Kahiya Jasumati Ki Aasis

वियोग
कहियो जसुमति की आसीस
जहाँ रहौ तहँ नंद – लाडिलौ, जीवौ कोटि बरीस
मुरली दई दोहनी घृत भरि ऊधौ धरि लई सीस
इह घृत तो उनही सुरभिन को, जो प्यारी जगदीस
ऊधौ चलत सखा मिलि आये, ग्वाल-बाल दस-बीस
अब के इहाँ ब्रज फेरि बसावौ, ‘सूरदास’ के ईस

Aao Aao Shyam Hraday Ki Tapan Bujhao

हृदय की तपन
आओ आओ श्याम, हृदय की तपन बुझाओ
चरण कमल हिय धरो, शोक संताप नसाओ
यों कहि रोई फूटि-फूटि के, गोपी सस्वर
रहि न सके तब श्याम भये, प्रकटित तहँ सत्वर
मदन मनोहर वेष तैं, मनमथ के मनकूँ करत
प्रकटे प्रभु तिन मध्य में, शोक मोह हियको हरत

Din Dukhi Bhai Bahano Ki Seva Kar Lo Man Se

जनसेवा
दीन दुःखी भाई बहनों की सेवा कर लो मन से
प्रत्युपकार कभी मत चाहो, आशा करो न उनसे
गुप्त रूप से सेवा उत्तम, प्रकट न हो उपकार
बनो कृतज्ञ उसी के जिसने, सेवा की स्वीकार
अपना परिचय उसे न देना, सेवा जिसकी होए
सेवा हो कर्तव्य समझ कर, फ लासक्ति नहीं होए
परहित कर्म करो तन मन से, किन्तु प्रचार न करना
फलासक्ति को तज कर के, बस यही भाव मन रखना

Sakhi Ri Achraj Ki Yah Baat

अचरज की बात
सखी री! अचरज की यह बात
निर्गुण ब्रह्म सगुन ह्वै आयौ, बृजमें ताहि नचात
पूरन-ब्रह्म अखिल भुवनेश्वर, गति जाकी अज्ञात
ते बृज गोप-ग्वाल सँग खेलत, बन-बन धेनु चरात
जाकूँ बेद नेति कहि गावैं, भेद न जान्यौ जात
सो बृज गोप-बधुन्ह गृह नित ही, चोरी कर दधि खात
शिव-ब्रह्मादि, देव, मुनि, नारद, जाकौ ध्यान लगात
ताकूँ बाँधि जसोदा मैया, लै कर छड़ी डरात  

Jewat Kanh Nand Ju Ki Kaniya

बालकृष्ण को जिमाना
जेंवत कान्ह नन्दजू की कनियाँ
कछुक खात कछु धरनि गिरावत, छबि निरखत नँद–रनियाँ
बरी, बरा, बेसन बहु भाँतिन, व्यंजन विविध अँगनियाँ
आपुन खात नंद-मुख नावत, यह सुख कहत न बनियाँ
आपुन खात खवावत ग्वालन, कर माखन दधि दोनियाँ
सद माखन मिश्री मिश्रित कर, मुख नावत छबि धनियाँ
जो सुख महर जसोदा बिलसति, सो नहिं तीन भुवनियाँ
भोजन करि अचमन जब कीन्हों, माँगत ‘सूर’ जुठनियाँ

Radha Ras Ki Khani Sarasta Sukh Ki Beli

श्री राधा
राधा रस की खानि, सरसता सुख की बेली
नन्दनँदन मुखचन्द्र चकोरी, नित्य नवेली
नित नव नव रचि रास, रसिक हिय रस बरसावै
केलि कला महँ कुशल, अलौकिक सुख सरसावै
यह अवनी पावन बनी, राधा पद-रज परसि के
जिह राज सुरगन इन्द्र अज, शिव सिर धारें हरषि के

Prabhu Ki Apaar Maya

शरणागति
प्रभु की अपार माया, जिसने जगत् रचाया
सुख दुःख का नजारा, कहीं धूप कहीं छाँया
अद्भुत ये सृष्टि जिसको, सब साज से सजाया
ऋषि मुनि या देव कोई, अब तक न पार पाया
सब ही भटक रहे है, दुस्तर है ऐसी माया
मुझको प्रभु बचालो, मैं हूँ शरण में आया

Sarvatra Bramh Ki Satta Hi

ब्रह्ममय जगत्
सर्वत्र ब्रह्म की सत्ता ही
यह जगत् जीव के ही सदृश, है अंश ब्रह्म का बात यही
माया विशिष्ट हो ब्रह्म जभी, तब वह ईश्वर कहलाता है
ईश्वर, निमित्त व उपादान से दृश्य जगत् हो जाता है
जिस भाँति बीज में अंकुर है, उस भाँति ब्रह्म में जग भी है
सो जीव, सृष्टि, स्थिति व नाश, सब ही तो ब्रह्म के आश्रित है
यह जीव, जगत्, ईश्वर हमको, जो भिन्न दिखाई देते हैं
पर ब्रह्म ज्ञान हो जाने पर, ये भेद सभी मिट जाते हैं

Pragat Bhai Sobha Tribhuwan Ki

राधा प्राकट्य
प्रगट भई सोभा त्रिभुवन की, श्रीवृषभानु गोप के आई
अद्भुत रूप देखि ब्रजबनिता, रीझि – रीझि के लेत बलाई
नहिं कमला न शची, रति, रंभा, उपमा उर न समाई
जा हित प्रगट भए ब्रजभूषन, धन्य पिता, धनि माई
जुग-जुग राज करौ दोऊ जन, इत तुम, उत नँदराई
उनके मनमोहन, इत राधा, ‘सूरदास’ बलि जाई

Udho Braj Ki Yad Satave

ब्रज की याद
ऊधो! ब्रज की याद सतावै
जसुमति मैया कर कमलन की, माखन रोटी भावै
बालपने के सखा ग्वाल, बाल सब भोरे भारे
सब कुछ छोड़ मोहिं सुख दीन्हौ, कैसे जाय बिसारे
ब्रज-जुवतिन की प्रीति -रीति की, कहा कहौं मैं बात
लोक-वेद की तज मरजादा, मो हित नित ललचात
आराधिका, नित्य आराध्या, राधा को लै नाम
चुप रहि गए, बोल नहिं पाए, परे धरनि हिय थाम