Avtar Hum Shri Raghav Ka

श्रीराम प्राकट्य
अवतार हुआ श्री राघव का, तो चैत्र-मास की नवमी थी
मौसम सुहावना सुखकारी, तब ऋतु बसंत छवि छाई थी
आनन्द विभोर अयोध्या थी, उन्मुक्त तरंगें सरयू की
हर्षातिरेक से भरी हुई, यह स्थिति मात कौसल्या की
चौथेपन में बेटा पाया, कोसलाधीश को हर्ष हुआ
मन चाहीं भेंट मिली सबको, नाचें गायें दें सभी दुआ
हो गये प्रफुल्लित सुर-गण भी, सब संत, विप्र आनंदित थे
हर्षातिरेक में शिव, ब्रह्मा, ऋषि मुनि सभी रोमांचित थे

Jay Shri Ram Hare

रामचन्द्र आरती
श्री राम हरे ॐ जय रघुवीर हरे
आरती करूँ तुम्हारी, संकट सकल टरे
कौशल्या-सुखवर्धन, नृप दशरथ के प्रान
श्री वैदेही-वल्लभ, भक्तों की प्रभु आन —-ॐ जय …
सत्-चित्-आनन्द रूपा, मनुज रूप धारी
शिव, ब्रह्मा, सुर वन्दित, महिमा अति भारी —-ॐ जय …
श्रीविग्रह की आभा, नव नीरद सम श्याम —-
सुभग सरोरुह लोचन, चितवन सौम्य ललाम —-ॐ जय …
कोटि मदन को लाजत, ॠषि-मुनि मन मोहे
पीताम्बर कटि राजत, रविकर द्युति सोहे —-ॐ जय …
रत्न हार गल शोभित, कुण्डल रुचिकारी —-
राजपाट सुख त्यागे, धनुष बाण धारी —-ॐ जय …
गौतम-नारि अहिल्या, शबरी को तारी —-
शिव धनु भंजत हरषे, मिथिला नर नारी —-ॐ जय …
रावणादि निशिचरगण, संहारे रघुवीर
मर्यादा पुरुषोत्तम, हरो हृदय की पीर —-ॐ जय … 

Prem Ho To Shri Hari Ka

कृष्ण कीर्तन
प्रेम हो तो श्री हरि का प्रेम होना चाहिये
जो बने विषयों के प्रेमी उनपे रोना चाहिये
दिन बिताया ऐश और आराम में तुमने अगर
सदा ही सुमिरन हरि का करके सोना चाहिये
मखमली गद्दों पे सोये तुम यहाँ आराम से
वास्ते लम्बे सफर के कुछ बिछौना चाहिये
छोड़ गफलत को अरे मन, पायी जो गिनती की साँस
भोग और विषयों में फँस, इनको न खोना चाहिये
सब जगह बसते प्रभु पर, प्रेम बिन मिलते नहीं
कृष्ण-कीर्तन में लगा मन, मग्न होना चाहिये

