Sakhi Ri Sundarta Ko Rang

दिव्य सौन्दर्य
सखी री सुन्दरता को रंग
छिन-छिन माँहि परत छबि औरे, कमल नयन के अंग
स्याम सुभग के ऊपर वारौं, आली, कोटि अनंग
‘सूरदास’ कछु कहत न आवै, गिरा भई अति पंग

Karahu Man Nandnandan Ko Dhyan

प्रबोधन
करहुँ मन, नँदनंदन को ध्यान
येहि अवसर तोहिं फिर न मिलैगो, मेरो कह्यो अब मान
अन्तकाल की राह देख मत, तब न रहेगो भान
घूँघरवाली अलकैं मुख पर, कुण्डल झलकत कान
मोर-मुकुट अलसाने नैना, झूमत रूप निधान
दिव्य स्वरुप हृदय में धरले करहुँ नित्य प्रभु गान

Pahchan Le Prabhu Ko

परब्रह्म
पहचान ले प्रभु को, घट घट में जो है बसते
झूठे सभी है सारे, संसार के जो रिश्ते
जड़ हो कि या हो चेतन, सबमें वही तो बसते
प्रच्छन्न वे नहीं हैं, फिर भी न हमको दिखते
कस्तूरी नाभि में पर, मृग खोजता है वन में
सबके वही प्रकाशक, तूँ देख उनको मन में
वे प्रकृति वही पुरुष हैं, सृष्टि की वे ही शक्ति
वे ॐ द्वारा लक्षित, हो प्राप्त उनसे मुक्ति
जिनका न रूप कोई, हमको वही उबारे
गति सबकी, वे नियन्ता, सबके वही सहारे
अग्नि, धरा, पवन में, सागर, पहाड़ वन में
वे ही तो चराचर में, हर साँस में वही है
जिसने तुम्हें बनाया, उसने जगत् रचाया
उसमें ही तूँ भुलाया, यों उम्र जा रही है
भोगों को छोड़ प्यारे, अस्थिर है सब यहाँ पर
माया है तृष्णा ठगिनी, तुझको फँसा रही है
अब चेत जा तूँ प्यारे, जो नन्द के दुलारे
मन में उन्हें बसाले, पल का पता नहीं है

Sarva Pratham Ganapati Ko Puje

श्री गणेश स्तवन
सर्वप्रथम गणपति को पूजे, पश्चात् कार्य आरम्भ करें
जो सृष्टि के कर्ता-धर्ता, वे विपदाएँ तत्काल हरें
गजवदन विनायक एकदन्त जो, प्रगट भये सब हर्ष भरे
मुदित हुए पार्वति शिवशंकर, इन्द्र, अप्सरा नृत्य करें
वक्रतुण्ड लम्बोदर गणपति, निरख चन्द्रमा हँसी करे
शाप दियो तब चन्द्रदेव को, कलाहीन तत्काल करे
ॠद्धि-सिद्धि के बीच विराजै, चँवर डुलै आनन्द भरे
गुड़ के मोदक भोग सुहावै, मूषक की सवारी आप करें
‘ॐ गं गणपतये नमः’ मंत्र, जपने से सारे दोष जरे
सच्चिदानन्द गणपति ध्याये, निश्चित ही सारे काज सरे
पाशाकुंश मोदक वर-मुद्रा का, तन्मय होकर ध्यान धरें
अथर्वशीर्ष का पाठ करे नित, मनोकामना पूर्ण करें

Hari Ko Herati Hai Nandrani

माँ का स्नेह
हरि को हेरति है नँदरानी
बहुत अबेर भई कहँ खेलत, मेरे साँरगपानी
सुनहति टेर, दौरि तहँ आये, कबके निकसे लाल
जेंवत नहीं बाबा तुम्हरे बिनु, वेगि चलो गोपाल
स्यामहिं ल्यायी महरि जसोदा, तुरतहिं पाँव पखारे
‘सूरदास’ प्रभु संग नंद के, बैठे हैं दोऊ बारे

Kahe Ko Soch Kare Manwa Tu

कर्मयोग
काहे को सोच करे मनवा तूँ! होनहार सब होता प्यारे
मंत्र जाप से शांति मिले पर, विधि -विधान को कैसे टारे
कर्म किया हो जैसा तुमने, तदनुसार प्रारब्ध बना है
जैसी करनी वैसी भरनी, नियमबद्ध सब कुछ होना है
हरिश्चन्द्र, नल, राम, युधिष्ठिर, नाम यशस्वी दुनिया जाने
पाया कष्ट गये वो वन में, कर्म-भोग श्रुति शास्त्र बखाने
शत्रु मित्र हम अपने होते, प्रभु व्याप्त सब जड़ चेतन में
पाप जले बस कर्मयोग से, धर्माचरण करो जीवन में

Pujan Ko Giriraj Goverdhan

अन्नकूट उत्सव
पूजन को गिरिराज गोवर्धन चले नंद के लाल
कर श्रंगार सभी ब्रज नारी और गये सब ग्वाल
नंद यशोदा भी अति उत्सुक ले पूजा का थाल
गये पूजने गोवर्धन गिरि, तिलक लगाये भाल
भाँति भाँति के व्यंजन एवं फल भी विविध रसाल
एक ओर मनमोहन ने तब कर ली देह विशाल
गिरिवर रूप धरे आरोगत, व्यंजन प्रभु तत्काल
गायें गीत गोपियाँ मिलकर और बजे करताल

He Hari Nam Ko Aadhar

नाम स्मरण
है हरि नाम को आधार
और या कलिकाल नाहिन, रह्यो विधि ब्यौहार
नारदादि, सुकादि संकर, कियो यहै विचार
सकल श्रुति दधि मथत काढ्यो, इतो ही घृतसार
दसहुँ दिसि गुन करम रोक्यो, मीन को ज्यों जार
‘सूर’ हरि को सुजस गावत, जेहि मिटे भवभार

Chanchal Man Ko Vash Me Karna

मनोनिग्रह
चंचल मन को वश में करना
दृढ़ता से साधन अपनायें, पूरा हो यह सपना
भोगों में दुख दोष को देखें, तृष्णा मन की त्यागें
भाव रहे समता परहित का, राग द्वेष सब भागें
प्रभु के यश का करें कीर्तन, ध्यान मानसिक पूजा
शरणागत हो चरण-कमल में, भाव रहे नहीं दूजा
प्राणायाम करें नियम से, सद्ग्रन्थों को पढ़ना
साँस साँस की गति के संग में, प्रभु-नाम को जपना
हो विरक्त अभ्यास के द्वारा, जीत लिया जग जिसने
रहा न करना अब कुछ उसको, हरि को पाया उसने 

Pratham Gou Charan Ko Din Aaj

गौचारण
प्रथम गो-चारन को दिन आज
प्रातःकाल उठि जसुमति मैया, सुमन सजाये साज
विविध भाँति बाजे बाजत है, रह्यो घोष अति गाज
गोपीजन सब गीत मनोहर, गाये तज सब काज
लरिका सकल संग संकर्षण, वेणु बजाय रसाल
धेनू चराये बाल-कृष्ण-प्रभु, नाम धर्यो गोपाल