Ab To Hari Nam Lo Lagi

चैतन्य महाप्रभु
अब तो हरी नाम लौ लागी
सब जग को यह माखन चोरा, नाम धर्यो बैरागी
कित छोड़ी वह मोहक मुरली, कित छोड़ी सब गोपी
मूँड मुँडाई डोरी कटि बाँधी, माथे मोहन टोपी
मात जसोमति माखन कारन, बाँधे जाके पाँव
श्याम किसोर भयो नव गौरा, चैतन्य जाको नाँव
पीताम्बर को भाव दिखावे, कटि कोपीन कसै
गौर कृष्ण की दासी ‘मीराँ’ रसना कृष्ण बसै

Jisne Nit Hari Ka Nam Liya

नाम महिमा
जिसने नित हरि का नाम लिया उसने अपना कल्याण किया
जिसने पशु पक्षी प्राणिमात्र का पालन पोषण नित्य किया
चाहे दान किसी को दिया न दिया, भवनिधि को उसने पार किया
सत्संग कथामृत पान किया, आजीवन सबका भला किया
चाहे पूजा पाठ किया न किया पर भक्ति-भाव को प्राप्त किया
गुरु का उपदेश हृदय धर के, आचरण शास्त्र अनुसार किया
चाहे व्रत उपवास किया न किया, मानव जीवन को सफल किया

Nato Nam Ko Mosu Tanak Na Todyo Jay

गाढ़ी प्रीति
नातो नाम को मोसूँ, तनक न तोड्यो जाय
पानाँ ज्यूँ पीली पड़ी रे, लोग कहै पिंड रोग
छाने लँघन मैं कियो रे, श्याम मिलण के जोग
बाबुल वैद बुलाइया रे, पकड़ दिखाई म्हाँरी बाँह
मूरख वैद मरम नहि जाणे, दरद कलेजे माँह
जाओ वैद घर आपणे रे, म्हाँरो नाम न लेय
‘मीराँ’ तो है जरी विरह की, काहे कूँ औषध देय
माँस तो तन को छीजिया रे, शक्ति जरा भी नाहिं
आँगुलियाँ की मूँदड़ी म्हारे, आवण लागी बाँहि

Nam Japan Kyon Chod Diya

नाम-जप
नाम जपन क्यों छोड़ दिया
क्रोध न छोड़ा, झूँठ न छोड़ा, सत्य वचन क्यों छोड़ दिया
झूठे जग में जी ललचा कर, असल देश क्यों छोड़ दिया
कौड़ी को तो खूब सम्भाला, लाल-रतन क्यों छोड़ दिया
जिहि सुमिरन ते अति सुख पावे, सो सुमिरन क्यों छोड़ दिया
रे नर इक भगवान भरोसे, तन-मन-धन क्यों न छोड़ दिया

Ram Nam Ras Pije Manua

श्याम का रंग
राम-नाम रस पीजै, मनुआ! राम-नाम रस पीजै
ताज कुसंग, सत्संग बैठ नित, हरि-चर्चा सुन लीजै
काम, क्रोध, मद लोभ, मोह कूँ बहा चित्त से दीजै
‘मीराँ’ के प्रभु गिरिधर नागर, ताहि के रंग में भीजै

Narayan Ka Nit Nam Japo

कीर्तन महिमा
नारायण का नित नाम जपो, हृदय से मंगलकारी
श्री राम कृष्ण हरि नारायण एक ही स्वरूप संकट हारी
है रामबाण औषधि है सब रोगों का जो शमन करें
प्रभु कीर्तन हो तन्मय हो कर सब चिंताओं को दूर करें
कलि-काल में साधन बड़ा यही हम जपे प्रभु का नाम नित्य
परिवार सहित संकीर्तन हो, वे करुणा सागर शांतिधाम 

Jiv Bas Ram Nam Japna

हरिनाम स्मरण
जीव बस राम नाम जपना, जरा भी मत करना फिकरी
भाग लिखी सो हुई रहेगी, भली बुरी सगरी
ताप करके हिरणाकुश राजा, वर पायो जबरी
लौह लकड़ से मार्यो नाहीं, मर्यौ मौत नख री
तीन लोक ककी माता सीता, रावण जाय हरी
जब लक्षमण ने करी चढ़ाई, लंका गई बिखरी
आठों पहर राम को रटना, ना करना जिकरी
कहत ‘ कबीर’ सुनो भाई साधो, रहना बिन फिकरी

Bhaj Le Pyare Hari Ka Nam

नाम स्मरण
भजले प्यारे हरि का नाम, इसमें लगे न कुछ भी दाम
कर न बुराई कभी किसी की, जप ले मन से हरि का नाम
नयनों से दर्शन हो हरि का, सुनों कान से प्रभु का गान
करो तीर्थ सेवन पैरों से, करो हाथ से समुचित दान
मन बुद्धि श्रद्धा से प्यारे, होय नित्य ही हरि का ध्यान
एकमात्र साधन यह कलि में, शास्त्र संत का यही विधान 

Din Yu Hi Bite Jate Hain Sumiran Kar Le Tu Ram Nam

नाम स्मरण
दिन यूँ ही बीते जाते हैं, सुमिरन करले तूँ राम नाम
लख चौरासी योनी भटका, तब मानुष के तन को पाया
जिन स्वारथ में जीवन खोया, वे अंत समय पछताते हैं
अपना जिसको तूँने समझा, वह झूठे जग की है माया
क्यों हरि का नाम बीसार दिया, सब जीते जी के नाते हैं
विषयों की इच्छा मिटी नहीं, ये नाशवान सुन्दर काया
गिनती के साँस मिले तुझको, जाने पे फिर नहीं आते हैं
सच्चे मन से सुमिरन कर ले, अब तक मूरख मन भरमाया
साधु-संगत करले ‘कबीर’, तो निश्चित ही तर जाते हैं

Main Krishna Nam Ki Chudiyan Pahanu

भरतार श्याम
मैं कृष्ण नाम की चुड़ियाँ पहनूँ, आँख में कजरा डार
गले में मोतियन माला पहनूँ, उनके हित श्रंगार
ऐसे जन को नहीं वरूँ मैं, जो कि जिये दिन चार
मेरे तो भरतार श्याम हैं, उन सँग करूँ विहार
करूँ निछावर जीवन सारा, वे ही प्राणाधार
स्वत्व मिटे, कुछ रहे न मेरा, माया मोह निवार