Shri Guru Charan Saroj Raj – Hanuman Chalisa

हनुमान चालीसा
दोहा – श्री गुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुर सुधारि
बरनउँ रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार
बल बुद्धि विद्या देहु मोहि, हरहु कलेस विकार
चौपाई – जय हनुमान ज्ञान गुन सागर, जय कपीस तिहुँ लोक उजागर
राम दूत अतुलित बल धामा, अंजनि पुत्र पवन सुत नामा
महावीर विक्रम बजरंगी, कुमति निवार सुमति के संगी
कंचन बरन बिराज सुवेसा, कानन कुण्डल कुंचित केसा
हाथ बज्र अरु ध्वजा बिराजै ,काँधे मूँज जनेऊ साजै
शंकर सुवन केसरी नन्दन, तेज प्रताप महा जग बन्दन
विद्यावान गुनी अति चातुर, राम काज करिबे को आतुर
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया, राम लखन सीता मन बसिया
सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा, विकट रूप धरि लंक जरावा
भीम रूप धरि असुर सँहारे, रामचंद्र के काज सँवारे
लाय सजीवन लखन जियाये, श्री रघुवीर हरषि उर लाये
रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई, तुम मम प्रिय भरतहिं सम भाई
सहस बदन तुम्हारो जस गावैं, अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा, नारद सारद सहित अहीसा
जम कुबेर दिग्पाल जहाँ ते, कबि कोविद कहि सके कहाँ ते
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा, राम मिलाय राज पद दीन्हा
तुम्हरो मंत्र विभीषन माना, लंकेश्वर भए सब जग जाना
जुग सहस्त्र जोजन पर भानू, लील्यो ताहि मधुर फल जानू
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं, जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं
दुर्गम काज जगत के जेते, सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते
राम दुआरे तुम रखवारे, होत न आज्ञा बिनु पैसारे
सब सुख लहैं तुम्हारी सरना, तुम रक्षक काहू को डरना
आपनु तेज सम्हारौ आपै, तीनों लोक हाँक ते काँपै
भूत पिसाच निकट नहिं आवै, महावीर जब नाम सुनावैं
नासै रोग हरै सब पीरा, जपत निरंतर हनुमत बीरा
संकट तें हनुमान छुड़ावै, मन क्रम वचन ध्यान जो लावै
सब पर राम तपस्वी राजा, तिनके काज, सकल तुम साजा
और मनोरथ जो कोई लावै, सोइ अमित जीवन फल पावै
चारों जुग परताप तुम्हारा, है परसिद्ध जगत उजियारा
साधु संत के तुम रखवारे, असुर निकंदन राम दुलारे
अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता, अस बर दीन जानकी माता
राम रसायन तुम्हरे पासा, सदा रहो रघुपति के दासा
तुम्हरे भजन राम को भावै, जनम जनम के दुख बिसरावै
अंत काल रघुबर पुर जाई, जहाँ जन्म हरि भक्त कहाई
और देवता चित्त न धरई, हनुमत सेई सर्व सुख करई
संकट कटै मिटै सब पीरा, जो सुमिरै हनुमत बलबीरा
जै जै जै हनुमान गोसाईं, कृपा करहु गुरुदेव की नाईं
जो सत बार पाठ कर कोई, छूटहि बंदि महा सुख होई
जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा, होय सिद्धि साखी गौरीसा
‘तुलसीदास’ सदा हरि चेरा, कीजै नाथ ह्रदय मँह डेरा
दोहा- पवनतनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप
राम लखन सीता सहित, ह्रदय बसहु सूर भूप

Shri Krishna Chandra Hi Yogeshwar

योगेश्वर श्रीकृष्ण
श्री कृष्णचन्द्र ही योगेश्वर, जो सभी योगियों के योगी
अध्यात्म साधनों के द्वारा, जुड़ जाता उनसे हर योगी
भगवान कृष्ण की लीलाएँ या कर्म सभी जन हितकारी
हो कर्म, ज्ञान या भक्ति योग, गीतोपदेश मंगलकारी
जो स्वास्थ्य प्रदान करे हमको, सीमित उस तक होता न योग
सर्वत्र शांति संतोष रहे, सुख सुविधा का हो सदुपयोग
भगवान् कृष्ण हैं योगिराज, भारतवासी के कण्ठहार
संदेश-‘अहर्निश सेवा हो’ वे देते, उनको नमस्कार

Anand Kand Shri Krishna Chandra

श्रीकृष्ण सौन्दर्य
आनन्दकन्द श्री कृष्णचन्द्र, सिर मोर-मुकुट की छवि न्यारी
मुसकान मधुर चंचल चितवन, वह रूप विलक्षण मनहारी
कटि में स्वर्णिम पीताम्बर है, शोभा अपूर्व अति सुखकारी
जो कामकला के सागर हैं, नटनागर यमुना-तट चारी
वंशी की मधुर ध्वनि करते, संग में श्री राधा सुकुमारी
गोवर्धन धारण की लीला, वर्णनातीत अति प्रियकारी
कालियानाग के मस्तक पर, वे नृत्य करें विस्मयकारी
हे नारायण, अच्युत, केशव, गोपी-वल्लभ मंगलकारी
हे कर्णधार भवसागर के, हे पूर्णकाम कलिमल हारी

