Yashoda Kaiso Lala Jayo

यशोदा के लाल
यशोदा कैसो लाला जायो
कोई कहे कुसुम अलसी सम, अन्जन अपर बतायो
कोई दुर्वा-वन सम शोभा, उत्पल द्युति कहि गायो
कोई कहे जनम नहिं याको, छिपि मधुबन तें आयो
कोई कहे ब्रह्मा को बाबा, वेदहु भेद न पायो
कैसो कहे कहत सकुचावत, नहिं हम दरशन पायो
गोविन्द गोकुल कुँवर गोपपति, गोपीश्वर कहलायो
कहा कहूँ कछु कहत न आवै, चरण कमल सिर नायो

Sakhi Lala Ke Mukh Pe Makkhan

माखन चोरी
सखि लाला के मुँह पे मक्खन, मैंने जब लगा हुआ पाया
भोलेपन से कुछ उत्तर दे, चित चुरा कन्हैया भाग गया
जिनके घर अब तक नहीं पहुँचा, लाला मक्खन चोरी करने
अति उत्कण्ठित वे गोपीजन, आ जाये वहीं उपकृत करने
वास्तव में हर ग्वालिन का मन, अटका रहता है मोहन में
वे उपालम्भ देने के मिस, जाती रहती नन्दालय में
मैया जब डाँटे लाला को, वह डरकर रोने लगता है
गोपियाँ बरजती यशुमति को, माँ का मन हल्का होता है

Maiya Ne Bandha Lala Ko

माखन चोर
मैया ने बाँधा लाला को
नहीं माखन की चोरी छोड़ी, तब उसका शिक्षा देने को
जसुमति तो बाँध नहीं पाई, थक करके आखिर बैठ गई
इतना कठोर यह काम किया मन में भारी वे पछताई
गोपीजन सुन दौड़ी आई हा हा कर सभी दुखी थीं
मैया से कान्हा स्वतः बंधे आंसू से भरी गोपियाँ थीं
बोली हमको आनँद आता जब माखन की चोरी करता
कान्हा जीता जसुमति हारी यह कृष्ण कन्हैया जग त्राता

Aarti Kije Hanuman Lala Ki

हनुमान आरती
आरती कीजै हनुमानलला की, दुष्टदलन रघुनाथ कला की
जाके बल से गिरिवर काँपे, रोग दोष जाके निकट न आवे
अंजनिपुत्र महा-बल दाई, संतन के प्रभु सदा सहाई
दे बीड़ा रघुनाथ पठाये, लंका जारि सीया सुधि लाये
लंका-सो कोट, समुद्र-सी खाई, जात पवनसुत बार न लाई
लंका जारि असुर संहारे, सीतारामजी के काज सँवारे
लक्ष्मण मूर्छित पड़े सकारे, आनि सजीवन प्रान उबारे
पैठि पताल तोरि जम-तारे, अहि रावन की भुजा उखारे
बायें भुजा असुर दल मारे, दाहिनी भुजा संत जन तारे
सुर नर मुनि आरती उतारे, जय जय जय हनुमान उचारे
कंचन थार कपूर लौ छाई, आरति करत अंजना माई
जो हनुमानजी की आरति गावै, बसि वैकुंठ परम पद पावै