Main Hari Patit Pawan Sune

पतित-पावन
मैं हरि पतित-पावन सुने
मैं पतित तुम पतित पावन दोइ बानक बने
व्याध, गनिका, गज, अजामिल, साखि निगमनि भने
और अधम अनेक तारे, जात कापै गने
जानि नाम अजानि लीन्हें, नरक सुरपुर मने
दास तुलसी सरन आयो, राखिये आपने

Mai Ri Main To Liyo Govind Mol

अनमोल गोविंद
माई री मैं तो लियो री गोविन्दो मोल
कोई कहै छाने, कोई कहै चोरी, लियो री बजंताँ ढोल
कोई कहै कारो, कोई कहै गोरो, लियो री अखियाँ खोल
कोई कहै महँगो कोई कहै सस्तो, लियो री अमोलक मोल
तन का गहणाँ सब ही दीना, दियो री बाजूबँद खोल
‘मीराँ’ के प्रभु गिरिधर नागर, पुरब जनम को कोल

Main Kase Kahun Koi Mane Nahi

पाप कर्म
मैं कासे कहूँ कोई माने नहीं
बिन हरि नाम जनम है विरथा, शास्त्र पुराण कही
पशु को मार यज्ञ में होमे, निज स्वारथ सब ही
इक दिन आय अचानक तुमसे, ले बदला ये ही
पाप कर्म कर सुख को चाहे, ये कैसे निबहीं
कहे ‘कबीर’ कहूँ मैं जो कछु, मानो ठीक वही

Ab Main Koun Upay Karu

असमंजस
अब मैं कौन उपाय करूँ
जेहि बिधि मनको संसय छूटै, भव-निधि पार करूँ
जनम पाय कछु भलो न कीन्हों, ताते अधिक डरूँ
गुरुमत सुन के ज्ञान न उपजौ, पसुवत उदर भरूँ
कह ‘नानक’ प्रभु बिरद पिछानौ, तब मैं पतित तरूँ 

Do Rupon Main Avtar Liya

नर नारायण स्तुति
दो रूपों में अवतार लिया नर नारायण को हम नमन करें
अंशावतार वे श्री हरि के, बदरीवन में तप वहीं करें
वक्षस्थल पर श्रीवत्स चिन्ह चौड़ा ललाट सुन्दर भौंहे
दोनों ही वेष तपस्वी में, मस्तक पर घनी जटा सोहें
तप से शंकित शचि पति प्रेरित, रति काम वहाँ पर जब आये
सामर्थ्य यही नारायण का, होकर परास्त वापस जाये
सब शास्त्र और सम्पूर्ण वेद, जिनकी महिमा को गाते हैं
नर नारायण का पूजन व ध्यान, उन परमात्मा का करते हैं
आदर्श यही मन के विकार, तप के द्वारा क्षय होते है
गीता का उपदेश पार्थ को श्रीकृष्ण तो देते है

Man Main Yah Rup Niwas Kare

युगल स्वरूप
मन में यह रूप निवास करे
दो गात धरे वह एक तत्व, अनुपम शोभा जो चित्त हरे
वृषभानु-सुता देवकी-नन्दन के अंगों का बेजोड़ लास्य
मधुरातिमधुर जिनका स्वरूप, अधरों पर उनके मंद हास्य
गल स्वर्णहार, बैजंति-माल, आल्हादिनि राधा मनमोहन
वृन्दावन में विचरण करते, वे वरदाता अतिशय सोहन
निमग्न रास क्रीड़ा में जो, रति कामदेव का गर्व हरे
आनन्द-कन्द सुषमा सागर, रे मनवा उनको क्यों न वरे
ऋषि मुनियों द्वारा वे सेवित, शिव ब्रह्मा उनका ध्यान धरे
जो प्राणनाथ गोपीजन के, उनके चरणों में नमन करे

Shyam Main Kaise Darshan Paun

दर्शन की चाह
श्याम! मैं कैसे दर्शन पाऊँ
दर्शन की उत्कट अभिलाषा और कहीं ना जाऊँ
पूजा-विधि भलीभाँति न जानूँ कैसे तुम्हें रिझाऊँ
माखन मिश्री का मैं प्रतिदिन, क्या मैं भोग लगाऊँ
गोपीजन-सा भाव न मुझमें, कैसे प्रीति बढ़ाऊँ
श्री राधा से प्रीति अनूठी, उनके गीत सुनाऊँ
तुम्हीं श्याम बतलाओ मुझको, क्या मैं भेंट चढ़ाऊँ
सारा खेल जगत् में तेरा, दर्शन किस विधि पाऊँ

Aaju Meri Vrandawan Main

दधि लूटन
आजु मेरी वृन्दावन में दधि लूटी
कहाँ मेरो हार कहाँ नक बेसर, कहाँ मोतियन लर टूटी
बरजो यशोदा श्यामसुंदर को, झपटत गगरी फूटी
‘सूरदास’ हेरि के जु मिलन को, सर्वस दे ग्वालिन छूटी

Main Giridhar Ke Ghar Jau

प्रगाढ़ प्रीति
मैं गिरिधर के घर जाऊँ
गिरिधर म्हाँरो साँचो प्रीतम, देखत रूप लुभाऊँ
रैन पड़ै तब ही उठ जाऊँ, भोर भये उठि आऊँ
रैन दिना वाके सँग खेलूँ, ज्यूँ त्यूँ ताहि रिझाऊँ
जो पहिरावै सोई पहिरूँ, जो दे सोई खाऊँ
मेरी उनकी प्रीति पुरानी, उन बिन पल न रहाऊँ
जहाँ बैठावे तितही बैठूँ, बेचे तो बिक जाऊँ
‘मीराँ’ के प्रभु गिरिधर नागर, बार बार बलि जाऊँ

Ram Nam Ke Bina Jagat Main

राम आसरा
राम नाम के बिना जगत में, कोई नहीं भाई
महल बनाओ बाग लगाओ, वेष हो जैसे छैला
इस पिजड़े से प्राण निकल गये, रह गया चाम अकेला
तीन मस तक तिरिया रोवे, छठे मास तक भाई
जनम जनम तो माता रोवे, कर गयो आस पराई
पाँच पचास बराती आये, ले चल ले चल होई
कहत ‘कबीर’ सुनो भाई साधो, यह गति तेरी होई