Shyam Kahat Puja Giri Mani

अन्नकूट
श्याम कहत पूजा गिरि मानी
जो तुम भाव-भक्ति सों अरप्यो, देवराज सब जानी
तुम देखत भोजन सब कीनो, अब तुम मोहि प्रत्याने
बड़ो देव गिरिराज गोवर्धन, इनहि रहो तुम माने
सेवा भली करी तुम मेरी, देव कही यह बानी
‘सूर’ नंद मुख चुंबत हरि को, यह पूजा तुम ठानी

Shyam Milan Ro Ghano Umavo

मिलन की प्यास
श्याम मिलणरो घणो उमावो, नित उठ जोऊँ बाट
लगी लगन छूटँण की नाहीं, अब कुणसी है आँट
बीत रह्या दिन तड़फत यूँ ही, पड़ी विरह की फाँस
नैण दुखी दरसण कूँ तरसै, नाभि न बैठे साँस
रात दिवस हिय दुःखी मेरो, कब हरि आवे पास
‘मीराँ’ के प्रभु कब रे मिलोगे, पूरवो मन की आस

Dudh Piwat Shyam Sundar

दुग्ध सेवा
दूध पीवत श्याम सुन्दर, प्राण प्यारी साथ
कनक प्यालो दूध को भर, दियो ललिता हाथ
पुलकित हो पीवत दोऊ, मुग्ध अति सुहात
लाड़िली और लाल मोहन, हँसत नहीं अघात
स्याम स्यामा की-छबि पे गोपियाँ बलि जात

Sandesha Shyam Ka Le Kar

गोपियों का वियोग
संदेशा, श्याम का लेकर, उधोजी ब्रज में आये हैं
कहा है श्यामसुन्दर ने गोपियों दूर मैं नहीं हूँ
सभी में आत्मवत् हूँ मैं, चेतना मैं ही सबकी हूँ
निरन्तर ध्यान हो मेरा, रखो मन पास में मेरे
वृत्तियों से रहित होकर, रहोगी तुम निकट मेरे
गोपियों ने कहा ऊधो, सिखाते योग विद्या अब
मिलें निर्गुण से कैसे हम, ज्ञान की व्यर्थ बातें सब
उधोजी! सुधा अधरों की पिलाई, हम को प्यारे ने
संग में रासलीला की, लगीं फिर बिलख कर रोने
कहा फिर श्याम की चितवन, सभी को वश में करतीं है
चुराया चित्त हम सबका, नहीं हम भूल सकतीं है
चढ़ाई सिर पे उद्धव ने, चरण-रज गोपियों की है
सुनाई श्याम को जाके, दशा जो गोपियों की है  

Shyam Tan Shyam Man Shyam Hai Hamaro Dhan

प्राण धन
श्याम तन, श्याम मन, श्याम है हमारो धन
आठो जाम ऊधौ हमें, श्याम ही सो काम है
श्याम हिये, श्याम तिये, श्याम बिनु नाहिं जियें
आँधे की सी लाकरी, अधार श्याम नाम है
श्याम गति, श्याम मति, श्याम ही है प्रानपति
श्याम सुखदाई सो भलाई सोभाधाम है
ऊधौ तुम भये बौरे, पाती लैकै आये दौरे
‘सूर’ जोग राखें कहाँ ! रोम-रोम स्याम है

Shyam Mohi Mat Tarsavo Ji

विरह व्यथा
श्याम मोहि मत तरसावोजी
तुम्हरे कारन सब सुख छोड्या, अब क्यूँ देर लगावोजी
विरह विथा लागी उर अंतर, सो तुम आय बुझावोजी
अब मत छोड़ो मोहि प्रभुजी, हँस कर तुरत बुलावोजी
‘मीराँ’ दासी जनम-जनम की, अंग से अंग मिलावोजी

Dhuri Bhare Ati Shobhit Shyam Ju

श्री बालकृष्ण माधुर्य
धूरि-भरे अति शोभित स्यामजू, तैसी बनी सिर सुंदर चोटी
खेलत-खात फिरै अँगना, पग पैंजनी बाजति, पीरी कछौटी
वा छबि को रसखानि बिलोकत, बारत काम कलानिधि कोटी
काग के भाग कहा कहिए हरि, हाथ सों लै गयो माखन रोटी
शेष, महेश, गनेश, दिनेस, सुरेशहु जाहि निरन्तर गावैं
जाहि अनादि अखण्ड अछेद, अभेद सुवेद बतावैं
नारद से शुक्र व्यास रटैं पचि हारे तऊ पुनि पार न पावैं
ताहि अहीर की छोहरियाँ, छछिया भरि छाछ पै नाथ नचावैं
टेरत हेरत हारि पर्यौ, रसखानि बतायो न लोग लुगायन
देखो,दुर्यौ वह कुंज-कुटीर में, बैठ्यौ पलोटन राधिका पायन 

Sundar Shyam Piya Ki Jori

राधा-कृष्ण माधुरी
सुन्दर स्याम पिया की जोरी
रोम रोम सुंदरता निरखत, आनँद उमँग बह्योरी
वे मधुकर ए कुंज कली, वे चतुर एहू नहिं भोरी
प्रीति परस्पर करि दोउ सुख, बात जतन की जोरी
वृंदावन वे, सिसु तमाल ए, कनक लता सी गोरी
‘सूर’ किसोर नवल नागर ए, नागरि नवल-किसोरी

Shyam Binu Rahyo Na Jay

विरह व्यथा
स्याम बिनु रह्यो न जाय
खान पानमोहि फीको लागे, नैणा रहे मुरझाय
बार बार मैं अरज करूँ छूँ, रैण गई दिन जाय
‘मीराँ’ कहे हरि तुम मिलिया बिन, तरस तरस तन जाय

Nana Vidhi Lila Karen Shyam

भक्त के भगवान
नाना विधि लीला करें स्याम
श्री हरि की शरण गजेन्द्र गया, जभी ग्राह ने जकड़ लिया
विनती को सुन फौरन पहुँचे और ग्राह से मुक्त किया
द्रुपत सुता का चीर खिंच रहा बोली-‘आस तिहारी’
लिया वस्त्र अवतार बचाई, लाज तभी गिरधारी
नहीं उठाऊँ शस्त्र युद्ध में, यह केशव की बान
तोड़ प्रतिज्ञा लिया सुदर्शन, रखा भीष्म का मान
महाभारत के युद्धस्थल में, पार्थ सारथी बनके
विजय दिलाई पाण्डव जन को, श्याम सखा जो उनके
सागर-मंथन हुआ असुर-सुर, कियो परिश्रम भारी
मोहिनी रूप धरा देवों को सुधा पिलाई न्यारी
दुर्योधन का मेवा त्याग्या साग विदुर घर पाई
केले के छिलके हरि खायें, ऐसी प्रेम सगाई
तुलसी मीरा सूरदास ने इनकी गाथा गाई
श्रवण किया श्रद्धा से जिसने, कृष्ण भक्ति को पाई