Pragat Bhai Sobha Tribhuwan Ki

राधा प्राकट्य
प्रगट भई सोभा त्रिभुवन की, श्रीवृषभानु गोप के आई
अद्भुत रूप देखि ब्रजबनिता, रीझि – रीझि के लेत बलाई
नहिं कमला न शची, रति, रंभा, उपमा उर न समाई
जा हित प्रगट भए ब्रजभूषन, धन्य पिता, धनि माई
जुग-जुग राज करौ दोऊ जन, इत तुम, उत नँदराई
उनके मनमोहन, इत राधा, ‘सूरदास’ बलि जाई

Prabhu Ki Upaasana Nitya Kare

पूजन-अर्चन
प्रभु की उपासना नित्य करे
जो सत्य अलौकिक देव-भाव, जीवन में उनको यहीं भरे
मन बुद्धि को जो सहज ही में, श्री हरि की प्रीति प्रदान करे
भौतिक उपचारों के द्वारा, यह संभव होता निश्चित ही
पूजन होए श्रद्धापूर्वक, अनिष्ट मिटे सारे तब ही
पूजा का समापन आरती से, हरि भजन कीर्तन भी होए
तन्मयता से जब कीर्तन हो, प्रभु की अनुकम्पा को पाए 

Hari Tum Haro Jan Ki Pir

पीड़ा हरलो
हरि तुम हरो जन की भीर
द्रौपदी की लाज राखी, तुम बढ़ायो चीर
भक्त कारन रूप नरहरि, धर्यो आप सरीर
हरिणकस्यप मारि लीन्हौं, धर्यो नाहिं न धीर
बूड़तो गजराज राख्यौ, कियो बाहर नीर
दासी ‘मीराँ’ लाल गिरिधर, हरो म्हारी पीर

Vrandavan Ki Mahima Apaar

वृन्दावन महिमा
वृन्दावन की महिमा अपार, ऋषि मुनि देव सब गाते हैं
यहाँ फल फूलों से लदे वृक्ष, है विपुल वनस्पति और घास
यह गोप गोपियों गौओं का प्यारा नैसर्गिक सुख निवास
अपने मुख से श्रीकृष्ण यहाँ, बंशी में भरते मीठा स्वर
तो देव देवियाँ नर नारी, आलाप सुनें तन्मय होकर
सब गोपीजन को संग लिये, भगवान् कृष्ण ने रास किया
थी शरद् पूर्णिमा की रजनी, सबको हरि ने आह्लाद किया
श्रीकृष्ण-चरण से यह चिङ्घित, वृन्दावन मन में मोद भरे
वैकुण्ठ लोक तक पृथ्वी की, कीर्ति का यह विस्तार करे 

Aaj Sakhi Raghav Ki Sudhi Aai

स्मृति
आज सखि! राघव की सुधि आई
आगे आगे राम चलत है, पीछे लक्ष्मण भाई
इनके बीच में चलत जानकी, चिन्ता अधिक सताई
सावन गरजे भादों बरसे,पवन चलत पुरवाई
कौन वृक्ष तल भीजत होंगे, राम लखन दोउ भाई
राम बिना मोरी सूनी अयोध्या, लक्ष्मण बिन ठकुराई
सीता बिन मोरी सूनी रसोई, महल उदासी छाई

Mangal Aarti Divya Yugal Ki

युगल किशोर आरती
मंगल आरति दिव्य युगल की, मंगल प्रीति रीति है उनकी
मंगल कान्ति हँसनि दसनन की, मंगल मुरली मीठी धुन की
मंगल बनिक त्रिभंगी हरि की, मंगल चितवनि मृगनयनी की
मंगल सिर चंद्रिका मुकुट की, मंगल छबि नैननि में अटकी
मंगल शोभा पियरे पटकी, मंगल आभा नील-वसन की
मंगल आभा कमलनयन की, मंगल माधुरि मृदुल बैन की
मंगल छटा युगल अँग अंग की, मंगल क्रीड़ा जमुना तट की
मंगल चरन कमल दोउन की, मंगल करनि भक्ति हरिजन की
मंगल लीला प्रिया श्याम की, मंगल जुगल स्वरुप धाम की

Makhan Ki Chori Te Sikhe

चित चोर
माखन की चोरी तै सीखे, कारन लगे अब चित की चोरी
जाकी दृष्टि परें नँद-नंदन, फिरति सु मोहन के सँग भोरी
लोक-लाज, कुल कानि मेटिकैं, बन बन डोलति नवल-किसोरी
‘सूरदास’ प्रभु रसिक सिरोमनि, देखत निगम-बानि भई भोरी

Prabhu Ki Kaisi Sundar Riti

करुणामय प्रभु
प्रभु की कैसी सुन्दर रीति
विरुद निभाने के कारण ही पापीजन से प्रीति
गई मारने बालकृष्ण को, स्तन पे जहर लगाया
उसी पूतना को शुभगति दी, श्लाघनीय फल पाया
सुने दुर्वचन शिशुपाल के, द्वेषयुक्त जो मन था
लीन किया उसको अपने में, अनुग्रह तभी किया था
हरि चरणों में मूर्ख व्याध ने, भूल से बाण चलाया
करुणा-सागर है प्रभु ऐसे, स्वधाम उसे भिजवाया
कितने ही दुख पड़े झेलने, नाथ मुझे जीवन में
मानव देह आपने ही दी, भूलूँ कभी न मन में

Tan Ki Dhan Ki Kon Badhai

अन्त काल
तन की धन की कौन बड़ाई, देखत नैनों में माटी मिलाई
अपने खातिर महल बनाया, आपहि जाकर जंगल सोया
हाड़ जले जैसे लकरि की मोली, बाल जले जैसे घास की पोली
कहत ‘ कबीर’ सुनो मेरे गुनिया, आप मरे पिछे डूबी रे दुनिया

Vedon Ki Mata Gayatri

वेदमाता गायत्री
वेदों की माता गायत्री, सद्बुद्धि हमें कर दो प्रदान
महात्म्य अतुल महादेवी का, शास्त्र पुराण करते बखान
वरदायिनि देवी का विग्रह, ज्योतिर्मय रवि-रश्मि समान
ब्रह्मस्वरूपिणि, सर्वपूज्य, परमेश्वरी की महिमा महान
जो विद्यमान रवि-मण्डल में, उन आदि शक्ति को नमस्कार
अभिलाषा पूर्ण करें, जप लो, गायत्री-मंत्र महिमा अपार