Kaha Kahati Tu Mohi Ri Mai

मनोवेग
कहा कहति तू मोहि री माई
नंदनँदन मन हर लियो मेरौ, तब तै मोकों कछु न सुहाई
अब लौं नहिं जानति मैं को ही, कब तैं तू मेरे ढ़िंग आई
कहाँ गेह, कहँ मात पिता हैं, कहाँ सजन गुरुजन कहाँ भाई
कैसी लाज कानि है कैसी, कहा कहती ह्वै ह्वै रिसहाई
अब तौ ‘सूर’ भजी नन्दलालै, के अपशय के होइ बड़ाई

Chabili Radhe Puje Ri Gangour

गणगौर पूजन
छबीली राधे पूजे री गणगौर
ललितादिक सब सखियाँ पहुँची वृषभान की पौर
पारबती शिवजी को पूजन, श्याम सुन्दर मन मोर
सघन कुंज, वृन्दावन अनुपम मिलि गयौ नंद-किसोर
‘नंददास’ प्रभु आय अचानक, घेरी लियो चहुँ ओर  

Khelan Ko Hari Duri Gayo Ri

यशोदा की चिन्ता
खेलन कौं हरि दूरि गयौ री
संग-संग धावत डोलत हैं, कह धौं बहुत अबेर भयौ री
पलक ओट भावत नहिं मोकौं, कहा कहौं तोहि बात
नंदहिं तात-तात कहि बोलत, मोहि कहत है मात
इतनो कहत स्याम-घन आये, ग्वाल सखा सब चीन्हे
दौरि जाइ उर लाइ ‘सूर’ प्रभु, हरषि जसोदा लीन्हे

Rasiya Ko Nar Banao Ri

होली
रसिया को नार बनाओ री, रसिया को
कटि लहँगा, उर माँहि कंचुकी, चूनर आज ओढ़ाओरी
बिंदी भाल नयन में कजरा, नक बेसर पहनाओरी
सजा धजा जसुमति के आगे, याको नाच नचाओरी
होरी में न लाज रहे सखियाँ, मिल कर के आज चिढ़ाओरी 

Dekho Ri Nand Nandan Aawat

श्री चरण
देखौ री नँदनंदन आवत
वृन्दावन तैं धेनु-वृंद बिच, बेनु अधर धर गावत
तन घनश्याम कमल-दल-लोचन, अंग-अंग छबि पावत
कारी-गोरी, धौरी-धूमरि, लै लै नाम बुलावत
बाल गोपाल संग सब सोभित, मिलि कर-पत्र बजावत
‘सूरदास’ मुख निरखत ही मुख, गोपी-प्रेम बढ़ावत

Shri Radhe Pyari De Daro Ri Bansuri

बंसी की चोरी
श्री राधे प्यारी, दे डारो री बाँसुरी मोरी
काहे से गाऊँ राधे, काहे से बजाऊँ, काहे से लाऊँ गैया घेरि
मुखड़े से गाओ कान्हा, ताल बजावो, चुटकी से लाओ गैया घेरि
या बंशी में मेरो प्राण बसत है, सो ही गई अब चोरी
न तो सोने की, ना ही चाँदी की, हरे बाँस की पोरी
कब से ही ठाड़ो राधा अरज करूँ मैं, कैसी गति हुई मोरी
‘चन्द्रसखी’ भज बालकृष्ण छवि, चिरजीवो ये जोरी  

Maiya Ri Tu Inaka Janati

राधा कृष्ण प्रीति
मैया री तू इनका जानति बारम्बार बतायी हो
जमुना तीर काल्हि मैं भूल्यो, बाँह पकड़ी गहि ल्यायी हो
आवत इहाँ तोहि सकुचति है, मैं दे सौंह बुलायी हो
‘सूर’ स्याम ऐसे गुण-आगर, नागरि बहुत रिझायी हो

Sakhi Ri Achraj Ki Yah Baat

अचरज की बात
सखी री! अचरज की यह बात
निर्गुण ब्रह्म सगुन ह्वै आयौ, बृजमें ताहि नचात
पूरन-ब्रह्म अखिल भुवनेश्वर, गति जाकी अज्ञात
ते बृज गोप-ग्वाल सँग खेलत, बन-बन धेनु चरात
जाकूँ बेद नेति कहि गावैं, भेद न जान्यौ जात
सो बृज गोप-बधुन्ह गृह नित ही, चोरी कर दधि खात
शिव-ब्रह्मादि, देव, मुनि, नारद, जाकौ ध्यान लगात
ताकूँ बाँधि जसोदा मैया, लै कर छड़ी डरात  

Maiya Ri Mohi Makhan Bhawe

माखन का स्वाद
मैया री मोहिं माखन भावै
मधु मेवा पकवान मिठाई, मोहिं नहीं रूचि आवै
ब्रज-जुबती इक पाछे ठाढ़ी, सुनति श्याम की बातैं
मन मन कहति कबहुँ अपने घर, देखौं माखन खातैं
बैठे जाय मथनियाँ के ढिंग, मैं तब रहौं छिपानी
‘सूरदास’ प्रभु अंतरजामी, ग्वालिन मन की जानी

Sakhi Ri Sundarta Ko Rang

दिव्य सौन्दर्य
सखी री सुन्दरता को रंग
छिन-छिन माँहि परत छबि औरे, कमल नयन के अंग
स्याम सुभग के ऊपर वारौं, आली, कोटि अनंग
‘सूरदास’ कछु कहत न आवै, गिरा भई अति पंग