Shri Krishna Chandra Madhurati Madhur

श्रीकृष्ण का माधुर्य
श्री कृष्णचन्द्र मधुरातिमधुर
है अधर मधुर मुख-कमल मधुर, चितवनी मधुर रुचि-वेश मधुर
है भृकटि मधुर अरु तिलक मधुर, सिर मुकुट मधुर कच कुटिल मधुर
है गमन मधुर अरु नृत्य मधुर, नासिका मधुर नखचन्द्र मधुर
है रमण मधुर अरु हरण मधुर, महारास मधुर संगीत मधुर
है गोप मधुर, गोपियाँ मधुर, संयोग मधुर उद्गार मधुर
है हास्य मधुर मुसकान मधुर, स्पर्श मधुर कर-कमल मधुर
गुंजा-माला, पट-पीत मधुर, यमुना-तट क्रीड़ा भ्रमण मधुर
माखन चोरी, बंशी-वादन, गोचारण गिरिधर चरित मधुर
शुचि वन-विहार रसमय लीला, अरु प्रणय-निरीक्षण भाव मधुर
राधावल्लभ घनश्याम मधुर, किंकिणी मधुर नूपुर मधुर
न्योछावर कोटि मदन शोभा, राधिका कृष्ण मधुरातिमधुर

Rup Rasi Shri Radha Rani

श्री राधा
रूपरासि श्री राधा रानी
मोहन की मन मोहिनि भामिनि, सखियन की स्वामिनी सुखदानी
कनक कान्ति कमनीय कलेवर, तापै नील निचोल सुहानी
चंद्रवदन पे चारु चन्द्रिका, चहुँ दिसि अहो छटा छिटकानी
कनक करधनी सोहै अनुपम, रतन जटित नहिं जात बखानी
पायन की पायल की रुनझुन, सुनि मुनिजन की मति बौरानी
मोहन हूँ की सोहनी स्वामिनि, याँकी छबि को कहे बखानी
स्वयं गिरा की होत न गति जहँ, जो सिंगार सार सुख दानी

Shri Vishnu Dattatrey Hi

भगवान दत्तात्रेय
श्री विष्णु दत्तात्रेय ही, सादर नमन उनको करुँ
रहते दिगम्बर वेष में, अज्ञान हरते सद्गुरु
दुख दूर करने प्राणियों का, तप किया मुनि अत्रि ने
बेटा बनूँगा आपका, बोला प्रकट हो विष्णु ने
आत्रेय माता अनसुया, जिनमें अहं निःशेष था
सर्वोच्च सती के रूप में, प्रख्यात उनका नाम था
सती धर्म की लेने परीक्षा, ब्रह्मा हरि हर आ गये
सामर्थ्य सती का था प्रबल, नवजात शिशु वे हो गये
अपना पिलाया दूध माँ ने, पूर्ववत् उनको किया
‘माँ! पुत्र होंगे हम तुम्हारे’, वरदान तीनों ने दिया
माँ अनसुया आत्रेय का, जय घोष श्रद्धा से करें
उपदेश व आदर्श उनका, हृदय में अपने धरें
श्री दत्त योगीराज थे, सिद्धों के परमाचार्य थे
निर्लोभ वे उपदेश दे, इसलिए गुरुदत्त थे
आह्लदकारी चन्द्रमा सा, वर्ण दत्तात्रेय का
काली जटा तन भस्म धारे, निर्देश देते ज्ञान का

Jo Param Shant Shri Lakshmikant

श्री नारायण स्तुति
जो परम शांत श्री लक्ष्मी-कांत, जो शेष-नाग पर शयन करें
वे पद्मनाभ देवाधिदेव, वे जन्म मरण का कष्ट हरें
है नील मेघ सम श्याम वर्ण, पीताम्बर जिनके कटि राजे
हे अंग सभी जिनके सुन्दर, शोभा पे कोटि मदन लाजे
ब्रह्मादि देव अरू योगी जन, जिनका हृदय में धरे ध्यान
वे कमल नयन सच्चिदानन्द, सब वेद-उपनिषद करें गान
वे शंख चक्र अरु, गदा पद्म, धारण करते कर कमलों में
मैं सादर उन्हें प्रणाम करूँ, जो नारायण जड़ चेतन में

Shri Krishna Kahte Raho

श्रीकृष्ण-भक्ति
श्री कृष्ण कहते रहो, अमृत-मूर्ति अनूप
श्रुति शास्त्र का मधुर फल, रसमय भक्ति स्वरूप
कर चिन्तन श्रीकृष्ण का, लीलादिक का ध्यान
अमृत ही अमृत झरे, करुणा प्रेम-निधान
कण-कण में जहाँ व्याप्त है, श्यामा श्याम स्वरूप
उस वृन्दावन धाम की, शोभा अमित अनूप
जप-तप-संयम, दान, व्रत, साधन विविध प्रकार
मुरलीधर से प्रेम ही, निगमाम का सार
जय जसुमति के लाड़ले, जय ब्रजेश नन्दलाल
वासुदेव देवकी-तनय, बालकृष्ण गोपाल
जो सुलभ्य प्रारब्ध से, उसमें कर सन्तोष
तृषा त्याग निश दिन करो, कृष्ण नाम का घोष
नाम स्मरण लवलीन हो, करलो मन को शुद्ध
अन्तकाल त्रिदोष से, कण्ठ होय अवरुद्ध
पद-सरोज में श्याम के, मन भँवरा तज आन
रहो अभी से कैद हो, अन्त समय नहीं भान
प्रेम कृष्ण का रूप है, मत कर जग से प्रेम
कृष्ण भक्ति में मन लगा, वही करेंगे क्षेम
भक्ति के आरम्भ का, पहला पद हरि-नाम
मधुसूदन श्रीकृष्ण को, भज मन आठों याम
लौकिक सुख को त्याग के, भजो सच्चिदानन्द
गोविंद के गुण-गान से, मिट जाये हर द्वन्द
श्रीराधा की भक्ति में, निहित प्यास का रूप
आदि अन्त इसमें नहीं, आनँद अमित अनूप

