Hari Dekhe Binu Kal Na Pare

विरह व्यथा
हरि देखे बिनु कल न परै
जा दिन तैं वे दृष्टि परे हैं, क्यों हूँ चित उन तै न टरै
नव कुमार मनमोहन ललना, प्रान जिवन-धन क्यौं बिसरै
सूर गोपाल सनेह न छाँड़ै, देह ध्यान सखि कौन करै

Nar Ho Na Nirash Karo Man Ko

कर्म निष्ठा
नर हो न निराश, करो मन को, बस कर्म करो पुरुषार्थ करो
आ जाय समस्या जीवन में, उद्देश्य हमारा जहाँ सही
साहस करके बढ़ते जाओ, दुष्कर कोई भी कार्य नहीं
संघर्ष भरा यहा जीवन है, आशा को छोड़ो नहीं कभी
मन में नारायण नाम जपो, होओगे निश्चित सफल तभी
जब घिर जाये हम कष्टों से, माने न हार किंचित न डरें
एकलव्य कथा से सुपरिचित, हो नहिं हताश पुरुषार्थ करें
हम धैर्य धरें विश्वास करें, मंगलमय प्रभु का जो विधान
अविरत प्रयास में लीन रहें, शुभ ही करते करुणा-निधान
हरि-नाम स्मरण को नहीं भूले, कठिनाई हल्की हो जाये
कुछ अनुष्ठान प्रायश्चित हो, बाधाएँ सारी मिट जाये 

Nato Nam Ko Mosu Tanak Na Todyo Jay

गाढ़ी प्रीति
नातो नाम को मोसूँ, तनक न तोड्यो जाय
पानाँ ज्यूँ पीली पड़ी रे, लोग कहै पिंड रोग
छाने लँघन मैं कियो रे, श्याम मिलण के जोग
बाबुल वैद बुलाइया रे, पकड़ दिखाई म्हाँरी बाँह
मूरख वैद मरम नहि जाणे, दरद कलेजे माँह
जाओ वैद घर आपणे रे, म्हाँरो नाम न लेय
‘मीराँ’ तो है जरी विरह की, काहे कूँ औषध देय
माँस तो तन को छीजिया रे, शक्ति जरा भी नाहिं
आँगुलियाँ की मूँदड़ी म्हारे, आवण लागी बाँहि

Nishchint Huve Baithe Na Raho

प्रबोधन
निश्चिंत हुए बैठे न रहो
शाश्वत जीवन यहाँ किसका है, पैदा होए वे मरते भी
दिन कभी एक से नहीं रहे, इसका विचार तुम करो अभी
जब जन्म दिवस आता है तो, खुशियाँ सब लोग मनाते हैं
कम वर्ष हो गये जीवन के, समझे जो नहीं पछताते हैं 

Patiyan Main Kaise Likhu Likhi Hi Na Jay

विरह व्यथा
पतियाँ मैं कैसे लिखूँ, लिखि ही न जाई
कलम धरत मेरो कर कंपत है, हियड़ो रह्यो घबराई
बात कहूँ पर कहत न आवै, नैना रहे झर्राई
किस बिधि चरण कमल मैं गहिहौं, सबहि अंग थर्राई
‘मीराँ’ के प्रभु गिरिधर नागर, बेगि मिल्यो अब आई

Purushartha Karo Baithe Na Raho

पुरुषार्थ
पुरुषार्थ करो, बैठे न रहो
जो सोच-विचार करे उद्यम, ईश्वर का नाम हृदय आये
भाग्योदय हो ऐसे जन का, सार्थक जीवन तब हो जाये
उत्साहित हो जो कार्य करे, जीविकोपार्जन कर पाये
ऐसे ही ठाला बैठ रहे, वह तो आखिर में पछताये
वरदान प्रभु का मनुज देह, जो सदुपयोग नहीं कर पाये
वह रहे दरिद्रित आजीवन, पशुवत् अपमानित हो जाये
हो दुरुपयोग जहाँ यौवन का, वह नहीं धनार्जन करवाये
अप्रिय हो जाता घर में भी, जीवन दुखदायी हो जाये
पुरुषार्थ किया जो भगीरथ ने, गंगा को पृथ्वी पर लाये
बालक ध्रुव ने तप किया घोर, ध्रुव लोक राज्य वे ही पाये

Piya Bin Rahyo Na Jay

विरह व्यथा
पिया बिन रह्यो न जाय
तन-मन मेरो पिया पर वारूँ, बार-बार बलि जाय
निस दिन जोऊँ बाट पिया की, कब रे मिलोगे आय
‘मीराँ’ को प्रभु आस तुम्हारी, लीज्यो कण्ठ लगाय

Mo Se Kaha Na Jay Kaha Na Jay

मोहन के गुण
मो से कहा न जाय, कहा न जाय,
मनमोहन के गुण सारे
अविनाशी घट घट वासी, यशुमति नन्द दुलारे
लाखों नयना दरस के प्यासे, वे आँखों के तारे
गोपियन के संग रास रचाये, मुरलीधर मतवारे
शरद पूर्णिमा की रजनी थी, रास रचायो प्यारे
उनके गुण सखि कितने गाऊँ, वे सर्वस्व हमारे 

Rana Ji Ab Na Rahungi Tori Hatki

वैराग्य
राणाजी! अब न रहूँगी तोरी हटकी
साधु-संग मोहि प्यारा लागै, लाज गई घूँघट की
पीहर मेड़ता छोड्यो अपनो, सुरत निरत दोउ चटकी
सतगुरु मुकर दिखाया घट का, नाचुँगी दे दे चुटकी
महल किला कुछ मोहि न चहिये, सारी रेसम-पट की
भई दिवानी ‘मीराँ’ डोलै, केस-लटा सब छिटकी

Rang Darat Laj Na Aai

होली
रंग डारत लाज न आई, नन्दजी के कुँवर कन्हाई
माखन-चोर रसिक मतवारे, गलियन धूम मचाई,
गुलचे खाये भूल गये क्यों, करन लगे ठकुराई
सखि! वाँको शरम न आई
हाथ लकुटिया काँधे कमरिया, बन बन धेनु चराई,
जाति अहीर सबहिं जन जानत, करन लगे ठकुराई
छलिये जानत लोग लुगाई
मात जसोदा ऊखल बाँधे, रोनी सूरति बनाई,
वे दिन अपने भूलि गये सब, करन लगे ठकुराई
कुछ करलो याद कन्हाई