Tu Dayalu Din Ho Tu Dani Ho Bhikhari

शरणागति
तू दयालु, दीन हौं, तू दानि, हौं भिखारी
हौं प्रसिद्ध पातकी, तू पाप – पुंज – हारी
नाथ तू अनाथ को, अनाथ कौन मोसो
मो समान आरत नहिं, आरतहर तोसो
ब्रह्म तू, हौं जीव, तू ठाकुर, हौं चेरो
तात, मात, गुरु, सखा तू, सब बिधि हितू मेरो
तोहि मोहिं नाते अनेक, मानियै जो भावै
ज्यों – त्यों ‘तुलसी’, कृपालु! चरन – सरन पावै

Tu Ga Le Prabhu Ke Geet

हरि भजन
तूँ गा ले प्रभु के गीत
दुनिया एक मुसाफिर खाना, जाना एक दिन छोड़ के
मात-पिता बंधु सुत पत्नी, सब से नाता तोड़ के
एक दिन ये सुन्दर घर तेरा मिट्टी में मिल जाएगा
तुझे अचानक ले जाने को, काल एक दिन आएगा
अब तो होश सँभालो प्यारे, व्यर्थ ही समय गँवाओ ना
हीरे जैसा नर तनु पाया, कोड़ी मोल लुटाओ ना

Mamta Tu N Gai Mere Man Te

वृद्ध अवस्था
ममता तू न गई मेरे मन तें
पाके केस जनम के साथी, लाज गई लोकन तें
तन थाके कर कंपन लागे, ज्योति गई नैनन तें
श्रवण वचन न सुनत काहू के, बल गये सब इन्द्रिन तें
टूटे दाँत वचन नहिं आवत, सोभा गई मुखन तें
भाई बंधु सब परम पियारे, नारि निकारत घर तें
‘तुलसिदास’ बलि जाऊँ चरनते, लोभ पराये धन तें

Tu So Raha Ab Tak Musafir

चेतावनी
तूँ सो रहा अब तक मुसाफिर, जागता है क्यों नहीं
था व्यस्त कारोबार में,अब भोग में खोया कहीं
मोहवश जैसे पतिंगा, दीपक की लौ में जल मरे
मतिमान तूँ घर बार में फिर, प्रीति इतनी क्यों करे
लालच में पड़ता कीर ज्यों, पिंजरे में उसका हाल ज्यों
फिर भी उलझता जा रहा, संसार माया जाल क्यों
भगवान का आश्रय ग्रहण जग से नाता तोड़ दें
प्राणियों के वे सुहद, भव-निधि से तुझको तार दे  

Kaha Kahati Tu Mohi Ri Mai

मनोवेग
कहा कहति तू मोहि री माई
नंदनँदन मन हर लियो मेरौ, तब तै मोकों कछु न सुहाई
अब लौं नहिं जानति मैं को ही, कब तैं तू मेरे ढ़िंग आई
कहाँ गेह, कहँ मात पिता हैं, कहाँ सजन गुरुजन कहाँ भाई
कैसी लाज कानि है कैसी, कहा कहती ह्वै ह्वै रिसहाई
अब तौ ‘सूर’ भजी नन्दलालै, के अपशय के होइ बड़ाई

Budhapa Bairi Tu Kyon Kare Takor

वृद्धा अवस्था
बुढ़ापा बैरी, तूँ क्यों करे टकोर
यौवन में जो साथ रहे, वे स्नेही बने कठोर
जीर्ण हो गया अब तन सारा, रोग व दर्द सताते
गई शक्ति बोलो कुछ भी तो, ध्यान कोई ना देते
चेत चेत रे मनवा अब तो, छोड़ सभी भोगों को
राम-कृष्ण का भजन किये बिन, ठोर नहीं हैं तुझको 

Kyon Tu Govind Nam Bisaro

नाम स्मरण
क्यौं तू गोविंद नाम बिसारौ
अजहूँ चेति, भजन करि हरि कौ, काल फिरत सिर ऊपर भारौ
धन-सुत दारा काम न आवै, जिनहिं लागि आपुनपौ हारौ
‘सूरदास’ भगवंत-भजन बिनु, चल्यो पछिताइ नयन जल ढारौ

Bhula Raha Hai Tu Youwan Main

नवधा भक्ति
भूला रहा तू यौवन में, क्यों नहीं समझता अभिमानी
तू राग, द्वेष, सुख, माया में, तल्लीन हो रहा अज्ञानी
जो विश्वसृजक करुणासागर की तन्मय होकर भक्ति करे
प्रतिपाल वहीं तो भक्तों के, सारे संकट को दूर करें
हरि स्मरण कीर्तन, दास्य, सख्य, पूजा और आत्मनिवेदन हो
हरि-कथा श्रवण हो, वन्दन हो, अरु संतचरण का सेवन हो
ये नवधा भक्ति के प्रकार, जिनकी मन में अभिलाषा हो
हो तीर्थ, दान, व्रत जीवन में, इनके प्रति भी उत्कण्ठा हो

Jo Tu Krishna Nam Dhan Dharto

नाम महिमा
जो तूँ कृष्ण नाम धन धरतो
अब को जनम आगिलो तेरो, दोऊ जनम सुधरतो
जन को त्रास सबै मिटि जातो, भगत नाँउ तेरो परतो
‘सूरदास’ बैकुण्ठ लोक में, कोई न फेंट पकरतो

Mat Kar Itana Pyar Tu Tan Se

देह से प्रेम
मत कर इतना प्यार तू तन से, नहीं रहेगा तेरा
बहुत सँवारा इत्र लगाया, और कहे यह मेरा
बढ़िया भोजन नित्य कराया, वस्त्रों का अंबार
बचपन, यौवन बीत गया तब, उतरा मद का भार
पति, पत्नी-बच्चों तक सीमित था तेरा संसार
स्वारथ के साथी जिन पर ही, लूटा रहा सब प्यार
सब कुछ तो नश्वर इस जग में, कहता काल पुकार
तन, धन छोड़ा सभी यहाँ पर, पहुँचा यम के द्वार