Re Man Murakh Janam Gawayo

असार संसार
रे मन मूरख जनम गँवायो
करि अभिमान विषय रस राच्यो, श्याम सरन नहिं आयो
यह संसार सुवा सेमर ज्यों, सुन्दर देखि भुलायो
चाखन लाग्यो रूई गई उड़ि, हाथ कछु नहीं आयो
कहा भयो अबके मन सोचे, पहिले पाप कमायो
कहत ‘सूर’ भगवंत भजन बिनु, सिर धुनि धुनि पछितायो

Jivan Ke Din Char Re Man Karo Punya Ke Kam

नाशवान संसार
जीवन के दिन चार रे, मन करो पुण्य के काम
पानी का सा बुदबुदा, जो धरा आदमी नाम
कौल किया था, भजन करूँगा, आन बसाया धाम
हाथी छूटा ठाम से रे, लश्कर करी पुकार
दसों द्वार तो बन्द है, निकल गया असवार
जैसा पानी ओस का, वैसा बस संसार
झिलमिल झिलमिल हो रहा, जात न लागे बार
मक्खी बैठी शहद पे, लिये पंख लपटाय
कहे ‘कबीर’ सुनो भाई साधो, लालच बुरी बलाय

Banar Jabaro Re

लंका दहन (राजस्थानी)
बानर जबरो रे, लंका नगरी में मच गयो हाँको रे
मात सीताजी आज्ञा दीनी, फल खा तूँ पाको रे
कूद पड्यो इतने में तो हनुमत मार फदाको रे
रूख उठाय पटक धरती पर, भोग लगाय फलाँ को रे
राक्षसियाँ अरडावे सारी, काल आ गयो म्हाको रे
उजड़ गई अशोक वाटिका, बिगड़ग्यो सारो खाको रे
हाथ टाँग तोड्या राक्षस का, सिर फोड्या ज्यूँ मटको रे
लुक छिप राक्षस घर में घुसग्या, पड़ गयो फाको रे
जाय पुकार करी रावण सूँ, कुसल नहीं लंका की रे

Koi Kahiyo Re Prabhu Aawan Ki

विरह व्यथा
कोई कहियौ रे प्रभु आवन की, आवन की मन भावन की
आप न आवै, लिख नहिं भेजै, बान पड़ी ललचावन की
ए दोऊ नैन कह्यो नहिं माने, नदियाँ बहे जैसे सावन की
कहा करूँ कछु नहिं बस मेरो, पाँख नहीं उड़ जावन की
‘मीराँ’ के प्रभु कब रे मिलोगे, चेरी भई तेरे दामन की

Pani Main Min Piyasi Re

आत्म ज्ञान
पानी में मीन पियासी रे, मोहे सुन-सुन आवे हाँसी रे
जल थल सागर पूर रहा है, भटकत फिरे उदासी रे
आतम ज्ञान बिना नर भटके, कोऊ मथुरा, कोई कासी रे
गंगा और गोदावरी न्हाये, ज्ञान बिना सब नासी रे
कहत ‘कबीर’ सुनो भाई साधो, सहज मिले अविनासी रे

Chalo Re Man Jamna Ji Ke Tir

यमुना का तीर
चलो रे मन जमनाजी के तीर
जमनाजी को निरमल पाणी, सीतल होत शरीर
बंसी बजावत गावत कान्हो, संग लिये बलबीर
मोर मुकुट पीताम्बर सोहे, कुण्डल झलकत हीर
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, चरण-कँवल पर सीर

Bhajo Re Bhaiya Ram Govind Hari

हरि कीर्तन
भजो रे भैया राम गोविन्द हरी
जप तप साधन कछु नहिं लागत, खरचत नहिं गठरी
संतति संपति सुख के कारण, जासे भूल परी
कहत ‘कबीर’ राम नहिं जा मुख, ता मुख धुल भरी

Jaao Hari Nirmohiya Re

स्वार्थ की प्रीति
जाओ हरि निरमोहिया रे, जाणी थाँरी प्रीत
लगन लगी जब और प्रीत थी, अब कुछ उलटी रीत
अमृत पाय जहर क्यूँ दीजे, कौण गाँव की रीत
‘मीराँ’ कहे प्रभु गिरधर नागर, आप गरज के मीत

Mat Kar Moh Tu Hari Bhajan Ko Man Re

भजन महिमा
मत कर मोह तू, हरि-भजन को मान रे
नयन दिये दरसन करने को, श्रवण दिये सुन ज्ञान रे
वदन दिया हरि गुण गाने को, हाथ दिये कर दान रे
कहत ‘कबीर’ सुनो भाई साधो, कंचन निपजत खान रे

Jogiya Kab Re Miloge Aai

मिलने की आतुरता
जोगिया, कब रे मिलोगे आई
तेरे कारण जोग लियो है, घर-घर अलख जगाई
दिवस न भूख, रैन नहिं निंदियाँ, तुम बिन कछु न सुहाई
‘मीराँ’ के प्रभु गिरिधर नागर, मिल कर तपन बुझाई