Shyam Binu Rahyo Na Jay

विरह व्यथा
स्याम बिनु रह्यो न जाय
खान पानमोहि फीको लागे, नैणा रहे मुरझाय
बार बार मैं अरज करूँ छूँ, रैण गई दिन जाय
‘मीराँ’ कहे हरि तुम मिलिया बिन, तरस तरस तन जाय

Rasna Kyon Na Ram Ras Piti

राम रसपान
रसना क्यों न राम रस पीती
षट-रस भोजन पान करेगी, फिर रीती की रीती
अजहूँ छोड़ कुबान आपनी, जो बीती सो बीती
वा दिन की तू सुधि बिसराई, जा दिन बात कहीती
जब यमराज द्वार आ अड़िहैं, खुलिहै तब करतूती
‘रूपकुँवरि’ मन मान सिखावन, भगवत् सन कर प्रीती 

Kuch Lena Na Dena Magan Rahna

आत्मानंद
कछु लेना न देना मगन रहना
पाँच तत्त्व का बना पींजरा, जामे बोलत मेरी मैना
गहरी नदिया नाव पुरानी, केवटिया से मिले रहना
तेरा पीया तेरे घट में बसत है, सखी खोल कर देखो नैना
कहत ‘कबीर’ सुनो भाई साधो, गुरु-चरण में लिपट रहना

Deh Dhara Koi Subhi Na Dekha

दुःखी दुनिया
देह धरा कोई सुखी न देखा, जो देखा सो दुखिया रे
घाट घाट पे सब जग दुखिया, क्या गेही वैरागी रे
साँच कहूँ तो कोई न माने, झूट कह्यो नहिं जाई रे
आसा तृष्णा सब घट व्यापे, कोई न इनसे सूना रे
कहत ‘कबीर’ सभी जग दुखिया, साधु सुखी मन जीता रे

Pyare Mohan Bhatak Na Jau

श्याम से लगन
प्यारे मोहन भटक न जाऊँ
तुम ही हो सर्वस्व श्याम, मैं तुम में ही रम जाऊँ
जब तक जिऊँ तुम्हारे ही हरि! अद्भुत गुण मैं गाऊँ
गा-गा गुण गौरव तब मन में, सदा सदा सरसाऊँ
भूल भरा हूँ नित्यनाथ! मैं तुमसे यही मनाऊँ
सदा प्रेरणा करना ऐसी, तुम्हें न कभी भुलाऊँ
तुम्हने दी है लगन नाथ! तो यह मन कहाँ लगाऊँ
कण कण में तुमको निहार, बस तुम पर प्राण लुटाऊँ

Prabhu Tera Paar Na Paya

शरणागत
प्रभु तेरा पार न पाया
तूँ सर्वज्ञ चराचर सब में, तू चैतन्य समाया
प्राणी-मात्र के तन में किस विधि, तू ही तो है छाया
जीव कहाँ से आये जाये, कोई समझ न पाया
सूर्य चन्द्रमा तारे सब में, ज्योति रूप चमकाया
यह सृष्टि कैसी विचित्र है, उसमें मैं भरमाया
‘ब्रह्मानंद’ शरण में तेरी, छोड़ कुटुंबी आया

Janani Main Na Jiu Bin Ram

भरत की व्यथा
जननी मैं न जीऊँ बिन राम
राम लखन सिया वन को सिधाये, राउ गये सुर धाम
कुटिल कुबुद्धि कैकेय नंदिनि, बसिये न वाके ग्राम
प्रात भये हम ही वन जैहैं, अवध नहीं कछु काम
‘तुलसी’ भरत प्रेम की महिमा, रटत निरंतर नाम

Priti Ki Rit Na Jane Sakhi

प्रीति की रीति
प्रीति की रीत न जाने सखी, वह नन्द को नन्दन साँवरिया
वो गायें चराये यमुना तट, और मुरली मधुर बजावत है
सखियों के संग में केलि करे, दधि लूटत री वह नटवरिया
संग लेकर के वह ग्वाल बाल, मग रोकत है ब्रज नारिन को
तन से चुनरी-पट को झटके, सिर से पटके जल गागरिया
वृन्दावन की वह कुंजन में, गोपिन के संग में रास रचे
पग नुपूर की धुन बाज रही, नित नाचत है मन-मोहनिया
जो भक्तों के सर्वस्व श्याम, ब्रज में वे ही तो विहार करें
‘ब्रह्मानंद’ न कोई जान सके, वह तीनों लोक नचावनिया

Jake Priy Na Ram Vedehi

राम-पद-प्रीति
जाके प्रिय न राम वैदेही
तजिये ताहि कोटि बैरीसम, जद्यपि परम सनेही
तज्यो पिता प्रह्लाद, विभीषन बंधु, भरत महतारी
बलि गुरु तज्यो, कंत ब्रज – बनितनि, भये मुद – मंगलकारी
नाते नेह राम के मनियत सुहृद सुसेव्य जहाँ लौं
अंजन कहाँ आँखि जेहि फूटै, बहुतक कहौं कहाँ लौं
‘तुलसी’ सो सब भाँति परम हित पूज्य प्रान ते प्यारो
जासों होइ सनेह राम – पद, एतो मतो हमारो

Ajahu Na Nikase Pran Kathor

आतुरता
अजहुँ न निकसे प्राण कठोर
दरसन बिना बहुत दिन बीते, सुन्दर प्रीतम मोर
चार प्रहर, चारों युग बीते, भई निराशा घोर
अवधि गई अजहूँ नहिं आये, कतहुँ रहे चितचोर
कबहुँ नैन, मन -भर नहिं देखे, चितवन तुमरी ओर
‘दादू’ ऐसे आतुर विरहिणि, जैसे चाँद चकोर