Aavat Mohan Dhenu Charay

गो-चारण
आवत मोहन धेनु चराय
मोर-मुकुट सिर, उर वनमाला, हाथ लकुटि, गो-रज लपटाय
कटि कछनी, किंकिन-धुनि बाजत, चरन चलत नूपुर-रव लाय
ग्वाल-मंडली मध्य स्यामघन, पीतवसन दामिनिहि लजाय
गोप सखा आवत गुण गावत, मध्य स्याम हलधर छबि छाय
सूरदास प्रभु असुर सँहारे, ब्रज आवत मन हरष बढ़ाय

Bhukh Lagi Hai Mohan Pyare

प्रेम के भूखे
भूख लगी है मोहन प्यारे
यज्ञ करे मथुरा में ब्राह्मण, जाओ उनके द्वारे
हाँ ना कुछ भी कहे न द्विज तो, चाह स्वर्ग की मन में
ग्वाल-बाल सब भूखे ही लोटे, घोर निराशा उन में
बोले हरि यों आस न छोड़ों अनुचित है यह राह
यज्ञ-पत्नियाँ जो कि वहाँ है, पूर्ण करेंगी चाह
भोजन की रुचिकर सामग्री लिये शीघ्र वे आई
सोचा ये सौभाग्य श्याम से मिलने को अकुलाई
यज्ञ-भोक्ता श्रीकृष्ण तो, हों प्रसन्न भक्ति से
पूर्ण हुआ संकल्प तुम्हारा, कहा श्याम ने उनसे  

Kahan Lage Mohan Maiya Maiya

कहन-लागे-मोहन मैया मैया
नंद महर सौ बाबा-बाबा, अरु हलधर सौं भैया
ऊँचे चढ़ि चढ़ि कहति जसोदा, लै लै नाम कन्हैया
दूर खेलन जिनि जाहु लला रे, मारेगी कोउ गैया
गोपी-ग्वाल करत कौतूहल, घर घर बजति बधैया
‘सूरदास’ प्रभु तुम्हे दरस कौ, चरननि की बलि जैया

Mohan Ne Murali Adhar Dhari

मुरली का जादू
मोहन ने मुरली अधर धरी
वृन्दावन में ध्वनि गूंज रही, सुन राधे-स्वर सब मुग्ध हुए
कोई न बचा इस जादू से, सबके मन इसने चुरा लिए
जड़ भी चैतन्य हुए सुन कर, उन्मत्त दशा पशु पक्षी की
जल प्रवाह कालिन्दी में रुक गया, कला ये वंशी की
गोपीजन की गति तो विचित्र, वे उलट-पलट धर वस्त्र आज
चल पड़ी वेग से मिलने को, प्यारे से तज संकोच लाज
अधरामृत पीकर मोहन का, वंशी इतनी इतराती है
सखि! नाम हमारा ले उसमें, सौतन बन हमें बुलाती है
अधरों पर धर वंशी में श्याम, जब भी भरते हैं विविध राग
ऋषि, मुनि, योगी मोहित होते, टूटे समाधि मिटता विराग

Bal Mohan Dou Karat Biyaru

बल मोहन
बल मोहन दोऊ करत बियारू, जसुमति निरख जाय बलिहारी
प्रेम सहित दोऊ सुतन जिमावत, रोहिणी अरु जसुमति महतारी
दोउ भैया साथ ही मिल बैठे, पास धरी कंचन की थारी
आलस कर कर कोर उठावत, नयनन नींद झपक रही भारी
दोउ जननी आलस मुख निरखत, तन मन धन कीन्हों बलिहारी
बार बार जमुहात ‘सूर’ प्रभु, यह छबि को कहि सके बिचारी

Sakhi Mohan Sang Mouj Karen

फागुन का रंग
सखि, मोहन सँग मौज करें फागुन में
मोहन को घरवाली बना के, गीत सभी मिल गाएँ री, फागुन में
पकड़ श्याम को गलियन डोलें, ताली दे दे नाच नचाएँ
मस्ती को कोई न पार आज, फागुन में
हम रसिया तुम मोहन गोरी, कैसी सुन्दर बनी रे जोरी
जोरी को नाच नचाओ रे, फागुन में
करे आज मनमानी तुमसे, कुछ न कहोगे फिर भी हमसे
वरना तो होगी, बरजोरी फागुन में
करे आज मनमानी तुमसे, कुछ न कहोगे फिर भी हमसे
वरना तो होगी, बरजोरी फागुन में

Mohan Kahe Na Ugilow Mati

लीला
मोहन काहे न उगिलौ माटी
बार-बार अनरुचि उपजावति, महरि हाथ लिये साँटी
महतारी सौ मानत नाहीं, कपट चतुरई ठाटी
बदन उघारि दिखायौ आपनो, नाटक की परिपाटी
बड़ी बेर भई लोचन उघरे, भरम जवनिका फाटी
‘सूर’ निरखि नंदरानि भ्रमति भई, कहति न मीठी खाटी

Sakhi Sapane Mohan Aaye

ब्रज की स्मृति
सखि, सपने में मनमोहन आये
बड़े दुखी है मथुरा में वे, कोई तो समझाये
टप टप आँसू गिरें नयन से, घूम रहे उपवन में
नहीं सँभाल पाते अपने को, व्याकुलता है मन में
कहते प्राणेश्वरी राधिके, निश दिन रहूँ उदास
लोग भले ही कहें यहाँ सुख, झूठ-मूठ विश्वास
तेरे बिना एक पल भी तो, कहाँ चैन है प्यारी
टूट गया राधा का सपना, प्रियतम कातर भारी  

Mohan Lalpalne Jhule Jasumati Mat Jhulave Ho

झूला
मोहनलाल पालने झूलैं, जसुमति मात झुलावे हो
निरिख निरखि मुख कमल नैन को, बाल चरित जस गावे हो
कबहुँक सुरँग खिलौना ले ले, नाना भाँति खिलाये हो
चुटकी दे दे लाड़ लड़ावै, अरु करताल बजाये हो
पुत्र सनेह चुचात पयोधर, आनँद उर न समाये हो
चिरजीवौ सुत नंद महर को, ‘सूरदास’ हर्षाये हो

Mohan Jagi Ho Bali Gai

प्रभाती
मोहन जागि, हौं बलि गई
तेरे कारन श्याम सुन्दर, नई मुरली लई
ग्वाल बाल सब द्वार ठाड़े, बेर बन की भई
गय्यन के सब बन्ध छूटे, डगर बन कौं गई
पीत पट कर दूर मुख तें, छाँड़ि दै अलसई
अति अनन्दित होत जसुमति, देखि द्युति नित नई
जगे जंगम जीव पशु खग, और ब्रज सबई
‘सूर’ के प्रभु दरस दीजै, अरुन किरन छई