Vando Shri Radha Charan

युगल स्वरूप झाँकी
वन्दौं श्री राधाचरन, पावन परम उदार
भय विषाद अज्ञानहर, प्रेम भक्ति दातार
रास-बिहारिनि राधिका, रासेश्वर नँद-लाल
ठाढ़े सुंदरतम परम, मंडल रास रसाल
मधुर अधर मुरली धरे, ठाढ़े स्याम त्रिभंग
राधा उर उमग्यौ सु-रस रोमांचित अँग-अंग
विश्वविमोहिनी श्याम की, मनमोहिनि रसधाम
श्याम चित्त उन्मादिनी, राधा नित्य ललाम
परम प्रेम-आनंदमय, दिव्य जुगल रस-रूप
कालिंदी-तट कदँब-तल, सुषमा अमित अनूप
सुधा-मधुर-सौंदर्य निधि, छलकि रहे अँग-अँग
उठत ललित पलपल विपुल, नव नव रूप तरंग
स्याम स्वामिनी राधिके! करौ कृपा को दान
सुनत रहैं मुरली मधुर, मधुमय बानी कान
करौ कृपा श्री राधिका! बिनवौं बारम्बार
बनी रहे स्मृति मधुर, मंगलमय सुखसार

Shri Vrindavan Bhakti Ka

श्री वृन्दावन महिमा
श्रीवृन्दावन भक्ति का, अनुपम रसमय धाम
महिमा अपरम्पार है, कण कण राधे श्याम
वृन्दावन अनुराग का, केन्द्र श्रेष्ठ सुख-वास
यमुनाजी के पुलिन पर, श्याम रचाये रास
नाम, धाम, लीला सभी, श्रीहरि के ही रूप
ब्रज चौरासी कोस में, वृन्दा-विपिन अनूप
श्रीवृन्दावन कुंज में, विहरें श्यामा श्याम
क्रीड़ा नित नूतन करें, सुखद रूप अभिराम
गोवर्धन मथुरा यथा बरसाना, नंदग्राम
किन्तु रासलीला करें, वृन्दावन में श्याम
यद्यपि तीर्थ सब हैं बड़े, काशी, पुरी, प्रयाग
वृन्दावन में राधिका-कृष्ण भक्ति अनुराग
जिनको भी संसार में लगा ‘ज्ञान’ का रोग
वृन्दावन का रस उन्हें, दुलर्भ यह संयोग
वृन्दावन की धूल को, ब्रह्मादिक तरसाय
लोकपाल और देवता, सबका मन ललचाय
वृन्दावन का वास हो, मन में गोपी भाव
रस का आस्वादन करें, मिटे और सब चाव
उद्धवजी वर माँगते, हे गोविन्द घनश्याम
गुल्म-लता होके रहूँ , वृन्दाविपिन ललाम
वृन्दावन में बसत हैं, साधू सन्त समाज
राधे राधे सब कहें, श्री राधे का राज

Jhula Jhule Shri Giridhari

झूला
झूला झूले श्री गिरधारी
मणिमय जटित हिंडोला बैठे, संग में प्राण पियारी
वाम भाग सोहत श्री राधा, पहन लहरिया सारी
शीतल मन्द सुगन्धित वायु, श्याम घटा मनहारी
कोकिल मोर पपीहा बोले, मधुर गान सुखकारी
फूल-हार, फूलों का गजरा, युगल रूप छबि न्यारी

Shri Krishnarjun Samvad Divya

श्रीमद्भगवद्गीता
श्री कृष्णार्जुन संवाद दिव्य, गीता ने हमें प्रदान किया
कालजयी यह ग्रंथ सभी धर्मों को समन्वित ज्ञान दिया
हर देश परिस्थिति में रचना, मानव को मार्ग दिखाती है
सर्वोत्कृष्ट यह ऐसी कृति, जो सदा प्रेरणा देती है
निन्दा, स्तुति, मानापमान, जो द्वन्द्व मचायें जीवन में
दुविधा में जब भी पड़ें कभी, जायें गीता के आश्रय में
जो गुणातीत हो, योग-क्षेम भगवान् स्वयं करते उसका
स्वाध्याय करें हम गीता का, दर्शन यह मानव के हित का
जो कार्य करें हम जीवन में, वह प्रभु को सदा समर्पित हो
किंचित न कामना फल की हो, बुद्धि संकल्पित स्थिर हो
सुख-दुख हो चाहे हानि लाभ, सम भाव रहें, निश्चल मन हो
शास्त्रानुसार निर्दिष्ट कर्म, निस्संग रूप में हम से हो  

Adbhut Shri Vrindavan Dham

वृन्दावन
धामअद्भुत श्री वृन्दावन धाम
यमुनाजी की धारा बहती, केलि राधिका श्याम
मुरली की ध्वनि मधुर गूँजती और नाचते मोर
इकटक निरख रहे पशु पक्षी, नटवर नन्द-किशोर
बंशी स्वर, मयूर नृत्य में, स्पर्धा रुचिकारी
पाँख मोर की निकल पड़ी, तो मोहन सिर पर धारी
राधारानी के मयूर की, भेंट मिली कान्हा को
इसीलिये सहर्ष श्याम ने, स्वीकारी है इसको