Chalat Lal Penjani Ke Chai

बालकृष्ण लीला
चलत लाल पैंजनि के चाइ
पुनि-पुनि होत नयौ-नयौ आनँद, पुनि पुनि निरखत पाँइ
छोटौ बदन छोटि यै झिंगुली, कटि किंकिनी बनाइ
राजत जंत्र हार केहरि नख, पहुँची रतन जराइ
भाल तिलक अरु स्याम डिठौना, जननी लेत बलाइ
तनक लाल नवनीत लिए कर, ‘सूरदास’ बलि जाइ

Main Giridhar Ke Ghar Jau

प्रगाढ़ प्रीति
मैं गिरिधर के घर जाऊँ
गिरिधर म्हाँरो साँचो प्रीतम, देखत रूप लुभाऊँ
रैन पड़ै तब ही उठ जाऊँ, भोर भये उठि आऊँ
रैन दिना वाके सँग खेलूँ, ज्यूँ त्यूँ ताहि रिझाऊँ
जो पहिरावै सोई पहिरूँ, जो दे सोई खाऊँ
मेरी उनकी प्रीति पुरानी, उन बिन पल न रहाऊँ
जहाँ बैठावे तितही बैठूँ, बेचे तो बिक जाऊँ
‘मीराँ’ के प्रभु गिरिधर नागर, बार बार बलि जाऊँ

Krishna Ghar Nand Ke Aaye Badhai Hai Badhai Hai

श्रीकृष्ण प्राकट्य
कृष्ण घर नंद के आये, बधाई है बधाई है
करो सब प्रेम से दर्शन, बधाई है बधाई है
भाद्र की अष्टमी पावन में प्रगटे श्याम मनमोहन
सुखों की राशि है पाई, बधाई है बधाई है
मुदित सब बाल, नर-नारी, चले ले भेंट हाथों में
देख शोभा अधिक हर्षित, बधाई है बधाई है
कृष्ण हैं गोद जननी के, खिल उठे हृदय पंकज दल
करें सब भेंट अति अनुपम, बधाई है बधाई है
सुर मुनि हुए हर्षित जो, बने थे ग्वाल अरु गोपी
परम आनन्द उर छाया, बधाई है बधाई है
बज उठी देव-दुंदुभियाँ, गान करने लगे किन्नर
स्वर्ग से पुष्प बरसाये, बधाई है बधाई है

Nirbal Ke Pran Pukar Rahe Jagdish Hare

जगदीश स्तवन
निर्बल के प्राण पुकार रहे, जगदीश हरे जगदीश हरे
साँसों के स्वर झंकार रहे, जगदीश हरे जगदीश हरे
आकाश हिमालय सागर में, पृथ्वी पाताल चराचर में
ये शब्द मधुर गुंजार रहे, जगदीश हरे जगदीश हरे
जब दयादृष्टि हो जाती है, जलती खेती हरियाती है
इस आस पे जन उच्चार रहे, जगदीश हरे जगदीश हरे
तुम हो करुणा के धाम सदा, शरणागत राधेश्याम सदा
बस मन में यह विश्वास रहे, जगदीश हरे जगदीश हरे

Samast Srushti Jis Ke Dwara

बुद्धियोग
समस्त सृष्टि जिसके द्वारा, सर्वात्मा ईश्वर एक वही
सब लोक महेश्वर शक्तिमान, सच्चिदानन्दमय ब्रह्म वही
जो कर्म हमारे भले बुरे, हो प्राप्त शुभाशुभ लोक हमें
उत्तम या अधम योनियाँ भी, मिलती हैं तद्नुसार हमें
हम शास्त्र विहित आचरण करें, शास्त्र निषिद्ध का त्याग करें
सांसारिक सुख सब नश्वर है, भगवत्प्राप्ति का यत्न करें
निष्काम कर्म समबुद्धि से, सेवा का व्रत, सद्गुण ये ही
प्रतिपादन करती गीताजी, जो बुद्धियोग वह मार्ग यही

Braj Ke Birahi Log Dukhare

वियोग
ब्रज के बिरही लोग दुखारे
बिन गोपाल ठगे से ठाढ़े, अति दुरबल तनु कारे
नन्द जसोदा मारग जोवत, नित उठि साँझ सकारे
चहुँ दिसि ‘कान्ह कान्ह’ करि टेरत, अँसुवन बहत पनारे
गोपी गाय ग्वाल गोसुत सब, अति ही दीन बिचारे
‘सूरदास’ प्रभु बिन यों सोभित, चन्द्र बिना ज्यों तारे

Main Giridhar Ke Rang Rati

गिरिधर के रंग
मैं गिरिधर के रंग राती
पचरँग चोला पहर सखी मैं, झिरमिट रमवा जाती
झिरमिट में मोहि मोहन मिलिग्यो, आनँद मंगल गाती
कोई के पिया परदेस बसत हैं, लिख-लिख भेजें पाती
म्हारे पिया म्हारे हिय में बसत हैं, ना कहुँ आती जाती
प्रेम भट्ठी को मैं मद पीयो, छकी फिरूँ दिन राती
‘मीराँ’ के प्रभु गिरिधर नागर, हरि चरणाँ चित लाती

Gayon Ke Hit Ka Rahe Dhyan

गो माता
गायों के हित का रहे ध्यान
गो-मांस करे जो भी सेवन, निर्लज्ज व्यक्ति पापों की खान
गौ माँ की सेवा पुण्य बड़ा, भवनिधि से करदे हमें पार
वेदों ने जिनका किया गान, शास्त्र पुराण कहे बार-बार
गौ-माता माँ के ही सदृश, वे दु:खी पर हम चुप रहते
माँ की सेवा हो तन मन से, भगवान कृष्ण को वह पाते

Prabal Prem Ke Pale Padkar

भक्त के भगवान्
प्रबल प्रेम के पाले पड़कर, प्रभु को नियम बदलते देखा
अपना मान भले टल जाये, भक्त का मान न टलते देखा
जिनके चरण-कमल कमला के, करतल से न निकलते देखा
उसको ब्रज करील कुंजन के, कण्टक पथ पर चलते देखा
जिनकी केवल कृपा दृष्टि से, सकल सृष्टि को पलते देखा
उनको गोकुल के गोरस पर, सौ-सौ बार मचलते देखा
शिव ब्रह्मा सनकादिक द्वारा जिनका ध्यान स्तवन देखा
उनको ग्वाल-सखा मण्डल में, लेकर गेंद उछलते देखा
जिसकी बंक-भृकुटि के भय से, सागर सप्त उबलते देखा
उन्हें यशोदा माँ के भय से, अश्रु-बिन्दु दृग ढलते देखा 

Ye Din Rusibe Ke Nahi

दर्शन की प्यास
ये दिन रूसिबै के नाहीं
कारी घटा पवन झकझोरै, लता तरुन लपटाहीं
दादुर, मोर, चकोर, मधुप, पिक, बोलत अमृत बानी
‘सूरदास’ प्रभु तुमरे दरस बिन, बैरिन रितु नियरानी