Bharat Bhai Kapi Se Urin Ham Nahi

कृतज्ञता
भरत भाई कपि से उऋण हम नाहीं
सौ योजन मर्याद सिन्धु की, लाँघि गयो क्षण माँही
लंका-जारि सिया सुधि लायो, गर्व नहीं मन माँही
शक्तिबाण लग्यो लछमन के, शोर भयो दल माँही
द्रोणगिरि पर्वत ले आयो, भोर होन नहीं पाई
अहिरावण की भुजा उखारी, पैठि गयो मठ माँही
जो भैया, हनुमत नहीं होते, को लावत जग माँही
आज्ञा भंग कबहुँ नहीं कीन्हीं, जहँ पठयऊँ तहँ जाई
‘तुलसिदास’, मारुतसुत महिमा, निज मुख करत बड़ाई

Nav Se Kar Do Ganga Paar

केवट का मनोभाव
नाव से कर दो गंगा पार
भाग्यवान् मैं हूँ निषाद प्रभु लेऊ चरण पखार
जब प्रभु देने लगे मुद्रिका जो केवट का नेग
बोला केवट प्रभु दोनों की जाति ही भी तो एक
चरण कमल के आश्रित हूँ प्रभु करो न लोकाचार
भवसागर के आप हो केवट करना मुझको पार

Jab Se Mohi Nand Nandan Drashti Padyo Mai

मोहन की मोहिनी
जब से मोहि नँद नंदन, दृष्टि पड्यो माई
कहा कहूँ या अनुपम छवि, वरणी नहीं जाई
मोरन की चन्द्रकला शीश मुकुट सोहे
केसर को तिलक भाल तीन लोक मोहे
कुण्डल की झलक तो, कपोलन पर छाई
मानो मीन सरवर तजि, मकर मिलन आई
कुटिल भृकुटि तिलक भाल, चितवन में टौना
खंजन अरु मधुप मीन, भूले मृग छोना
छुद्र घंटि किंकिनी की, मधुर ध्वनि सुहाई
गिरधर के अंग अंग, ‘मीराँ’ बलि जाई

Nishkam Karma Se Shanti Mile

निष्काम कर्म
निष्काम कर्म से शान्ति मिले
जीवन में चाहों के कारण, केवल अशांति मन छायेगी
सुख शांति सुलभ निश्चित, संतृप्ति भाव मन में होगी
सम्मान प्राप्ति का भाव रहे, तो कुण्ठाएँ पैदा होगी
संयम बरते इच्छाओं पर, मन में न निराशा तब होगी
स्वाभाविक जो भी कर्म करें, फल की इच्छा न रखें मन में
संदेश यही गीताजी का, होगी न हताशा जीवन में 

Prabhu Ji The To Chala Gaya Mhara Se Prit Lagay

पविरह व्यथा
प्रभुजी थें तो चला गया, म्हारा से प्रीत लगाय
छोड़ गया बिस्वास हिय में, प्रेम की बाती जलाय
विरह जलधि में छोड़ गया थें, नेह की नाव चलाय
‘मीराँ’ के प्रभु कब रे मिलोगे, तुम बिन रह्यो न जाय

Prabhu Se Jo Sachcha Prem Kare

हरि-भक्ति
प्रभु से जो सच्चा प्रेम करे, भव-सागर को तर जाते हैं
हरिकथा कीर्तन भक्ति करे, अर्पण कर दे सर्वस्व उन्हें
हम एक-निष्ठ उनके प्रति हों, प्रभु परम मित्र हो जाते हैं
लाक्षागृह हो या चीर-हरण, या युद्ध महाभारत का हो
पाण्डव ने उनसे प्रेम किया, वे उनका काम बनाते है
हो सख्य-भाव उनसे अपना, करुणा-निधि उसे निभायेंगे
सुख-दुख की बात कहें उनसे, वे ही विपदा को हरते हैं  

Ek Aur Vah Kshir Nir Main Sukh Se Sowen

श्री राधाकृष्ण
एक ओर वह क्षीर नीर में, सुख से सोवैं
करि के शैया शेष लक्ष्मीजी, जिन पद जोवैं
वे ही राधेश्याम युगल, विहरत कुंजनि में
लोकपाल बनि तऊ चरावत, धेनु वननि में
निज ऐश्वर्य भुलाय कें, करैं अटपटे काम है
तेज पुंज उन कृष्ण को, बारम्बार प्रणाम है

Prabhu Se Priti Badhaye

हरि से प्रीति
प्रभु से प्रीति बढ़ायें
मुरलीधर की छटा मनोहर, मन-मंदिर बस जाये
माया मोह कामनाओं का, दृढ़ बंधन कट जाये
सब सम्बन्धी सुख के संगी, कोई साथ न आये
संकट ग्रस्त गजेन्द्र द्रौपदी, हरि अविलम्ब बचाये
भजन कीर्तन नंद-नन्दन का, विपदा दूर भगाये
अन्त समय जो भाव रहे, चित वैसी ही गति पाये
हरि भक्ति ही साधन जो तब, विपदा कष्ट दुराये

Laga Le Prem Prabhu Se Tu

शरणागति
लगाले प्रेम प्रभु से तू, अगर जो मोक्ष चाहता है
रचा उसने जगत् सारा, पालता वो ही सबको है
वही मालिक है दुनियाँ का, पिता माता विधाता है
नहीं पाताल के अंदर, नहीं आकाश के ऊपर
सदा वो पास है तेरे, ढूँढने क्यों तू जाता है
पड़े जो शरण में उसकी, छोड़ दुनियाँ के लालच को
वो ‘ब्रह्मानन्द’ निश्चय ही, परम सुख-धाम पाता है

Prasannata Prabhu Se Prapta Prasad

प्रसन्नता
प्रसन्नता, प्रभु से प्राप्त प्रसाद
जीवन तो संघर्ष भरा, मिटादे दुःख और अवसाद
अगर खिन्नता आड़े न आये, जीवन भी सुखमय हो
जब प्रसन्न सन्तुष्ट रहें तो, आनन्दमय सब कुछ हो
संग करें उन लोगों का, जो खिले पुष्प से रहते
कथा प्रभु की सुने कहें हम, पूर्ण शांति पा लेते
मनोरोग है चिन्ता भारी, कई कष्ट ले आता
हँसना है उपचार श्रेष्ठ, मन का तनाव भग जाता