Ab To Sanjh Bit Rahi Shyam

होली
अब तो साँझ बीत रही श्याम, छोड़ो बहियाँ मोरी
तुम ठहरे ब्रजराज कुँवरजी, हम ग्वालिन अति भोरी
आनंद मगन कहूँ मैं मोहन,अब तो जाऊँ पौरी
लाज बचेगी मोरी
सास, ननद के चुपके छाने, तुम संग खेली होरी
अँगुली पकरत पहुँचो पकरयो और करी बरजोरी
हम हैं ब्रज की छोरी
मीठी-मीठी तान बजाकर, लेन सखिन चित चोरी
‘सूरदास’ प्रभु कुँवर कन्हाई, मुख लपटावत रोरी
बोलत हो हो होरी

Baje Baje Re Shyam Teri Pejaniyan

श्याम की पैंजनियाँ
बाजे-बाजे रे स्याम तेरी पैजनियाँ
माता यशोदा चलन सिखावत, उँगली पकड़ कर दो जनियाँ
राजत अनुपम लाल झगुला, पीट बरन सुन्दर तनिया
‘मीराँ’ के प्रभु गिरिधर नागर, तीन लोक के तुम धनिया

Shyam Ne Kaha Thagori Dari

श्याम की ठगौरी
स्याम ने कहा ठगोरी डारी
बिसरे धरम-करम, कुल-परिजन, लोक साज गई सारी
गई हुती मैं जमुना तट पर, जल भरिबे लै मटकी
देखत स्याम कमल-दल-लोचन, दृष्टि तुरत ही अटकी
मो तन मुरि मुसुकाए मनसिज, मोहन नंद-किसोर
तेहि छिन चोरि लियौ मन सरबस, परम चतुर चित-चोर

Shiva Shiv Bane Radhika Shyam

शिवाशिव महिमा
शिवा शिव बने राधिका श्याम
एक बार कैलाश धाम में, शंकर दुर्गा संग
करने लगे विहार वहाँ पर, अतिशय अद्भुत ढंग
रूप मनोहर अति देवी का, मुग्ध हुए शिवशंकर
लगे सोचने नारी को यह, रूप मिला अति सुन्दर
शिव बोले मैं बनूँ राधिका, तुम नँदनंदन प्यारी
बने प्रभु वृषभानुनंदिनी, दक्षसुता गिरिधारी
देव देवियों ने भी तत्पर, लिया वहाँ अवतार
राधा कृष्ण रूप देवी शिव, हरे धरा का भार
यह प्रसंग ‘देवी-पुराण’ का, पढ़े सुने चित लाय
धुले सर्वथा मैल हृदय का, भक्तों के मन भाय

Aai Chak Bulaye Shyam

वन भोजन
आई छाक बुलाये स्याम
यह सुनि सखा सबहि जुरि आये, सुबल, सुदामा अरु श्रीदाम
कमलपत्र दोना पलास के, सब आगे धरि परसत जात
ग्वाल मंडली मध्य स्याम घन, सब मिलि भोजन रूचि सो खात
ऐसी भूख बीच यह भोजन, पठा दियौ जो जसुमति मात
‘सूर’,स्याम अपनो नहिं जेंवत, ग्वालन कर तें लै लै खात

Baadar Dekh Dari Shyam

बादल देख डरी
बादर देख डरी हो श्याम! मैं तो बादर देख डरी
काली-पीली घटा उमड़ी, बरस्यो एक घरी
जित जाऊँ तित पानी ही पानी, भई सब भोम हरी
जाको पिव परदेस बसत है, भीजै बार खरी
‘मीराँ’ के प्रभु गिरिधर नागर,कीज्यो प्रीत खरी

Aaj Sakhi Shyam Sundar

मुरली का जादू
आज सखी श्याम सुंदर बाँसुरी बजाये
मोर-मुकुट तिलक भाल, पग में नूपुर सुहाये
बिम्बाधर मुरलीधर, मधुर धुन सुनाये
यमुना को रुकत नीर, पक्षीगण मौन भये
धेनू मुख घास डार, धुनि में मन लाये
त्रिभुवन में गूँज उठी, मुरली की मधुर तान
समाधि भी गई टूट, योगी मन भाये
बंशी-स्वर सुन अपार, भूले मुनि मन विचार
‘ब्रह्मानंद’ गोपीजन, तन सुधि बिसराये

Shyam Tumhara Rup Anutha

अनूठा रूप
श्याम तुम्हारा रूप अनूठा, कोटि अनंग लजाये
चंचल चितवन कमल-नयन से, प्रेम सरस बरसाये
स्निग्ध कपोल अरुणिमा जिनकी, दर्पण सम दमकाये
मोर-मुकुट शीश पर शोभित, केश राशि लहराये
कमनीय अंग किशोर मूर्ति के, दर्शन मन सरसाये
पान करे गोपीजन प्रति पल, फिर भी नहीं अघाये
ऐसा अद्भुत ज्योति-पुंज जो, मन का तिमिर भगाये
झलक दिखादो हमको प्यारे! धन्य जीवन हो जाये  

Bujhat Shyam Kon Tu Gori

राधा कृष्ण भेंट
बूझत श्याम कौन तूँ गोरी
कहाँ रहति काकी है बेटी, देखी नहीं कहूँ ब्रज खोरी
काहे को हम ब्रजतन आवति, खेलति रहति आपनी पोरी
सुनति रहति श्रवननि नंद ढोटा, करत रहत माखन दधि-चोरी
तुम्हरो कहा चोरि हम लैहैं, खेलन चलो संग मिलि जोरी
‘सूरदास’ प्रभु रसिक सिरोमनि, बातनि भुरइ राधिका भोरी

Manmohan Shyam Hamara

श्याम की पाती
मनमोहन श्याम हमारा
निर्मल नीरा जमुन को त्याग्यौ, जाय पियौ जल खारा
आप तो जाय द्वारका छाए, हमें छाँड़ि माझ धारा
लिखि लिखि पाती भेजुँ स्याम कूँ, बाँचौ प्रीतम प्यारा
‘मीराँ’ के प्रभु हरि अविनासी, जीवन प्राण आधारा