Swami Sab Sansar Ka Ji Sancha Shri Bhagwan

संसार के स्वामी
स्वामी सब संसार का जी, साँचा श्री भगवान
दान में महिमा थाँरी देखी, हुई हरि मैं हैरान
दो मुठ्ठी चावल की फाँकी, दे दिया विभव महान
भारत में अर्जुन के आगे, आप हुया रथवान
ना कोई मारे, ना कोई मरतो, यो कोरो अज्ञान
चेतन जीव तो अजर अमर है, गीताजी को ज्ञान
म्हारा पे प्रभु किरपा करजो, दासी अपणी जान
‘मीराँ’ के प्रभु गिरिधर नागर, चरण-कमल में ध्यान

Shri Radhe Pyari De Daro Ri Bansuri

बंसी की चोरी
श्री राधे प्यारी, दे डारो री बाँसुरी मोरी
काहे से गाऊँ राधे, काहे से बजाऊँ, काहे से लाऊँ गैया घेरि
मुखड़े से गाओ कान्हा, ताल बजावो, चुटकी से लाओ गैया घेरि
या बंशी में मेरो प्राण बसत है, सो ही गई अब चोरी
न तो सोने की, ना ही चाँदी की, हरे बाँस की पोरी
कब से ही ठाड़ो राधा अरज करूँ मैं, कैसी गति हुई मोरी
‘चन्द्रसखी’ भज बालकृष्ण छवि, चिरजीवो ये जोरी  

Kar Chintan Shri Krishna Ka

श्री राधाकृष्ण
कर चिन्तन श्रीकृष्ण का, राधावर का ध्यान
अमृत ही अमृत झरे, करुणा-प्रेम निधान
जप तप संयम दान व्रत, साधन विविध प्रकार
श्रीकृष्ण से प्रेम ही, निगमागम का सार
कृष्ण कृष्ण कहते रहो, अमृत-मूरि अनूप
श्रुति-शास्त्र का मधुर फल, रसमय भक्ति स्वरूप
श्रीराधा की भक्ति में निहित प्यास का रूप
आदि अन्त इसमें नहीं, आनन्द अमित अनूप
पद-सरोज में श्याम के, मन भँवरा तज आन
रहे अभी से कैद हो, अन्त समय नहीं भान
कृष्ण प्रिया श्री राधिके, राधा प्रिय घनश्याम
एक सहारा आपका, बंधा रहा नित काम
युगल माधुरी चित चढ़े, राधा-कृष्ण ललाम
हे करुणाकर वास दो, श्री वृन्दावन धाम
श्री वृन्दावन कुंज में, राधा-कृष्ण ललाम
क्रीड़ा नित नूतन करें, अद्वितीय अभिराम

Shobhit Shri Vrindavan Dham

श्री वृन्दावन धाम
शोभित श्री वृन्दावन धाम
यमुनाजी की पावन धारा, क्रीड़ा रत घनश्याम
गिरि गोवर्धन पास यहाँ पर, भ्रमण करे गोपाल
गौएँ चरतीं, मोर नाचते, मुरली शब्द रसाल
मग्न मोर ने पाँख गिराई, सिर पर धरली श्याम
राधा रानी के मयूर ने, करी भेंट अभिराम
धन्य धन्य अनुपम वृन्दावन, जहाँ गोपियों संग
रास रचायो नंदलाल ने, लज्जित भयो अनंग

Van Te Aawat Shri Giridhari

वन से वापसी
वनतैं आवत श्रीगिरिधारी
सबहिं श्रवन दै सुनहु सहेली, बजी बाँसुरी प्यारी
धेनु खुरनि की धुरि उड़त नभ, कोलाहल अति भारी
गावत गीत ग्वाल सब मिलिकें, नाचत बीच बिहारी
मलिन मुखी हम निशि सम नारी, बिनु हरि सदा दुखारी
कृष्णचन्द्र ब्रजचन्द्र खिलें नभ, तब हम चन्द्र उजारी
मिटै ताप संताप तबहिं जब, दृष्टि परैं बनवारी
चलो चलें चित-चोर विलोकें, ठाढ़े कृष्ण मुरारी

Shri Ram Ko Maa Kaikai Ne

राम वनगमन
श्रीराम को माँ कैकयी ने दिया जभी वनवास
उनके मुख पर कहीं निराशा का, न तभी आभास
मात कौसल्या और सुमित्रा विलपे, पिता अचेत
उर्मिला की भी विषम दशा थी, त्यागे लखन निकेत
जटा बनाई वल्कल पहने, निकल पड़े रघुनाथ
जनक-नन्दिनी, लक्ष्मण भाई, गये उन्हीं के साथ
आज अयोध्या के नर नारी, विह्वल और उदास
विदा कर रहे अश्रु नयन में, राम गये वनवास

Chalo Man Shri Vrindavan Dham

राधा कृष्ण
चलो मन श्री वृन्दावन धाम
किसी कुंज या यमुना-तट पे, मिल जायेंगे श्याम
सुन्दर छबिमय मोर-मुकुट में, सातो रंग ललाम
वही सुनहरे पीत-वसन में, शोभित शोभा-धाम
वनमाला के सुमन सुमन में, सुलभ शुद्ध अनुराग
और बाँसुरी की सुर-धुन में, राधा का बस राग
सुन्दरियों संग रास रमण में, प्रेम ज्योति अभिराम
राधा दीखे नँद-नन्दन में, राधा में घनश्याम 

Shri Krishna Ka Virah

श्री चैतन्य महाप्रभु
श्री कृष्ण का विरह आपको आठों ही प्रहर सताये
श्री महाप्रभु चैतन्य वही जो राधा भाव दिखाये
राधा कान्ति कलेवर अनुपम, भक्तों के मन भाये
रोम रोम में हाव भाव में, गीत कृष्ण के गाये
प्रेमावतार महाप्रभु अन्तस में, राधावर छाये
ओत प्रोत है कृष्ण-भक्ति से, जन-मन वही लुभाये

Priti Pagi Shri Ladili Pritam Shyam Sujan

युगल से प्रीति
प्रीति पगी श्री लाड़िली, प्रीतम स्याम सुजान
देखन में दो रूप है, दोऊ एक ही प्रान
ललित लड़ैती लाड़िली, लालन नेह निधान
दोउ दोऊ के रंग रँगे, करहिं प्रीति प्रतिदान
रे मन भटके व्यर्थ ही, जुगल चरण कर राग
जिनहिं परसि ब्रजभूमि को, कन कन भयो प्रयाग
मिले जुगल की कृपा से, पावन प्रीति-प्रसाद
और न अब कछु चाह मन, गयो सकल अवसाद
मेरे प्यारे साँवरे, तुम कित रहे दुराय
आवहु मेरे लाड़िले! प्रान रहे अकुलाय

Shri Ram Jape Ham Kaise Hi

राम नाम महिमा
श्री राम जपें हम कैसे ही
उलटा नाम जपा वाल्मीकि ने, ब्रह्मर्षि हो गये वही
लिया अजामिल ने धोखे से नाम तर गया भवसागर
द्रुपद-सुता जब घिरी विपद् से, लाज बचाई नटनागर
गज, गणिका का काम बन गया, प्रभु-कृपा से ही तो
प्रतीति प्रीति हो दो अक्षर में, श्रीराम मिले उसको तो
रामनाम के पत्थर तर गये, सेतु बँधा सागर में
सेना पहुँच गई लंका में, निशिचर मरे समर में