Aao Aao Shyam Hraday Ki Tapan Bujhao

हृदय की तपन
आओ आओ श्याम, हृदय की तपन बुझाओ
चरण कमल हिय धरो, शोक संताप नसाओ
यों कहि रोई फूटि-फूटि के, गोपी सस्वर
रहि न सके तब श्याम भये, प्रकटित तहँ सत्वर
मदन मनोहर वेष तैं, मनमथ के मनकूँ करत
प्रकटे प्रभु तिन मध्य में, शोक मोह हियको हरत

Sakhi Ri Achraj Ki Yah Baat

अचरज की बात
सखी री! अचरज की यह बात
निर्गुण ब्रह्म सगुन ह्वै आयौ, बृजमें ताहि नचात
पूरन-ब्रह्म अखिल भुवनेश्वर, गति जाकी अज्ञात
ते बृज गोप-ग्वाल सँग खेलत, बन-बन धेनु चरात
जाकूँ बेद नेति कहि गावैं, भेद न जान्यौ जात
सो बृज गोप-बधुन्ह गृह नित ही, चोरी कर दधि खात
शिव-ब्रह्मादि, देव, मुनि, नारद, जाकौ ध्यान लगात
ताकूँ बाँधि जसोदा मैया, लै कर छड़ी डरात  

Karo Ab Jaane Ki Taiyari

चेतावनी
करो अब जाने की तैयारी
साधु संत सम्राट भी जायें, जाते सब संसारी
देह तुम्हारी लगी काँपने, अंत काल की बारी
ईर्ष्या द्वेष अहं नहीं छूटे, उम्र बिता दी सारी
मोह जाल में फँसा रहे मन, वह है व्यक्ति अनारी
काम न आये कोई अन्ततः, फिर भी दुनियादारी
खाते, चलते सभी समय बस, जपलो कृष्ण मुरारी

Aarti Kije Hanuman Lala Ki

हनुमान आरती
आरती कीजै हनुमानलला की, दुष्टदलन रघुनाथ कला की
जाके बल से गिरिवर काँपे, रोग दोष जाके निकट न आवे
अंजनिपुत्र महा-बल दाई, संतन के प्रभु सदा सहाई
दे बीड़ा रघुनाथ पठाये, लंका जारि सीया सुधि लाये
लंका-सो कोट, समुद्र-सी खाई, जात पवनसुत बार न लाई
लंका जारि असुर संहारे, सीतारामजी के काज सँवारे
लक्ष्मण मूर्छित पड़े सकारे, आनि सजीवन प्रान उबारे
पैठि पताल तोरि जम-तारे, अहि रावन की भुजा उखारे
बायें भुजा असुर दल मारे, दाहिनी भुजा संत जन तारे
सुर नर मुनि आरती उतारे, जय जय जय हनुमान उचारे
कंचन थार कपूर लौ छाई, आरति करत अंजना माई
जो हनुमानजी की आरति गावै, बसि वैकुंठ परम पद पावै

Hari Kilkat Jasumati Ki Kaniyan

माँ का स्नेह
हरि किलकत जसुमति की कनियाँ
मुख में तीनि लोक दिखराए, चकित भई नँद-रनियाँ
घर-घर आशीर्वाद दिवावति, बाँधति गरै बँधनियाँ
‘सूर’ स्याम की अद्भुत लीला, नहिं जानत मुनि जनियाँ

Bheje Man Bhawan Ke Uddhav Ke Aawan Ki

गोपियों की ललक
भेजे मन-भावन के उद्धव के आवन की,
सुधि ब्रज-गाँवनि में पावन जबैं लगी
कहैं, ‘रतनाकर’ गुवालिनि की झौरि-झौरि,
दौरि-दौरि नंद-पौरि आवन तबै लगीं
उझकि-उझकि पद-कंजनि के पंजनि पै,
पेखि-पेखि पाती छाती छोहनि छबै लगीं
हमकौं लिख्यौ है कहा, हमकौं लिख्यौ है कहा,
हमकौं लिख्यौ है कहा, कहन सबै लगीं

Radha Ras Ki Khani Sarasta Sukh Ki Beli

श्री राधा
राधा रस की खानि, सरसता सुख की बेली
नन्दनँदन मुखचन्द्र चकोरी, नित्य नवेली
नित नव नव रचि रास, रसिक हिय रस बरसावै
केलि कला महँ कुशल, अलौकिक सुख सरसावै
यह अवनी पावन बनी, राधा पद-रज परसि के
जिह राज सुरगन इन्द्र अज, शिव सिर धारें हरषि के

Sarvatra Bramh Ki Satta Hi

ब्रह्ममय जगत्
सर्वत्र ब्रह्म की सत्ता ही
यह जगत् जीव के ही सदृश, है अंश ब्रह्म का बात यही
माया विशिष्ट हो ब्रह्म जभी, तब वह ईश्वर कहलाता है
ईश्वर, निमित्त व उपादान से दृश्य जगत् हो जाता है
जिस भाँति बीज में अंकुर है, उस भाँति ब्रह्म में जग भी है
सो जीव, सृष्टि, स्थिति व नाश, सब ही तो ब्रह्म के आश्रित है
यह जीव, जगत्, ईश्वर हमको, जो भिन्न दिखाई देते हैं
पर ब्रह्म ज्ञान हो जाने पर, ये भेद सभी मिट जाते हैं

Jaki Gati Hai Hanuman Ki

हनुमान आश्रय
जाकी गति है हनुमान की
ताकी पैज पूजि आई, यह रेखा कुलिस पषान की
अघटि-घटन, सुघटन-विघटन, ऐसी विरुदावलि नहिं आन की
सुमिरत संकट सोच-विमोचन, मूरति मोद-निधान की
तापर सानुकूल गिरिजा, शिव, राम, लखन अरु जानकी
‘तुलसी’ कपि की कृपा-विलोकनि, खानि सकल कल्यान की

Kishori Tere Charanan Ki Raj Pau

श्री श्री राधा महात्म्य
किशोरी तेरे चरणन की रज पाऊँ
बैठि रहौं कुंजन की कोने, श्याम राधिका गाऊँ
जो रज शिव सनकादिक लोचन, सो रज शीश चढाऊँ
राधा स्वामिनि की छवि निरखूँ, नित्य विमल यश गाऊँ
अद्वितीय सौन्दर्य तुम्हारा, मन-मंदिर बिठलाऊँ