगमगाय, शोभित है अंग पे नीलाम्बर
कर हल की मठू पर रखा हुआ, वक्ष:स्थल पे वैजन्ती हार
भगवान कृष्ण के अग्रज की लीला का मन में धरें ध्यान
जो गौर वर्ण बलराम प्रभु, हम को करुणा का करें दान

Tum Prem Ke Ho Ghanshyam

प्रेमवश प्रभु
तुम प्रेम के हो घनश्याम
गोपीजन के ऋणी बने तुम, राधा वल्लभ श्याम
शबरी के जूँठे फल खाये, सीतापति श्रीराम
लंका राज विभीषण पायो, राम भक्ति परिणाम
बंधन मुक्त करे निज जन को, जसुमति बाँधे दाम
गाढ़ी प्रीत करी ग्वालन संग, यद्यपि पूरम-काम
व्यंजन त्याग साग को भोजन, कियो विदुर के ठाम
राजसूय में जूँठ उठाई, प्रीति बढ़ाई श्याम
तंदुल लेकर दियो सुदामा, कंचन माणिक धाम
भज मन प्रेमनिधे उन प्रभु को, निशि दिन आठो याम

Bheje Man Bhawan Ke Uddhav Ke Aawan Ki

गोपियों की ललक
भेजे मन-भावन के उद्धव के आवन की,
सुधि ब्रज-गाँवनि में पावन जबैं लगी
कहैं, ‘रतनाकर’ गुवालिनि की झौरि-झौरि,
दौरि-दौरि नंद-पौरि आवन तबै लगीं
उझकि-उझकि पद-कंजनि के पंजनि पै,
पेखि-पेखि पाती छाती छोहनि छबै लगीं
हमकौं लिख्यौ है कहा, हमकौं लिख्यौ है कहा,
हमकौं लिख्यौ है कहा, कहन सबै लगीं

Kahu Ke Kul Hari Nahi Vicharat

भक्त के प्रति
काहू के कुल हरि नाहिं विचारत
अविगत की गति कही न परति है, व्याध अजामिल तारत
कौन जाति अरु पाँति विदुर की, ताही के हरि आवत
भोजन करत माँगि घर उनके, राज मान मद टारत
ऐसे जनम करम के ओछे, ओछनि ते व्यौहारत
यह स्वभाव ‘सूर’ के हरि कौ, भगत-बछल मन पारत

Chalo Re Man Jamna Ji Ke Tir

यमुना का तीर
चलो रे मन जमनाजी के तीर
जमनाजी को निरमल पाणी, सीतल होत शरीर
बंसी बजावत गावत कान्हो, संग लिये बलबीर
मोर मुकुट पीताम्बर सोहे, कुण्डल झलकत हीर
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, चरण-कँवल पर सीर

Om Ke Gayen Sab Mil Geet

ॐ वन्दना
ॐ के गायें सब मिल गीत
सकल सृष्टि आधार प्रणव है, धर्म कर्म का सार यही है
कण-कण इसमें, यह कण कण में, निराकार साकार यही है
सच्चिदानंदघन भी ये ही है, वेदों का भी जनक यही है
गायें गीत ॐ के जो जन, मन वांछित फल पाता है
जन्म मरण चक्कर से छूटे, भवसागर से तर जाता है

Tu Ga Le Prabhu Ke Geet

हरि भजन
तूँ गा ले प्रभु के गीत
दुनिया एक मुसाफिर खाना, जाना एक दिन छोड़ के
मात-पिता बंधु सुत पत्नी, सब से नाता तोड़ के
एक दिन ये सुन्दर घर तेरा मिट्टी में मिल जाएगा
तुझे अचानक ले जाने को, काल एक दिन आएगा
अब तो होश सँभालो प्यारे, व्यर्थ ही समय गँवाओ ना
हीरे जैसा नर तनु पाया, कोड़ी मोल लुटाओ ना

Mano Mano Nand Ji Ke Lal

होली
मानो मानो नंदजी के लाल
चूनर, चोली भिगा दी सारी, डारो न और गुलाल
जमुना से जल भर मैं आई, तब भी करी ढिठाई
दौड़ के मोरी गगरी गिराई, कैसो कर दियो हाल
गीली चुनरिया सास लड़ेगी, ननँद साथ नहीं देगी
काहू भाँति नहीं बात बनेगी, नटखट करी कुचाल
नंदकुँवर खेली जो होरी, करी अधिक बरजोरी
एकटक निरख रहीं ब्रज बाल, आज तो कर दी उसे निहाल