Jagahu Jagahu Nand Kumar

प्रभाती
जागहु जागहु नंद-कुमार
रवि बहु चढ्यो रैन सब निघटी, उचटे सकल किवार
ग्वाल-बाल सब खड़े द्वार पै, उठ मेरे प्रानअधार
घर घर गोपी दही बिलोवै, कर कंकन झंकार
साँझ दुहां तुम कह्यो गाईकौं, तामें होति अबार
‘सूरदास’ प्रभु उठे तुरत ही, लीला अगम अपार

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