Aarti Kije Shri Raghuvar Ki

राम आरती
आरती कीजै श्री रघुवर की, मर्यादा पुरुषोत्तम राम की
दशरथ-सुत कौसल्या-नंदन, चंद्र-वदन की शोभा भारी
सुर-मुनि-रक्षक, दैत्य-निकंदन, मर्यादित जीवन असुरारी
स्वर्ण-मुकुट मकराकृत कुण्डल, हीरक-हार छटा उजियारी
भुजा विशाल आभरण अनुपम, भाल तिलक की शोभा न्यारी
सूर्य चन्द्र कोटिक छबि लाजै, स्वर्णिम पीताम्बर कटि धारी
धीर वीर प्रभु जानकीवल्लभ, शिव, ब्रह्मा, ऋषि मुनि बलिहारी
सच्चिदानन्द भगवान् राम हैं, भव-भंजन, जन जन हितकारी

Bhaj Man Shri Radhe Gopal

श्रीराधाकृष्ण स्तुति
भज मन श्री राधे गोपाल
स्निग्ध कपोल, अधर-बिंबाफल लोचन परम विशाल
शुक-नासा, भौं दूज-चन्द्र-सम, अति सुंदर है भाल
मुकुट चंद्रिका शीश लसत है, घूँघर वाले बाल
रत्न जटित, कुंडल, कर-कंगन, गल मोतियन की माल
पग नूपुर-मणि-खचित बजत जब, चलत हंस गति चाल
गौर श्याम तनु वसन अमोलक, चंचल नयन विशाल
मृदु मुसकान मनोहर चितवन, गावत गीत रसाल
जिनका ध्यान किये सुख उपजे, दूर होत जंजाल
‘नारायण’ वा छबि को निरखत, पुनि पुनि होत निहाल

Shri Ram Chandra Krapalu Bhaj Man

श्री राम स्तुति
श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन, हरण भवभय दारुणम्
नवकंज-लोचन कंज-मुख कर-कंज पद-कंजारुणम्
कंदर्प अगणित अमित छबि, नव नील-नीरद-सुंदररम
पट-पीत मानहुँ तड़ित रूचि शुचि नौमि जनक-सुतावरम्
भजु दीन-बंधु दिनेश दानव, दैत्य-वंश निकंदनम्
रघुनंद आनंदकंद कौशलचंद दशरथ-नंदनम्
सिर मुकुट, कुण्डल तिलक चारु उदारु अंग विभूषणम्
आजानु भुज, शर-चाप-धरि, संग्राम-जित-खरदूषणम्
इति वदति ‘तुलसीदास’ शंकर-शेष-मुनि-मन रंजनम्
मम ह्रदय कंज निवास कुरु, कामादि खल-दल गंजनम्

Shri Bhagvad Gita Divya Shastra

गीतोपदेश
श्री भगवद्गीता दिव्य शास्त्र जिसमें वेदों का भरा सार
वाणी द्वारा इसका माहात्म्य, अद्भुत कोई पाता न पार
भगवान् कृष्ण-मुख से निसृत, यह अमृत इसका पान करे
स्वाध्याय करे जो गीता का, उसके यह सारे क्लेश हरे
मृगतृष्णा-जल जैसी दुनिया, आसक्ति मोह का त्याग करें
कर्तापन का अभिमान छोड़, हम शास्त्र विहित ही कर्म करें
सच्चिदानन्दघन वासुदेव, हैं व्याप्त पूर्णतः सृष्टि में
निष्काम भाव से कर्म करें, हो योग-क्षेम तब प्राप्त हमें