Badhai Se Nahi Phulo Man Main

प्रशंसा
बड़ाई से नहिं फूलों मन में
ध्यान न रहता जो भी खामियाँ, रहती हैं अपने में
काम प्रशंसा का जब होए, समझो कृपा प्रभु की
याद रहे कि प्रशंसा तो बस, मीठी घूँट जहर की
नहीं लगाओ गले बड़ाई, दूर सदा ही भागो
होगी श्लाघा बड़े बनोगे, सपने से तुम जागो 

Jab Se Mohi Nand Nandan Drashti Padyo Mai

मोहन की मोहिनी
जब से मोहि नँद नंदन, दृष्टि पड्यो माई
कहा कहूँ या अनुपम छवि, वरणी नहीं जाई
मोरन की चन्द्रकला शीश मुकुट सोहे
केसर को तिलक भाल तीन लोक मोहे
कुण्डल की झलक तो, कपोलन पर छाई
मानो मीन सरवर तजि, मकर मिलन आई
कुटिल भृकुटि तिलक भाल, चितवन में टौना
खंजन अरु मधुप मीन, भूले मृग छोना
छुद्र घंटि किंकिनी की, मधुर ध्वनि सुहाई
गिरधर के अंग अंग, ‘मीराँ’ बलि जाई

Tan Man Se Gopiyan Priti Kare

व्यथित गोपियाँ
तन मन से गोपियाँ प्रीति करें, यही सोच कर प्रगटे मोहन
कटि में पीताम्बर वनमाला और मोर मुकुट भी अति सोहन
कमनीय कपोल, मुस्कान मधुर, अद्वितीय रूप मोहन का था
उत्तेजित कर तब प्रेम भाव जो परमोज्ज्वल अति पावन था
वे कण्ठ लगे उल्लास भरें, श्रीकृष्ण करें क्रीड़ा उनसे
वे लगीं सोचने दुनियाँ मे, कोई न श्रेष्ठ ज्यादा हमसे
जब मान हुआ गोपीजन को, अभिमान शान्त तब करने को
सहसा हरि अंतर्ध्यान हुए, दारुण दुख हुआ गोपियों को

Mat Kar Itana Pyar Tu Tan Se

देह से प्रेम
मत कर इतना प्यार तू तन से, नहीं रहेगा तेरा
बहुत सँवारा इत्र लगाया, और कहे यह मेरा
बढ़िया भोजन नित्य कराया, वस्त्रों का अंबार
बचपन, यौवन बीत गया तब, उतरा मद का भार
पति, पत्नी-बच्चों तक सीमित था तेरा संसार
स्वारथ के साथी जिन पर ही, लूटा रहा सब प्यार
सब कुछ तो नश्वर इस जग में, कहता काल पुकार
तन, धन छोड़ा सभी यहाँ पर, पहुँचा यम के द्वार

Prabhu Ji The To Chala Gaya Mhara Se Prit Lagay

पविरह व्यथा
प्रभुजी थें तो चला गया, म्हारा से प्रीत लगाय
छोड़ गया बिस्वास हिय में, प्रेम की बाती जलाय
विरह जलधि में छोड़ गया थें, नेह की नाव चलाय
‘मीराँ’ के प्रभु कब रे मिलोगे, तुम बिन रह्यो न जाय

Tore Ang Se Ang Mila Ke Kanhai

प्रेम दिवानी
तोरे अंग से अंग मिला के कन्हाई, मैं हो गई काली
मल-मल धोऊँ पर नहीं छूटे, ऐसी छटा निराली
तेरा तन काला और मन काला है, नजर भी तेरी काली
नैनों से जब नैन मिले तो, हो गई मैं मतवाली
तू जैसा तेरी प्रीत भी वैसी, एक से एक निराली
करूँ लाख जतन फिर भी नहीं छूटे, ऐसी मोहिनी डाली
जित देखूँ तित काली घटायें, भूल सकूँ नहीं आली
गोरी से हो गई रे काली, मुझे जब से मिले बनमाली

Mathura Se Shyam Nahin Loute

ज्ञान पर भक्ति की विजय
मथुरा से श्याम नहीं लौटे हैं, दुःखी सब ही ब्रज में
मात यशोदा बाबा नन्द को, लाला की याद आय मन में
मथुरा राजमहल में व्याकुल, रहें सदा ही राधाकान्त
रोक नहीं पाते अपने को रोते थे पाकर एकान्त
ब्रज बालाएँ डूब रहीं थीं, विरह वेदना में दिन रात
उद्धव के अतिरिक्त न कोई, जिसे कहे हरि मन की बात
मैया, बाबा, ब्रज वनिताएँ, दु:खी याद में सब मेरे
तुम्हीं योग्य हो जाओ ब्रज में, समझाना उनको प्यारे
उद्धव ने देखा वहाँ जाकर, कृष्ण-प्रेम विरही ब्रज को
ज्ञान की बात सुने नहीं कोई, समझाना बस अपने को 

Ek Aur Vah Kshir Nir Main Sukh Se Sowen

श्री राधाकृष्ण
एक ओर वह क्षीर नीर में, सुख से सोवैं
करि के शैया शेष लक्ष्मीजी, जिन पद जोवैं
वे ही राधेश्याम युगल, विहरत कुंजनि में
लोकपाल बनि तऊ चरावत, धेनु वननि में
निज ऐश्वर्य भुलाय कें, करैं अटपटे काम है
तेज पुंज उन कृष्ण को, बारम्बार प्रणाम है

Din Dukhi Bhai Bahano Ki Seva Kar Lo Man Se

जनसेवा
दीन दुःखी भाई बहनों की सेवा कर लो मन से
प्रत्युपकार कभी मत चाहो, आशा करो न उनसे
गुप्त रूप से सेवा उत्तम, प्रकट न हो उपकार
बनो कृतज्ञ उसी के जिसने, सेवा की स्वीकार
अपना परिचय उसे न देना, सेवा जिसकी होए
सेवा हो कर्तव्य समझ कर, फ लासक्ति नहीं होए
परहित कर्म करो तन मन से, किन्तु प्रचार न करना
फलासक्ति को तज कर के, बस यही भाव मन रखना

Maya Se Tarna Dustar Hai

माया
माया से तरना दुस्तर है
आसक्ति के प्रति हो असंग, दूषित ममत्व बाहर कर दें
मन को पूरा स्थिर करके, प्रभु सेवा में अर्पित कर दें
पदार्थ सुखी न दुखी करते, व्यर्थ ही भ्रम को मन में रखते
होता न ह्रास वासना का, विपरीत उसकी वृद्धि करते
मन को नहीं खाली छोड़े हम, सत्संग संत से करते हों
उनके कथनों का चिन्तन हो, जिससे मन की परिशुद्धि हो
स्वाध्याय, प्रार्थना, देवार्चन, अथवा दिन में जो कार्य करे
पल भर भी प्रभु को नहीं भूले, मन को उनसे संलग्न करे